Ravish Kumar

टीवी का ट्वीट ट्वीट

लगता है कि टीवी ट्वीटर हो गया है। जैसे आप ट्वीटर में करते हैं उसी तरह से टीवी में होने लगा है। ...

देख रही हो न गंगा माई, अब हम हवा में उड़ रहे हैं

जब पहली बार हवाई जहाज़ से पटना गया तो शहर के ऊपर से निकलते हुए जहाज़ अचानक गंगा के ऊपर से मुड़ने ...

गांधी परिवार का मीडिया परिवार
 

गांधी परिवार का मीडिया परिवार

जब से प्रियंका गांधी वाड्रा उतरीं हैं मैदान में,तब से लग रहा है कि यूपी में बाकी नेता प्रचार ही नहीं कर रहे हैं। वैसे प्रियंका ने सिर्फ रायबरेली और अमेठी का जिम्मा संभाला है फिर भी ऐसे बताया जा रहा है जैसे वो पूरे उत्तर प्रदेश में प्रचार कर रही हैं। दिन भर कैमरे पीछा करते है,लाइव दिखाते हैं,फोकस में प्रियंका ही रहती हैं। एक भी कैमरा पैन होकर,लेफ्ट-राइट होकर अमेठी या रायबरेली नहीं दिखाता। ... Full story

नूझ चैनलों का फार्मूला वन
 

नूझ चैनलों का फार्मूला वन

नूझ लैनलों और बकबारों ने फार्मूला वन निरक्षरता को दूर करने में जो उल्लेखनीय योगदान दिया है,उसकी सराहना करनी चाहिए। इससे साबित हो गया कि मीडिया बेलमुंड ज्योतिषियों के सहारे अंधविश्वास फैलाने में ही नहीं, अत्याधुनिक और विलासी गेम के लोकप्रचार में भी योगदान कर सकता है। बारह झंडे से लेकर ग्रिड गर्ल्स और कब पेन्चर ठीक होता है यह सब जानकारी आपके भीतर ठूंस दी गई है। ... Full story

100 फीसदी कटऑफ का कामर्शियल ब्रेक
 

100 फीसदी कटऑफ का कामर्शियल ब्रेक

क्या यह सही है कि कॉमर्स एक विधा नहीं है? एकेडमिक डिसिप्लिन। सांख्यिकी,अर्थशास्त्र और गणित जैसे कई विषयों को मिला कर वाणिज्य विषय को गढ़ा गया है। इस पर आपके पास जानकारी हो तो ज़रूर शेयर करें लेकिन कुछ लोगों से बात करने पर यही पता चला कि बाहर के मुल्कों में भी ऑनर्स कोर्स में कॉमर्स नाम का विषय नहीं होता है। अगर यह जानकारी ग़लत पाई गई तो मैं अपने लेख में संशोधन कर लूंगा। बहरहाल इस बात पर विचार करना चाहिए कि कॉमर्स के लिए इतनी मारा मारी क्यों हैं? ... Full story

अलीमुद्दीन स्ट्रीट में आखिरी बार: ज्योति बसु की शवयात्रा (10 जनवरी 2010)
 

बंगाल में बहती बदलाव की बयार

"ठीक है कि हम दंगों की आग में नहीं जले। लेकिन पेट की आग भी बड़ी चीज़ होती है। बंगाल के मुसलमानों की हालत ख़राब है।" अपनी बात कहते हुए अलीमुद्दीन मस्जिद के नीचे बैठे गुलाम हुसैन टेलिग्राफ में छपे आंकड़ों को दिखाने लगे। ये देखिये केंद्र का मंत्री गलत बोलेगा। क्या हुआ मुसलमानों के साथ आप खुद देखिये न! पास में बैठे रसूल मियां मुस्कुराते हुए हज़ामत बना रहे थे. मैंने पूछा कि क्यों हंस रहे हैं? बोले १९६३ से यहीं बैठा हूं। मोतिहारी से कलकत्ता आया था। कमाने। ज्योति बसु का ज़माना ठीक था। कुछ उम्मीद थी। वाम दल ने हमको सड़कों से हटाया नहीं लेकिन कुछ बदला नहीं। हम तो यहां तब से है जब अलीमुद्दीन स्ट्रीट में सीपीएम का दफ्तर नहीं था। मेरे इस पेड़ के नीचे बैठने के बाद ही तो पार्टी बनी। पहले इस गली में सीपीआई का दफ्तर होता था। देखिये चार कमरे से कितना बड़ा दफ्तर हो गया। ... Full story

