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Sep

30

2014

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मिस्टर 'होप' से मिले मिस्टर 'होप'

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2008 में ओबामा ने जिन नारोंं का इस्तेमाल किया था 2014 में उन्हीं नारों मुहावरों का इस्तेमाल नरेन्द्र मोदी ने किया 2008 में ओबामा ने जिन नारोंं का इस्तेमाल किया था 2014 में उन्हीं नारों मुहावरों का इस्तेमाल नरेन्द्र मोदी ने किया

इराक से लेकर अफगानिस्तान तक 'जस्टिस' को स्थापित करने के संकल्प के साथ अमेरिका पर शासन करनेवाले जार्ज डब्लू बुश जूनियर। अब्राहम लिंक की डेमोक्रेट पार्टी के ऐसे प्रशासक जिनकी पहचान बताने के लिए अमेरिका ने रिपब्लिकन के चुनाव चिन्ह गधे को बड़ी उदारता के साथ जार्ज बुश जूनियर के साथ जोड़ दिया था। इराक और अफगानिस्तान जस्टिस स्थापित करने के लोकतांत्रिक काम में विजयी होने के बाद भी जार्ज बुश जूनियर नाउम्मीद करनेवाले नेता हो गये थे। अमेरिका की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी का दबाव और सैन्य कार्रवाई पर बढ़ते खर्च के कारण अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदार देश हो चला था। लेकिन अकेले यही समस्या नहीं थी जो अमेरिकी नागरिकों को परेशान कर रही थी। कर्जखोर अर्थव्यस्था के चक्रव्यूह में फंसकर चकनाचूर हुई निजी, पारिवारिक और सामाजिक संकट ने जार्ज बुश जूनियर के जस्टिस को ज्यादा तवज्जो नहीं दिया। अमेरिका को एक नये उम्मीद की जरूरत थी।

अमेरिका की वह उम्मीद बनकर आये बराक हुसैन ओबामा। उसी डेमोक्रेट पार्टी के उम्मीदवार जिसके जॉन कैरी 2004 में जार्ज बुश जूनियर से चुनाव हार गये थे। डेमोक्रेट्स 2008 में पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन को अपना दावेदार बनाना चाहते थे लेकिन ओबामा का उभार इतनी तेजी से

Sep

30

2014

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भारत का उत्सव धर्म

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भारत का उत्सव धर्म

भारतीय संस्कृति में त्योहारों एवं उत्सवों का आदि काल से ही काफी महत्व रहा है। हमारी संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां पर मनाये जाने वाले सभी त्योहार समाज में मानवीय गुणों को स्थापित करके लोगों में प्रेम, एकता एवं सद्भावना को बढ़ाते हैं। भारत में त्योहारों एवं उत्सवों का सम्बन्ध किसी जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र से न होकर समभाव से है। यहां मनाये जाने वाले सभी त्योहारों के पीछे की भावना मानवीय गरिमा को समृद्धि प्रदान करना होता है। यही कारण है कि भारत में मनाये जाने वाले त्योहारों एवं उत्सवों में सभी धर्मों के लोग आदर के साथ मिलजुल कर मनाते हैं। उसलिए उत्सव धर्मों के उत्सव नहीं रह जाते बल्कि भारत में उत्सव अपने आप में एक ऐसे धर्म का रूप धर लेता है जिसमें सब सहभागी होते हैं।

आजकल तो नवरात्र, विजयादशमी की धूम है। बच्चे, बड़े सभी इन उत्सवों का हिस्सा बनते नजर आ रहे हैं। इन दिनों राष्ट्र देवी पूजा में डूबा हुआ है। चारों ओर देवीमंडप सजे हैं। जिनमें नवीनतम कला रूपों का कलाकारों, मूर्तिकारों ने प्रयोग किया है। चारों ओर तरह-तरह के सांस्कृतिक अनुष्ठानों का आयोजन हो रहा है और सारा समाज उसमें डूबा हुआ है। इस अवसर पर

