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Aug

18

2014

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पीएम मोदी का पहला पंद्रह अगस्त

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पीएम मोदी का पहला पंद्रह अगस्त

बड़े एलान की बात करें तो एक बड़ा एलान हुआ कि योजना आयोग की जगह कोई नया आयोग बनेगा। हालांकि, उसका भी जिक्र एक-दो लाइनों में हुआ। उसकी भी असल रूपरेखा अभी जनता के सामने आना बाकी है। हां, ये जरूर पता चल गया है कि ये नया आयोग संभवत: राष्ट्रीय विकास एवं सुधार आयोग या इसी तरह का कुछ होगा। और साथ ही ये आयोग योजना आयोग की तरह पंचवर्षीय सरकारी योजनाओं से आगे जाएगा । आगे किस तरह जाएगा वो होता ये दिख रहा है कि इसमें निजी कंपनियों के लिए भी कुछ प्रस्तावित रूपरेखा तैयार होगी। राज्यों के काम करने के तरीके भी ये आयोग कुछ-कुछ तय करेगा। उम्मीद ये भी है कि नया आयोग पुराने आयोग की तरह सिर्फ इस मद में इतना खर्च वाली भूमिका में भी नहीं रहेगा। उम्मीद ये भी कि नया आयोग अगले 02-30-50 सालों की योजना भी बनाएगा और उसके पूरा होने की एक निश्चित समयसीमा भी तय करेगा। हालांकि, ये सारे मेरे निजी अनुमान हैं। तो फिर अगर ये भी लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नहीं बोला तो आखिर करीब 65 मिनट तक यानी एक घंटे से भी ज्यादा समय तक वो क्या बोलते रहे।
 
तीन दशक

Aug

18

2014

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संवैधानिक शक्ति का सत्ता संघर्ष

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संवैधानिक शक्ति का सत्ता संघर्ष

तीन स्तंभों के बीच छिड़ी सर्वोच्चता की होड़
विधेयक के पारित होते ही संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरका ि और न्यायमंत्री रहे कपिल सिब्बल और प्रख्यात न्यायविद फाली नरीमन ने इस विधेयक को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का ऐलान कर दिया। सरकार को कानूनविदों ने पहले ही अदालती चुनौती की चेतावनी दी थी, सो कानून एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राज्यसभा में ताल ठोंक कर कहा कि कानूनी चुनौतियों के भय से संसद कानून बनाने के अपने संविधान प्रदत्त अधिकार को त्याग नहीं सकती। कपिल सिब्बल और फाली नरीमन की चुनौती के अलावा राम जेठमलानी का राज्यसभा के मत विभाजन में हिस्सा न लेना भी कुछ संकेत देता है। संसद में विधेयक पेश होने के पहले ही सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश आर. एम. लोढा का महत्वपूर्ण बयान आया जिसमें उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की नियुक्तियों की वर्तमान कोलेजियम प्रणाली को बदनाम किए जाने पर नाराजगी जाहिर की।

जम्हूरियत सिर गिनने का खेल भर रह गई है
संवैधानिक अपेक्षा तो यही थी कि ‘एनजेएसी’ पर संसद में समग्र बहस होती। लोकतंत्र में अपेक्षित था कि इस बहस को देख कर जनमानस अपना मंतव्य प्रकट करता। लकवाग्रस्त लोकतंत्र में विधायिकाओं का संचालन भी ऐसी जटिल नियमावलियों से किया

Aug

16

2014

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जश्ने आजादी के बाद जंगे आजादी

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पाकिस्तान में जंगे आजादी के पीटीए समर्थक पाकिस्तान में जंगे आजादी के पीटीए समर्थक

यह दिसंबर 2012 का महीना था और अभी पाकिस्तान में आम चुनाव की दूर दूर तक कोई सुगबुहाट नहीं थी कि अचानक से पाकिस्तान में एक लांग मार्च का ऐलान होता है। पाकिस्तान की राजनीति में बिल्कुल अन्ना हजारे की तर्ज पर एक 'इंसान' उभरता है और वह पाकिस्तान में मजबूत डेमोक्रेसी के लिए लांग मार्च का आह्वान कर देता है। जनवरी में इस्लामाबाद का मौसम बहुत सर्द होता है लेकिन सर्द मौसम की परवाह किये बिना पाकिस्तान के अन्ना हजारे तहिरुल कादरी इस्लामाबाद के डी स्क्वायर पर 14 जनवरी (2013) से चार दिनों का 'सिट इन' करते हैं और चौथे दिन वापस चले जाते हैं। उस वक्त डॉ कादरी और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी सरकार के बीच एक समझौता होता है जिसमें सबसे अहम था कि पाकिस्तान में लोकतांत्रिक चुनाव की शुचिता और शुद्धता सुनिश्चित किया जाएगा। बहुत सारे उपाय बताये गये थे कि कैसे यह शुचिता शुद्धता सुनिश्चित करते हुए फ्री एण्ड फेयर इलेक्शन करवाये जाएगें। जनवरी के बाद मई आई और मई में चुनाव हुए। जिस पीपीपी सरकार ने कादरी से फ्री एण्ड फेयर इलेक्शन का वादा किया था उस पीपीपी की करारी हार हुई। जरदारी से खार खाये बैठे नवाज शरीफ की पीएमएल-एन पूर्ण बहुमत वाली जीत

