Bajarang Muni
आंधी आई, चली गई
अन्ना की आंधी बहे एक साल हो गये. हम देख रहे हैं कि अन्ना की आंधी आई और चली गई. भ्रष्टाचार के ...
सर्वोच्च नहीं है संसद
एक बार फिर सांसद ने संसद के सर्वोच्चता की दुहाई देकर अपने दामन को बचा लिया है. टीम अन्ना के सदस्य अरविन्द ...
गरीबी और कैलोरी की काल्पनिक सीमारेखा
विपक्षी दल, मीडिया, सोनिया जी की टीम यदि गरीबी रेखा पर भावनात्मक उबाल पैदा करें तो कुछ कुछ समझ में आता है किन्तु केन्द्रीय मंत्रिमंडल के सदस्य जयराम रमेश अथवा एन्टोनी जी असंतोष व्यक्त करें तो बात गंभीर बन जाती है। क्या वास्तव में सरकार ने गरीबों के साथ कोई अन्याय किया है? क्या वास्तव में सरकार ने गरीबों से कोई ऐसी सुविधा घटा दी या छीन ली है जो उन्हें प्राप्त थी? आखिर इतना बड़ा बवंडर क्या है? सरकार उत्तर क्यों नहीं दे रही? एक भी व्यक्ति स्पष्ट क्यों नहीं कर रहा कि यथार्थ क्या है? ... Full story
आसान नहीं है राइट टू रिकाल
राइट टू रिकाल एकमात्र ऐसा समाधान है जो राजनेताओं की बढ़ती उच्श्रृखलता पर अंकुश में सहायक हो सकता है। राइट टू रिकाल की प्रक्रिया पर भिन्न मत हो सकते है किन्तु कोई समाधान निकलना असंभव नहीं। जो लोग राइट टू रिकाल को उचित मानते है उनका रिकाल की प्रक्रिया संबंधी विचार मंथन मे स्वागत है। जो इसे अनावश्यक मानते है उनसे भी हम चर्चा करने के लिये तैयार है जिससे कोई अन्य मार्ग निकले, किन्तु जो लोग तंत्र की ढाल बनेंगे उन्हे हम उत्तर देने के लिये भी तैयार है। ... Full story
जेपी से बड़ा अन्ना का आंदोलन
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार निवारण के नाम पर शुरू किया गया आंदोलन अब अपने वास्तविक स्वरुप की दिशा में आगे बढ़ने लगा है. हम आप जिस आंदोलन को अन्ना का आंदोलन कहते रहे हैं वह अन्ना का आंदोलन न होकर लोक और तंत्र के बीच अधिकारों के पुनर्विभाजन का आंदोलन है. महात्मा गांधी के बाद जेपी ने लोकतंत्र की मजबूती के लिए जो आंदोलन चलाया था, अन्ना का आंदोलन उससे आगे जाता दिख रहा है. अन्ना के आंदोलन सामने जेपी आंदोलन बौना साबित हो गया है. ... Full story
विकेन्द्रीकरण और अकेन्द्रीकरण के बीच
ग्लोबलाइजेशन का अर्थ है उदारीकरण। भारत ने उदारीकरण की सन इक्यान्नवे से राह पकडी जो आज तक धीरे धीरे सरक रही है। उदारीकरण की शुरूआत मनमोहन सिंह जी ने की थी जो उस समय नरसिंह राव सरकार मे वित्तमंत्री थे और आज प्रधानमंत्री हैं। उदारीकरण का सीधा सा आशय होता है विकेन्द्रीकरण। यह केन्द्रीयकरण तथा अकेन्द्रीयकरण के बीच की स्थिति होती है।। केन्द्रीयकरण का परिणाम होता है सुव्यवस्था और गुलामी। विकेन्द्रीयकरण का परिणाम होता है अव्यवस्था और लोकतंत्र। अब यह समाज पर निर्भर करता है कि वह किस दिशा मे जाना चाहता है? ... Full story
मंहगाई और गरीबी का भ्रामक मायाजाल
