Anupam Mishra

गीत फरोश मन्ना

थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना पिताजी से ही सीखा पर उनपर कभी कुछ लिखा नहीं. उन्हें गये अब 27 बरस हो गये हैं ...

ज्ञान के रामरतन

आईआईटी दिल्ली के इक्कीस वर्षीय अंकुर दहिया को जब फेशबुक ने सालाना 65 लाख रूपये का पैकेज देकर अपने यहां नौकरी पर ...

अनपढ़, असभ्य और अप्रशिक्षित
 

अनपढ़, असभ्य और अप्रशिक्षित

गांव में तकनीकि भी बसती है यह बात सुनकर समझ पाना उन लोगों के लिए थोड़ा मुश्किल होता है जो तकनीकि को महज मशीन तक सीमित मानते हैं. लेकिन तकनीकि क्या वास्तव में सिर्फ मशीन तक सीमित है? यह बड़ा सवाल है जिसके फेर में हमारी बुद्धि फेर दी गई है. मशीन, कल पुर्जे, औजार से भी आगे अच्छी सोच सच्ची तकनीकि होती है. अच्छी सोच से सृष्टिहित का जो लिखित और अलिखित शास्त्र विकसित किया जाता है उसके विस्तार के लिए जो कुछ इस्तेमाल होता है वह तकनीकि होती है. इस तकनीकि को समझने के लिए कलपुर्जे के शहरों से आगे गांवों की ओर जाना होता है. भारत के गांवों में वह शास्त्र और तकनीकि दोनों ही लंबे समय से विद्यमान थे, लेकिन कलपुर्जों की कालिख ने उस सोच को दकियानूसी घोषित कर दिया और ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल करनेवाले लोग अनपढ़, असभ्य और अप्रशिक्षित घोषित कर दिये गये. साल 2010 का ग्रामीण तकनीकि के अध्ययन और विस्तार पर जमनालाल बजाज पुरस्कार पानेवाले अनुपम मिश्र का यह लेख जन और तकनीकि दोनों को समझने में हमारी मदद करता है. ... Full story

मौन साधक की मुखर क्रांति
 

मौन साधक की मुखर क्रांति

पहाड़ में यह एक शिक्षक की झोलाछाप क्रांति है. लेकिन मौन होकर की गई इस क्रांति की मुखरता इतनी व्यापक है कि पौढ़ी गढ़वाल के सैकड़ों गांवों ने पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या पलायन पर रोक लगा दी है. इस पलायन को रोकने के लिए प्राइमरी के शिक्षक सच्चिदानंद भारती ने पानी को रोकने की जो मुहिम चलाई उसकी बदौलत आज उन्हें मध्य प्रदेश सरकार ने महात्मा गांधी पुरस्कार देकर सम्मानित किया है. कभी एक पैसा अनुदान न लेनेवाले सच्चिदानंद भारती के कालजयी काम पर अनुपम मिश्र का कालजयी लेखन. यह लेख थोड़ा पुराना है और काम इस लेख से भी आगे निकल चुका है, फिर भी सच्चिदानंद भारती और उनके द्वारा की गई क्रांति को समझने के लिए इससे बेहतर और कोई भी विकल्प हमारे सामने मौजूद नहीं है. ... Full story

विकास और हमारा पिछड़ापन
 

विकास और हमारा पिछड़ापन

हमारे जीवन में, राजनीति में और समाज के कामों में भी एक नया शब्द इस दौर में आया है। हमने उसे बिना ज्यादा सोचे-समझे बहुत बड़ी जगह देने की एक गलती की है। हम सब साथियों को यह जानकर अचरज होगा कि यह शब्द और कोई नहीं बल्कि ‘विकास’ शब्द ही है। आज के इस दौर से सौ साल पहले का साहित्य या पचास साल पहले का साहित्य विकास जैसे शब्दों का उपयोग नहीं करता था। कुछ राजनैतिक कारणों से हमने अपनी किसी लड़ाई में इस शब्द का किसी ढाल की तरह इस्तेमाल करना चाहा था और अब हम सब पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, राजनैतिक कार्यकर्ता, साहित्यकार, कवि आदि भी अपना काम बिना विकास या प्रगति जैसे शब्दों के चला नहीं पा रहे हैं। इसकी गहराई में जाना चाहिये, ऐसा अनुरोध मैं पूरी विनम्रता के साथ करना चाहता हूं। ... Full story

