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		<title>भगवान बुद्ध यह जूठन आपके लिए</title>
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		<pubDate>Sun, 14 Mar 2010 19:54:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[फोटो गैलरी]]></category>
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		<description><![CDATA[भगवान बुद्ध के प्रति हममें से किसकी श्रद्धा नहीं होगी? शांति और अहिंसा के अद्वितीय उपदेशक के प्रति हर व्यक्ति के मन में स्वाभाविक श्रद्धा होनी ही चाहिए. भारतीय लोग तो बुद्ध के प्रति श्रद्धा दिखाते नहीं थकते. नौजवान पीढ़ी तो खासकर बुद्ध को बतौर फैशन बात करती है. लेकिन इसी नौजवान समाज के कुछ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>भगवान बुद्ध के प्रति हममें से किसकी श्रद्धा नहीं होगी? शांति और अहिंसा के अद्वितीय उपदेशक के प्रति हर व्यक्ति के मन में स्वाभाविक श्रद्धा होनी ही चाहिए. भारतीय लोग तो बुद्ध के प्रति श्रद्धा दिखाते नहीं थकते. नौजवान पीढ़ी तो खासकर बुद्ध को बतौर फैशन बात करती है. लेकिन इसी नौजवान समाज के कुछ लोग रविवार को एक वरिष्ठ नेता के घर मिलने के लिए आये. ये नौजवान भी कोई सामान्य नौजवान नहीं. पुणे की चर्चित एमआईटी के विद्यार्थी जो कि स्कूल आफ गवर्नेन्स की पढ़ाई पढ़ते हैं. अर्थात सीधे शब्दों में कहें तो राजनीति की पाठशाला में शासन प्रशासन चलाने की विद्या सीख रहे हैं.</p>
<p>जिन्हें देश प्रदेश का शासन जिम्मेदारी से चलाना है वे खुद कितने जिम्मेदार हैं? उस नेता के घर कोई 19 छात्र और उनके शिक्षक महोदय आये थे. आदर सत्कार के लिए नेताजी के लोगों ने उन्हें समोसे खिलाए, पानी पिलाया. अब जहां ये छात्र बैठे थे उसके पीछे एक छोटी सी टेबल पर बुद्ध की प्यारी सी मूर्ति रखी थी. खाने पीने के बाद इन छात्रों ने बचा हुआ समोसा और पानी पिये हुए गिलास से बुद्ध की उस छोटी सी मोहक मूर्ति के सामने रख दिया. ऐसा जानबूझकर नहीं किया होगा लेकिन जिन्हें इतना भी होश न हो कि वे क्या कर रहे हैं वे भला गवर्नेन्स की कौन सी पढ़ाई पढ़ाई पढ़ रहे होंगे आप ही अंदाज लगाईये? जो इतने बेहोश हों कि बुद्ध की मूर्ति के सामने जूठे गिलास और बचा हुआ समोसा रख देते हों और उन्हें यह भी होश न रहता हो कि वे क्या कर रहे हैं वे भला देश को कैसे चलाएंगे?</p>

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		<title>भूख लगे तो अखबार खाइये</title>
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		<pubDate>Sat, 13 Mar 2010 10:46:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[फोटो गैलरी]]></category>

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		<description><![CDATA[क्या अखबार सिर्फ पढ़ने के लिए होता है? आप कह सकते हैं कि अखबार के और भी कई इस्तेमाल हो सकते हैं. मसलन, कागज का थैला बनाने से लेकर कतरन काटकर आर्काईव बनाने तक अखबार के बहुत उपयोग हैं. लेकिन मंबई के डीएनए आफिस में मैंने देखा कि अखबार खाने के लिए भी होता है. [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>क्या अखबार सिर्फ पढ़ने के लिए होता है? आप कह सकते हैं कि अखबार के और भी कई इस्तेमाल हो सकते हैं. मसलन, कागज का थैला बनाने से लेकर कतरन काटकर आर्काईव बनाने तक अखबार के बहुत उपयोग हैं. लेकिन मंबई के डीएनए आफिस में मैंने देखा कि अखबार खाने के लिए भी होता है. भूख लगे तो अखबार खाइये.  कम से कम डीएनए अखबार के रिसेप्सन पर बना विज्ञापन तो यही संदेश दे रहा है. प्रमाण के लिए यह फोटो मौजूद है.</p>