Aug

16

2014

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आर्डर आर्डर डिसआर्डर

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आर्डर आर्डर डिसआर्डर

पूर्व प्रधान न्यायधीश जस्टिस ए अहमदी, पूर्व प्रधान न्यायधीश जस्टिस वी एन खरे,सोली सोराबजी, फलि एस नरीमन, शांति भूषण, के परासरन, के के वेणुगोपाल, के टी एस तुलसी, जस्टिस ए पी शाह, प्रो माधव मेनन, उपेंद्र सिंह, अनिल बी सिंह,अटार्नी जनरल, वकील की हैसियत से अरुण जेटली से मशवरा किया। सभी आए सिर्फ पूर्व चीफ जस्टिस जी बी पटनायक नहीं आ सके तो फोन कर सहमति दी। पी पी राव, अशोक देसाई, टी आर अंध्यार्जुन,हरीश साल्वे, जी एन वाहनवति सबने समर्थन किया। फिर मैंने कानून मंत्री की हैसियत से राजनीतिक दलों के 26 अध्यक्षों को खत लिखकर उनकी राय मांगी।

कानून मंत्री 20 बड़े न्यायविदों से मिलकर राय लेते हैं। 26 पार्टी प्रमुखों से पूछते हैं मगर सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा प्रधान न्यायधीश का ज़िक्र तक नहीं करते हैं। क्या इतने लोगों से पूछताछ में मौजूदा प्रधान न्यायधीश की राय को शामिल नहीं किया जा सकता है। क्या यह मुमकिन है कि इतने नाम कानून मंत्री की ज़ुबान पर आते हैं लेकिन चीफ जस्टिस का नाम नहीं आता है। वे भूल गए हों। तब जब इस विवाद में सार्वजनिक रूप से सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा चीफ जस्टिस एक पार्टी बन गए हैं।

क्या टकराव की स्थिति है। सरकार

Aug

16

2014

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बाल गोपाल पर हिंसा क्यों?

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बाल गोपाल पर हिंसा क्यों?

शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के बाद यहे बेहद जरूरी है कि बच्चों को हिंसा से संरक्षण का भी मौलिक अधिकार मिले। इसके अभाव में भोले मन वाला बचपन घर और स्कूल में मानसिक व शारीरिक रूप से पीड़ित है। देश दुनिया का कौन सा ऐसा देश है जहां बच्चों पर नियंत्रण के लिए हिंसा का उपयोग नहीं किया गया है। भारत के पौराणिक कथाओं में तो इसके उदाहरण है। भगवान श्रीकृष्ण अपनी नटखट कारनामों से माता यशोदा को इतना तंग करते हैं कि मां कभी कान्हा को रस्सियों से बांध देती हैं, तो कभी ओखली में बांध कर अनुशासित करने का प्रयास करती है। बच्चों को घरों में बांध कर रखने, उन्हें मारने-पीटने की घटनाएं आज भी जारी है। पर चंचल बाल मन की शरारत भला कहां छुटती है। बच्चों की सहज पृवृत्तियां जब माता-पिता या शिक्षक के लिए भारी लगने लगती है तो उनका धैर्य टूट जाता है। वे बच्चों की बाल मनोवृत्ति समझने के इतर उस पर नियंत्रण के लिए हिंसा का रुख अख्तियार कर लेते हैं। जैसे-जैसे समाज विकसित हुआ, एकल परिवार बढ़े। बच्चे एकल परिवार में ही सीमित रहने लगे। उनकी स्वछंदता समाप्त हो गई है। माता-पिता की अपेक्षाओं ने सब कुछ कठोर अनुशासन में

Aug

15

2014

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शैतान और समुद्र के बीच फंसी तुर्की की राजनीति

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तुर्की के नवनियुक्त राष्ट्रपति रेसेप तायईप अरर्दोआं तुर्की के नवनियुक्त राष्ट्रपति रेसेप तायईप अरर्दोआं

