Umesh Chaturvedi
मोदी का टाइम
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को खबरों में रहना आता है। हासिल हुए मौकों को अपने पक्ष में मोड़ने और प्रचारित करने ...
दीदी की दादागीरी
ममता बनर्जी केंद्र सरकार और कांग्रेस सरकार को बार-बार परेशान कर रही हैं और उनकी हर बात मानने के लिए मजबूर है। ...
वे रवीन्द्र शाह थे...
1999 की बात है...संसद का मानसून सत्र चल रहा था...अचानक एक दिन दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो के सभी लोगों को निर्देश मिला कि वे आइएनएस बिल्डिंग के दफ्तर की बजाय गोलमार्केट के क्लासिक हाउस वाले दफ्तर में दस बजे मिलें। सूचना ये भी थी कि दैनिक भास्कर के निदेशक गिरीश अग्रवाल सबसे मिलकर कोई जरूरी सूचना देंगे। तब इन पंक्तियों का लेखक भी दिल्ली ब्यूरो में संवाददाता के तौर पर कार्यरत था। नियत वक्त पर दफ्तर में पहुंचे ब्यूरो के संवाददाताओं से गिरीश अग्रवाल ने परिचय दाढ़ी वाली एक शख्सियत से कराया। वे रवींद्र शाह थे... ... Full story
फॉलो मी! ड्यूड
सोशल नेटवर्किंग साइटें सकारात्मक बदलाव की दुनिया में कैसी भूमिका निभा रही हैं, इस पर कायदे से अभी तक अपने देश में शायद ही रिसर्च हुआ हो, लेकिन ब्रिटेन में सोशल साइटों के जरिए आ रहे सकारात्मक बदलाव को लेकर एक अध्ययन कराया गया है, जिसकी रिपोर्ट हाल ही में आई है। यह अध्ययन किसी छोटे-मोटे संस्थान ने नहीं कराया है, बल्कि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने कराया है। इस अध्ययन के मुताबिक सोशल मीडिया ने बीते साल वहां बदलाव की बड़ी भूमिका निभाई है। इस अध्ययन के मुताबिक ब्रिटेन में आम चुनाव के दौरान प्रचार अभियान और राजनीतिक रिपोर्टिंग में सकारात्मक बदलाव लाने में सोशल मीडिया का अहम योगदान रहा। इस अध्ययन रिपोर्ट पर भारत में भी गौर फरमाया जाना चाहिए। वैसे यह यहां के लिए भी काफी मायने रखता है, क्योंकि दिग्गविजय सिंह और शशि थरूर ही नहीं, अब सुषमा स्वराज जैसे राजनेता भी अपनी बात रखने के लिए बड़ी तेजी से टि्वटर का इस्तेमाल कर रहे हैं और और राजनीतिक रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों के लिए खबरों के एक बड़े स्रोत के तौर पर ट्विटर भी उभर कर सामने आया है। ... Full story
पूंजीवाद को क्रिसमस का तोहफा
कुछ ही दिनों बाद पश्चिमी दुनिया का सबसे बड़ा त्यौहार क्रिसमस आने वाला है। क्रिसमस पर तोहफे देने-दिलाने की परंपरा रही है। तो क्या यह मान लिया जाय कि भारत सरकार ने अमेरिका की बड़ी कंपनी वॉलमार्ट, फ्रांस की काफरू, जर्मनी की मेट्रो, ब्रिटेन की टेस्को तथा फ्रांस की स्वार्ज जैसी विशाल कंपनियों के लिए जो भारतीय खुदरा बाजार का दरवाजा खोला है वह मनमोहन सरकार का क्रिसमस तोहफा है। शायद ऐसा ही है लेकिन अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को यह तोहफा देने में 14 साल का लंबा वक्त लग गया। ... Full story
सात अरबवें बच्चे पर सवाल