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		<title>मावलंकर साहब माफ करना</title>
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		<pubDate>Fri, 12 Mar 2010 13:07:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[नई दिल्ली में संविधान क्लब (Constitution Club) जानी मानी जगह है. संसद भवन से थोड़ी ही दूर पर स्थित यह क्लब राजनीतिक गतिविधियों, सेमिनारों, संगोष्टियों का अड्डा है. इसी क्लब परिसर में एक बड़ा सा हाल है जिसका नाम मावलंकर सभागार है. यह मावलंकर कौन थे? आजाद भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष. लोकसभा अध्यक्ष यानी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>नई दिल्ली में संविधान क्लब (Constitution Club) जानी मानी जगह है. संसद भवन से थोड़ी ही दूर पर स्थित यह क्लब राजनीतिक गतिविधियों, सेमिनारों, संगोष्टियों का अड्डा है. इसी क्लब परिसर में एक बड़ा सा हाल है जिसका नाम मावलंकर सभागार है. यह मावलंकर कौन थे? आजाद भारत के पहले लोकसभा अध्यक्ष. लोकसभा अध्यक्ष यानी जो काम आज मीरा कुमार कर रही है. उनका पूरा नाम था गणेश वासुदेव मावलंकर. लेकिन जरा देखिए. गणतंत्र के साठ साल बाद मावलंकर साहब किस कदर मॉवालंकर होकर रह गये हैं.  मावलंकर साहब की आत्मा हमें माफ करे. क्या करें इस लोकतंत्र की नींव तो उन जैसे लोगों ने ही डाली थी. अब उनके नाम के साथ ऐसा सलूक किया जा रहा है तो फिर सरकारी महकमे को दोष दें या भारत के भाग्य को?</p>

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		<title>इंटरनेट हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है</title>
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		<pubDate>Wed, 10 Mar 2010 18:44:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[आजादी के आंदोलन में लोकमान्य तिलक ने नारा दिया था कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. और हम इसे लेकर रहेंगे. आजादी के बाद इस नारे में स्वराज शब्द को दायें बाये करके अनेक नारे बना दिये गये जो देश में राजनीतिक आंदोलनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का काम करते रहे लेकिन अब [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>आजादी के आंदोलन में लोकमान्य तिलक ने नारा दिया था कि स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. और हम इसे लेकर रहेंगे. आजादी के बाद इस नारे में स्वराज शब्द को दायें बाये करके अनेक नारे बना दिये गये जो देश में राजनीतिक आंदोलनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए प्रेरणा का काम करते रहे लेकिन अब नया नारा जन्म ले चुका है. यह नया नारा है- इंटरनेट हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे. निश्चित रूप से यह नारा किसी देश की आजादी की लड़ाई का हिस्सा नहीं है लेकिन ऐसा लगता है कि सूचना प्रौद्योगिकी के सहारे ज्ञान की आजादी की एक मुहिम जो पूरी दुनिया में चल निकली है इसने इस नारे को वैश्विक स्तर पर प्रभावी बना दिया है.</p>
<p>बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के लिए कराए गये एक सर्वेक्षण में जो नतीजा सामने आया है कि उसमें सर्वेक्षण में शामिल 27 हजार लोगों में 87 प्रतिशत लोगों का मानना है कि इंटरनेट तक हर इंसान की पहुंच होनी चाहिए और इसे इंसान के मूलभूत अधिकारों में शामिल किया जाना चाहिए. खाना, पानी, आवास, कपड़ा, बिजली, दवाई के साथ ही इंटरनेट को मूलभूत आवश्यकता का हिस्सा बना देना चाहिए. सर्वेक्षण में शामिल लोग सही कह रहे हैं. लेकिन मुश्किल यह है कि दुनिया में इंटरनेट तक पहुंच कितने लोगों की है? विश्व की कुल आबादी का पांचवा हिस्सा ही अभी इंटरनेट के आस पास आ पाया है. तो फिर इसे मूलभूत अधिकार कैसे बना दिया जाए? सर्वेक्षण में शामिल लोगों का तर्क है कि फिर उन तक इंटरनेट की पहुंच आसान की जाए.</p>
<p>बिल्कुल सही है. इंटरनेट इस युग में सबसे प्रभावी माध्यम बनकर स्थापित होगा. तकनीकि के कन्वर्जेन्स की महिमा से अभी इसमें और बदलाव होंगे और स्पीड ने कमाल किया तो वीडियो भी पूरी तरह से इंटरनेट का गुलाम हो जाएगा. इसलिए नये युग का यह नारा कि इंटरनेट हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है कहीं से गलत नहीं है. हो सकता है कि इसके लिए कोई धरना प्रदर्शन और आंदोलन न हो लेकिन ध्रुवीकरण तो तेज होगा ही. समय बताएगा कि यह जन्मसिद्ध अधिकार धोखा देता है या फिर साथ निभाता है लेकिन साथ में एक सूचना और ले लीजिए. जितनी तेजी से इंटरनेट लोकप्रिय हो रहा है इंटरनेट हैकर और अपराधी भी सक्रिय हो रहे हैं. यानी यह जन्मसिद्ध अधिकार निष्कंटक नहीं होगा. देव दानव का संघर्ष यहां भी जारी रहेगा. तो आप बताईये, आप जन्मसिद्ध अधिकार का नारा कब लगा रहे हैं?</p>

