Sandeep Joshi
बाजारू क्रिकेट से नहीं बनेंगे विश्वविजेता
खेल का भी इतिहास होता है। वह धिक्कार देने वाला या फिर गौरव प्रदान करने वाला हो सकता है। अतीत के लिखित ...
लोकपाल का फुटबाल न खेंले राजनीतिक दल
संसद में लोकपाल विधेयक बहस के लिए तैयार है। हमारी संसद लोकपाल पर बहस करेगी और उसे पारित करके कानून की शक्ल ...
खेल भावना से दें खेल का भारत रत्न
जब देश इतना विशाल और बड़ा हो तो उसके रत्न भी उतने ही विस्तृत और विभिन्न वर्ग के हो सकते हैं। एक रत्न को दूसरे रत्न से ज्यादा या कम आंकना जरूरी नहीं होना चाहिए। एक खेल के महान को दूसरे खेल के महान खिलाड़ी के साथ भिड़ाने का औचित्य भी नहीं होता है। बढ़ी बात तो है कि संसद ने यह माना की खेलों में भी भारत के रत्न होते हैं। इसलिए खेलों में भी भारतरत्न हों। ससंद के इस विवेकी समझभाव पर बधाई। खेल सभ्यता के लिए जरूरी इस खेल भावनात्मक फैसले के लिए संसद का धन्यवाद। इसके साथ ही संसद को देश के संविधान में भी फैर बदल कर खेलों को प्रतिष्ठा प्रदान करनी होगी। ... Full story
लोक विरोध के तंत्र का महामंत्र
अनशन, सत्याग्रह या शांतिपूर्ण प्रदर्शन क्या हमारे लोकतंत्र के लिए अपरिहार्य नहीं रह गये हैं. राजनीति बनाम समाज बनाम धर्म का त्रिभुज बनाने की कोशिश कर रहे लोगों से क्या यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि इन तीनों में अंतरविरोध है या फिर अंतरसंबंध? अन्ना हजारे के अनशन से लेकर स्वामी रामदेव के सत्याग्रह के बीच इस बात पर विचार करना जरूरी है कि क्या देश में भ्रष्टाचार का मुद्दा राजनैतिक है, सामाजिक है या फिर धार्मिक? राजनेता समाज से, समाज के लिए और समाज द्वारा समाज की सेवा करने के लिए चुने जाते हैं। समाज का धन अगर सरकार गलत इस्तेमाल करती है तो यह सामाजिक मुद्दा क्यों नहीं बनना चाहिए? ... Full story
जय जननी, जनता, जनार्दन!
आपको भी ऐसा ही एसएमएस आया होगा। पूर्व में दीदी, दक्षिण में अम्मा, उत्तर में बहनजी और राजधानी में आंटी। इन सब के अलावा देश की सत्ता सोनिया मैडम के हाथ में और राष्ट्र की बागडोर प्रतिभा ताई के हाथ में है। क्या जनता जनार्दन का भरोसा पुरूष समुदाय से उठ गया है? या यह भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता का उद्घोषणा है। सवाल यह भी है कि क्या महिला मतदाता पुरूष मतदाताओं से ज्यादा लोकतांत्रिक हों गयी हैं? ... Full story
धुन के पक्के, मन के मौजी
होली पर इंदौर समय पर पहुंचना था। दादीजी के जाने के बाद की पहली होली थी। धुलेंडी से पहली रात को पूर्णमासी की सुपरमून दशा भी थी। चंद्रमा की चमक चका-चौंध किए थी। आगरा के बाद भिंड-मुरेना के बीहड़ उस तेज रोशनी में शांतमय लेकिन डरावने और गजब का चमकीलापन बिखेर रहे थे। धोलपुर के बाद मुरेना, और फिर ग्वालियर आया। रास्ते भर बाहर उस चमकीली चांदनी में बीहड़ देखता रहा। ऐसी रोशनी में इन घमासान बीहड़ को पहले कभी नहीं देखा था। अचानक, इस बीहड़ से चले और दिल्ली आ बसे मरजीवडे़ साहसी पत्रकार आलोक तोमर का ध्यान आया। साल भर से ज्यादा से आलोक गंभीर बीमार में भी कमाल कर्मठता से झूझ रहे थे। ... Full story
मजबूरी का नाम मनमोहन सिंह
सुनने में आता, ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ है। यह उन लोगो द्वारा कहा जाता था जो महात्मा गांधी की नीतियों को मजबूरी के कारण करना मानते थे। यही लोग लगातार बढ़ते हिंसक समाज में अहिंसक असहयोग को अव्यवहारिक मानते थे। गांधी जी के सत्य के अविष्कार, अहिंसक असहयोग और सत्याग्रह पालन को दकियानूसी मानते थे। गांधी जी के भय और निर्भय से अलग अभय समाज को एक सपना मानते थे। लेकिन अब कहना पड़ेगा कि ‘मजबूरी का नाम मनमोहन सिंह’ है। ... Full story
विज्ञापनों में गुम होते अखबार
बचपन में चंडीगढ़ में बहस होती। सवाल होता, कौन सा अखबार था जिसने गांधी जी के मरने की खबर पहले पन्ने पर नहीं छापी थी। ऐसी बातचीत इसलिए होती क्योंकि ‘पहला पन्ना मुख्य व बड़ी खबरों का होता है’, यह मान्यता बन गई थी। विज्ञापन वगहरा के लिए पुरा अखबार हो सकता है। यह अन्तर तो सभी मानते हैं कि अखबार पढ़े जाते हैं, वहीं विज्ञापन देखें जाते हैं। ... Full story
खेल में हुआ खिलवाड़
बैंगलूरू में खिलाड़ियों की खरीद-फरोख्त हो गई। बीसमबीस की नीलामी में खेल के खिलाड़ी बिक गए। आईपीएल में दूसरी नीलामी ने बाजार के नए आयाम भी दर्षाए हैं। इस खिलाड़ी मंडी में भी भाव सिर चड़ कर बोलें हैं। दुनिया का कोई खेल अपने खिलाड़ियों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं करता है। किसी भी खेल में खेल के लिए खिलाड़ियों की नीलामी देखने में नहीं आयी है। जिन खिलाड़ियों को खेलते देखने के लिए लोग अपना पैसा लगाते हैं उन्हीं की गिने चुने घरानो ने बाजार में बोली लगा दी है। जैसे सब्जी खरीदी जाती है वैसे ही खिलाड़ियों को खरीदा-बेचा गया है। ... Full story
