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Jul

28

2014

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नक्सल के निशाने पर नई पीढ़ी

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नक्सल के निशाने पर नई पीढ़ी

निशाने पर नई पीढ़ी इसलिए है कि बड़ी संख्या में नक्सली आत्मसमर्पण कर रहे हैं और नए क्रांतिकारियों की आमद बंद है। माओवाद का विचार अब नई पीढ़ी को आंदोलित नहीं कर पा रहा है। पढ़े-लिखे युवा अब इस विचार में छिपे खोखलेपन को समझने लगे हैं, सो जोर अब जबरिया लोगों को अपने साथ जोड़ने पर है। भ्रष्टाचार के तंत्र ने इस कथित जनयुद्ध को और अवसर मुहैया कराए हैं। आज बस्तर इलाके में भ्रष्टाचारियों के लिए जंगल में मंगल है। इस पूरे विवाद में कुल चार पक्ष हैं सरकार, उद्योग व ठेके-पट्टों से जुड़े लोग, आदिवासी समाज और नक्सली। लेकिन आप देखें तो इसमें सारे दुखों का पहाड़ बेचारे आम आदिवासी पर टूट रहा है। इस इलाके में नक्सलवाद के रहने से न राजनीति और न सरकार के तंत्र को कोई समस्या है, न इस इलाके के ठेकेदारों व उद्योगों को कोई समस्या है, न ही नक्सलियों को कोई कष्ट है। वे अकेले बस्तर से ही इतनी वसूली कर रहे हैं कि उनका पूरी पार्टी चल रही है। जनयुद्ध को शक्ति यहां से मिल रही है। वे इस इलाके में जो चाहे कर सकते हैं। जनप्रतिनिधियों का हाल यह है कि वे इस इलाके में हेलीकाप्टर से आ

Jul

28

2014

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बीमार मानसिकता का मोहनलालगंज

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बीमार मानसिकता का मोहनलालगंज

सरकार जो कुछ छिपाने की कोशिश कर रही थी उसका बड़ा हिस्सा पहले ही पब्लिक डोमेन में आ चुका था. हालांकि यह भी सच है कि असहाय लड़की की ह्त्या के बहुत ही दुखद मामले को मीडिया के एक वर्ग ने चटखारे का मामला बनाने में कोई कसर नहीं छोडी. यह तो मीडिया में कुछ जागरूक लोग के प्रयास से आज हम इस स्थिति में हैं कि उत्तर प्रदेश के सामंती मानसिकता वाले समाज में जन्म लेने वाली लड़कियों के प्रति समाज के रुख के बारे में कुछ सवाल पूछ सकें. मोहनलालगंज में महिला के साथ हुई बर्बरता के बारे में जो सवाल उठ रहे हैं, उनमें से किसी भी सवाल का जवाब हमारे पास नहीं है लेकिन कोशिश यह की जानी चाहिए की सवाल सही उठाये जाएँ. दुर्भाग्य यह है कि इस तरह के सवाल उठाये जा रहे हैं कि  उसकी ह्त्या की जांच को इतना विवादित कर दिया जा रहा है कि पुलिस अपने आप को पाक साफ़ साबित कर ले. लेकिन क्या ऐसा किया जाना चाहिए. 35 साल की जिस महिला की सामूहिक बलात्कार के बाद जिस तरह बर्बरतापूर्वक हत्या हुई है उसमें जो इंसानियत और सामाजिक असंगतियों के सवाल हैं उनको भी चर्चा का विषय बनाया

Jul

26

2014

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भारत के लिए सानिया पराई कब से हो गई भाई?

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भारत के लिए सानिया पराई कब से हो गई भाई?

सानिया मिर्जा के विरुद्ध के लक्ष्मण की टिप्पणी की विधिवत्, पर्याप्त और चौतरफा निंदा हो चुकी है, जिसकी वह अधिकारी है। सानिया बुरी तरह आहत हुई हैं, इसमें संदेह नहीं। लेकिन शायद उन्हें खुश होने की ज्यादा जरूरत है क्योंकि इस देश ने दिखा दिया है कि वह उन पर फख़्र करता है और इक्का-दुक्का लोगों की संकीर्णताओं के प्रभाव में आने वाला नहीं है। यह घटना न होती तो शायद सानिया को देशवासियों के प्यार और लगाव का पता नहीं चलता। लेकिन एक समर्पित भारतीय को, और सानिया मिर्जा की भारत-निष्ठा असंदिग्ध है, अपनी भारतीयता सिद्ध करने के लिए बयान देना पड़े, वह सचमुच बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

