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Oct

30

2014

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कालेधन का सियासी सिनेमा

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कालेधन का सियासी सिनेमा

25 बरस पहले पहली बार खुले तौर पर वीपी सिंह ने बोफोर्स घोटाले के कमीशन का पैसा स्विस बैंक में जमा होने का जिक्र अपनी हर चुनावी रैली में किया। हर मोहल्ले। हर गांव। हर शहर की चुनावी रैली में वीपी के यह कहने से ही सुनने वाले खुश हो जाते कि बोफोर्स घोटाले के कमीशन का पैसा कैसे स्विस बैंक में चला गया और वीपी पीएम बन गये तो पैसा भी वापस लायेंगे और कमीशन खाने वालो को जेल भी पहुंचायेंगे। तब वोटरों ने भरोसा किया। जनादेश वीपी सिंह के हक में गया। लेकिन वीपी के जनादेश के 25 बरस बाद भी बोफोर्स कमीशन की एक कौड़ी भी स्विस बैंक से भारत नहीं आयी। तो अब पहला सवाल यही है कि क्या विदेशों में जमा कालेधन की कौडी भर भी भारत में आ पायेगी या फिर सिर्फ सपने ही दिखाये जा रहे हैं।

क्योंकि 25 बरस पहले के वीपी के जोश की ही तरह 25 बरस बाद नरेन्द्र मोदी भी कालेधन को लेकर कुछ इसी तर्ज पर चुनावी समर में निकले । 25 बरस पुरानी राजनीतिक फिल्म एक बार फिर चुनाव में हिट हुई। मोदी भी पीएम बन चुके हैं लेकिन वीपी के दौर की तर्ज पर मोदी

Oct

30

2014

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कालेधन से मुक्ति की चुनौतियाँ

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कालेधन से मुक्ति की चुनौतियाँ

गौरतलब है कि आरोपियों के खिलाफ जाँच सीबीआइ करेगी या आयकर विभाग, का फैसला भी अदालत खुद करेगी। मालूम हो कि सरकार संबंधित देशों के साथ मौजूदा संधियों की दुहाई देकर मामले में टाल-मटोल की नीति अपना रही थी। सरकार का कहना था कि संधि के प्रावधान गोपनीय हैं। साथ ही, इसमें दोहरे कराधान से बचने के लिए इस बात का प्रावधान है कि आरोपियों के खिलाफ अभियोजन शुरू होने से पहले नामों का खुलासा नहीं किया जा सकता, लेकिन अदालत ने सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि कालाधन रखने वाले सभी खाताधारकों के नाम बताने पर मित्र देशों के साथ  संधि टूट सकती है।

ताजा घटनाक्रम:
शुरू में मोदी सरकार ने कहा कि वह 136 लोगों का नाम कोर्ट को सौंपेगी, लेकिन 27 अक्टूबर को उसने सिर्फ आठ लोगों के नाम बताये, जबकि कहा जा रहा था कि कालेधन वाली सूची में आठ सौ लोगों के नाम हैं। हालाँकि, कोर्ट के कड़े रुख एवं विपक्ष के आलोचना के बाद सरकार ने केवल 627 लोगों की सूची ही अदालत को सौंपी है। बता दें कि मामले में सरकार का रुख लगातार बदलता रहा है। सरकार का कहना है कि विदेशों में पैसा रखना

Oct

29

2014

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तेल के खेल में मोदी सरकार का तमाशा

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तेल के खेल में मोदी सरकार का तमाशा

तो बुरे दिन आ जाते
इस तथ्य से को हीं कर सकता कि पेट्रोलियम पदार्थों के मूल्यों में जो गिरावट आई है उसका लाभ हिंदुस्तानी अर्थव्यवस्था को निश्चित तौर पर होना है। हमारे सकल आयात में पेट्रोलियम आयात की हिस्सेदारी लगभग 30 फीसदी है। यदि पेट्रोलियम मूल्यों के अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसी तरह के हालात बने रहे तो ‘अच्छे दिन’ आने वाले ही हैं। अंतर्राष्ट्रीय पेट्रोलियम राजनय को विश्लेषित किया जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि इस तरह के हालात से कई देश फायदे में रहेंगे। साथ ही साथ वेनेजुएला और ईरान जैसे कुछ देश पेट्रोलियम पदार्थों के सस्ते रहने पर अपनी अर्थव्यवस्था को संकट के दौर में जाता हुआ पाएंगे। पहले हम समझ लें कि सस्ते पेट्रोलियम पदार्थों से बड़ी अर्थव्यवस्थाएं मसलन अमेरिका, चीन, जापान और यूरोपीय संघ पर क्या असर पड़ेगा? फिर हम हिंदुस्तान पर इसके प्रभाव को भी विश्लेषित करेंगे और अंत में तेल उत्पादक देशों में कौन तेल की सस्ती कीमतों को झेल पाएगा और कौन इस खेल में हाशिए पर ठेल उठेगा, को भी समझ लेंगे। हिंदुस्तान में जब आम चुनाव हो रहे थे तब इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया (आइसिस) इराक के तेल भंडार पर कब्जे के लिए आगे बढ़ रहा