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		<title>नारायणभाई देसाई, गांधी और गांधी शांति प्रतिष्ठान</title>
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		<pubDate>Tue, 02 Mar 2010 18:34:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
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		<description><![CDATA[गांधी शांति प्रतिष्ठान में बापू कथा करने वाले नारायणभाई देसाई. नारायण भाई देसाई गांधी के निजी सचिव रहे महादेवभाई देसाई के बेटे हैं और उन्होंने खुद महात्मा गांधी के साथ दस साल काम किया है.
होली के दिन नारायणभाई देसाई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में थे. यह फोटो तब ली जब वे सीढ़िया चढ़ रहे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>गांधी शांति प्रतिष्ठान में बापू कथा करने वाले नारायणभाई देसाई. नारायण भाई देसाई गांधी के निजी सचिव रहे महादेवभाई देसाई के बेटे हैं और उन्होंने खुद महात्मा गांधी के साथ दस साल काम किया है.</p>
<p>होली के दिन नारायणभाई देसाई दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में थे. यह फोटो तब ली जब वे सीढ़िया चढ़ रहे थे.</p>

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		<title>शाही सड़क पर शाही सवारी</title>
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		<pubDate>Mon, 28 Dec 2009 13:34:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[फोटो गैलरी]]></category>

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		<description><![CDATA[रविवार को दिल्ली के राजपथ पर विंटेज कारों की रैली निकाली गयी.

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		<title>ब्लागरों के लड़ने झगड़ने की आदत यहां भी नहीं गयी</title>
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		<pubDate>Sat, 24 Oct 2009 08:43:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बियाबान में शोर]]></category>

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		<description><![CDATA[ब्लाग मीट शब्द को लेकर हिन्दी ब्लागरों ने अक्सर विरोध किया था. आपस की मुलाकात को ब्लाग मीट में तब्दील करनेवाले अनूप शुक्ला ने वास्तव में ब्लागरों को एक दूसरे से मिलने मिलाने का सिलसिला शुरू किया था. वह थोड़ा आगे बढ़ा और भरभराकर गिर गया. लेकिन जो लोग इलाहाबाद में मौजूद हैं वे देख [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>ब्लाग मीट शब्द को लेकर हिन्दी ब्लागरों ने अक्सर विरोध किया था. आपस की मुलाकात को ब्लाग मीट में तब्दील करनेवाले अनूप शुक्ला ने वास्तव में ब्लागरों को एक दूसरे से मिलने मिलाने का सिलसिला शुरू किया था. वह थोड़ा आगे बढ़ा और भरभराकर गिर गया. लेकिन जो लोग इलाहाबाद में मौजूद हैं वे देख रहे हैं ब्लागर नये सिरे से मिलने जुलने का सिलसिला शुरू कर रहे हैं. यह नया सिलसिला थोड़ा तार्किक और बहुत सारा आयोजित और प्रायोजित है.</p>
<p>देश के कुछ चुनिंदा ब्लागर जिन्हें बुलाया गया या फिर जो अपने से कोशिश करके इस सम्मेलन में आये हैं वे मुक्त होकर बोल रहे हैं. पहले दिन उद्घाटन के बाद जो चर्चा सत्र शुरू हुआ. सत्र की शुरूआत लड़ने झगड़ने से हुई. ऐसी ऐसी बातों पर अड़े और लड़े कि औचित्य भी समझ में नहीं आया. लेकिन थोड़ी ही देर में बात मुद्दे पर होने लगी और सिलसिला चल पड़ा. पहले दिन का थीम यही रहा कि अभिव्यक्ति का नया माध्यम ब्लाग क्या अभिव्यक्ति का माध्यम बन रहा है. क्या यहां स्तरीय बहस हो रही है? क्या मुद्दे सही तरीके से उठाये जा रहे हैं.</p>
<p>देर शाम तक बातचीत होती रही. ब्लागरों के अलावा कुछ स्थानीय लोग भी इस बैठक में शामिल हुए जो भकुआ बने सिर्फ देख सुन रहे थे. व्यवस्था अच्छी है. सबके रुकने की और आने जाने की बेहतर व्यवस्था है. ऐसा लग रहा है कि ब्लागर न हुए कोई अति विशिष्ट प्राणी हो गये और उनकी हर सुख सुविधा का ध्यान रखा जा रहा है. यह सब देखकर अच्छा लग रहा है और नयी जमात के उभरने का भी साफ संकेत दिखाई दे रहा है.</p>
<p>दूसरे दिन ब्लागरों में कुछ लोग बैठने से कतराए हुए हैं और यहां वहां घूम रहे हैं. मसलन दूसरे दिन अविनाश का पता नहीं है. कुछ ब्लागर सम्मेलन के बहाने पूरे इलाहाबाद को नापने का मौका भी नहीं छोड़ना चाहते. अरे हां, बोधिसत्व तो एक ही दिन भाग लेकर भाग लिए. जो बचे हैं वे बहस में उलझे हैं. नामवर सिंह का विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है. सम्मेलन जारी है.</p>