तुर्की में इससे पहले, राष्ट्रपति का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से संसद के मध्यम से होता था. यह पद प्रधानमंत्री की तुलना मे केवल अलंकारिक ही होता था. लेकिन 2010 के जनमत संग्रह के बाद प्रत्यक्ष चुनाव का प्रावधान लाया गया और अब तुर्की एक प्रेसीडेंशियल (अध्यक्षीय) व्यवस्था की ओर अग्रसर है, जहाँ राष्ट्रपति का पद ज़्यादा महत्वपूर्ण हो गया है. अरर्दोआं संवैधानिक संशोधन की तैयारी में हैं. अगले साल के संसदीय चुनाव मे अगर उनकी पार्टी को अच्छा बहुमत मिलता है तो वे संशोधन कर पाएँगे. अरर्दोआं को इस चुनाव में लगभग 52 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि विरोधी प्रत्याशी एक्मेलेदिन इहसनोग्लू को लगभग 39 प्रतिशत वोट मिले हैं. अरर्दोआं को रूढ़िवादी मतदाताओं का समर्थन है और वे नव-उदारवादी नीतियों के लिए जाने जाते हैं. उनकी धार्मिक नीतियों से तुर्की के धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठ रहा है. साथ ही उनके तीन बार प्रधानमंत्री के बाद अब राष्ट्रपति बनने से लोकतंत्र पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं. उनकी तुलना रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से की जा रही है, जो लगभग 15 वर्षों से राजनीतिक व्यवस्था पर नियंत्रण बनाए हुए हैं. 

कभी बहुत लोकप्रिय रही अरर्दोआं सरकार जल्द ही विवादों में घिर गयी. प्रधानमंत्री अरर्दोआं भ्रष्टाचार और कुशासन

Aug

14

2014

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जनादेश का जनगण जंगम

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जनादेश का जनगण जंगम

असल में राजनीतिक तौर पर कोई दृष्टि १९४७ में कांग्रेस के पास थी ही नहीं इसलिये देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने पहली कैबिनेट हर तबके, हर संप्रदाय हर जाति और कमोवेश हर राजनीतिक धारा के नुमाइंदों को लेकर बना दी जिससे इतिहास उन्हे दोषी ना माने। दलितों के सवाल पर महात्मा गांधी से दो दो हाथ करने वाले बाबा साहेब आंबेडकर से लेकर पाकिस्तान को आर्थिक मदद देने के खिलाफ हिन्दू महासभा के श्यामा प्रसाद मुखर्जी तक नेहरु की पहली कैबिनेट में थे। वैसे माना यही जाता है कि आजादी को अधूरा मानने वाले महात्मा गांधी ने ही नेहरु को सुझाव दिया था कि पहली सरकार राष्ट्रीय सरकार लगनी चाहिये लेकिन इस राष्ट्रीय सरकार के मर्म में नेहरु या कहे कांग्रेस की सियासत ने सामाजिक सरोकार को ही राजनीतिक चुनाव के कंधे पर लाद दिया और वक्त के साथ हर राजनीतिक विचारधारा भी राजनीतिक सत्ता के लिये संघर्ष करती दिखायी देने लगी।

ध्यान दें बीते ६७ बरस में देश की सबसे बड़ी उपलब्धि देश में राजनीतिक ताकत का ना सिर्फ बढ़ाना है बल्कि राजनीतिक सत्ता को ही हर क्षेत्र का पर्याय मान लिया गया। यानी वैज्ञानिक हो या खिलाड़ी। सिने कलाकार हो या संस्कृतकर्मी। या कहें देश के

Aug

14

2014

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बिटिया का डंका, बेटे पर शंका

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बिटिया का डंका, बेटे पर शंका

तब प्रियंका ने संभाली थी कमान
वैसे कांग्रेस की राजनीति में प्रच र पर राहुल के पहले ही प्रियंका गांधी को सक्रिय किया गया था। १९९९ से २०१४ तक गांधी परिवार के जिस भी सदस्य ने लोकसभा चुनावों का सामना किया है उक्त निर्वाचन क्षेत्र में मुख्य प्रचारक की कमान प्रियंका के पास रही है। बीते डेढ़ दशकों में केवल एक बार गांधी परिवार अमेठी और रायबरेली से दूर चुनाव मैदान में उतरा। १९९८ के आम चुनावों में गांधी परिवार की परंपरागत सीट अमेठी से परिवार के विश्वस्त वैâप्टेन सतीश शर्मा चुनाव हार गए थे। १९८९ के आम चुनावों के दौरान ही वैâप्टेन सतीश शर्मा और संजय गांधी के विश्वासपात्र संजय सिंह के बीच जम कर ठन गई थी। संजय सिंह ने उन दिनों राजीव गांधी के शत्रु विश्वनाथ प्रताप सिंह से रिश्तेदारी जोड़ ली थी। १९८९ के चुनावों में वैâप्टेन सतीश शर्मा के समर्थकों ने संजय सिंह पर गोलीबारी भी की थी। जब राजनाथ सिंह के पास उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी की कमान आई तो राजनाथ सिंह ने संजय सिंह को अमेठी से भाजपा का उम्मीदवार बना दिया। वैâप्टेन सतीश शर्मा चुनाव हार गए। १९९९ में जब सोनिया गांधी को चुनाव लड़ने की नौबत आई तब वह