एक कमजोर क्रिकेट प्रेमी की आपबीती
 

एक कमजोर क्रिकेट प्रेमी की आपबीती

मैं एक कमजोर इंसान हूं। घबराहट से ओत-प्रोत। अपनी इसी खूबी और मैच फिक्सिंग से आहत होने के कारण क्रिकेट देखना छोड़ दिया। बचपन में टीम इंडिया का कप्तान बनने की ख्वाहिश रखने वाला मैं कभी तीन गेंद लगातार नहीं फेंक सका। तीनों गेंद पिच की बजाय स्लिप से बाहर जाती थीं और मेरे मुंह से झाग निकलने लगता था और कपार झन्ना जाता था। बहुत रो-धो के एकाध मैच में खेलने का मौका मिला भी तो इस वजह से कैच नहीं लिया कि ड्यूज बॉल से हाथ फट जाएगा। इस गुस्से में एक फिल्डर ने एक थाप लगा भी दिया। (थाप चांटा का लघुक्रोधित वर्जन है।) लेकिन टीवी पर टीम इंडिया को खेलते देख किसी कामयाब खिलाड़ी का प्रतिरूप बन हमेशा मैच का आनंद उठाता रहा। सिर्फ जीत के क्षणों में। हारती टीम से इतनी घबराहट होती थी कि मैच देखना बंद कर देता था। कमरे से निकल कर गली में घूमने लगता था। तमाम तरह के देवी-देवताओं की झलकियां भी आंखों के सामने से गुजर जाती थीं। उनके निष्क्रिय होने से भक्ति में कमी आने लगी, इसीलिए क्रिकेट से दूर हो गया। यही वजह है कि क्रिकेट के बारे में मैं उतना ही जानता हूं, जितना फिजिक्स और बॉटनी के बारे में। ... Full story

हिन्दी हैं.....हम....वतन हैं
 

हिन्दी हैं.....हम....वतन हैं

कोस कोस पर पानी और चार कोस पर बानी बदल देनेवाले देश में हिन्दी भाषा को लेकर होनेवाली कोई भी बहस अजूबा हो सकती है. सच्चाई की जमीन और आदर्श के आसमान का फर्क ऐसी बहसों में साफ दिखाई देता है. ये सारी बहसें हिन्दी के अंग्रेजी होते जाने के विषाद से पैदा होती हैं और हारकर दफन होने की चिंता बहस करनेवालों के माथे पर साफ दिखाई देती है. टीवी पत्रकार रवीश कुमार मानते हैं कि भाषा का संस्कार संस्कृति के स्वरूप से बंधा हुआ है. जब जन भ्रमण कर रहे हैं और आपस में सब प्रकार का लेन देन कर रहे हैं तो भाषा के स्तर पर भी यह लेन देन दिखाई ही देगा. शायद इसीलिए काली भक्ति अब हरियाणवी रागिणी में सुनाई देती है. हिन्दी में हो रहे बदलाव पर रवीश कुमार का लेख. ... Full story

Author info

Ravish Kumar Ravish Kumar टीवी पत्रकारिता के इश होते रवीश कुमार पिछले 15 सालों से टीवी पत्रकारिता में हैं. कुछ न कर पाने की कुलबुलाहट उनसे बहुत कुछ करा लेती है लेकिन फिर उनकी कुछ कर लेने की तड़प बनी हुई है. एनडीटीवी पर रवीश की रिपोर्ट में ऐसे अनछुए पहलुओं को छूते हैं जो टीवी को बीमारी होने से बचाती है. ब्लाग लिखते हैं, और किताब भी लिखने की सिलसिला जारी है. समय मिला तो मोबाइल को कैमरे में तब्दील कर अपने ब्लाग और फेशबुक के जरिए शेयर करने से भी नहीं चूकते हैं.

Latest comments