सानिया ने किससे विवाह किया, यह उनके निजी जीवन का विषय है और सार्वजनिक बहस या टीका-टिप्पणी के लिए उपलब्ध नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने एक पाकिस्तानी नागरिक के साथ निकाह के बाद भी भारत की नागरिकता नहीं छोड़ी है और पाकिस्तान की नागरिकता ग्रहण नहीं की है। वे आज भी भारत की ओर से खेलती हैं और जैसा कि उन्होंने कहा है, हमेशा भारत की ओर से ही खेलती रहेंगी। सानिया ऐसा करने के लिए बाध्य नहीं थीं। शायद वे पाकिस्तान की नागरिकता लेतीं और उसकी तरफ से

Jul

25

2014

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गाज गिरी गाजा पर

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गाज गिरी गाजा पर

दस्तावेज कहते हैं कि छह साल में नाजियों ने लगभग 60 लाख यहूदियों को मार डाला, जिनमें 15 लाख बच्चे भी थे। हालांकि इसका कोई सटीक जवाब आज तक नहीं मिल पाया है कि हिटलर को यहूदियों से इतनी नफरत क्यों थी? लेकिन माना जाता है कि र्जमनी यह मानते थे कि यहूदियों की हर हाल में र्जमनों की मुखालफत करने की नीति रही है, इसलिए यहूदियों को खत्म कर दिया जाए, तो सभी समस्याओं का हल हो जाएगा। हिटलर ने यहूदियों के साथ जो किया, उसके लिए हिटलर को कभी माफ नहीं किया गया। हिटलर को जालिम और यहूदियों को मजलूम माना जाता है।

दुनिया में यहूदियों का अपना कोई मुल्क नहीं था। 1914 तक फलस्तीन में पांच लाख अरब और यूरोप से आए करीब 65,000 यहूदी रहते थे। फलस्तीन उस दौरान टर्की के आॅटोमन साम्राज्य का हिस्सा था। दुनिया में भटक रहे यहूदियों से 1917 में ब्रिटेन के तत्कालीन विदेश मंत्री लॉर्ड बलफोर ने यहूदियों से वादा किया था कि फलस्तीन उन्हें दे दिया जाएगा। 1922-39 के बीच यूरोप से तीन लाख से ज्यादा यहूदी फलस्तीन पहुंचे, जिससे यहूदियों का अरबों से टकराव हुआ, लेकिन ब्रिटेन ने अरबों के विरोध को सख्ती से कुचल दिया। 15 मई, 1948

Jul

25

2014

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ढेर होने के कगार पर कागज का शेर

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ढेर होने के कगार पर कागज का शेर

अड़चन में है अमेरिकी अर्थ व्यवस्था
2008 और 2009 के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्थादौर के बाद सबसे बुरी बदहाली की शिकार है। श्रम आपूर्ति एवं उत्पादन में वृद्धि दोनों बिंदुओं पर अमेरिका का प्रदर्शन बदतर है। अमेरिका की श्रमशक्ति में कोई वृद्धि नहीं है और श्रमिकों के प्रति घंटे उत्पादन की दर नीचे गिरती जा रही है। ‘इंटरनेशनल मोनेटरी फंड’ (आईएमएफ) ने बीच के दिनों में देश के भावी वृद्धि दर को दो फीसदी तक आंका। अर्थवेत्ता इसे और नीचे 1.75 फीसदी आंक रहे हैं। अर्थवेत्ताओं का मानना है कि अमेरिकियों की आय में सुधार की गुंजाइश कम होने के चलते उनका जीवन स्तर बेहद धीमी गति से सुधरेगा। परिणामस्वरूप उनके कर संचय में भारी कमी आएगी। कर संचय कम होगा तो अर्थव्यवस्था पर कर्ज वापसी का भार बढ़ता जाएगा। 1990 के दशक में श्रमिक एवं निवृत्त अमेरिकियों की संख्या में प्रतिवर्ष 1.2 फीसदी की दर से वृद्धि हो रही थी। 2013 में यह वृद्धि केवल 0.4 फीसदी रह गई है। अमेरिका की कुल आबादी में काम करनेवाली आबादी पिछले दशक तक 67 प्रतिशत हुआ करती थी, जो अब 63 प्रतिशत रह गई है। 50 वर्ष से अधिक उम्र वालों की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। जबकि 18 से

Jul

25

2014

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सऊदी यहूदी भाई भाई

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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ सऊदी किंग अब्दुल्ला अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ सऊदी किंग अब्दुल्ला

