Saleem Akhtar
शव के साथ सहवास की बकवास
इन दिनों इंटरनेट पर कहा जा रहा है कि मोरक्को के एक काजी जमजमी अबुल बारी ने पिछले साल मई में फतवा ...
बदमाश है इमाम बुखारी
दिल्ली की जामा मसजिद के इमाम अहमद बुखारी द्वारा समाजवादी पार्टी को वोट देने की अपील करने के बाद अब उत्तर प्रदेश ...
उत्तर प्रदेश के किंतु-परंतु
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव कभी भी आसान नहीं रहे, इस बार भी नहीं हैं। सबसे बड़ी दिक्कत वोटरों की चुप्पी को लेकर है। नेता सयाने हुए हैं, तो वोटर भी चालाक हो गया है। उसकी थाह लेना मुश्किल काम है। हालांकि मुख्य मुकाबला बसपा और सपा में माना जा रहा है, लेकिन कांग्रेस-रालोद गठबंधन को जोड़ दिया जाए, तो मुकाबला तिकोना कहा जा सकता है। भाजपा फिलहाल रेस से बाहर दिखाई दे रही है। भले ही कुछ चुनावी सव्रेक्षणों ने तस्वीर साफ करने की कोशिश की हो, लेकिन अतीत में सव्रेक्षण औंधे मुंह गिरते रहे हैं। ... Full story
ठंडा पड़ता अन्ना का उबाल
कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था कि अगस्त में अन्ना आंदोलन से जो उबाल जनता में आया था, नवंबर आते-आते वह इस तरह बैठ जाएगा, जैसे दूध में आया उबाल बैठ जाता है। अन्ना आंदोलन जितनी तेजी के साथ ऊंचाइयों पर गया था, उतनी तेजी के साथ नीचे आता जा रहा है। अन्ना टीम के बिखराव का दौर शुरू हो गया है। बिखराव का ही नतीजा है कि आंदोलन की धार कुंद पड़ने लगी है। यह इस बात से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश का दौरा कर रही अन्ना टीम के कार्यक्रमों में भीड़ नहीं जुट रही है। जब कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर शुरूआत की जाती है, तो ऐसा ही होता है। कई विचारधाराओं के लोग मिले और जल्दबाजी में एक ऐसी मुहिम छेड़ दी, जिसके लिए जबरदस्त ‘होमवर्क’ की जरूरत थी। ... Full story
मुंबई धमाके और शशिशेखर
‘हिंदुस्तान’ के 17 जुलाई के अंक में शशि शेखर साहब का आलेख ‘मुंबई हमले से उपजे कुछ प्रश्न’ खुद में कुछ सवाल पैदा करता है। वे आतंकवाद और आजादी की लड़ाई में फर्क करना भूल गए हैं। जिस तरह से अंग्रेज भारत की आजादी के दीवानों को आतंकवादी की श्रेणी में रखते थे, इसी तरह शशि शेखर साहब ने भी फलस्तीन की आजादी की लड़ाई लड़ने वालों को आतंकवादी ठहरा दिया है। कम से कम शशि शेखर साहब से ऐसी उम्मीद नहीं थी कि वे यह लिखेंगे कि ‘घर में घुसकर उनकी (इस्राइल) की नीति ने उनके घर को हमारे मुकाबले ज्यादा सुरक्षित कर दिया है।’ ... Full story
अजब प्रेम की गजब कहानी
‘अजब प्रेम की गजब की कहानी’ कह लीजिए या कुछ और। मामला एकता कपूर के सीरियल की कहानी से भी आगे का है। एकता कपूर ने भी वह सब दिखाने की हिम्मत नहीं दिखाई, जो आरती ने असल जिंदगी में कर दिखाया। रुद्रपुर की आरती का विवाह मेरठ के नीतिश के साथ हुआ था। पहले दिन ही आरती ने नीतिश से कह दिया कि वह विनीत से शादी कर चुकी है। नितीश ने भी शायद भावनाओं में बहकर उसे ‘बहन’ बना डाला। रिश्तों का इस तरह से शायद ही कभी मजाक बना हो। पहले दिन ही आरती का नितीश को असलियत बता देना उसका ‘बोल्ड’ कदम कहा जा सकता है, लेकिन सवाल यह है कि उसने यह ‘बोल्डनेस’ शादी से पहले क्यों नहीं दिखाई थी? आरती जो कुछ कर चुकी थी, उसमें वह सब अपने पिता को बताने की हिम्मत नहीं थी। ... Full story
मुस्लिम मत के कारोबारी
उत्तर प्रदेश सरकार ने पिछले दिनों अपने चार साल मुकम्मल कर लिए हैं। इधर नगर निकायों का कार्यकाल भी समाप्त होने को है, इसलिए नगर निकाय और विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज हो गर्इं हैं। राजनैतिक दलों ने कुछ उम्मीदवारों की घोषणा भी कर दी है। जब चुनाव आते हैं, तो मुसलिम वोट बैंक को हर राजनैतिक दल ललचाई नजरों से देखता है। देखे भी क्यों नहीं? उत्तर प्रदेश में मुसलिम आबादी लगभाग 20 प्रतिशत है। भले ही भाजपा का आधार मुसलिम विरोध पर टिका हो, लेकिन वह भी मुसलिम वोटों की चाहत रखती है। ... Full story
हिन्दू मुस्लिम एकता के प्रतीक भी थे महेन्द्र सिंह टिकैत
महेंद्र सिंह टिकैत का किसान नेता के रूप उभार अस्सी के दशक के अंत की अभूतपूर्व घटना थी। मेरठ के लिए वे सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल के तौर पर भी याद किए जाएंगे। मेरठ में 1987 में भयंकर सांप्रदायिक दंगा हो चुका था। सूबे में कांगे्रस की सरकार थी। मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह थे। हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अविश्वास की काली छाया हटने का नाम नहीं ले रही थी। मुसलमान वीरबहादुर सिंह से सख्त खफा थे। फरवरी 1988 में महेंद्र सिंह टिकैत किसानों की मांगों को लेकर मेरठ कमिश्नरी पर अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए थे। ... Full story
मुसलमान का हाथ ममता के साथ
बंगाल के विधानसभा चुनाव कई मायनों में अलग हैं। नतीजों से पहले ही वामदलों के लिए ‘मर्सिया’ पढ़े जाने लगे हैं। वाम दलों का परंपरागत वोट बैंक समझे जाने वाले मुसलमान इस बार क्या करेंगे? यह सवाल फिजा में तैर रहा है। हालांकि पिछले लोकसभा और पंचायत चुनावों में मुसलमानों ने वाम दलों को अपनी दूरी को नतीजों का रूप दे दिया था। यही वजह है कि इस बार राजनीतिक पार्टियां मुसलिम वोट बैंक का हिसाब लगा रही हैं। बंगाली वाममोर्चा को गलतफहमी हो गई है कि अब पहले जैसे हालात नहीं हैं और मुसलमान उसके साथ हैं। ... Full story
कल तय होगा वस्तानवी का भविष्य
मजलिस-ए-शूरा 23 फरवरी को तय करेगी कि मोदी की तारीफ करके सुर्खियों में आए गुलाम मौहम्मद वस्तानवी दारुल उलूम के मोहतमिम रहेंगे या नहीं। लोग बहुत बेसब्री से 23 फरवरी का इंतजार कर रहे हैं। वस्तानवी के रूप में में दारूल उलूम को ऐसा कुलपति मिला है, जो हाफिज-ए-कुरान के साथ एमबीए है। उनकी यही खूबी कुछ लोगों को रास नहीं आ रही है। ... Full story
