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Nov

25

2014

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मेरा घर फुकुशिमा में है

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मेरा घर फुकुशिमा में है

रेडियोधर्मी पानी अब भी समुद्र में बह कर जा रहा है और इसे रोकने के तरीकों पर शोध हाल ही में शुरू हुआ है। विकिरण का स्तर इतना ज्यादा है कि प्लाण्ट के विशेषज्ञ एक्सपोजर के तय स्तरों से पार जा चुके हैं लिहाजा इस तबाही को नियंत्रित करने के लिए यहां पर्याप्त कर्मचारी भी नहीं हैं। हमें बताया गया है कि फुकुशिमा दाइ-ची को बंद करने में 30 साल लग जाएंगे, लेकिन मौजूदा हालात में यह बता पाना असंभव है कि इस हादसे को कब तक नियंत्रित किया जा सकेगा। फुकुशिमा के मछुआरों की रोजी-रोटी छिन चुकी है। सुनामी से नावों को बचाने के लिए जिन लोगों ने अपनी जान जोखिम में डाली थी वे अब मछली नहीं पकड़ सकते क्योंकि समुद्र के पानी में रेडियोधर्मी तत्व मौजूद हैं। कोई नहीं जानता कि समुद्र साफ कब हो पाएगा, दोबारा यह जीवनदायी कैसे बन पाएगा।

फुकुशिमा के किसान भी विकिरण के स्तर से पीड़ित हैं जो कम नहीं हो रहा। किसी इलाके को अगर एक बार साफ कर भी दिया जाता है, अस्थायी तौर पर भी विकिरण का स्तर कम हो जाता है, तो दोबारा यह बढ़ने लगता है। क्या वह दिन कभी आ पाएगा जब हमारी इतनी ज्यादा प्रदूषित

Nov

25

2014

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जनता को क्या मिला नेताजी?

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जनता को क्या मिला नेताजी?

अब बात करते हैं समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की, जो स्वयं को डॉ. लोहिया के आदर्शों का सब से बड़ा पहरेदार मानते हैं। उनके बेहद खास कहे जाने वाले आजम खां ने अपने गृह नगर रामपुर में उनके  जन्मदिन पर समारोह आयोजित किया, जिसमें सब कुछ अंग्रेजी और कीमती ही था। रामपुर के जिलाधिकारी आवास के सामने से अपने पुत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, भाई शिवपाल सिंह यादव और आजम खां के साथ सवार  होकर लगभग पांच-छः किमी दूर स्थित गांधी समाधि तक मुलायम सिंह यादव दो घोड़ों की बग्घी से गये, उसके बारे में बताया गया कि रानी विक्टोरिया की बग्घी ख़ास उनके लिए लंदन से रामपुर मंगाई गई। पंडाल, मंच और चारों ओर लगे बड़े-बड़े स्क्रीन भी अंग्रेजी तकनीकी वाले ही थे। जन्मदिन के अवसर पर काटी गई विशेष केक के साथ भोजन भी अंग्रेजी तरीकों से ही बनाया गया, इस सब के अलावा लगभग 14 किमी ऐसा क्षेत्र पूरी तरह विशेष सुरक्षा बलों की निगरानी में रहा, जहां आम आदमी बिना जाये रह ही नहीं सकता। अब यहाँ सवाल उठता है कि व्यक्तिगत तौर पर मुलायम सिंह यादव को इस भव्य आयोजन से क्या लाभ हुआ,  समाजवादी पार्टी का क्या हित हुआ?

Nov

25

2014

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जर्मन पढ़ाने का गोरखधंधा

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जर्मन पढ़ाने का गोरखधंधा

निश्चित रूप से आज यह मामला 2014 में मानव संसाधन मंत्री सुश्री स्मृति ईरानी की सतर्कता से उजागर हुआ है, परन्तु तीन वर्ष में कुछ लोग इस सन्दर्भ में जो करने में सफल हुए हैं, वह हमारी शासन प्रणाली पर एक गंभीर प्रश्न-चिह्न है। मैं 2009 से जानता हूँ कि कोई संदिग्ध खिचड़ी पक रही थी, परन्तु मेरी जानकारी में केवल इतना ही था कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के अस्तित्व पर कुठाराघात करके कुछ जर्मनभाषी सांस्कृतिक दूत अंग्रेज़ी को भारत की मुख्य भाषा सिद्ध करने पर तुले हुए थे। मैंने इसका जम कर विरोध किया है, बहुत कुछ लिखा है, और मुझे इसकी काफ़ी क़ीमत भी चुकानी पड़ी है। जर्मन का वर्चस्व जिस तरह से सरकारी स्कूलों में स्थापित किया जा रहा था, वह जुड़ा इसी सन्दर्भ से था, परन्तु मुझे यही भ्रम रहा कि यह भारत सरकार की इच्छा से हो रहा है, एक नीतिगत निर्णय है, अतः इस का विरोध करना निरर्थक होगा।

