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Apr

23

2014

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फासीवादी दर्शन को समर्थन

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फासीवादी दर्शन को समर्थन

गौरतलब है कि श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट आॅफ लिविंग के अंर्तराष्ट्रीय महासचिव महेश गिरि पूर्वी दिल्ली से भाजपा के टिकट पर लोकसभा के प्रत्याशी हैं। यहां तक कि राजनीतिक जगत में श्री श्री रविशंकर की छवि भी संघ के एक वैचारिक समर्थक की मानी जाती है। यही नहीं, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से उनके व्यक्तिगत रिश्ते बहुत अच्छे हैं। ऐसे में, यह बात साफ है कि उनकी यह अभिव्यक्ति भी संघ के राजनैतिक दर्शन का एक छोटा सा प्रतिबिंब है, और इस लिहाज से इसका विश्लेषण होना चाहिए कि छोटे दलों को लोकसभा चुनाव लड़ने से रोकने की इस विचारधारा के पीछे का राजनैतिक और सामाजिक मनोविज्ञान क्या है? आखिर इस विचार के प्रचार  के पीछे संघ की कौन सी राजनैतिक रणनीति काम कर रही है?

क्या यह सच है कि क्षेत्रीय दल ही वर्तमान समय में देश की सुरक्षा तथा अर्थव्यस्था की बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं? और क्या उनके लोकसभा चुनाव से हटते ही सारी समस्या खत्म हो जाएगी? जहां तक इस देश में क्षेत्रीय
दलों के उदय का सवाल है, यह बात हमें स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि इनका राजनीति में उदय अचानक घटी कोई परिघटना नहीं थी। आजादी के समय तक देश के

Apr

23

2014

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तार तार होता तिलिस्म

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तार तार होता तिलिस्म

आम आदमी पार्टी करप्शन के खिलाफ एक ठोस ब्यू प्रिंट के साथ हाजिर हुई थी। भ्रष्टाचारी को चौराहे पर सरेआम फांसी पर लटका देने, वसूली सुनिश्चित करने से लेकर जेल में डाल देने का एेलान करने वाली आम आदमी पार्टी की इस वैचारिक आक्रामकता के प्रति युवा वर्ग और शहरी आबादी का एक तबका आकर्षित भी हुआ, लेकिन समय के साथ मुलम्मा उतरता चला गया। पार्टी के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताआें पर जब भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए गए तो उन्हें सिर्फ पार्टी से निष्कासित कर काम चला लिया गया। इसी से पता चलता है कि आप की कथनी और करनी में कितना अंतर है। बाकी जगह भी तो यही होता है। किसी पर भ्रष्टाचार का आरोप सही पाया जाता है तो उसे निलंबित या ज्यादा से ज्यादा निष्कासित कर दिया जाता है। सवाल यह उठता है कि दूसरों के भ्रष्टाचार के खिलाफ आप के तीखे तेवर आखिर अपने लोगों के भ्रष्टाचार पर नरम क्यों है?

फर्श से अर्श और फिर फर्श 
गांधीवादी नेता अन्ना हजारे के आंदोलन के गर्भ से पैदा आम आदमी पार्टी यानी आप ने जब राजनीतिक आकार लिया और अपनी सोच और कार्यक्रमों के साथ जनता के बीच आई तो लोगों को सड़ांध में ताजी

Apr

22

2014

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अब्दुल्ला का अलगाववाद

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अब्दुल्ला का अलगाववाद

वैसे तो विरोधियों को निपटाने का आसान तरीक़ा अब्दुल्ला परिवार ने पहले ही खोज लिया था और उसका लम्बे अरसे तक फल भोग भी किया। वह था विरोधियों के थोक भाव से नामांकन पत्र ही रद्द करवा देना। लेकिन अब शायद इक्कीसवीं शताब्दी में ऐसा संभव नहीं है। चुनाव आयोग भी सख़्त हो गया है। इटली का फासीवाद भी अब मदद कर नहीं पायेगा । लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि अब्दुल्ला परिवार ऐसी स्थिति में हाथ पर हाथ धर कर बैठ जायेगा। अब वह विरोधियों को निपटाने के लिये आतंकवादियों और बंम्ब पिस्तौलों की तलाश कर रहा है। यह विचार जरुर फ़ारूक़ अब्दुल्ला को अपने जे के एल एफ़ के दिनों के अनुभव से मिला होगा।

शेख़ मोहम्मद अब्दुल्ला के परिवार की एक ख़ूबी है वे जो कुछ भी करते हैं डंके की चोट पर करते हैं और उसको कभी छिपाने की कोशिश नहीं करते। परिवार के वर्तमान सदस्यों ने यह ख़ासियत यक़ीनन अपने पुरखे शेख़ अब्दुल्ला से ही पाई होगी। यह शेख़ अब्दुल्ला ही थे जिन्होंने प्रदेश की पहली विधान सभा के लिये १९५२ में हुये चुनावों में सभी विरोधियों के नामांकन पत्र रद्द करवा पर सभी ७५ सीटें बिना चुनाव के ही जीत ली थीं और लोकतंत्र

Apr

22

2014

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नेतागीरी नहीं, गुण्डागीरी!