Sep

30

2014

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पढ़ें इंजीनियरी बेचें तेल

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पढ़ें इंजीनियरी बेचें तेल

हकीकत और भी तकलीफदेह है
कुशवाहा जी, आपने ठीक ही बल्कि सच पूछो, तो जमीनी हकीकत इससे भी ज्यादा तकलीफदेह है। स्कूली स्तर पर वोकेशनल कोर्स (तकनीकी/व्यावसायिक) के मामले में दीपांकर गुप्ता की रिपोर्ट और निराश करती है। नेशनल सैंपल सर्वे के एक अध्ययन के मुताबिक, स्कूली शिक्षा के दौरान कम्पयूटर प्रशिक्षण प्राप्त 44 प्रतिशत घर बैठे हैं। टैक्सटाइल प्रशिक्षण प्राप्त 66 प्रतिशत के पास नौकरियां नहीं हैं। स्कूलों में वोकेशनल कोर्स उत्तीर्ण महज् 18 प्रतिशत किशोरों को ही संबंधित ट्रेंड की नौकरी मिल पाई; शेष 82 प्रतिशत अपनी पढाई का लाभ नहीं पा सके। ज्यादातर बेरोजगारी झेलने को मजबूर हैं। इस 18 प्रतिशत में से मात्र 40 प्रतिशत को ही औपचारिक शर्तों पर नौकरी मिली। जाहिर है कि शेष 60 प्रतिशत की नौकरी अस्थाई किस्म की है। नौकरियां हासिल करने वालों में 30 प्रतिशत ऐसे थे, जिनके पास स्नातक अथवा उच्च डिग्री थी।

यह हाल क्यों है? यह हाल इसलिए नहीं कि है, तकनीकी क्षेत्र में विद्यार्थियों की आवक अधिक है या कि नौकरियां कम हैं। हकीकत यह है कि आज भारत के मात्र तीन प्रतिशत कर्मचारी ही वोकेशनल प्रशिक्षण प्राप्त है। अधिक की पूर्ति के लिए भारत में वोकेशनल स्कूलों की कमी है। असलियत यह है कि भारत

Sep

29

2014

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महा युति क्यों टूटी?

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महा युति क्यों टूटी?

शिवसेना पार्टी प्रमुख की पत्नी रश्मी ठाकरे मौजूदा वक्त में सबसे ताकतवर है और गठबंधन टूटने के बाद बीजेपी के भीतर से लगातार यही आवाज आ रही है कि उद्दव ठाकरे की राजनीतिक महत्वकांक्षा को उड़ान देने के लिये परिवार की ही वह कोटरी है जो शिवसेना के हर निर्णय को लेने में सक्षम है। इस कोटरी में कोई बाहरी शिवसैनिक नहीं है बल्कि ठाकरे परिवार के ही सदस्य है। और उद्दव ठाकरे का हर निर्णय इससे प्रभावित होता है। इसीलिये जो ठाकरे परिवार हमेशा किंगमेकर की भूमिका में रहा वह पहली बार किंग बनने का खुला ऐलान करने से नहीं कतरा रहा है। कमोवेश बीजेपी के गठबंधन टूटने के बाद ठाकरे परिवार की इसी महत्वकांक्षा का जिक्र संघ परिवार से किया। चूंकि संघ परिवार नहीं चाहता था कि महाराष्ट्र में गठबंधन टूटे तो बीजेपी की तरफ से आरएसएस को जानकारी भी यही दी गयी ही मौजूदा वक्त में ठाकरे परिवार की बडी हुई महत्वाकांक्षा का चेहरा बालासाहेब ठाकरे से अलग है। बालासाहेब ठाकरे दूर की सोच कर निर्णय लेते थे। लेकिन मौजूदा ठाकरे परिवार सिर्फ तत्काल को देख रहा है और बीजेपी की ताकत जब शिवसेना से ना सिर्फ ज्यादा है बल्कि साथ लड़ने पर बीजेपी के वोट का

Sep

29

2014

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हिन्दुत्व के साथ भाजपा का लव जेहाद

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हिन्दुत्व के साथ भाजपा का लव जेहाद

राजनीति भले ही अनिश्चितताओं से आसन्न और अवसरों से लबरेज हुआ करे किन्तु उसमें किसी भी क्रिया को तत्काल एक बटन दबा कर ‘अनडू’ करने की सुविधा नहीं हुआ करती। भारतीय राजनीति में १९९० और २००० के दशक क्षेत्रीय क्षत्रपों और केन्द्रीय सियासी दलों के गठबंधन का सत्ताकाल था। १९८० के दशक तक कोई मानता नहीं था कि गठबंधन के भरोसे कोई सरकार अपना कार्यकाल भी पूरा कर सकती है। १९९० और २००० के दशक ने केन्द्र में नरसिंहराव, अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपने कार्यकाल पूर्ण करने वाले गठबंधनों का इतिहास रचाया। तमाम राज्यों में गठबंधन सरकारों ने सफलताएं हासिल की। १९९५ तक सियासी विश्लेषक मानते थे कि गठबंधन से राज्य सरकारें चलाने की कला से सिर्फ साम्यवादी ही समर्थ हैं। पश्चिम बंगाल और केरल में वाममोर्चा सरकारें सफलतापूर्वक संचालित हुर्इं। १९९५ में पहली बार महाराष्ट्र ने संदेश दिया कि साम्यवाद की तरह ही ‘रामवाद’ को मानने वाली हिंदुत्ववादी शक्तियों में भी गठबंधन धर्म निभाकर सत्ता संचालन का समग्र बल है। भारतीय राजनीति के गठबंधन के इतिहास में सत्ता के गठबंधनों के टिके रहने के उदाहरण तो थे, ऐसे गठबंधनों में सत्ता ‘फेविकोल’ का काम किया करती थी।

मौकापरस्त मुंडे–महाजन की जोड़ी
विपक्ष में

Sep

29

2014

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कहां जाएं कुर्द?