Aug

13

2014

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माई एहरा पूत जिन जेहरा

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वीर दुर्गादास राठौर (13 अगस्त 1638 से 22 नवंबर 1718) वीर दुर्गादास राठौर (13 अगस्त 1638 से 22 नवंबर 1718)

आज भी मारवाड़ के गाँवों में बड़े-बूढ़े लोग बहू-बेटी को आशीर्वाद स्वरूप यही दो शब्द कहते हैं और वीर दुर्गादास को याद करते है कि “माई ऐहा पूत जण जेहा दुर्गादास, बांध मरुधरा राखियो बिन खंभा आकाश” अर्थात् हे माता! तू वीर दुर्गादास जैसे पुत्र को जन्म दे जिसने मरुधरा (मारवाड़) को बिना किसी आधार के संगठन सूत्र में बांध कर रखा था. दुर्गादास को वीर दुर्गादास बनाने का श्रेय उसकी माँ मंगलावती को ही जाता है जिसने जन्मघुट्टी देते समय ही दुर्गादास को यह सीख दी थी कि “बेटा, मेरे धवल (उज्ज्वल सफेद) दूध पर कभी कायरता का काला दाग मत लगाना.”

मुगलों के दमनकारी कालखंड में जब 13 अगस्त 1638 को जोधपुर रियासत के सालवा कला में वीर दुर्गादास का जन्म हुआ. उस समय समृद्ध,संपन्न, और विशाल धनाड्य राज्य मारवाड़ का कोई स्वामी, सामंत या सेनापति नहीं था. चारों ओर औरंगजेब के कुटिल विश्वासघात की भेंट चढा समाज त्राहि त्राहि कर रहा था जनता कठोर दमन चक्र में फंसी थी. सर्वत्र आतंक लूट-खसोट, हिंसा और भय की विकराल काली घटा छाई थी. उस समय मारवाड़ ही नहीं पूरा भारत मुग़ल आक्रान्ताओं के अत्याचार, शोषण,दमन,जबरन धर्मांतरण,धर्म स्थलों ऊपर हमले और उनके खजानों को लूटने की घटनाओं को सहन कर

Aug

12

2014

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अरब और अमेरिका का नया 'अफगानिस्तान'

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इराक के नवनियुक्त प्रधानमंत्री हैदर अल आब्दी इराक के नवनियुक्त प्रधानमंत्री हैदर अल आब्दी

असल में इराक एक ऐसे बवंबडर में फंस गया है जो कब थमेगा, कोई नहीं जानता, खुद अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी नहीं। ह्वाइट हाउस के अपने संबोधन में बराक ओबामा ने स्वीकार किया कि इराक में लंबा वक्त लगेगा। यह लंबा वक्त कितना लंबा होगा? उतना जितना अफगानिस्तान में लगा या फिर उतना जितना सीरिया में लग रहा है? एक दो महीने, एक दो साल या फिर एक दो दशक? समय कितना भी लंबा लगे लेकिन राजनीतिक समाधान की ऐसी अंतहीन कड़ियां एक दूसरे से उलझती जा रही हैं जो एक समस्या को दूसरे समस्या से हल कर रही हैं।

सद्दाम हुसैन के खात्मे के बाद नूर अल मलीकी अमेरिका की पसंद थे। सत्तर के दशक में सद्दाम हुैसन के विरोध से राजनीतिक कैरियर की शुरूआत करनेवाले मलीकी को मौत की सजा नसीब होती अगर वे इराक से भाग न गये होते। करीब 24 साल निर्वासित जीवन जीनेवाले नूर अल मलीकी ने अमेरिकी रणनीतिकारों और फौजों के साथ मिलकर सद्दाम हुसैन के सफाये में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। शायद यही कारण है कि सद्दाम हुसैन के खात्मे के बाद अमेरिका ने मलीकी को अपना उम्मीदवार घोषित करवाया और उन्हें इराक के पुनर्निमाण का जिम्मा दे दिया। अमेरिका

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

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मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

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अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.