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Dec

20

2014

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आतंक की विचारधारा

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आतंक की विचारधारा

अमेरिका ने अपने स्वार्थ की खातिर तालिबान को खड़ा किया था। 1978 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया तो उससे लड़ने के लिए अमेरिका ने अफगानिस्तान के मदरसों के तलबा (विद्यार्थियों) को जेहाद का ऐसा पाठ पढ़ाना शुरू किया, जिसका वास्तविक जेहाद से कुछ लेना-देना नहीं था। तालिबान का राक्षस खड़ा करने के लिए पाकिस्तान में ट्रेनिंग कैंप खोले गए। उन कैंपों में सोवियत संघ से लड़ने को ही सबसे बड़ा काम बताकर उनमें इतनी धर्मांधता कूट-कूट कर भर दी गई कि उन्होंने अपना ‘इसलाम’ गढ़ लिया, जिसमें इसलामिक मूल्यों की कोई जगह नहीं थी। अफगानिस्तान पर सोवियत हमले को इसलाम पर हमला बताया गया। जिसका नतीजा यह हुआ कि कई मुसलिम देशों के युवा सोवियत सेना के खिलाफ जेहाद करने पहुंचने लगे। अमेरिका की एजेंसी सीआईए ने तालिबान को हथियारों और डॉलर से नवाजा। नतीजा यह हुआ कि पूरा अफगानिस्तान और पाकिस्तान अवैध हथियारों से पट गया। सऊदी अरब, इराक आदि ने भी कई तरीकों से तथाकथित मुजाहिदीनों की मदद की।

अमेरिका अपने मकसद में कामयाब हुआ और 1991 में सोवियत संघ टूट गया। इस कामयाबी के लिए अमेरिका ने तालिबान प्रमुख मुल्ला उमर और शेख ओसामा बिन लादेन को सम्मानित किया। अब अमेरिका को तालिबान

Dec

18

2014

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संभल जाओ ऐ मुसलमानों

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संभल जाओ ऐ मुसलमानों

इस्लामिक मुल्क पकिस्तान में इस्लामिक आतंकवादियों ने 132 स्कूली बच्चे मार डाले जो उन्हीं की तरह मुसलमान थे. कत्लेआम का एक चाश्मीद गवाह बच्चा बोला "आतंकवादियों ने बच्चों को लाइन लगाने को कहा ताकि गोली मार सकें। बच्चों ने समझा कि अंकल कोई गेम खेलने वाले हैं" इन मासूमों को ये नहीं पता कि इस्लाम के कठमुल्लों को बस दो ही गेम पता हैं..एक बिस्तर पर दूसरा जंग के मैदान में. इन्होंने न कोई और गेम सीखा है और न इनको इनके मदरसे कुछ सिखाते हैं. ये भूखे नंगे वहशी अरब की बर्बर मानसिकता वाले लोग. जब तक ये पूरी तरह से नेस्तोनाबूद नहीं किये जायेंगे तब तक इनका ये वाला गेम रुकने वाला नहीं है.

मारे गये बच्चों में से एक के पिता अजीज कहते हैं, "मेरा बेटा सुबह यूनिफॉर्म में था, अब ताबूत में है। मेरा बेटा मेरा ख्वाब था। मेरा ख्वाब मारा गया।'' लेकिन ये क्या जाने ख्वाब, जन्नत की हूरों के लिए लार टपकाने वाले घिनौने कठमुल्ले, इनसे किस ख्वाब की उम्मीद करते हो तुम लोग? इन्होने सामूहिक आत्महत्या की पूरी प्लानिंग कर रखी है. फिर भी तुम सब लोग (मुसलमान) चुप हो. तुम सब लोग जो दिल ही दिल में शरीया को सपोर्ट करते

Dec

18

2014

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संथाल में क्यों बदल गया मोदी का सुर?

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संथाल में क्यों बदल गया मोदी का सुर?

संथाल की जनता से इन्हें सुधारने की बात की, इन्हें सीधे तौर पर मौका नहीं दी। नरेंद्र मोदी की भाजपा भी संथाल में अपने घोषणापत्र की बात नहीं करती है। भाजपा भी यहां केवल आदिवासी हित की बात करती है। क्या हुआ अगर संथाल परगमना में होने वाले 16 सीटों में से 9 सीटें आरक्षित हैं? क्या हुआ अगर यह भाजपा की स्थिति बीते दो विधानसभा चुनाव में खराब हुई? मोदी जी जीत के रथ पर सवार होने वाली भाजपा को क्या अपने एजेंडे और विकास के प्रारूप पर संथाल में भरोसा नहीं रहा? क्या संथाल में वह आदिवासियों के सर्वमान्य नेता शिबू सोरेन को सीधे चुनौती देने की स्थिति में नहीं है? क्या भाजपा लोकसभा चुनाव में आदिवासियों के नेता बनने ही चाह लिए बाबूलाल मरांडी की हार से डरी हुई है?