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		<title>ब्लागवाणीः आदि, अंत, अनंत&#8230;</title>
		<link>http://visfot.com/blog/archives/874</link>
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		<pubDate>Mon, 28 Sep 2009 07:22:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बियाबान में शोर]]></category>

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		<description><![CDATA[ब्लागवाणी भी एक प्रयोग ही था. मार्च-अप्रैल 2007 में जब ब्लागवाणी की शुरूआत की गयी थी तो लक्ष्य क्या था? हिन्दी में ब्लाग बढ़ने लगे थे. दिल्ली में सामान्य सा व्यापार करनेवाले मैथिली गुप्त ने सोचा कि हिन्दी के ब्लागों के लिए एक ऐसा एग्रीगेटर होना चाहिए जो बिना लाग लपेट और किसी पूर्वाग्रह के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="_mcePaste" style="position: absolute; left: -10000px; top: 0px; width: 1px; height: 1px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden;">ब्लागवाणी भी एक प्रयोग ही था. मार्च-अप्रैल 2007 में जब ब्लागवाणी की शुरूआत की गयी थी तो लक्ष्य क्या था? हिन्दी में ब्लाग बढ़ने लगे थे. दिल्ली में सामान्य सा व्यापार करनेवाले मैथिली गुप्त ने सोचा कि हिन्दी के ब्लागों के लिए एक ऐसा एग्रीगेटर होना चाहिए जो बिना लाग लपेट और किसी पूर्वाग्रह के लोगों के लिखे को सबके सामने लाये. उनसे जब भी बात हुई तो हमेशा वे एक बात बोलते थे कि ब्लागवाणी पर कौन सा ब्लाग होगा और कौन सा ब्लाग नहीं होगा इसका चयन करते समय वे और किसी बात का ध्यान नहीं रखते. सिर्फ एक ही बात का ध्यान रखते हैं कि ब्लाग लिखनेवाला किस तरह से ब्लाग लेखन कर रहा है. जब मैथिली गुप्त ब्लागवाणी लेकर मैदान में डटने के लिए आ रहे थे उसी वक्त अनिल अंबानी की कंपनी बिग अड्डा ने ब्लाग अड्डा नाम से एक ब्लाग एग्रीगेटर लांच किया था लेकिन समय के साथ ब्लाग अड्डा गायब हो गया और ब्लागवाणी आगे बढ़ गया.</div>
<div id="_mcePaste" style="position: absolute; left: -10000px; top: 0px; width: 1px; height: 1px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden;">लेकिन इसके जिन प्रयोगों का स्वागत होना चाहिए था उसको ही इसकी आलोचना का रास्ता बना लिया गया. देशभर में फैले तकनीकि के जानकार शूकरों ने अपनी अपनी तरह से ब्लागवाणी पर हमला बोलना शुरू किया. जिस नेकनीयती से इस एग्रीगेटर को शुरू किया गया था कि हिन्दी के ब्लागरों के बीच एक प्लेटफार्म बने उस नेकनीयती को कीचड़ में घसीटकर उस पर गोबर फेंकने का काम शुरू हो गया. ऐसे शूकरों और वायरसों ने अपनी अपनी तरह से ब्लागवाणी को निशाने पर लेना शुरू कर दिया. इसका नतीजा यह हुआ बनने के साथ ही आये िदन ब्लागवाणी विवाद का दूसरा नाम हो गया. इंटरनेट की सतही समझ ने इन शूकरों को दिन रात मुंह मारने का मौका दे दिया. इससे ब्लागवाणी के संचालकों को आर्थिक और तकनीकि नुकसान जो हुआ सो हुआ, मानसिक रूप से अधिक कष्ट हुआ. कई मौके ऐसे आये जब उन्होंने इसे बंद करके गोवा चले जाने की मंशा जाहिर की. फिर भी वे बने रहे. हिन्दी में ब्लाग लिखनेवालों को एक ऐसा माध्यम मिला रहा जो एक दूसरे से आपस में जोड़ता था. ब्लाग के बाहर की दुनिया के लिए भले ही ब्लागवाणी का कोई मतलब न हो लेकिन ब्लागरों के लिए ब्लागवाणी सबसे बेहतरीन माध्यम था. आखिरकार तकनीकि विरोधी जीते और मैथिली गुप्त को इस हद तक मानसिक रूप से परेशान किया कि वे ब्लागवाणी समेटकर अलविदा कह गये.</div>