Oct

29

2014

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इंडिगो का ईनाम

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इंडिगो का ईनाम

भले ही विश्व की सबसे बड़ी विमानों की खरीददारी अखबारों की सुर्खियां नहीं बन सकी, लेकिन इस ऑर्डर से भारतीय घरेलू बाजार में विमानों के किराये में बड़े बदलाव के कयास लगाये जा रहे हैं।  जानकारों के मुताबिक इस ऑर्डर की आपूर्ति के बाद इंडिगो किफ़ायती दर पर अपनी सेवा देने में सक्षम हो सकेगा। इस बात की तसदीक इंडिगो के प्रेसिडेंट आदित्य घोष ने भी की है। उन्होंने अपने बयान में कहा है कि इंडिगो के ऑर्डर से देश में विमानन सेवा और भी सस्ती होगी। साथ ही, इससे विमानन क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे, क्योंकि भारत में कारोबार के विस्तार की अभी भी काफी गुंजाइश है। बता दें कि विमानन क्षेत्र में प्रति विमान औसतन 100 लोगों को रोजगार मिलता है। इस लिहाज से इंडिगो के इस सौदे से 2500 लोगों को रोजगार मिल सकता है। प्रति विमान कर्मचारियों की बात करें तो इंडिगो में प्रति विमान सबसे कम 101 कर्मचारी काम करते हैं। यह संख्या जेट एयरवेज में 130 और एयर इंडिया में 260 है। मौजूदा वक्त में यदि विश्व स्तर पर विमान सेवा के उपभोग की बात करें तो अमेरिकी साल में 1.8 बार, जर्मन 1.0 बार, चीनी 0.2 बार और भारतीय 0.1 बार

Oct

27

2014

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विदाई बेला में वंशवादी राजनीति

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विदाई बेला में वंशवादी राजनीति

शायद कांग्रेस नेताओं को लगता है कि प्रियंका गांधी में वह जादू है, जो मोदी मैजिक से टक्कर ले सकता है। आखिर प्रियंका गांधी में ऐसा क्या है, जो डूबती कांग्रेस के लिए तिनका बन सकती हैं। अभी तक प्रियंका के बारे में यही सामने आया है कि वह अच्छा बोल लेती हैं, तुर्की-ब-तुर्की जवाब दे सकती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि वह खूबसूरत हैं। किसी कांग्रेसी से पूछ लीजिए कि प्रियंका में ऐसा क्या है, जो आप उनको राजनीति में लाने की मांग करते हैं? जवाब आएगा, उनमें इंदिरा गांधी का अक्स दिखता है। सवाल यह है कि क्या राजनीति में आने के लिए सिर्फ किसी बड़े नेता का अक्स दिख जाना ही काफी है? देश में मौजूद गंभीर मुद्दों पर प्रियंका की क्या राय है, यह अभी तक किसी भी रूप में सामने नहीं आया है। हालिया लोकसभा चुनाव में भी उनकी भूमिका सीमित ही रही है।

1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी, तो राजीव गांधी को कलकत्ता से लाकर दिल्ली की गद्दी सौंप दी गई थी। राजीव गांधी की एकमात्र विशेषता यही थी कि वह इंदिरा गांधी के बेटे थे। उनकी यह एकमात्र योग्यता उन्हें एक अच्छा प्रधानमंत्री नहीं बना पाई। 1985