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तुर्की की सीमा पर पानी की बौछार से बचती एक कुर्द महिला तुर्की की सीमा पर पानी की बौछार से बचती एक कुर्द महिला

शायद नहीं। आइसिस की यह लड़ाई और कत्लेआम सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि आर्थिक भी है, सामाजिक भी है और नस्लीय भी। इराक के अल्पसंख्यक इसाईयों और यजीदियों को दरबदर कर देने के बाद अब वे इस्लाम पर हमलावर हैं। इस्लाम में भी शिया मुसलमान तो उनके निशाने पर बड़ी तादात में हैं ही, लेकिन वे उन सुन्नी मुसलमानों को भी खत्म कर रहे हैं जो आइसिस की नजर में गैर इस्लामिक हैं। कुर्द इसी कारण अब सीधे तौर पर आइसिस के निशाने पर आ गये हैं।

सितंबर के महीने में आइसिस ने इराक में एक ऐसे निशानी को जमींदोज कर दिया जिसे इस्लाम में हीरो का दर्जा प्राप्त है। मिश्र और सीरिया में अयूबी राज कायम करनेवाले और इस्लाम के सबसे बड़े ख्वाब येरुसेलम को जीतनेवाले सलाउद्दीन अल अयूबी की तिकरित स्थित निशानी को आइसिस आतंकियों ने जमींदोज कर दिया। सलाउद्दीन तिकरित में ही पैदा हुए थे इसलिए उनके नाम पर यहां छोटा सा किला बना हुआ था। आइसिस आतंकियों को सलाउद्दीन गैर इस्लामिक नजर आये क्योंंकि सुन्नी मुसलमान होने के बावजूद वे कुर्द थे इसलिए उनके जन्म की निशानीं को मिटा दिया गया। लेकिन सिर्फ सलाउद्दीन की निशानी को मिटाकर आइसिस शांत नहीं हुआ। ईसाईयोंं और यजीदियों के उत्पीड़न

Sep

28

2014

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सत्ता मोह में हुआ विछोह

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सत्ता मोह में हुआ विछोह

शिवसेना और भाजपा ने सीटों की लड़ाई को इस मोड़ पर ले जाकर खड़ा कर दिया था जहां सुलह के तमाम रास्ते बंद हो रहे थे| भाजपा के नेता दिल्ली से महाराष्ट्र की राजनीति को हांक रहे थे और मातोश्री को दिल्ली दरबार में झुकना गवारा न था| इस पूरी कवायद में फायदे में कौन रहा और नुकसान किसे हुआ, इसका आकलन चुनाव परिणामों के बाद हो ही जाएगा किन्तु राज्य की जनता जो कांग्रेस-राकांपा की भ्रष्टतम सरकार को सबक सिखाने और शिवसेना-भाजपा महागठबंधन को सत्ता सौंपने को आतुर थी, उसके साथ राजनीति ने ही छल कर दिया| संभावित मुख्यमंत्री पद के दावेदार का प्रश्न भी दोनों खेमों की रार बढ़ा रहा था। स्व. गोपीनाथ मुंडे के बाद भाजपा के पास कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं था तो नितिन गडकरी राज्य की राजनीति में लौटने को लेकर आशंकित थे| ले-देकर शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे पर ही निगाह ठहरती थी और उद्धव ने अपनी नई संभावित भूमिका को व्यक्त भी किया था किन्तु भाजपा की राज्य इकाई ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना किया और दिल्ली दरबार से कुछ ऐसे घटनाक्रम हुए जिन्हें स्वस्थ राजनीति नहीं कहा जा सकता| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की निष्क्रियता, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का उद्धव को नकारना