<div id="_mcePaste" style="position: absolute; left: -10000px; top: 0px; width: 1px; height: 1px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden;">ब्लागवाणी के बंद होने से पहला बडा़ सवाल तो यही उठता है कि ऐसे शूकरों और हिन्दी के वायरसों से मुक्ति कैसे मिले? मैथिली गुप्त व्यावसायिक इंसान नहीं हैं, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा लेकिन अच्छे काम के प्रति उनके मन में हमेशा आग्रह रहता है. ब्लाग का चुनाव करते समय भी वे यही बात ध्यान में रखते थे क्योंकि वे मानते थे कि भविष्य में इंटरनेट पर वैकल्पिक पत्रकारिता अगर ब्लाग के जरिए होनी है तो एग्रीगेटर को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. ऐसे में कतर-ब्यौंत करना उनकी मजबूरी भी थी लेकिन इसके रास्ते में सबसे बडी़ बाधा मनुष्य का वह स्वभाव आती है जिसके अंदर यह छटपटाहट होती है कि वह जो कुछ भी लिख रहा है उसे लोग पढे़. इंटरनेट और ब्लाग ने उसे वह माध्यम भी मुहैया करवा दिया है कि व्यक्ति अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र है. व्यक्तिगत इच्छा और सार्वजनिक जरूरत के बीच का यह द्वंद बहुत जटिल है. फिर भी मैथिली गुप्त और उनकी टीम ने इस द्वंद को बखूबी संभाला. और दो साल तक ब्लागवाणी को बनाये और चलाये रखा.</div>
<div id="_mcePaste" style="position: absolute; left: -10000px; top: 0px; width: 1px; height: 1px; overflow-x: hidden; overflow-y: hidden;">कुछ लोग तर्क देते हैं कि ऐसे काम भावुक होकर नहीं किये जाते. मेरा कहना है कि ऐसे काम भावुकता में ही किये जाते हैं. रेशनल बुद्धि से निर्जीव व्यापार तो होते हैं लेकिन सजीव काम नहीं होता. ब्लागवाणी ब्लागरों के बीच एक सजीव उपस्थिति थी. कहने के लिए तो अभी भी कई एग्रीगेटर हैं और हो सकता है कुछ और लोग एग्रीगेटर बना दें लेकिन कोई भी वह स्थान नहीं भर सकता जो ब्लागवाणी को स्वतः ही मिल गया था. बेहतर तो हो कि मैथिली गुप्त और टीम ब्लागवाणी कुछ नया अवतार लेकर आये जिसमें पीछे की गलतियों को दोहराने की गुंजाईश न हो और वह उनकी इच्छा वैकल्पिक पत्रकारिता को भी पूरा करता हो.</div>
<p>नयी तकनीकि और नये माध्यम आये तो हिन्दी को कैसे व्यवहार करना चाहिए था? वह और अधिक उदात्त होती और ज्ञान की शिष्टता को स्थापित करती. लेकिन हुआ क्या? जैसे जैसे तकनीकि के द्वारा नये माध्यम उभरे हिन्दी ऐसे शूकरों की प्रतिनिधि भाषा हो गयी है जो सिवाय गंदगी में मुंह मारने के अलावा दूसरा कोई काम ही नहीं करते. ऐसे शूकरों की कुल ताकत का आधार थोडा़ सा तकनीकि ज्ञान है. इन्हीं शूकरों की वजह से टेलीविजन उद्योग बर्बाद हुआ और अब इंटरनेट पर एक एक प्रयोग धराशाही होने शुरू हो गये हैं.</p>
<p>ब्लागवाणी भी एक प्रयोग ही था. मार्च-अप्रैल 2007 में जब ब्लागवाणी की शुरूआत की गयी थी तो लक्ष्य क्या था? हिन्दी में ब्लाग बढ़ने लगे थे. दिल्ली में सामान्य सा व्यापार करनेवाले मैथिली गुप्त ने सोचा कि हिन्दी के ब्लागों के लिए एक ऐसा एग्रीगेटर होना चाहिए जो बिना लाग लपेट और किसी पूर्वाग्रह के लोगों के लिखे को सबके सामने लाये. उनसे जब भी बात हुई तो हमेशा वे एक बात बोलते थे कि ब्लागवाणी पर कौन सा ब्लाग होगा और कौन सा ब्लाग नहीं होगा इसका चयन करते समय वे और किसी बात का ध्यान नहीं रखते. सिर्फ एक ही बात का ध्यान रखते हैं कि ब्लाग लिखनेवाला किस तरह से ब्लाग लेखन कर रहा है. जब मैथिली गुप्त ब्लागवाणी लेकर मैदान में डटने के लिए आ रहे थे उसी वक्त अनिल अंबानी की कंपनी बिग अड्डा ने ब्लाग अड्डा नाम से एक ब्लाग एग्रीगेटर लांच किया था लेकिन समय के साथ ब्लाग अड्डा गायब हो गया और ब्लागवाणी आगे बढ़ गया.</p>