Oct

23

2014

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नरेगा पर नरेन्द्र की नकेल

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नरेगा पर नरेन्द्र की नकेल

सन दो हजार पांच में यह योजना शुरू हुई। और यह कहने में कोई संकोच नहीं हो सकता कि नरेगा श्रमजीवियों के हित में सरकार द्वारा किया गया पहला सफल प्रयास रहा। इस योजना को शुरू करने का सर्वाधिक दबाव वामपंथियों का रहा। वे नही समझते थे कि भारत सरकार इसे मान लेगी और जब सरकार ने इसे मानकर लागू किया तो वामपंथियों को भारी अफसोस हुआ। वामपंथियों ने समय समय पर इस योजना के महत्व को कम करने के अनेक प्रयास किये जिनमे आंशिक रूप से वे सफल भी रहे। दूसरी ओर विकसित प्रदेशों के बड़े किसानों ने भी इस योजना के विरूद्ध प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष लाबिंग की। तीसरी ओर वामपंथियों तथा विकसित प्रदेशों के बड़े किसानों के कष्ट से प्रभावित अनेक सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीशों तथा अधिवक्ताओं ने भी इस योजना का स्वरूप बदलने का भरसक प्रयास शुरू कर दिया। अर्थशास्त्रियों की भी जमात उन विकसित किसानो के पक्ष में आकर खड़ी हो गई है। इन्हीं लोगों ने एक पत्र लिखा है। जिन अठाइस लोगो ने मिलकर यह पत्र लिखा है उनमे से एक भी ऐसा नही जिसे समाजशास्त्र का कोई ज्ञान हो अथवा ग्रामीण अर्थव्यवस्था का कुछ पता हो। कुछ पश्चिमी अर्थशास्त्र की किताबें पढकर वर्तमान

Oct

22

2014

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पवार का पॉवर ब्रेक

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पवार का पॉवर ब्रेक

अंतिम नतीजा आने से ऐन पहले भांप लिया कि बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी की दिशा में बढ रही है। मौके तो ताड़ा और बीजेपी के सामने सदाशयता के साथ प्रकट हो गए। महाराष्ट्र में स्थायी सरकार बनाने के लिए एनसीपी कार्यकारिणी से बीजेपी को बिना शर्त समर्थन देने का अधिकृत फैसला कर दिया। शिवसेना की छाती पर मूंग दललते हुए सिपहसलार प्रफुल्ल पटेल के हवाले से मराठा दिग्गज पवार ने तुरंत फुरंत में फैसले का ऐलान करा दिया। अब बीजेपी के दोनों हाथ लड़्डू वाली स्थिति बन आई है।

देर सबेर राजनीति का ऊंट चाहे जिस करवट बैठे फिलहाल इतना तय है कि पवार के झटके से मातोश्री की दिवाली में इसबार खुशी की मिठाई नहीं बंटेगी। सामना की पत्रकारिता के सहारे विष उगल रही शिवसेना को सताने का रास्ता निकल आया है। पॉवर के करीब पहुंची बीजेपी ने फैसले के बाद से अबतक शिवसेना से याचना नहीं की है। सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बीजेपी सरकार बनाने में कोई जल्दीबाजी में नहीं दिख रही। दिखे भी क्यों ? सहुलियत के लिए दिल्ली की तरह ही महाराष्ट्र को राष्ट्रपति शासन से संचालित किया जा सकता है। इसका इंतजाम चुनाव के दौरान ही अल्पमत सरकार के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चह्वाण के

Oct

22

2014

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भारत की दीवाली, चीन की खुशहाली

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भारत की दीवाली, चीन की खुशहाली

पिछले दिनों हम भारतीय एक उल्लेखनीय राजनयिक घटना के साक्षी बनें जिसके अंतर्तत्व को प्रत्येक भारतीय समझे यह आवश्यक है. पिछले माह चीनी राष्ट्रपति के भारत प्रवास में भारत प्रशासन उनसें सौ अरब डालर के निवेश हेतु आश्वस्त था किन्तु इसके सामनें उन्होंने मात्र 20 अरब डालर के ही निवेश की घोषणा की. ऐसा क्यों हुआ था इस बात को हमें स्मरण रखना चाहिए!! इसके पीछे यह वजह है कि शी जिनफिंग के दौरे के दौरानचीनी सेना के भारतीय सीमा में अतिक्रमण को मोदी ने मुखरता से उठाया था. चीन द्वारा यह कहा जाना कि “सीमा विवाद को एक तरफ रखकर दोनों देश आर्थिक कार्यक्रमों पर ध्यान लगायेंगे” यह चीन का एक छलावा मात्र है. शी के भारत आगमन के ठीक पूर्व सीमा पर चीन के अन्दर आनें और पीछे हटनें का कूटनीतिक प्रयोग शी नें किया था. शी ने संभवतः इस प्रयोग से नए भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के रूख को समझनें की कोशिश की और फिर बड़ा ही निवेश की राशि कम करके स्पष्ट सन्देश देकर एक प्रकार से “देख लो- समझ लो- अन्यथा झेल लो” का वातावरण सफलता पूर्वक निर्मित कर दिया था. अब यह भारतीयों पर निर्भर है कि हम ड्रेगन के इस व्यवहार को किस