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नेतागीरी नहीं, गुण्डागीरी!

प्रवीण तोगड़िया, अकबरुद्दीन ओवैसी, अमित शाह, इमरान मसूद, वसुंधराराजे सिंधिया, ग्रीराज सिंह और अजित पवार जैसे लोग इन दिनों किसी अच्छे काम के लिए मशहूर नहीं हुए हैं बल्कि इन्होंने अपने भाषणों के दौरान कुछ ऐसी बातें कहीं हैं जिनसे ऐसा लगता है कि वह या तो वोटरो, किसी खास धर्म के मानने वालों को यह फिर अपने राजनितिक विरोधियों को धमका रहे हैं। कोई किसी को टुकड़े टुकड़े करने की धमकी दे रहा है तो कोई चुनाव बाद कौन किसके टुकड़े करता है ऐसा कहकर धमका रहा है।  कोई मोदी विरोधियों को भारत से निकल जाने की धमकी दे रहा है तो किसी को यह पसंद नहीं है कि मुस्लिम हिन्दुओं के मोहल्ले में बिज़नेस  करें । अगर  कोई मुस्लमान हिन्दू मोहल्ले में बिज़नेस करने की हिम्मत करता है तो उसे प्रवीण तोगड़िया जैसे लोग धमकी देते हैं और अपने गुंडों को उस मुसलमान का घर लूट लेने की बात कहते हैं।

अफ़सोस इस बात का भी है कि वरुण गांधी और राज ठाकरे जैसे लोग किसी को धमकी दें तो बात समझ में आती है कि इन्हें अभी बहुत कुछ सीखना है मुलायम सिंह यादव जैसे बड़े नेता भी ऐसा करते हैं।  तीन अप्रैल को उत्तर प्रदेश

Apr

22

2014

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संत, असंत और घोघाबसंत

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संत, असंत और घोघाबसंत

शहर बनारस के दक्खिनी छोर पर गंगा किनारे बसा ऐतिहासिक मोहल्ला अस्सी है. अस्सी चौराहे पर भीड़ भाड़वाली चाय की एक दुकान है . इस दूकान पर रात दिन बहसों में उलझते ,लड़ते- झगड़ते कुछ स्वनामधन्य अखाडिये बैठकबाज़ विराजमान रहते हैं. न कभी उनकी बहसें ख़त्म होती हैं, न सुबह शाम. कभी प्रगतिशील और लिबरल राजनीतिक सोच वालों के केंद्र रहे इसी अस्सी को केंद्र बनाकर इस बार नरेंद्र मोदी की पार्टी वाले वाराणसी का अभियान चला रहे हैं. इस अभियान में वाराणसी में आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल को  मोदी के समर्थक भगा देने के चक्कर में हैं.

अरविन्द केजरीवाल जहां भी जा रहे हैं बीजेपी कार्यकर्ता उनके  ऊपर पत्थर ,टमाटर आदि फेंक रहे हैं. इन कार्यकर्ताओं के इस कार्यक्रम के चलते केजरीवाल का नाम देश के सभी टी वी चैनलों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में छाया हुआ है. हालांकि सच्चाई यह है कि बनारस की ज़मीन पर अभी केजरीवाल का कोई नाम नहीं है. बनारस में रहने वाले और पप्पू की दूकान को राजनीतिक समझ की प्रयोगशाला मानने वाले एक गुनी से बात हुयी तो पता चला कि अरविन्द केजरीवाल के साथ आये हुए लोग भी बनारस में अजनबी ही हैं. वाराणसी के पत्रकारों से चर्चा करने