<p>लेकिन इसके जिन प्रयोगों का स्वागत होना चाहिए था उसको ही इसकी आलोचना का रास्ता बना लिया गया. देशभर में फैले तकनीकि के जानकार शूकरों ने अपनी अपनी तरह से ब्लागवाणी पर हमला बोलना शुरू किया. जिस नेकनीयती से इस एग्रीगेटर को शुरू किया गया था कि हिन्दी के ब्लागरों के बीच एक प्लेटफार्म बने उस नेकनीयती को कीचड़ में घसीटकर उस पर गोबर फेंकने का काम शुरू हो गया. ऐसे शूकरों और वायरसों ने अपनी अपनी तरह से ब्लागवाणी को निशाने पर लेना शुरू कर दिया. इसका नतीजा यह हुआ बनने के साथ ही आये िदन ब्लागवाणी विवाद का दूसरा नाम हो गया. इंटरनेट की सतही समझ ने इन शूकरों को दिन रात मुंह मारने का मौका दे दिया. इससे ब्लागवाणी के संचालकों को आर्थिक और तकनीकि नुकसान जो हुआ सो हुआ, मानसिक रूप से अधिक कष्ट हुआ. कई मौके ऐसे आये जब उन्होंने इसे बंद करके गोवा चले जाने की मंशा जाहिर की. फिर भी वे बने रहे. हिन्दी में ब्लाग लिखनेवालों को एक ऐसा माध्यम मिला रहा जो एक दूसरे से आपस में जोड़ता था. ब्लाग के बाहर की दुनिया के लिए भले ही ब्लागवाणी का कोई मतलब न हो लेकिन ब्लागरों के लिए ब्लागवाणी सबसे बेहतरीन माध्यम था. आखिरकार तकनीकि विरोधी जीते और मैथिली गुप्त को इस हद तक मानसिक रूप से परेशान किया कि वे ब्लागवाणी समेटकर अलविदा कह गये.</p>
<p>ब्लागवाणी के बंद होने से पहला बडा़ सवाल तो यही उठता है कि ऐसे शूकरों और हिन्दी के वायरसों से मुक्ति कैसे मिले? मैथिली गुप्त व्यावसायिक इंसान नहीं हैं, ऐसा कहना ठीक नहीं होगा लेकिन अच्छे काम के प्रति उनके मन में हमेशा आग्रह रहता है. ब्लाग का चुनाव करते समय भी वे यही बात ध्यान में रखते थे क्योंकि वे मानते थे कि भविष्य में इंटरनेट पर वैकल्पिक पत्रकारिता अगर ब्लाग के जरिए होनी है तो एग्रीगेटर को महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होगी. ऐसे में कतर-ब्यौंत करना उनकी मजबूरी भी थी लेकिन इसके रास्ते में सबसे बडी़ बाधा मनुष्य का वह स्वभाव आती है जिसके अंदर यह छटपटाहट होती है कि वह जो कुछ भी लिख रहा है उसे लोग पढे़. इंटरनेट और ब्लाग ने उसे वह माध्यम भी मुहैया करवा दिया है कि व्यक्ति अभिव्यक्ति के लिए स्वतंत्र है. व्यक्तिगत इच्छा और सार्वजनिक जरूरत के बीच का यह द्वंद बहुत जटिल है. फिर भी मैथिली गुप्त और उनकी टीम ने इस द्वंद को बखूबी संभाला. और दो साल तक ब्लागवाणी को बनाये और चलाये रखा.</p>
<p>कुछ लोग तर्क देते हैं कि ऐसे काम भावुक होकर नहीं किये जाते. मेरा कहना है कि ऐसे काम भावुकता में ही किये जाते हैं. रेशनल बुद्धि से निर्जीव व्यापार तो होते हैं लेकिन सजीव काम नहीं होता. ब्लागवाणी ब्लागरों के बीच एक सजीव उपस्थिति थी. कहने के लिए तो अभी भी कई एग्रीगेटर हैं और हो सकता है कुछ और लोग एग्रीगेटर बना दें लेकिन कोई भी वह स्थान नहीं भर सकता जो ब्लागवाणी को स्वतः ही मिल गया था. बेहतर तो हो कि मैथिली गुप्त और टीम ब्लागवाणी कुछ नया अवतार लेकर आये जिसमें पीछे की गलतियों को दोहराने की गुंजाईश न हो और वह उनकी इच्छा वैकल्पिक पत्रकारिता को भी पूरा करता हो.</p>