2009 में मैं बर्लिन के साहित्य-सम्मेलन की ग्रीष्म-अकादमी में हिस्सा ले रहा था, जहाँ जर्मनी के अनेकों प्रकाशक तथा गोएथे-संस्थान के लोग भी उपस्थित थे। सब मुझ से पूछ रहे थे कि क्या मैं नवीन किशोर को जानता हूँ। किशोर कोलकाता के

Nov

24

2014

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ऋग्वैदिक भारत और संस्कृत का मिथक

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ऋग्वैदिक भारत और संस्कृत का मिथक

कुछ ऐसा ही असमीकरण ‘ऋग्वैदिक इंडिया` से काले एवं लाल मृद्भांड की संस्कृति का भी है. ऋग्वेद के तिथिक्रम से मेल खानेवाली तीसरी संस्कृति ताम्र निधियों की है जिसमें से लगभग आधी गंगा-यमुना दोआब में केंद्रित हैं. सप्तसिंधु से इनका भी वास्ता नगण्य है. इनका वास्ता पूरब में बंगाल और उड़ीसा से है, दक्षिण में आंध्र प्रदेश से है तथा पश्चिम में गुजरात और हरियाणा से है जबकि ऋग्वैदिक लोग पूरब में बंगाल और उड़ीसा तक पहुंचे भी नहीं थे. कुल मिलाकर ऋग्वैदिक जनों की पुरातात्त्विक पहचान की समस्या को सुलझाना कठिन है. अब जबकि पुरातात्त्विक साक्ष्य के मूल्य पर महाभारत और रामायण में प्रतिबिंबित ‘महाकाव्य युग` (एपिक एज) की कपोलकल्पित धारणा त्यागी जा रही है, तब क्यों और किस आधार पर आज भी इस कालखंड को भारतीय इतिहास में ‘ऋग्वैदिक इंडिया` कहा जाता है जबकि ‘ताम्र-पाषाण युग` की अवधारणा सर्वाधिक निरापद है.

ऐसी कल्पना कुछ लोगों की है कि ‘ऋग्वैदिक इंडिया' में वस्तु-विनियम मुख्य था, पर सोनेे-चांदी के सिक्के भी थे. सोने के सिक्के ‘निष्क` कहे जाते थे. सातवलेकर ने ‘निष्क` का अनुवाद, सोने के सिक्के किया है जो सही मालूम होता है. चांदी के सिक्के ‘रजत'हो सकते हैं. यदि यह कल्पना ठीक है तो सवाल है कि

Nov

23

2014

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बहुत कठिन है डगर उद्यम की

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बहुत कठिन है डगर उद्यम की

हाल ही में भारत दौरे पर आई संयुक्त राष्ट्र महिला संगठन की कार्यकारी निदेशक फुम्जिले मलाम्बो नकुका का कहना था कि लैंगिक समानता के मामले में भारत में दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता है। भारतीय समाज में लैंगिक समानता स्थापित करने के लिए पुरु षों और युवाओं को संगठित होकर सरकारी योजनाओं के अमल में सहयोग करना चाहिए। उम्मीद है कि दिल्ली के प्रगति मैदान में चल रहा अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला दुनिया को यह संदेश देने में सफल होगा कि भारत में महिला सशक्तिकरण के प्रयास प्रगति की ओर अग्रसरित हैं। मेले की थीम ‘महिला उद्यमिता’ इसकी खास वजह है। मेले में अधिसंख्य प्रतिभागियों द्वारा महिला उद्यमियों की कारोबारी उपलब्धियों पर फोकस करके यह संदेश देने का प्रयास है कि महिलाएं भी पुरु षों की तरह कारोबार स्थापित कर सकती हैं। पर पिछले दिनों जारी ‘र्वल्ड इकोनॉमिक फोरम’ की ग्लोबल जेंडर सव्रेक्षण रिपोर्ट 2014 के अनुसार भारतीय महिलाओं की आर्थिक एवं सामाजिक स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है। दुनिया के 142 देशों में लैंगिक असमानता के मामले में कराए गए सव्रेक्षण में भारत 101वें स्थान से लुढ़ककर 114वें स्थान पर पहुंच गया है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और कारोबार के मामले में