हजार बार हजारे
 

हजार बार हजारे

अन्ना हजारे का आंदोलन अभी भी जारी है. अब वह जंतर मंतर से हटकर नार्थ ब्लाक के बैरकों में पहुंच गया है. सरकार के सरकारी नुमाइंदों के साथ उन्होंने पहली बैठक पूरी कर ली है. आगे भी बैठकों का दौर जारी रहेगा और देश के लोकतांत्रिक ढांचे में लोकपाल रूपी द्वारपाल बैठाने की कोशिशों को पूरी ईमानदारी से अंजाम दिया जाएगा. लेकिन यह द्वारपाल बैठ भी गया तो करेगा क्या? अभी से यह दावा करना कि यह द्वारपाल चोरों से मिलीभगत नहीं करेगा, थोड़ी नादानी होगी. लेकिन ऐसा मान लेने से बहुत सारी आसानी होगी. इसलिए हम यही मान लेते हैं कि लोकपाल रूपी द्वारपाल के जरिए लोकतांत्रिक ढांचे से भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सकेगा. लेकिन उस शिष्टाचार का क्या जो भ्रष्टाचार के रूप में मौजूद है? ... Full story

पानी की राजनीति
 

पानी की राजनीति

आज हर बात की तरह पानी का राजनीति भी चल निकली है। पानी तरल है, इसलिए उसकी राजनीति भी जरूरत से ज्यादा बहने लगी है। देश का ऐसा कोई हिस्सा नहीं है, जिसे प्रकृति उसके लायक पानी न देती हो, लेकिन आज दो घरों, दो गांवों, दो शहरों, दो राज्यों और दो देशों के बीच भी पानी को लेकर एक न एक लड़ाई हर जगह मिलेगी। ... Full story

मरुभूमि का भाग्यवान समाज
 

मरुभूमि का भाग्यवान समाज

समाज कैसे चलता है, वह अपने सारे सदस्यों को कैसे संगठित करता है, कैसे उनका शिक्षण प्रशिक्षण करता है, उन सबका प्रयोग वह कैसी कुशलता से करता है, उस समाज के एक सदस्य के रूप में मैं भी पिछले तीस साल से देख समझ रहा हूं. वह कितनी लंबी योजना बनाकर काम करता है उसे भी देखने समझने का मौका मिला है. समाज का भूतकाल, वर्तमान और भविष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जुड़ता रहे, सधता रहे, संभला रहे और छीजने के बदले संवरता रहे इस सब का विराट दर्शन मुझे विशाल पसरे रेगिस्तान में, मरूप्रदेश में मिला और आज भी मिलता चला जा रहा है. ... Full story

शोध के साथ श्रद्धा की जरूरत
 

शोध के साथ श्रद्धा की जरूरत

बहुत कम लोगों को पता होगा कि भारत ही नहीं एशिया का पहला इंजीनियरिंग कालेज कहां बना था? आप जानते हैं वह कब और क्यों बना? यह जानना इसलिए भी जरूरी है कि आज तकनीकि का जो हमारा थोड़ा पढ़ा लिखा समाज है उसकी नींव में हमारे वे अनपढ़ लोग रहे हैं जिनको हमने दुत्कार कर अलग कर दिया. लेकिन शायद ही इसके बारे में किसी को पता हो. मुझे चार-पांच आईआईटी में जाने का मौका मिला है. मैंने वहां के फैकल्टी से भी यह जानने की कोशिश की कि क्या उन्हें पता है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई कहां से शुरू होती है. ... Full story

पर्यावरण सुरक्षा का भोग विलास
 

पर्यावरण सुरक्षा का भोग विलास

दुनिया को पर्यावरण की चिंता करनेवाली 24 घण्टे की बुद्धि नहीं चाहिए बल्कि चौबीसों घण्टे पर्यावरण के प्रति सजग रहनेवाला मानस चाहिए. सरकारी कैलेण्डर में देखें तो पर्यावरण पर बातचीत 1972 में हुए संयुक्त राष्ट्र संघ के स्टाकहोम सम्मेलन से शुरू होता है. पश्चिम के देश चिंतित थे कि विकास का कुल्हाड़ा उनके जंगल काट रहा है. विकास की पताकानुमा उद्योग की ऊंची चिमनियां, संपन्नता के वाहन, मोटर गाड़ियां आदि उनके शहरों का वातावरण खराब कर रही हैं. ... Full story

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Anupam Mishra Anupam Mishra पानी और पर्यावरण पर काम करने के पर्याय बन चुके अनुपम मिश्र अपनी किताब आज भी खरे हैं तालाब की तरह व्यक्तित्व और संपादन के लिए पूरी तरह से खरे हैं. और भी बहुतेरे काम हैं जिनके बारे में लोग कम ही जानते हैं. वर्तमान में गांधी मार्ग के संपादक.

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