ऐसे एक नहीं, कई सवाल हैं। जो लोगों के मन में उमड़-घुमर रहे हैं। अब पूरे झारखण्ड की नजर केवल और केवल संथाल पर टिक गई है। एक बार संथाल अपने चरित्र को और भी अधिक मजबूत कर रहा है कि सत्ता की धारा यहीं से तय होती है। अब तो भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रवीन्द्र राय भी कह रहे हैं कि संथाल में मुख्य मुकाबला भाजपा

Dec

16

2014

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'जर्ब-ए-अज्ब' की जंग

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'जर्ब-ए-अज्ब' की जंग

यह सिर्फ पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि आधुनिक दुनिया के इतिहास में सबसे भयावह त्रासदियों में से एक कही जाएगी जब किसी क्रूर आतंकी संगठन ने इस तरह से नौनिहाल बच्चों को अपना निशाना बनाया है। घटना को अंजाम देनेवाले तहरीक-ए-तालिबान ने बहुत शान से इस आतंकी कार्रवाई की जिम्मेवारी भी ले ली है और संदेश भी दिया है कि जो कुछ किया गया वह बदले की कार्रवाई है। पाकिस्तानी सेना जिस तरह से उनके लोगों और बच्चों को निशाना बना रही है, उन्हें भी पता चलना चाहिए कि बच्चों का कत्ल कितना खौफनाक होता है। इसका मतलब बैतुल्ला मसूद के तहरीक-ए-तालिबान ने जो कुछ किया जानबूझकर किया और सोच समझकर किया। अब भले ही पूरी दुनिया यह पूछ रही हो कि मासूम बच्चों को तालिबान ने निशाना क्यों बनाया, लेकिन तालिबान के पास अपनी इस कार्रवाई का भी उसी तरह जवाब है जैसे हर कार्रवाई का होता है। तो आखिर पाकिस्तान में ऐसे कौन से हालात हैं कि एक आतंकी संगठन यह जानते हुए कि वह जो करने जा रहा है, वह सही नहीं है फिर भी कर गुजरता है?

जैसे ही पेशावर में सैनिक स्कूल पर आतंकी हमले की खबर सामने आई पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख रहील शरीफ

Dec

16

2014

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फेसबुकिया फुसफुसाहट के बीच सफल साहित्य महोत्सव

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फेसबुकिया फुसफुसाहट के बीच सफल साहित्य महोत्सव

इस पर यह तर्क देकर सरकार को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है कि यह पैसा गरीबों का है, नसबंदी कांड के पीड़ितों को दे दिया जाता तो उनका भला हो जाता। नसबंदी कांड निश्चय ही शर्मनाक घटना थी, लेकिन मामले के प्रकाश में आते ही जिस तरह से प्रशासन ने हरकत में आकर इस पर कार्रवाई की, उससे कई महिलाओं की जान बच गई। उन्हें सरकार ने मुआवजा दिया। उनके बच्चों को सरकार ने गोद ले लिया। 18 साल तक के उम्र तक बेहतरीन अस्पताल में इलाज का पूरा खर्च उठाने का निर्णय लिया। इन सब सकारात्मक चीजों को स्थानीय अखबारों में जगह तो मिल गई, लेकिन बाहरी मीडिया में इसे तब्बजों नहीं मिला। सरकार हर विभाग को अपनी योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए बजट देती है। तो क्या स्वास्थ्य विभाग की लापरवाही से जो मातमी माहौल बना, उसमें सांस्कृतिक विभाग और जनसंपर्क विभाग अपनी जिम्मेदारी और दायित्व को छोड़ दे।

रायपुर साहित्य उत्सव को लेकर सोशल मीडिया में जो बातें आ रही हैं, उसका न कोई ठोस तर्क है न ही विरोध का मजबूत आधार। चूंकि साहित्य का इतना बड़ा आयोजन पहली बार हो रहा था। थोड़ी बहुत चूक की गुजांईश स्वाभाविक है। लेकिन थोड़ी चुक से