उलटबांसियों के बीच हम हिंदुस्तानियों को ही रहने की आदत नहीं है, बल्कि विकास और आधुनिकता के वाहक होने का दावा करने वाली पश्चिमी दुनिया भी उलटबांसियों के साथ जीवित रहती है। इन उलटबांसियों के साथ ही वे विकास और नव आधुनिकता का पैमाना तय करते हैं। दुनिया की सात अरब की जनसंख्या को लेकर जिस तरह 31 अक्टूबर को दावे-प्रतिदावे किए गए, वे प्रहसन से ज्यादा कुछ नहीं थे। ... Full story
बहस के लिए बंद होती खिड़कियां
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और टीम अन्ना के सदस्य प्रशांत भूषण की पिटाई राजनीतिक मसला बनती जा रही है। राजनीतिक बयानबाजी के बीच फंसती इस पिटाई ने इससे जुड़े अहम सवाल पीछे छूटते नजर आ रहे हैं…सवाल ये हैं कि क्या किसी सोच को इसी तरह दबाने की कोशिश की जाएगी? लोकतंत्र में आजाद खयाली को क्या इसी तरह बाधित किया जाएगा? निश्चित तौर पर भगत सिंह क्रांति सेना के जिन नौजवानों ने प्रशांत भूषण पर हमला किया, उनका खून गरम है। लेकिन इसका ये भी मतलब नहीं है कि खून की गरमी को इस तरह शांत किया जाय। ... Full story
अन्ना के आंदोलन के विविध आयाम
देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनमानस को खड़ा करने के अलावा अन्ना के आंदोलन ने एक और सीख दी है। उसने बताया है कि अगर साख वाला व्यक्ति किसी को अगुआई करे तो उसके साथ आमतौर पर उच्छृंखल समझी जाने वाली पीढ़ी भी अनुशासन का पाठ पढ़ने लगती है। जिन लोगों ने 1990 में पूरे उत्तर भारत में फैले आरक्षण विरोधी आंदोलन को देखा है, उन्हें पता है कि तब क्रोध और क्षोभ से भरे नौजवानों ने राष्ट्रीय और निजी संपत्ति को कितना नुकसान पहुंचाया था। तब आंदोलनकारी युवाओं की एक ही कोशिश होती थी कि कब मौका मिले और अपना गुस्सा सरकारी संपत्ति पर निकालें। ... Full story
16 अगस्त और शुमाकर
समाजवादी राजनीतिक और छात्र आंदोलन की एक खासियत रही है। उसने अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को पढ़ने के संस्कार दिए। यह बात और है कि आज की राजनीति ऐसे संस्कार देने की कोशिश नहीं करती। बहरहाल समाजवादी छात्र युवजन सभा से जुड़े रहे लोग अब प्रौढ़ हो चुके हैं। उनमें से जो पत्रकारिता या लेखन की दुनिया में सक्रिय हैं, उनकी बात छोड़ भी दें तो जो लोग सचमुच सामाजिक कर्म में मसरूफ हैं, उन्हें अब भी अच्छी किताबों और लेखों की चर्चा करते हुए देखा जा सकता है। अगर ऐसा प्रशिक्षण समाजसेवी क्रांति प्रकाश को नहीं मिला होता तो उनका ध्यान अर्थशास्त्री और स्माल इज ब्यूटीफुल के लेखक ई एफ शुमाकर की जन्म शती की ओर नहीं जाता और छोटे ही स्तर पर सही, उन्हें याद नहीं किया जाता। ... Full story
संत से मत टकराइये सरकार
अन्ना के आंदोलन के साथ सरकार जिस तरह का सलूक कर रही है, उससे साफ है कि कांग्रेस एक बार फिर 37 साल पुरानी रवाययत को ही दोहरा रही है। तब जयप्रकाश के आंदोलन को भी कुछ इसी अंदाज में दबाने की कोशिश हुई थी। जैसा अन्ना के आंदोलन के साथ किया जा रहा है। लेकिन तब कांग्रेस में मोहन धारिया, चंद्रशेखर, रामधन, कृष्णकांत जैसे युवा तुर्क के तौर पर विख्यात समाजवादी भी थे। इनमें से एक चंद्रशेखर ने साहस दिखाकर इंदिरा गांधी को समझाने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था - ' जेपी संत हैं. संत से मत टकराइए। संत से जो सत्ता टकराती है, वह चूर-चूर हो जाती है।' ... Full story
