घोटाला और घाघपना

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Jan

26

2012

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ये नख से शिख तक भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी सरकार द्वारा की गयी अब तक की सबसे बड़ी नैतिक हत्या है। इसरो के के पूर्व प्रमुख माधवन नायर समेत देश के तीन शीर्ष अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के खिलाफ किसी भी सार्वजनिक उपक्रम में सेवा देने पर लगायी गयी पाबंदी हैरान कर देने वाली है। देश के लिए लगभग २७ प्रतिष्ठापरक परियोजनाओं को मुकाम तक पहुंचाने वाले माधवन और उनके साथियों को दी गयी सजा साफ़ बताती है कि राजनीति के शस्त्र-शास्त्र न सिर्फ संसद और विधानसभाओं में बल्कि देश के गौरव कहे जाने वाले प्रतिष्ठानों में भी पूरी ताकत के साथ मौजूद हैं। ... Full story

उत्तर प्रदेश के किंतु-परंतु

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Jan

25

2012

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कभी भी आसान नहीं रहे, इस बार भी नहीं हैं। सबसे बड़ी दिक्कत वोटरों की चुप्पी को लेकर है। नेता सयाने हुए हैं, तो वोटर भी चालाक हो गया है। उसकी थाह लेना मुश्किल काम है। हालांकि मुख्य मुकाबला बसपा और सपा में माना जा रहा है, लेकिन कांग्रेस-रालोद गठबंधन को जोड़ दिया जाए, तो मुकाबला तिकोना कहा जा सकता है। भाजपा फिलहाल रेस से बाहर दिखाई दे रही है। भले ही कुछ चुनावी सव्रेक्षणों ने तस्वीर साफ करने की कोशिश की हो, लेकिन अतीत में सव्रेक्षण औंधे मुंह गिरते रहे हैं। ... Full story

डिग्गी पैलेस में साहित्य की डुगडुगी

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Jan

25

2012

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इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 22 जनवरी को जयपुर में पंडित झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यान में प्रेस परिषद के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू जब बोल रहे थे कि “देश और लोगों की असली समस्याओं से भटकाने के लिए जनता को धर्म, फिल्म, क्रिकेट और गैर जिम्मेदार मीडिया की अफीम का नशा दिया जा रहा है.”, उसी दौरान जयपुर में ही एशिया के सबसे बड़े साहित्यिक उत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का तीसरा दिन ओप्रा विन्फ्रे को पाकर अभिभूत था. पूरा डिग्गी पैलेस प्रसिद्ध टीवी एंकर ओप्रा विन्फ्रे के प्रशंसकों से अटा पड़ा था. हजारों की संख्या में लोग ‘नो इंट्री’ के बाद भी डिग्गी पैलेस के अंदर दाखिल होना चाहते थे. ... Full story

आधार परियोजना का कॉरपोरेट विचार

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Jan

25

2012

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विप्रो देश की जानी मानी आईटी कंपनी है. विप्रो के निदेशक अजीम प्रेमजी अपनी सदाशयता के लिए जाने जाते हैं. लेकिन इन दिनों विप्रो के अजीम प्रेमजी को एक कष्ट है. उनका यह कष्ट निजी नहीं है और वह हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है इसलिए इसका जिक्र जरूरी है. अजीम प्रेमजी की कंपनी को इस बात का दुख है कि अगर हर भारतीय को पहचानपत्र देनेवाली आधार परियोजना नष्ट हो जाती है तो उनका 30 करोड़ का निवेश बेकार चला जाएगा. यह 30 करोड़ रूपया उन्होंने ऐसे उपकरण खरीदने में निवेश किये हैं जो इंसान की आंखों, अंगुलियों की छाप ग्रहण करके उनका एक डाटाबेस तैयार करती है और वह डाटाबेस आगे चलकर लोगों की पहचान करने में काम आयेगी. ... Full story