Nov

23

2014

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संक्रमण काल में अग्निकन्या

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संक्रमण काल में अग्निकन्या

अग्निकन्या ममता की पार्टी का ढांचा ही कुछ ऐसा ही कि इस पार्टी में वे ही वे दिखती हैं। यही वजह है कि ममता अफनी पार्टी और सरकारी की बदनामी के चौफेर गाए जा रहे गीत सुन-सुनकर बौखला रही हैं। ममता को आशंका खाए जा रही है कि आने वाले कल को कुछ और नेता भी इस काण्ड में धरे जा सकते हैं। बताना प्रासंगिक है कि पार्टी के गिरते ग्राफ को संभालने की गरज से ममता ने पिछले दिनों अपने करीबियों के साथ बैठक की। बन्द कमरे में हुई बैठक में क्या कुछ हुआ, यह तो नहीं मालूम, अलबत्ता बैठक के बाद उन्होंने पार्टी के सभी नेताओं का बचाव करके खुद की किरकिरी अवश्य करवा ली।

वाममोर्चा ने बंगाल पर 34 साल राज किया। बहुतेरे मसलों पर जनता उनके फैसलों के विरोध में रही, लेकिन मोर्चे के शीर्ष नेताओं की कठोर पकड़ के कारण 14 पार्टियों वाली सरकार के सुदीर्घ शासन-काल में इक्का-दुक्का छोड़ दें, तो कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आया। दुर्भाग्यवश ममता बनर्जी के तीन साल के कार्यकाल में कई जार करोड़ का यह घोटाला सामने आया, जिसमें उनकी पार्टी के शीर्ष नेताओं पर उंगलियां उठने लगीं। ममता की पार्टी में मौलिक चिन्तन वाले लोगों

Nov

21

2014

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मोमिन मुसलमीन

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मोमिन मुसलमीन

राजनैतिक रणनीतियां
पाकिस्तान में बसने रत छोड़ने से पहले,मौलाना मौदूदी ने कहा था कि यदि भारत के मुसलमान अपने अधिकारों पर जोर देंगे तो उनके प्रति हिन्दुओं का पूर्वाग्रह बढ़ेगा। अतः, उनकी यह सलाह थी कि मुसलमानों को सरकार और प्रशासन से दूर ही रहना चाहिए ताकि हिन्दू राष्ट्रवादी आश्वस्त रहें कि उनके मुकाबिल मुस्लिम राष्ट्रवादी ताकतें लामबंद नहीं हो रही हैं। मौलाना के अनुसार, यही वह एकमात्र रास्ता था जिसके जरिए मुसलमान, इस्लाम के संबंध में बहुसंख्यक समुदाय के पूर्वाग्रहों को दूर करने में सफल हो सकते थे। साम्प्रदायिक राष्ट्रवादियों की दृष्टि में समाज में या तो किसी सम्प्रदाय का वर्चस्व हो सकता है या वह पराधीन हो सकता है। उन्हें बीच का यह रास्ता दिखता ही नहीं है कि दो समुदायों के सदस्य,मिलजुलकर,शांतिपूर्वक रह भी सकते हैं। यही समस्या मौलाना मौदूदी के साथ थी। मौलाना मौदूदी के पाकिस्तान जाने के बाद, उनके द्वारा स्थापित जमायते इस्लामी ने चुनावी राजनीति में भाग नहीं लिया। परंतु मौलाना की सलाह उन मुसलमानों के लिए किसी काम की नहीं थी जो कि अपनी रोजाना की जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगे हुए थे।
देवबंदी उलेमाओं के संगठन जमायत उलेमा.ए.हिन्द ने हमेशा पाकिस्तान का विरोध किया। जमात ने

Nov

21

2014

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ऑनलाइन कारोबार में सुधार की दरकार

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ऑनलाइन कारोबार में सुधार की दरकार

