Kailash Satyarthi
बेशर्मी का कैटवॉक
31 जुलाई को दिल्ली में निकाला गया, बेशर्मी मोर्चा मीडिया में खासी चर्चा में रहा है। टी.वी. चैनलों पर हो रही बहस ...
पहचान के संकट से जूझते 'रामलला'
पिछले सप्ताह मेरे लेख ”अयोध्या में भीख मांगते रामलला“ पर खासी प्रतिक्रिया रही है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरित मानस में ठीक ...
अयोध्या की गलियों में भीख मांगते रामलला
“सियाराम मय सब जग जानी” की तोता रटन्त करने वाले यदि लेसमात्र भी तुलसीदास की इस चौपाई पर अमल कर रहे होते तो देश के 6 करोड़ बच्चे आज शिक्षा से वंचित तथा बाल श्रम और शोषण के शिकार नहीं होते। भ्रूण हत्या के चलते एक हजार लड़कों के पीछे बच्चियों की संख्या घटकर 918 नहीं रह गई होती। देश के लगभग 70 फीसदी रामलला शारीरिक उत्पीड़न और 53 फीसदी जनकदुलारियां यौन उत्पीड़न की शिकार न हो पातीं। ... Full story
बाल मजदूरी की यह कैसी मजबूरी?
12 जून को पूरी दुनिया अन्तर्राष्ट्रीय बाल श्रम विरोधी दिवस के रूप में मना रही है। बाल श्रम के कानूनी, आर्थिक, सामाजिक तथा मानवीय इत्यादि कई पहलू हैं, परन्तु एक महत्वपूर्ण पहलू पूरी तरह अछूता है। वह यह कि बाल मजदूरी और बाल तस्करी काले धन और भ्रष्टाचार के सबसे बड़े स्रोतों में से हैं। दुर्भाग्य से न तो भ्रष्टाचार के विरोध में उठ खड़ी हुई सिविल सोसायटी और न ही बाल अधिकारों पर काम करने वाले संगठनों का ध्यान इस ओर जा रहा है। बहुत लोगों को यह तर्क अटपटा या चौंकाने वाला लगेगा कि भ्रष्टाचार और बाल मजदूरी का रिश्ता कारण और परिणाम का रिश्ता है। ठीक उसी तरह जैसे बाल मजदूरी, गरीबी और अशिक्षा के आपसी संबंध मुर्गी और अण्डे जैसे हैं। ... Full story
करवट बदलो किसान भगवान
दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा के भट्ठा-पारसौल गांव में हुई पुलिस फायरिंग तथा आगजनी को लेकर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी व बसपा के बीच आरोप-प्रत्यारोपों का दौर जोर-शोर से चल रहा है। बाकी राजनैतिक पार्टियां भी किसानों की सहानुभूति लूटने की होड़ में जुटी हैं। दो हफ्ते पहले तक महाराष्ट्र में प्रस्तावित जैतापुर परमाणु ऊर्जा केन्द्र निर्माण का मुद्दा काफी चर्चा में था। अधिग्रहित जमीनों के दाम ज्यादा मांगना एक महत्वपूर्ण मुद्दा है किन्तु देश का किसान जिन गंभीर समस्याओं से जूझते हुए अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, उनकी तह में जाना जरूरी है। इनमें कुछ की जड़ें बड़ी पुरानी हैं तथा अन्य कुछ नई आर्थिक नीतियों से उपजी हैं। इनके समाधान के ठोस उपाय किए बगैर महज घड़ियाली आंसुओं से चुनावी राजनीति तो की जा सकती है, किसानों का भला नहीं। ... Full story