Apr

22

2014

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मोदी ब्राण्ड का बोलबाला

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मोदी ब्राण्ड का बोलबाला

मोदी ने कुछ संस्कृत और कुछ हिंदी में वेद, पुराण, संस्कृति एवं परंपराओं  के सूत्र वाक्यों के माध्यम से अपना ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ पेश किया है। संघ की चिंतन बैठकों या शाखाओं में कुछ भी कहा जा सकता है। प्राचीन काल के वैभव (यह बताने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि किस युग का, कैसा वैभव) की वापसी की इच्छा व्यक्त की जा सकती है, सनातन राष्ट्र की वंदना की जा सकती है या भारत को ‘हिंदू राष्ट्र’ का रूप देने की योजनाएँ बनाई जा सकती हैं। लेकिन सार्वजनिक संज्ञान में बोलने के कुछ खतरे होते हैं। मोदी ने ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ के बारे में जो भी कहा, वह आधुनिक भारतीय राज्य सत्ता के तकाजे पूरे नहीं करता।

26 जनवरी 1950 से लागू गणतांत्रिक संवैधानिक व्यवस्था कुछ बुनियादी सिद्धांतों पर आधारित है। इनमें एक है सेक्युलरिज्म। संघ वालों को आपत्ति रही है कि संविधान में इस शब्द का उल्लेख नहीं है। उस तर्क को मानें तो ब्रिटेन में संवैधानिक व्यवस्था ही नहीं होनी चाहिए, क्योंकि उस देश में लिखित संविधान नहीं है। इंदिरा गांधी के शासन काल में जब 42 वें संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना में सोशलिस्ट शब्द का समावेश किया गया, तो सेक्युलरिज्म को भी शामिल किया जा

Apr

16

2014

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मोदी के 'गुजरात मॉडल' से इसलिए डरता है मुसलमान...

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मोदी के 'गुजरात मॉडल' से इसलिए डरता है मुसलमान...

इतना सब होने के बाद भी मुसलमानों की यह चिंता खत्म नहीं हो रही है कि नरेंद्र मोदी पीएम बन जाएंगे, तो देश में उनका मुस्तकबिल क्या होगा? हालांकि बहुत लोग इसे यह कहकर दरगुजर कर देते हैं कि पहले भी तो छह साल भाजपा सरकार रही, उसने मुसलमानों के साथ ऐसा क्या गलत कर दिया, जो मोदी सरकार कर देगी? लेकिन मुसलमानों का बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है, जो मानता है कि वाजपेयी सरकार और मोदी सरकार में जमीन-आसमान का अंतर होगा।

दरअसल, जब नरेंद्र मोदी पूरे देश में ‘गुजरात मॉडल’ लागू करने की बात करते हैं, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि भारत के हर शहर में गोधरा दोहराया जाएगा, या मोदी देश के मुसलमानों को हिंद महासागर में डूबो देंगे। इसका मतलब यह भी नहीं होता कि पूरा देश गुजरात की तर्ज पर तरक्की करेगा। उनका ‘गुजरात मॉडल’ का मतलब होता है कि देशभर के मुसलमानों को उसी तरह दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया जाएगा, जैसा गुजरात में बनाया हुआ है। मुसलमान वहां किस हैसियत में जी रहे हैं, यह इससे पता चलता है कि देश के दो नामी क्रिकेटर भाइयों, इरफान पठान और युसूफ पठान के वालिद बीबीसी से राजनीति पर बात करने से

Apr

16

2014

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संघ, भाजपा और मोदी में सबसे बड़ा कौन?

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संघ, भाजपा और मोदी में सबसे बड़ा कौन?

जिस धूल को हम दूसरों के लिए उछालते हैं,वह एक न एक दिन हवा का सहारा लेकर जब हमारी आंख में पड़ती हमें कितना कष्ट होता है। कुछ इसी तरह का कष्ट मोदी से भाजपा और संघ को हो रहा है। दरअसल,भाजपा में अटल बिहारी के बाद निस्तेज हो चुके लालकृष्ण आडवाणी और उनकी टीम को किनारे करके संघ एक नया नेतृत्व खड़ा करना चाहता था,ताकि एक नए जोश और जुनून के साथ सत्ता तक पहुंचा जा सके। संघ की खोज एक ऐसे व्यक्ति की थी जो उसके इशारे पर काम कर सके। ऐसे में उसकी संघ की पृष्ठभूमि के नेता नजर मोदी पर गई। संघ मोदी को विकास पुरूष के साथ ही हिंदुत्व का चेहरा और उदारवादी विचारक मान बैठा और यहीं वह गलती कर दी,जिसके कारण वह आज अपने आप को असमंजस में पड़ा पा रहा है।

दरअसल, नरेंद्र मोदी कभी न उग्रवादी विचारों के रहे हैं और न हीं उदारवादी विचारों के। वे अवसरवादी विचारधारा के प्रतीक पुरुष हैं। उनकी गिनती सफल कूटनीतिज्ञ के रूप में की जा सकती है। या यूं भी कह सकते हैं कि सत्ता पाने के लिए भाजपा और संघ की नई राजनीति उग्र हिन्दुत्व तथा कूटनीति के नापाक गठबंधन का परिणाम है।

Apr

16

2014

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बैरी क्यों भये बारू?