नाकाम हुए स्नैपडील और एमेजॉन इंडिया के मंसूबे: 
इस बार खुदरा बिक्रेताओं के दबाव में स्नैपडील और एमेजॉन इंडिया साकार नहीं हो सका। दबाव में दोनों कंपनियों को सोच-समझकर छूट की पेशकश करनी पड़ी, क्योंकि एलजी, सैमसंग, वीडियोकॉन, सोनी, पैनासोनिक आदि उपभोक्ता टिकाऊ कंपनियों ने अपने व्यापार साझेदारों को आगाह किया था कि भारी छूट के साथ बेचे गये उत्पादों पर सर्विस  और वारंटी की सुविधा नहीं दी जायेगी। इन कंपनियों के ऐसे रुख के कारण छोटे डीलरों के जरिये की जाने वाली बिक्री में गिरावट दर्ज की गई, क्योंकि वे मामूली मार्जिन पर उत्पादों को ऑनलाइन बाजार में पहुँचा रहे थे। प्रमुख उपभोक्ता टिकाऊ कंपनियों ने इस संबंध में ऑनलाइन कंपनियों से भी बात की, ताकि मूल्य के निर्धारण उनके मन मुताबिक हो, जिसके कारण दोनों कंपनियों ने मूल्य के मुक़ाबले भारी छूट देने से परहेज किया, जैसे, स्नैपडील ने आईफोन 5 एस को केवल 10 प्रतिशत छूट के साथ 31,499 रूपये में इस “सेविंग डे” में बेचने की पेशकश की। इसीतरह माइक्रोमैक्स की एचडी एलईडी को 19990 रूपये में बेचने की पेशकश की गई, जो दीवाली में भी इसी कीमत पर बेची जा रही थी। बहरहाल, उपभोक्ता टिकाऊ कंपनियों की इसतरह की पहल के कारण स्नैपडील और

Nov

21

2014

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अजब निजाम है उलटे सवाल देता है

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अजब निजाम है उलटे सवाल देता है

सुनहरा अवसर
सम्मेस्सा लेने के लिए यदि ४००० प्रतिनिधि पहुंचे तो उन्हें कवरेज देने के लिए लगभग २५०० मीडियाकर्मी भी ब्रिस्बेन में मौजूद थे। इस लिहाज से अपनी आर्थिक और राजनयिक शक्ति को साबित करने के लिए जी-२० का मंच नमो के लिए सुनहरा अवसर था। लेकिन क्या नरेन्द्र मोदी वह कर पाये? आप नीतियां चाहे जो बघार लें इस हकीकत से कोई इंकार नहीं कर सकता कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और अमेरिकी साम्राज्यवाद के नेतृत्ववाले बड़े औद्योगिक देशों की अगुवाई में विश्व की जिस तरह की अर्थव्यवस्था बनी है, हिंदुस्तानी अर्थतंत्र भी उसी का अंग है। इसलिए चंद दिनों पहले वल्र्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन के ट्रेड फैसिलिटेशन एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने को नमो का हिंदुस्तान मजबूर हुआ है। याद है २० वर्ष पहले का काल। तब नरसिंह राव सरकार अमेरिकी साम्राज्यवाद के दबाव में डंकल प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर रही थी। उन दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हुआ करते थे डॉ. मुरली मनोहर जोशी। तब नमो के पास राष्ट्रीय सचिव का दायित्व था। उस वक्त नमो डंकल प्रस्तावों के खिलाफ प्रभावशाली वक्तव्य दिया करते थे। आज उन्हीं नमो को अमेरिकी आका ‘मैन ऑफ एक्शन’ कह रहा है।

व्यक्तित्वों की ब्रांडिंग
याद होगा २००८-०९ में

Nov

20

2014

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बरवाला का बैरी

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बरवाला का बैरी

हरियाणा के दलित समाज में पैदा होनेवाले रामपाल सिंह जाटिन (जतिन, जातिन) कोई ऐसे विख्यात संत न थे कि देश की आधुनिक संत परंपरा में उनका कोई स्थान होता। सोनीपत के गोहाना तहसील में पिता नंदलाल और माता इंदिरा देवी की संतान रामपाल ने आईटीआई की डिग्री लेने के बाद हरियाणा सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर की नौकरी कर ली थी। शुरूआत में एक धर्मनिष्ठ हिन्दू की तरह वे भी हनुमान के भक्त थे और देवी देवताओं की पूजा किया करते थे। लेकिन अपनी जीवनी में संत रामपाल कहते हैं कि देवी देवताओं की पूजा करते हुए भी उन्हें वह मानसिक शांति प्राप्त नहीं हो पा रही थी जो धर्म मार्ग पर चलते हुए वे पाना चाहते थे। इसी उधेड़बुन में नब्बे के दशक में एक बार उनकी मुलाकात के एक कबीरपंथी संत रामदेवानंद से हो गयी। 1994 में रामदेवानंद से हुई इस मुलाकात के बाद रामपाल सिह के जीवन में बहुत क्रांतिकारी बदलाव आया और वे कहते हैं कि रामदेवानंद ने जो उन्हें नामजप का उपदेश किया उससे उन्हें वह मानसिक शांति प्राप्त हुई जिसकी तलाश में वे भटक रहे थे।

रामदेवानंद से मुलाकात के बाद अगले ही साल 1995 में उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया और

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

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सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

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अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.