माया सभ्यता में मुनादी लोकतंत्र की

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Jan

24

2012

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लखनऊ का चर्चित अंबेडकर पार्क। 40 से 50 एकड़ में फैला यह पार्क कई मायनों में अद्भुत है। अरबों की सरकारी राशि से तैयार इस पार्क और इसमें बने हाथी, मायावती, कांशीराम और स्तूपों की कलाकृतियां चाहें जो भी हो, इतना तय मानिए कि इतिहास सदा मायावती की इस कृति को याद रखेगा। माया के इस कला प्रेम के पीछे का सच चाहे जो भी हो, लेकिन एक सच तो यह है कि जब सदियां बदलेंगी, इतिहास भूगोल में बदलाव आयेगा और नई सभ्यता, संस्कृति का उद्भव होगा, तो माया का यह अंबेडकर पार्क तब के लोगों को आज के इतिहास, माया संस्कृति और उसके शिल्प से परिचय कराएगा। ... Full story

मैंने जाकर देखा है उस पार

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Jan

23

2012

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फूल खिलते हैं, मुरझा जाते हैं। सूरज उगता है, डूब जाता है। सुख आता है तो दुख उसके पीछे ही खड़ा रहता है। हर्ष के हर मधुर क्षण के आगे विषाद की रेखाएं झिलमिलाती रहती हैं। जीवन है तो मृत्यु निश्चित है। यह प्रकृति का क्रम है। यही उसकी गत्यात्मकता है, यही उसका नयापन है। एक फूल के मुरझा जाने से हजारों दूसरे फूलों के खिलने की संभावना मर नहीं जाती। सूरज डूबता है तो भी उजाले की संभावना नहीं डूबती। दुख कितना भी गहरा हो, यंत्रणाकारी हो, दर्द भरा हो, वह भी सुख की संभावना को मिटा नहीं सकता। विषाद कितना भी गहन हो, प्रसन्नता की परिधि को अतिक्रमित नहीं कर सकता। मृत्यु होगी, इसलिए जीना छोड़ देना समझदारी की बात नहीं है। भारतीय दार्शनिकों ने इस द्वंद्व के पार जाने की हमेशा सलाह दी। इस पार सुख-दुख है, हर्ष-विषाद है, प्रकाश-अंधकार है, राग-द्वेष है, जीवन है, मृत्यु है, उस पार परम शांति है, निर्विकार का अनहद विस्तार है, अविकल चैतन्यलोक है, अनंत आनंद है। ... Full story

समाजवादी राजनीति का शलाका पुरूष

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Jan

23

2012

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दो साल पहले वह भी 22 जनवरी का ही दिन था जब सर्दी का सितम अपने चरम पर था. सुबह सुबह खबर आई कि जनेश्वर मिश्र नहीं रहे.२२ जनवरी २०१० के दिन 76 साल की उम्र में जनेश्वर मिश्र ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. अपने प्रिय शहर इलाहाबाद में उन्होंने अंतिम सांस ली. ... Full story