Oct

21

2014

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पाक का नापाक मिलियन मार्च

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पाक का नापाक मिलियन मार्च

ब्रिटेन के बाद पाकिस्तान ब्रशेल्स में भी इसी तरह के मार्च का आयोजन करेगा. ब्रशेल्स यूरोपियन यूनियन का मुख्यालय है और यहां कश्मीर में मानवाधिकार हनन का सवाल उठाकर पाकिस्तान यूरोपीय देशों की जनता को बरगलाना चाहता है. वैसे तो पाकिस्तान कश्मीर मसले का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने की कोशिश लगातार करता रहा है, लेकिन ये ताजा कोशिशें हाल के वर्षों में उसके द्वारा की गयी कोशिशों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण और बड़ी हैं.

भारत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली नयी सरकार ने पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने की मंशा से ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को भी अपने शपथ ग्रहण समारोह में बुलाया था. इसके साथ ही भारत ने पाकिस्तान से खुलेमन से बातचीत करने की तिथि भी तय कर दी. लेकिन इससे ठीक पहले पाकिस्तान ने नयी दिल्ली में कश्मीर के अलगाववादियों से मुलाकात कर यह जतला दिया कि उसकी नीयत कतई साफ नहीं है. भारत की कोई और पहले की तरह की सरकार होती तो शायद इस बात का उतना बुरा नहीं मानती. पर विशाल बहुमत से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में चुनकर आयी भारतीय जनता पार्टी की नयी भारत सरकार ने इस मामले पर कड़ा रूख अख्तियार करते हुए पाकिस्तान से निर्धारित बातचीत रद्द

Oct

21

2014

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जिस समाज ने आपको इतना दिया है, उस समाज को आप भी कुछ दीजिए!

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जिस समाज ने आपको इतना दिया है, उस समाज को आप भी कुछ दीजिए!

मेरा एक-दो सुझाव जरूर है। क्‍या कभी हम इस कन्वोकेशन में एक स्पेशल गेस्ट की परंपरा खड़ी कर सकते हैं क्‍या? और स्पेशल गेस्ट का मेरा मतलब है कि गरीब बस्‍ती में जो स्कूल हैं, गरीब परिवार के बच्‍चे जहां पढ़ते हैं, ऐसे एक सेलेक्टेड 8वीं 9वीं कक्षा वे बच्‍चे, 30, 40, 50 जो भी आपकी क्षमता में हो, उनको ये कन्वोकेशन में स्पेशल गेस्ट के रूप में बुलाया जाए, बिठाया जाए, और वे देखें, ये दुनिया क्‍या है। जो काम शायद उसका टीचर नहीं कर पाएगा, उस बालक मन में एक घंटे-डेढ़ घंटे का ये अवसर उसके मन में जिज्ञासा पैदा करेगा। उसके मन में भी सपने जगाएगा। उसको भी लगेगा कि कभी मेरी जिंदगी में ये अवसर आए। आप कल्‍पना कर सकते हैं, कितना बड़ा इसका प्रभाव हो सकता है। चीज बहुत छोटी है। लेकिन ताकत बहुत गहरी है और यही चीजें हैं जो बदलाव लाती है। मेरा आग्रह रहेगा, वे गरीब बच्‍चे। डॉक्‍टर का बच्‍चा आएगा तो उसको लगेगा कि मेरे पिताजी ने भी ये किया है, उसको नहीं लगेगा। समाज जीवन में अपने सामान्‍य बातों से हम कैसे बदलाव ला सकते हैं। उस पर हम सोचें। जो डॉक्‍टर बनकर आज जा रहे हैं, अपने जीवन में

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.