इतिहासकारों की माने तो सऊद अन्ज़ा जनजाति से जुड़े थे और 1450 ई. के आसपास नज्द में बसे थे। सऊद मूल रूप से यहूदी धर्म के माननेवाले चतुर सामंती प्रभुओं में थे। किंग फैसल ने सऊदी अरब पर 1964-1975 के बीच शासन किया और अपने यहूदी मूल के होने की पुष्टि की। 17 सितम्बर 1969 को वाशिंगटन पोस्ट को दिए एक साक्षात्कार में, किंग फैसल ने कहा था कि "हम सऊदी परिवार यहूदियों के चचेरे भाई हैं" किंग फैसल के बयान की व्याख्या का आधार समझने के लिये यह जानना आवश्यक होगा की यहूदियों के पैगंबर इशहाक वंश के हैं और अरबों के पैगंबर इस्माइल के वंशज होते हैं, इस तरह वे रिश्ते में चचेरे भाई हुए। इशहाक और इस्माइल दोनों ही इब्राहिम की संतान थे।

पैगंबर मोहम्मद के आगमन के समय काबा बुतपरस्त मूर्ति भक्तों के कब्जे में था और इतिहासकारो के अनुसार कुरैशी कबीले के धार्मिक स्थल काबा में 360 मूर्तियों की पूजा सम्पन होती थी जो काबा के चारों ओर स्थित थी। मूर्तियां तो नष्ट कर दी गईं लेकिन नये समय में नये तरह के बुत बना दिये गये। आज काबा के चारों ओर भव्य इमारतें होटल और मॉल मौजूद है। सलफ़ी/वहाबी हुकूमत के पश्चात अपने को

Jul

24

2014

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भारतीय भाषाओं पर अंग्रेज़ी की कालिख

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भारतीय भाषाओं पर अंग्रेज़ी की कालिख

डॉ दौलत सिंह कोठारी की अनुशंसाओं के आधार पर वर्ष 1979 में सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी के साथ भारतीय भाषाओं में भी उत्त र देने की छूट दी गई थी। लेकिन 2011 से लागू नई परीक्षा पद्धति के बाद भारतीय भाषाएँ अंग्रेज़ी के वर्चस्व से हाशिये पर आ गई. नई प्रणाली में प्रारंभिक परीक्षा के अंतर्गत एक पेपर सामान्य अध्ययन और दूसरा सिविल सर्विसिज़ एप्टिट्यूड टेस्ट यानी सी-सैट का होता है. हिंदी माध्यम छात्रों के लिए यही दूसरा पेपर परेशानी का सबब बना हुआ है. 2011 से पहले हिंदी सहित भारतीय भाषाओँ में प्रारंभिक परीक्षा पास कर मुख्य परीक्षा लिखने वाले छात्रों की संख्या जहां लगभग पचास प्रतिशत हुआ करती थी वह सी सैट आने के बाद घटकर मात्र पन्द्रह से बीस प्रतिशत रह गई है. यदि अंतिम चयनित अभ्यर्थियों की संख्या देखें तो 2011 से पूर्व अंतिम चयनित सूची में भारतीय भाषाओँ के उम्मीदवारों की हिस्सेदारी पंद्रह से बीस फ़ीसदी हुआ करती थी जो अब केवल 2 से 3 प्रतिशत ही बची है. इस वर्ष के घोषित परिणामों में 1122 छात्रों में हिंदी माध्यम के केवल 26 और अन्य भारतीय भाषाओँ को मिला लिया जाए तो भी यह संख्या सौ का आँकड़ा नहीं छूती. यदि पिछले तीन वर्षों

Jul

23

2014

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भगत भरोसे छत्तीसगढ़

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भगत भरोसे छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ राज्य योजना आयोग में उनकी नियुक्ति को इस नजरिए से भी देखा जा सकता है। बहरहाल आयोग के अन्य नामचीन अशासकीय सदस्य हैं डॉ. दामोदर आचार्य, डॉ. दिनेश मरोठिया तथा अरविंद पनगरिया। विभिन्न क्षेत्रों के इन विशेषज्ञों के अलावा तीन मंत्री एवं कुछ शासकीय अधिकारी भी आयोग में हैं। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह अध्यक्ष हैं। योजना आयोग को सुदृढ़ बनाने की सरकार की कवायद पूरी हो गई और अब बैठकों एवं विचार-विमर्श का दौर चलने वाला है।