संवाद विस्फोट

अनिल सौमित्र जब भी मुझे मिलते हैं मैं हमेशा उन्हें कहता हूं- अनिल जी के सौ मित्र, उसमें से एक मैं भी हूं. सौमित्र का संधि विच्छेद करके जो विशेषण निकलता है वे उस विशेषण के बिल्कुल अनुरूप हैं. सौम्य हैं. शांत हैं. और मित्र तो ऐसे बनाते हैं जैसे कोई चना चबैना हो. आसान सफर हो या मुश्किल डगर, जैसे चना चबैना सबसे सस्ता और सुमग होता है वैसे ही अपने अनिल सौमित्र सबके लिए सुगम हैं. यही अनिल सौमित्र अब संपादक हो गये हैं. ... Full story
डेढ़ दशक पहले की बात है. वह कोई 95-96 का समय था. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जंघई जंक्शन से इलाहाबाद और इटारसी होते हुए एक किशोर मुंबई पहुंचा था. कैसे पहुंचा यह जाने बिना क्यों पहुंचा इसे समझना मुश्किल होगा. हम जिस इलाके में पैदा हुए वह स्वभाव से परजीवी इलाका है. इस परजीवी इलाके में कोई सौ साल पहले पिया लोग रंगून जाया करते थे. फिर कलकत्ता तक सिमट गये. इसके बाद हम जिस वक्त में बड़े हो रहे थे उस दौर में यहां के परजीवी मुंबई जाया करते थे. डेढ़ दशक बाद भी मुंबई जाने की इस रफ्तार में कोई कमी नहीं आई है लेकिन हम अपने जाने को अपनी उस नौजवान आंख से एक बार पीछे मुड़कर फिर देखना चाहते हैं जिसकी चर्चा जाने अनजाने राहुल गांधी ने कर दी है. ... Full story
संजय स्वदेश के उत्साह का कायल हुए बिना नहीं रहा जा सकता. पिछले तीन सालों से विस्फोट से जुड़े हैं और कई मौके ऐसे आये हैं जब उन्होंने हमसे ज्यादा उत्साह दिखाकर इस प्रयोग को व्यापक बनाने में योगदान दिया. कभी मुंबई गये तो वहां उनसे मिल आये जो विस्फोट के लिए लिखते हैं. कभी बिहार गये तो बात करते रहे कि यह स्टोरी विस्फोट के लिए अच्छी होगी. वे अखबारों में नौकरी करते रहे हैं. लेकिन उनके उत्साही चरित्र ने एक ऐसा कदम उठा लिया है जिसका जिक्र करना जरूरी है. ... Full story
अगर आपको गरीबी को रेखांकित करना हो तो प्रतीक चुनने में कोई मुश्किल नहीं होती. भारत गरीबों का देश बना दिया गया है, इसलिए भारत में गरीबी के प्रतीकों की भरमार है. जिधर नजर उठाइये गरीबी का कोई न कोई प्रतीक हमें हासिल हो जाता है. इसलिए बतौर पत्रकार जब हम गरीबी को रिपोर्ट करते हैं तो हमें गरीबी को चित्रित करने में कोई मुश्किल नहीं होती. मुश्किल होती है अमीरी को प्रतिबिम्बित करने में. आलीशान घर, मंहगी गाड़ियां जैसे चंद प्रतीक अमीरी की पूरी जमात को परिभाषित नहीं करते. ये प्रतीक गरीबों को आकर्षित तो कर सकतें हैं लेकिन ऐसे प्रतीक गरीबों के मन में अमीरी का सर्वमान्य प्रतीक स्थापित नहीं कर पाते. अगर आप वास्तव में अमीरी के खोखलेपन को समझते हैं तब तो उसे चिन्हित करना और भी मुश्किल हो जाता है. ... Full story
दुनिया का तो पता नहीं लेकिन भारत में विचार के व्यापार का तरीका बड़ा वीभत्स हो गया है. जो व्यापार है उसमें विचारशून्यता अनिवार्य शर्त है लेकिन जहां विचार के प्रचार को ही व्यापार होना है वहां स्थिति बड़ी भयावह है. ज्ञान के बोझ को कांधे पर लादे भारत में विचारों का इतना अनादर आश्चर्य पैदा करता है. सत् तत्व को शब्द तक उतारलानेवाले भारतीय समाज में सद्विचार, सत्कर्म, सत्संग को समाप्त करने के जैसे बहुल प्रयास दिखाई देते हैं उसे देख सुन और समझकर संदेह पैदा होता है कि व्यक्तिगत या फिर समूहगत रूप से हम सद्गति कैसे प्राप्त कर सकेंगे? ... Full story

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Dr. Shashi Tiwari

Dr. Shashi Tiwari

डॉ शशि तिवारी मीडिया जगत की विभिन्न गतिविधियों से जुड़ी हैं और सूचनामंत्र नामक पत्रिका का संपादन करती हैं. भोपाल में रहते हुए मीडिया संगठनों में सक्रियता के साथ साथ दूरदर्शन के लिए भी मुक्त रूप से काम करती हैं.

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मुन्ना बजरंगी की राजनीतिक मौत मांग रही है मालती
 

मुन्ना बजरंगी की राजनीतिक मौत मांग रही है मालती

उत्तर प्रदेश के मड़ियाहूं विधानसभा सीट से इस बार पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुख्यात हत्यारे मुन्ना बजरंगी ने भी पर्चा भरा है। क्या संयोग है कि मुन्ना बजरंगी के खिलाफ भाजपा ने जो प्रत्याशी मैदान में उतारा है वह हैं मालती दूबे. मालती दूबे कैलाश दूबे की विधवा हैं जिन्हें मुन्ना बजरंगी ने ही मार दिया था। अब मालती अपने पति के हत्यारे को हराकर राजनीतिक मौत मारना चाहती हैं। ... Full story

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