Sep

26

2014

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मोदी संघ संबंध

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मोदी संघ संबंध

स्पष्ट है कि लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेतृत्व मे सम्पन्न हुए। यदि संघ ने अपना वीटो न लगाया होता तो लालकृष्ण आडवाणी सुषमा स्वराज मुरली मनोहर जोशी की महत्वाकांक्षाएं कभी एकजुट भाजपा न होने देती न दिखने देती। मोदी या तो स्थापित ही नही हो पाते अथवा यदि होते भी तो अस्थिर ही होते। लोकसभा चुनाव संघ ने जी जान से लड़ा। संघ की मेहनत और मोदी की वाकपटुता ने करिष्मा कर दिखाया। मुस्लिम एकजुटता का घमंड चूर चूर हो गया। अल्पसंख्यक एकता के भरोसे शासन चलाने वाले सभी दल चारों खाने चित हो गये। लोकसभा में जहां हिन्दू अपने सारे भेद भुलाकर एकजुट हो गये वहीं मुसलमान मायावती मुलायम और कांग्रेस के बीच स्थायी नही हो सके। परिणाम सबके सामने है।

लोकसभा चुनाव के तत्काल बाद नरेन्द्र मोदी ने किसी की परवाह न करते हुए कुछ नीतिगत निर्णय लिये। उन्होने रामदेव को भी खुश करते हुए किनारे कर दिया। अडवाणी जी और मुरली मनोहर जोषी सरीखे लोग उचित जगह पर शोभा  बढाने लायक जगह पर पहुंच गये। सुषमा स्वराज जी उचित जगह पर आ गई। मोदी लगातार व्यवस्था  के वे सभी कार्य तीव्र गति से करने लगे जो संघ के प्रिय विषय रहे है। भाषा

Sep

25

2014

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काली नीति की कालिख

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काली नीति की कालिख

असर इसी का हुआ कि जिन कंपनियो को ना तो कोयला खदानो का कोई अनुभव था या फिर जिनके पास ना पावर प्लांट था उन्होंने कोयले की भारी मांग को देखते हुये कोयला खादान मुनाफा बनाने- कमाने के लिये अपने नाम करवा लिया। ऐसी 24 कंपनियां हैं, जिनके पास कोई पावर प्रोजेक्ट का नहीं है । लेकिन उन्हे खादान मिल गयी । 42 कंपनिया एसी है जिन्होंने खादानो की तरफ कभी झांका भी नहीं। लेकिन खादान अपने नाम कर खादान बेचने में लग गयी। यानी लूट हुई है इसपर पहली अंगुली सीएजी ने उठायी तो अब फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया। लेकिन असल सवाल यही है कि सरकार की अगर कोई नीति बीस बरस बाद आदालत के निर्देश पर खारिज होती है । या फिर सरकार को बीते 20 बरस के फैसले रद्द करने पड़ते हैं तो फिर जिन निवेशकों ने सरकारी नीति के तहत पूंजी लगायी वह अब क्या करेंगे। जिन बैकों ने पावर प्लांट के लिये कंपनियो को उधारी दी अब उन्हें वापस पैसा कैसे मिलेगा। और जिन्होने कोयला खादान मिलने पर पावर प्लांट लगा लिया उनकी पूंजी का क्या होगा।

यानी मुसीबत दोहरी है। एक तरफ सरकारों की लूट है तो दूसरी तरफ विकास की

Sep

24

2014

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प्यार के सौदागर

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प्यार के सौदागर

‘लव जिहाद’ किसी धर्म या समुदाय से जुड़ा हुआ विषय मात्र नही है बल्कि पित्रसत्तात्मक समाज का अभिशाप भी इसी से जुड़ा हुआ हैं. जो आज भी समाज में, महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक़ देने के पक्ष में नहीं है. अगर आज के समाज में, महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक़ व अधिकार होते तो यह इतना वाद-विवाद का मुद्दा ही न होता.

आज भी हमारें समाज में विभिन्न जातियों, पंथों, धर्मों, वर्गों व समूहों के बीच असमानता व ऊँच-नीच की खाईं व्याप्त है. जोकि इस जटिल समाज की बुनियादी समस्या भी है. इसी समस्या  की वजह से ‘लव जिहाद’ एक राष्ट्रीय समस्या बनकर उभरी है. इन समस्यायों की जड़ में ही हमारी पित्रसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था, अब तक कुण्डली मार कर बैठी हुई है. आज अगर हमारे समाज में समता व्याप्त होती तो इस तरह के गैरजरूरी विमर्शों न कोई महत्व ही होता, न ही चर्चा का विषय! जै

ी ‘लव जिहाद’ को परिभाषित किया जा रहा है उसमें कितनी सच है और कितना झूठ है. इससे हम और आप बखूबी से वाकिफ हो चुकेंगे.

हाँ इसमें भी कोई दो राय नही की मुस्लिम समाज के लोगों को मदरसों, देवबंदों व दारुल-उलेमों में इस्लामिक तालीम दी जाती है. जहाँ

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

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आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

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मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

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सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

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अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.