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		<title>काली कुतिया अब मां नहीं बनेगी</title>
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		<pubDate>Thu, 24 Sep 2009 17:30:15 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बियाबान में शोर]]></category>

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		<description><![CDATA[मातृत्व एक ऐसी सौगात है जो हर जीव योनि को समान सुख देती है. मां का अपने शिशु से रिश्ता उस जीव योनि के स्वभाव से निर्धारित होता है. लेकिन हर जीव योनि में एक बात समान होती है कि मातृत्व के बिना संपूर्णता और संतति दोनों ही बधित हो जाते हैं. इंसान का बुद्धि [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>मातृत्व एक ऐसी सौगात है जो हर जीव योनि को समान सुख देती है. मां का अपने शिशु से रिश्ता उस जीव योनि के स्वभाव से निर्धारित होता है. लेकिन हर जीव योनि में एक बात समान होती है कि मातृत्व के बिना संपूर्णता और संतति दोनों ही बधित हो जाते हैं. इंसान का बुद्धि विकास और तर्क क्षमता सर्वाधिक है इसलिए उसने मातृत्व को भी बहुत कुसंस्कारित कर दिया है. आप पायेंगे कि जो मां जितनी अधिक आधुनिक है वह मातृत्व से उतनी ही विमुख है. लेकिन जिन्हें आधुनिक शिक्षा का कुसंस्कार ज्यादा नहीं मिला है वे इस संबंध की संवेदनशीलता को संपूर्णता में ही स्वीकार करते हैं.</p>
<p>लेकिन शिक्षा की विनाशकारी व्यवस्था ने आधुनिक मनुष्य की बुद्धि को जिस प्रकार जड़ कर दिया है उसने प्रकृति की व्यवस्था में घातक दोष पैदा कर दिया है. मनुष्य मानता है कि प्रकृति में वह जैसा चाहे वैसी व्यवस्था होनी चाहिए. अत्याचार की हद यह कि हमारे शहरों के विस्तार ने सिर्फ इंसान और उसकी सुविधा के लिए उपलब्ध संसाधनों के अलावा और किसी बात के लिए कोई जगह नहीं बची है.</p>
<p>काली कुतिया सड़क पर आवारा घूमती है. भौंकती है लेकिन काटती नहीं. भौंकना उसका स्वभाव है, काटना उसे हम सिखाते हैं. अब तक तो उसने काटना नहीं सीखा है. इस साल तीन साल की हो गयी. जो महीना चल रहा है वह कुत्तों के समागम का महीना होता है इसलिए उसके आस पास भी कुत्तों की फौज मंडराने लगी थी. लेकिन अचानक इस व्यवस्था में इंसान ने अपनी शिक्षित बुद्धि के साथ प्रवेश किया. नगर निगम के लोग आये. न जाने कब आये और उसे पकड़कर ले गये. आज देखा तो उसके पेट पर पट्टी बंधी है. पूछने पर पता चला कि सरकार ने उसकी नसबंदी कर दी है. अब वह कभी मां नहीं बन सकेगी.</p>
<p>मैं जानता हूं शिक्षित मष्तिष्क के लिए यह कोई आपदा नहीं है. आपदा तब है जब कोई संजय गांधी पैदा होता है और कहता है कि इंसानों की जबरन नसबंदी कर दो. कुत्तों की नसबंदी से इंसान को भला क्या फर्क पड़ेगा? उसकी शिक्षित बुद्धि यह कहती है कि जेब में पैसा रखो, बाजार जाओ और एक बढ़िया नस्ल का कुत्ता खरीदकर ले आओ. फिर उस कुत्ते को सिर पर बैठाओ और उसकी पूरी चिंता करो. यह शिक्षित और स्वार्थ बुद्धि है जो कहती है कि उससे ही मतलब रखो जिससे तुम्हें कोई फायदा होता हो. लेकिन जिससे हमारा कोई फायदा न हो क्या उसको उसी रूप में जीवन जीने का कोई अधिकार नहीं है? फिर सवाल इंसान या जानवर का नहीं है. सवाल है कि हम कैसे सोचते हैं? आज जो इंसान किसी जानवर के जीवन में हस्तक्षेप करके खुश होत है क्या वही इंसान अपने जीवन में हस्तक्षेप बर्दाश्त करेगा?</p>
<p>लेकिन कौन सुनता है? सब तो शिक्षित होते जा रहे हैं. शिक्षित होने का अर्थ ही होता है अस्तित्व से कट जाना. अपने आस पास से हट जाना. हमारी शिक्षा प्रणाली जिस तरह से हमें इंसान से राक्षस बना देती है उसी का परिणाम है कि हम अपने अलावा किसी और का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं करना चाहते. घिन आती है कि ऐसी शिक्षा प्रणाली से निकले लोग ही आधुनिक और पढ़े लिखे कहे जाते हैं. थू है ऐसी पढ़ाई और शिक्षा पर जो इंसान को स्वार्थी राक्षस में तब्दील कर देती है.</p>