Dec

16

2014

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धर्मांतरण नहीं है घर वापसी

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धर्मांतरण नहीं है घर वापसी

इस आगरा की एक घटना को हमारे सेकलुरवादी और कुछ अंग्रेजी अखबार ऐसे पेश कर रहे है कि मानो, भारत को धर्म के आधार पर राष्ट्र घोषित कर दिया गया हो। इंडियन एक्सप्रेस, हिंदुस्तान टाइम्स, मेल टुडे, टाइम्स आॅफ इंडिया इंडिया, सटेट्मैन और हिन्दू जैसे अखबार लीड हेडिंग बनाकर और लेख लिखकर यह साबित करने में लग गए है कि चारो तरफ भागवाधारियों का राज हो गया है और वह जल्द ही भारत के एक चैथाई, 25-30 करोड़ ईसाइयों और मुस्लमानों को हिंदू बना देगें।

अंग्रेजीदा मीडिया और सेकुलरवादी यह भी साबित करने की कोशिश कर रहे है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए संघ धर्मांतरण का मुद्दा उठाकर उनकी विकास वाली छवि को नुकसान पहुंचा रहा है। यहीं मीडिया भाजपा के कुछ सासंदो और कुछ मंत्रियों के हिंदू प्रेम के कारण भी विचलित हो रहा है। धर्मांतरण पर मचे इस हंगामें के बीच सरकार ओर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे है कि यह धर्मांतरण नहीं है इसे ‘घर वापसी’ समझा जाए। अगर सेकलुरवादी धर्मांतरण पर इतने ही चिंतत और दुखीः है तो इस मामले पर एक राष्ट्रीय कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। सेकुलरवादी खेमा और अंगे्रजीदा मीडिया इस मामले पर सरकार और

Dec

15

2014

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कश्मीर में जम्हूरियत की जंग

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कश्मीर में जम्हूरियत की जंग

इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें। कश्मीर में पहला चुनाव 1951 में हुआ। उन दिनों हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू कश्मीर के अपने साथी शेख अब्दुल्ला पर बेहद फिदा हुआ करते थे। शेख अब्दुल्ला, जम्मू एवं कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के पितामह थे। उन दिनों जम्मू एवं कश्मीर की एसेंबंली में कुल 75 सीटें हुआ करती थीं। तब केवल 2 एसेंबली सीटों पर सही मायनों में चुनाव हुए थे। शेख अब्दुल्ला के समर्थकों ने शेष 73 सीटों से किसी भी विरोधी को नामांकन पत्र दायर करने ही नहीं दिया था। शेख अब्दुल्ला तब इस फर्जी चुनाव के माध्यम से विजयी घोषित हो कश्मीर के प्रधानमंत्री बने थे। तब कश्मीर के मुख्यमंत्री के पद को प्रधानमंत्री के नाम से जाना जाता था। शेख अब्दुल्ला ने जम्हूरियत का यह खून अपने मित्र पं. नेहरू के प्रश्रय से किया था।

व्यक्ति के इर्द-गिर्द सियासत
तब दिल्ली में खुद पं. नेहरू कहा करते थे- ‘कश्मीर में जम्हूरियत का कोई तत्व मौजूद ही नहीं। कश्मीरी सियासत किसी दल की बजाय व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द घूमती है।’ पं. नेहरू की इसी हरकत के चलते शेख अब्दुल्ला बेलगाम हुए और साल भर के भीतर पं. नेहरू को उनके

Dec

15

2014

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सतनाम श्री गुरू घासीदास

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सतनाम श्री गुरू घासीदास

छत्तीसगढ़ को आज यही तो चाहिए। सतनामी समाज में जाति भेद नहीं है। मानव मात्र के लिए प्रेम है।  गुरू घासीदास जी का अवतरण जिस समय हुआ, उस समय पूरे छत्तीसगढ में अराजकता थी। अंग्रेज और मराठा शाही भूलभुलैया खेल रही थी। मराठों की राज्य व्यवस्था शक्तिहीन हो चली थी। लूटखसोट का व्यवसाय अंतिम चरण पर पहुंच चुका था। सामाजिकता का मूल्य नहीं था। सूबेदार अपने स्थानों के स्वतंत्र राजे हो चुके थे। जिसकी लाठी उसकी भैंस चरितार्थ हो रही थी। धर्म के पहरेदार धर्म छोड़ चुके थे। मठ-मंदिर महाजनी अड्डा में परिवर्तित हो चुका था। यहां की जनता मांस, मदिरा, मैथुन में अपने को भुलाने की प्रयत्न कर रही थी। सामाजिक एवं आर्थिक न्याय पाने के लिए संघर्ष करने की शक्ति खो चुकी थी। तभी इस अंचल के उध्दार के लिए गुरुघासीदास का अवतरण हुआ था। गुरु घासीदास जी का अवतरण छत्तीसगढ़ अंचल के लिए, उस युग की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक आवश्यकता थी। उनके अवतरण के बिना इस क्षेत्र के उध्दार हो ही नहीं सकता था।