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बैरी क्यों भये बारू?

मशहूर फिल्मी कलाकार, गायक, संगीतकार ही नहीं अपितु पूर्व राजघरानों के सदस्यों के साथ साथ राज्य सभा सदस्यों, विधायकों और राजनेताओं के पुत्र पुत्रियों, पूर्व सेना अधिकारियों, पुलिस अधिकारियों, प्रशासनिक अधिकारियों, को टिकिट देकर किसी भी तरह से जीत सुनिश्चित करने की व्यवस्थाएं की गयी हैं। अंतर्राष्ट्रीय विज्ञापन एजेंसियों की सेवायें लेना, सोशल मीडिया पर जाली एकाउंटों के द्वारा लोकप्रियता का भ्रम पैदा करना, वीडियो कैमरों की नई तकनीक से भीड़ को अतिरंजित करके दर्शाने और उसे मीडिया घरानों तक पहुँचाने, चुनावी सर्वेक्षणों की निरपेक्षता को प्रभावित करने और विज्ञापनों के समस्त माध्यमों में विज्ञापन की बाढ लाने के उदाहरण सामने हैं। देश को सबसे पुरानी और एतिहसिक पार्टी कांग्रेस से मुक्त करने के नारे से शुरू करके साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने तक के सारे अनैतिक तरीके अपनाये जा रहे हैं।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि श्री मनमोहन सिंह अचानक पैदा हुयी परिस्तिथियों के कारण प्रधानमंत्री बने थे और वे चुनावी प्रबन्धन में निष्णात जननेता कभी नहीं रहे। वे एक अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के अर्थशास्त्री होने के बाद भी नई दिल्ली लोकसभा क्षेत्र जैसे सर्वाधिक शिक्षित मतदाताओं के बीच भी श्री जगमोहन से हार गये थे और उसके बाद असम राज्य से राज्यसभा में चुन कर आते रहे। देश की सभी गैरकांग्रेसी

Apr

15

2014

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मोदी ज्वार पर संघ सवार

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मोदी ज्वार पर संघ सवार

स्वयंसेवकों के लिये टारगेट का नाम बूथ जीतो रखा गया है। इसके तहत कम से कम 395 सीटों पर बीजेपी पूरा जोर लगाएगी। 100 से ज्यादा सीटें ऐसी, जिस पर जीत पक्की। 120-130 सीटें ऐसी, जिन पर थोड़ी मेहनत से ही जीत तो पक्की। यूपी, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड से कम से कम 90 सीटें जीतने का टारगेट। लेकिन पहली बार सवाल सिर्फ पीएम की कुर्सी को लेकर नहीं है बल्कि देशभर में आरएसएस अपने स्वयंसेवकों की संख्या कैसे दुगुनी कर सकती है, नजरें इस पर भी हैं और इसीलिये समूचे संघ परिवार के लिये 2014 का चुनाव उसके अपने विस्तार के लिये इतना महत्वपूर्ण हो चला है और यह मोदी के मिशन 272 पर भी भारी है।

क्योंकि संघ के स्वयंसेवक पहली बार चुनाव में मोदी के लिये वोटरों को घरों से निकालने के नाम पर देश के हर गांव में जा पहुंचे हैं। लोगों से जुड़ाव राजनीतिक तौर पर नरेन्द्र मोदी का नाम लेकर है लेकिन आरएसएस के साथ जुड़कर कौन कैसे कितना सहयोग कर सकता है स्वयंसेवकों का समूचा काम इसी पर जा टिका है। असर इसी का है कि हर सुबह हर गांव में संघ का कैप लगने लगा है। चर्चा वर्तमान राजनीतिक माहौल से होते

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
S Rajen Todariya

S Rajen Todariya

लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय एस राजेन टोडरिया दैनिक भास्कर में बतौर स्थानीय संपादक काम कर चुके हैं। इस वक्त देहरादून से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका जनपक्ष टुडे के प्रधान संपादक हैं।
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

लंबे समय तक मुख्यधारा की पत्रकारिता करने के सतीश सिंह पिछले एक साल से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कर रहे हैं. दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाईम्स के लिए काम किया. वर्तमान समय में दिल्ली में कार्यरत.
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.