राज्य योजना आयोग का काम राज्य के लिए विकास योजनाएं बनाना तथा फंड के लिए केन्द्रीय योजना आयोग में पैरवी करना है। राज्य की  पंचवर्षीय योजनाएं सभी क्षेत्रों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार की जाती हैं। काम महत्वपूर्ण है क्योंकि इन्ही योजनाओं के आधार पर राज्य के विकास की दिशा तय होती है। इस लिहाज से आयोग का जनता की आवश्यकताओं एवं समस्याओं से भिज्ञ रखना अतिआवश्यक है। जो आयोग इस सन्दर्भ में जितना चैतन्य होगा उसी के अनुरूप योजनाओं का खाका तय हो सकेगा। चूंकि छत्तीसगढ़ राज्य योजना आयोग में पहली बार विशेषज्ञों को शामिल किया गया है अत: उम्मीद की जानी चाहिए उसे एक नई दृष्टि मिलेगी जिसकी झलक उसके कामकाज में नजर आएगी।

लेकिन सवाल है, राज्य

Jul

23

2014

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यस, माई लार्ड महेन्द्र सिंह धोनी

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यस, माई लार्ड महेन्द्र सिंह धोनी

आजादी के बाद भारत बार बार लॉर्ड्स में इंग्लैंड से टकराया, लेकिन जीत का स्वाद मिलने से हर बार भारत दूर ही रहा। 1974 में लॉर्ड्स ने ही भारत को सबसे शर्मनाक पहचान दी। इंग्लैंड ने ना सिर्फ 628 रन की विशाल पारी खेली बल्कि बारत ने सारे रिकॉर्ड तोड़कर इंग्लैंड के खिलाफ दूसरी पारी में सिर्फ 42 रन बनाये। और भारत की टीम में उस वक्त गावस्कर, विश्वनाथ, वाडेकर, आबिद अली, इंजीनियर सरीखे बल्लेबाज थे। लेकिन 5 रन से ज्यादा कोई ना बना सका। सबसे ज्यादा 18 रन सोल्कर ने बनाये। तो लॉर्ड्स में जीत के लिये तड़पती भारतीय क्रिकेट टीम को पहली बार जीत भी मिली तो इतिहास बना गयी। क्योंकि यह जीत विश्वकप जीतने वाली थी। लेकिन 1983 के इस जश्न में सामने इंग्लैंड नहीं वेस्ट इंडीज था। भारत जीता और जश्न लॉर्ड्स से लेकर दिल्ली तक मना। लेकिन तब भी इंतजार लॉर्ड्स में इंग्लैंड को पीटने का था।

क्रिकेट का मक्का लॉर्ड्स तो क्लासिक क्रिकेट के लिये जाना जाता था और दुनिया में माना यही जाता रहा कि जबतक टेस्ट मैच में जीत नहीं मिलेगी तबतक क्रिकेट की बादशाहत को कोई मतलब नहीं है। फिर 1986 में कमोवेश वही टीम लॉर्ड्स में इग्लैड के खिलाफ

Jul

23

2014

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कठमुल्लाओं की कठपुतली

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कठमुल्लाओं की कठपुतली

दिल्ली से बग़दाद कितनी दूर है? ठीक-ठीक 3159 किलोमीटर. बीच में ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान. किसने सोचा था कि आग वहाँ लगेगी तो आँच तीन देशों को पार करते हुए अपने यहाँ तक आ जायेगी. वैसे तो इराक़ पिछले दस-बारह सालों से युद्ध से झुलस रहा है, लेकिन पहले कभी आज जैसी तपिश महसूस नहीं की गयी. तपिश नहीं, साज़िश. गहरी और भयानक साज़िश! अबू बकर अल बग़दादी ने ‘इसलामी ख़िलाफ़त’ की स्थापना कर अपने को इसलाम का स्वयंभू ख़लीफ़ा घोषित कर सबकी नींद उड़ा दी है. बड़ी मुसलिम आबादी वाले दुनिया के तमाम देश पुनरोत्थानवादी कट्टरपंथी इसलाम के बीज फैलने के ख़तरों से चौकन्ना हैं. लेकिन भारत के लिए स्थिति कहीं ज़्यादा नाज़ुक हो सकती है. और कहीं ज़्यादा जटिल भी. क्योंकि यहाँ समस्या के कई और पहलू हैं, जो और कहीं नहीं हैं!

पुनरोत्थानवादी कट्टरपंथी इसलाम के कुछ डरावने, ज़हरीले, शर्मनाक नमूने हम पिछले कुछ बरसों में पड़ोसी अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में देख चुके हैं! बामियान बुद्ध की ऐतिहासिक धरोहर को तहस-नहस करने से ले कर एक मासूम बच्ची मलाला यूसुफ़ज़ई पर क़ातिलाना हमले तक मनुष्य विरोधी, लोकतंत्र विरोधी, समानता विरोधी और प्रगति विरोधी इस सोच ने इन देशों में आतंक और ख़ौफ़ का साम्राज्य स्थापित कर रखा

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

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मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

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सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

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अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.