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		<title>भाजपा नेताओं का मक्काः झंडेवालान</title>
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		<pubDate>Fri, 28 Aug 2009 22:45:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>संजय तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[बात करामात]]></category>
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		<description><![CDATA[संघ का दिल्ली कार्यालय राजनीतिक गतिविधियों का गहरा अड्डा बन चुका है. जब से केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आयी संघ कार्यालय पर लाल बत्तियों की आवाजाही बढ़ गयी. इसका असर यह हुआ कि रानी झांसी रोड पर इस लंबे चौड़े भूखण्ड पर सरगर्मियां बढ़ गयी हैं. पिछले दस सालों से यहां सुरक्षाकर्मी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>संघ का दिल्ली कार्यालय राजनीतिक गतिविधियों का गहरा अड्डा बन चुका है. जब से केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आयी संघ कार्यालय पर लाल बत्तियों की आवाजाही बढ़ गयी. इसका असर यह हुआ कि रानी झांसी रोड पर इस लंबे चौड़े भूखण्ड पर सरगर्मियां बढ़ गयी हैं. पिछले दस सालों से यहां सुरक्षाकर्मी भी तैनात हैं जो स्वयंसेवकों की डंडा सुरक्षा से अलग बाकायदा मेटल डिटेक्टर लगाकर जांच पड़ताल करते हैं. शुरूआत में थोड़ा विरोध जरूर हुआ था लेकिन बाद में संघ के स्वयंसेवक भी इस सुरक्षा के अभ्यस्त हो गये.</p>
<p>इसी संघ कार्यालय पर शुक्रवार को मोहनराव भागवत ने प्रेस कांफ्रेस आयोजित की. जो प्रेस रिलीज बांटी गयी या फिर जो कुछ शुरूआत में उन्होंने कहा उसमें से एक लाईन भी कहीं खबर नहीं बनी. बनती भी क्यों किसी संघ के विकास से देश की मुख्यधारा को क्या लेना लादना है? जब बात शुरू हुई तो घूम-फिरकर हर कोई संघ भाजपा संबंधों पर पूछता और मोहनराव भागवत बड़ी चालाकी से उत्तर देने से बच जाते. लगभग एक घण्टे की प्रेस कांफ्रेस में उन्होंने एक ही बात काम की कही कि संघ में जो तय हुआ है भाजपा को वही अमल में लाना होगा. अब क्या तय हुआ है और भाजपा को क्या अमल में लाना है यह तो संघ जाने और भाजपा वाले जानें लेकिन भाजपाईयों के इस मक्का से समय समय पर चुपचाप फतवे तो निकलते ही रहते हैं.</p>
<p>जब तक वाजपेयी प्रभावी रहे उन्होने इस मक्का को मक्के की रोटी का भाव भी नहीं दिया. खुद वाजपेयी कभी संघ कार्यालय नहीं आये और जब भी संघ भाजपा के बीच बात करनी हुई तो संघ के सरसंघचालक को ही घर बुला लिया. इसके कूटनीतिक संकेत विजय वाले थे. वाजपेयी के छह साल के शासनकाल में संघ कभी उनके खिलाफ मुखर नहीं हुआ लेकिन जब यही चाल आडवाणी ने खेलनी शुरू की तो उनको बहुत भारी पड़ गया. वाजपेयी की ही तर्ज पर आडवाणी ने उन्हीं सुधीन्द्र कुलकर्णी और कुछ अन्य नेताओं को साथ मिलाकर अपना गुट बनाना चाहा तो मक्का ने फतवा जारी कर दिया कि अब आप रास्ता छोड़ दें.</p>
<p>भाजपा के लोग लाख कहें कि संघ उनकी राजनीति में सिर्फ मार्गदर्शक की भूमिका में रहता है या फिर संघ लाख कहे कि वह भाजपा को सिर्फ सलाह देता है, लेकिन सच्चाई यह है कि भाजपा फुल टाईम संघ का पेड राजनीतिक वर्कर है तो संघ फुल टाईम सिर्फ भाजपा के कामकाज के बारे में ही सोचता रहता है. संघ में अब शायद ही कोई कार्यकर्ता हो जो भाजपा में दखल देना अपना अधिकार न समझता हो. जैसे ऋषिकेश के सन्यासी की कीमत तब होती है जब उसे कोई एक विदेशी भक्त मिल जाता है वैसे ही संघ में उस कार्यकर्ता की अहमियत अपने आप बढ़ जाती है जिसके आगे पीछे भाजपा के नेता टहलते हों. इसका सबसे बड़ा प्रमाण खुद भागवत की प्रेस कांफ्रेस है जिसमें सैकड़ों पत्रकार, दर्जनों टीवी चैनल के लोग सिर्फ इसलिए ही तो आये क्योंकि वे भाजपा के बारे में कुछ बोलेंगे.</p>
<p>खैर, जब तक भाजपा है तब तक इस मक्का की अहमियत खत्म नहीं होगी. यह हर भाजपाई जानता है.</p>

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