गुरु घासीदास का जन्म 1756 ई. में वर्तमान छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में गिरौद नामक ग्राम में हुआ था। इनकी माता का नाम अमरौतिन तथा पिता का नाम मंहगूदास था। युवावस्था में

Dec

15

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योग दिवस का अर्थशास्त्र

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योग दिवस का अर्थशास्त्र

संयुक्त राष्ट्र में योग को इतनी बड़ी स्वीकृति मिलने से भारत में हर्ष की लहर दौड़ गयी है,खासकर हिंदुत्ववादियों में.इस घोषणा में संघ के योग्य प्रचारक और हिन्दू धर्म-संस्कृति की बड़ी विजय देखकर वे हर्ष से झूम उठे हैं.इस घटना को प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिगत उपलब्धि मानते हुए हर्ष लोकसभा और राज्यसभा में मनाया गया है.चैनलों पर तो इस घोषणा के बाद हर्ष का सैलाब ही आ गया था.जब चारो तरफ इसे लेकर हर्ष ही हर्ष था तो वह योग गुरु रामदेव ही कैसे चुप रहते,जो हाल ही में देश भर में पांच लाख आचार्य कुलम  बनाने की घोषणा कर चुके हैं.संयुक्त राष्ट्र की घोषणा से आह्लादित योग गुरु ने इसका सारा श्रेय मोदी को देते हुए कह दिया कि इसके जरिये उन्होंने अपने वैश्विक नेतृत्व का लोहा मनवा  लिया है.बहरहाल अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा निश्चय ही बौद्धिक संपदा के मामले में निचले पायदान पर पड़े भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है,लेकिन इसके पीछे योग की महत्ता कम ,अंतर्राष्ट्रीय अर्थनीति की भूमिका बड़ी है,जिसे समझने के लिए 24 जुलाई, 1991 के बाद के हालात का सिंहावलोकन कर लेना होगा.

स्मरण रहे भारत में जो आज निजीकरण,उदारीकरण की अर्थनीति मोदी युग में चरम की ओर अग्रसर

Dec

14

2014

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शोक के शहर में साहित्य का महोत्सव

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शोक के शहर में साहित्य का महोत्सव

छत्तीसगढ़ में एक माह के दौरान तक़रीबन 46 मौतें हुई हैं ,जिनमे 18 महिलाएं हैं और 16 बच्चे |मृत्यु के इन  आंकड़ों के साथ साथ हमें उन 80 महिलाओं की भी चर्चा जरुर करनी होगी ,जिनकी किडनी ने नसबंदी काण्ड के बाद काम करना बंद कर दिया है |दुर्भाग्य यह कि तीन दिनों तक चले इस महोत्सव में किसी भी लेखक ,कहानीकार ,कवि ने अपनी स्थापना में इन गणहत्याओं का नाम तक नहीं लिया ,वो भी तब जबकि अकाल  मृत्यु की इन घटनाओं की वजहों पर लगभग एक माह बाद भी सत्ता की पर्देदारी है |यह लेख लिखे जाने से ठीक पहले छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल से बात हो रही थी |केन्द्रीय प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट में छत्तीसगढ़ में हुई मौतों के पीछे के सरकारी दावे झूठे साबित हुए हैं ,प्रयोग की गई दवाओं में कोई चूहामार दवा नहीं मिली है ,स्वास्थ्य मंत्री का कहना था कि अब हम कोई जांच नहीं करेंगे ,जो भी जांच करवानी होगी पुलिस कराएगी। स्वास्थ्य मंत्री और छत्तीसगढ़ सरकार का यह अहंकार यूँही नहीं है ,इस अहंकार के मूल में रायपुर गए कथित प्रगतिशील ,स्त्रीवादी ,मानववादी साहित्यकारों द्वारा दिया गया चरित्र प्रमाण पत्र है जो 25 से 15 हजार रूपए में खरीद लिया

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

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अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.