स्वतंत्रता के तत्काल बाद ही राजनेताओं तथा उनके आश्रित बुद्धिजीवियों ने मंहगाई और गरीबी के विरूद्ध सामूहिक हल्ला बोल दिया था जो साठ वर्ष बाद भी उसी रूप में उसी प्रकार जारी है। मैने इन आर्थिक समस्याओं पर पिछले तीस चालीस वर्षों से गहन शोध किया। मुझे कई बार आंकड़े इकठ्ठे करने पड़े क्योंकि जो नतीजे आते थे उनमें पूरे भारत में मैं अकेला दिखता था। मैं अपने आधे अधूरे नतीजों पर कुछ प्रश्न करता था तो कोई अन्य उत्तर देने वाला भी नहीं था। परिणामस्वरूप मुझे अकेले ही बढ़ना पड़ा और आज मैं यह कहने की स्थिति में हूं कि भारत में पिछले साठ पैंसठ वर्षों से मंहगाई, गरीबी, का जो हल्ला किया जा रहा है वह पूरी तरह या तो झूठा है या कृत्रिम। न मंहगाई वास्तविक है न गरीबी। ये सब प्रचार भारत के बुद्धिजीवियों, पूंजीपतियों, राजनेताओं का मिला जुला षड़यंत्र मात्र है। ... Full story
न भ्रष्टाचार जाएगा, न रामराज्य आयेगा
इन दिनों भारत में भ्रष्टाचार सर्वाधिक चर्चा का विषय बना हुआ हैं। ऐसा लगता है कि भारत की सबसे बड़ी समस्या भ्रष्टाचार ही है। रामदेव जी के अनशन और अन्ना हजारे के आंदोलन ने इस विषय को और भी ज्यादा गंभीर बना दिया है। हर आदमी इस बीमारी की चर्चा करने लगा है। लेकिन क्या वर्तमान व्यवस्था में रहते हुए हम भ्रष्टाचार से मुक्ति पा सकते हैं? क्या आदर्श राज्य व्यवस्था कभी इस देश में लागू हो पायेगी? बजरंग मुनि मानते हैं कि वर्तमान व्यवस्था के रहते न तो भ्रष्टाचार से मुक्ति मिल सकती है और न ही गांधी के आदर्शों का रामराज्य देश में कभी आ सकता है. ... Full story
सुनो सिब्बल तीन सवाल
केन्द्रीय मंत्री तथा ड्राफटिंग कमेटी के सदस्य कपिल सिब्बल जी ने बहुत दिमाग लगाकर तीन सवाल उठाया है। अन्ना जी की टीम भी इस प्रश्न का ठीक उत्तर नहीं दे पा रही है. इन तीनों सवालों का वरिष्ठ सर्वोदयी गांधीवादी बजरंगमुनि न केवल मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं बल्कि कपिल सिब्बल से भी तीन प्रतिप्रश्न पूछ रहे हैं. ... Full story
अथ से इति तक बाबा रामदेव
रामदेव जी का उत्थान जिस तेज गति से हुआ, पतन की गति उससे भी बहुत ही तेज थी। ऐसा लगा जैसे एकाएक गुब्बारा फूट गया हो और गुब्बारे की हवा को पकड़ते पकडते रामदेव जी खुद ही तबाह हो गये हों। रामदेव जी ने जिस महल को खड़ा करने मे इतने वर्ष लगाये थे वह महल राजनैतिक वजन न सम्हालने के कारण एकाएक हिलने लगा और बाबा रामदेव जान बचाकर उस से बाहर कूद गये। रामदेव जी बड़ी शान्ति से अपने योग व्यवसाय में सफलता और सम्मान पूर्वक बढ रहे थे। एकाएक उन्हे क्या सूझी कि उन्होने लालच मे आकर राजनीति रूपी कंबल को पकड लिया। किन्तु वह काला कम्बल न होकर भालू निकला। अब रामदेव जी तो कम्बल को छोडना चाहते हैं किन्तु वह भालू बन चुका कम्बल रामदेव जी को छोडने को तैयार नहीं। ... Full story
