CURRENT AFFAIRS
May
17
2012
शव के साथ सहवास की बकवास
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मिस्र की महिलाओं ने इस तरह का कानून बनाने जाने विरोध किया है, जो स्वाभाविक भी है। लेकिन किसी उलेमा का कड़ा ऐतराज अभी तक नजरों से नहीं गुजरा है। इतना तय है कि फतवे का इसलाम से कोई लेना-देना नहीं हो सकता। यह जरूर उनकी चाल लगती है, जो किसी भी प्रकार इसलाम को बदनाम करने की साजिश करते रहे हैं। इसलाम में कई फिरके हैं, लेकिन उनमें तमाम तरह के मतभेद होने के बावजूद इसका जबरदस्त विरोध की करेंगे। जिस बात का कुरआन और हदीस में कोई जिक्र नहीं है, उसे सही ठहरकार उसके मुताल्लिक कानून बनाने की बात करना निहायत शर्म की बात है। दुनिया का कोई भी धर्म या संस्कृति इस तरह की कुंठित हरकत को सही नहीं ठहरा सकता। शरीयत के किसी भी मामले में दखअंदाजी पर सख्त ऐतराज जताने वाले दुनियाभर के उलेमा क्यों खामोश हैं, यह समझ नहीं आया है? ऐसा नहीं है कि उलेमा आधुनिक दूर-संचार के साधनों से अनजान हैं। दारुल उलूम देवबंद की वेबसाइट है। फतवा भी ऑन लाइन दिया जाता है। कई पत्रिकाओं में इस बारे में छप चुका है। यह खबर इंटरनेट पर तैर रही है, लेकिन हमारे उलेमाओं की नजर इस पर क्यों नहीं पड़ी?
द सैटेनिक
May
17
2012
राजनीतिक मनमर्जी की निर्मम बनर्जी
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मूलत: कांग्रेसी पृष्ठभूमि की ममता कांग्रेस में विभिन्न पदों पर रहने के बाद सन १९८४ में इंदिरा लहर पर सवार होकर पहली बार ससंद में पहुंची और वो भी दिग्गज सोमनाथ चटर्जी को उनके गढ़ जाधवपुर में शिकस्त देकर। १९८४ का चुनाव अटलबिहारी वाजपेई, हेमवतीनंदन बहुगुणा और सोमनाथ चटर्जी जैसे राजनिति के दिग्गजों की इंदिरा लहर में हार को लेकर चर्चित रहा है। कांग्रेस के तत्कालीन नेता राजीव गाँधी ने बड़ी चतुराई से इन दिग्गजों को उनके घर में ही मात दी थी। ऐसे वातावरण में दिल्ली पहुंची ममता ने शयद उसी जोश और जूनून को अब तक कायम रखा है।
बंगाल कांग्रेस में सिद्दार्थ शंकर राय ,प्रणव मुखर्जी और प्रिय्रंदास मुंशी से ममता की कभी नहीं बनी। अति महत्वाकांक्षी ममता १९९१ में नरसिम्हा राव की सरकार में मंत्री भी रहीं। लेकिन शुरू से ही ममता की छबि एक लड़ाकू नेत्री की बनी जिसकी किसी से भी पटरी नहीं बैठती। कभी अमर सिंह तो कभी रामविलास पासवान किसी ना किसी से ममता का वाद -विवाद बना ही रहा।
अंतत: ममता ने सन ९७ में कांग्रेस से नाता तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। ममता समय के साथ राजनतिक लाभ के लिए किसी का भी साथ ले सकती है और
May
17
2012
सुरक्षा के ताबूत में स्वार्थ की कील
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इस साल की शुरुआत में केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी जिसके तहत नैशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर(एनसीटीसी) की स्थापना होनी थी. मूल योजना के अनुसार यह संगठन १ मार्च २०१२ से अपना काम करना शुरू कर देता. इसके लिए जारी किये गए सरकारी नोटिफिकेशन में बताया गया था एनसीटीसी एक बहुत ही शक्तिशाली पुलिस संगठन के रूप में काम करेगा. ऐसे प्रावधान किये गए थे आतंकवाद के मामलों की जांच एनसीटीसी के अफसर किसी भी राज्य में कर सकेगें. इन अफसरों को संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ्तार करने के अधिकार दिए गए थे. यह तलाशी भी ले सकेगें और इंटेलिजेंस इकठ्ठा करने के अधिकार भी इस संगठन के पास होगा. एनसीटीसी के पास नैशनल सेक्योरिटी गार्ड को भी तलब करने का अधिकार दिये जाने का प्रस्ताव है.
कारगिल में हुए संघर्ष में इंटेलिजेंस की नाकामी के बाद केंद्र सरकार ने एक ग्रुप आफ मिनिस्टर्स का गठन किया था जिसने तय किया कि एक ऐसे संगठन की स्थापना की जानी चाहिए जो आतंरिक और वाह्य सुरक्षा के मामलों की पूरी तरह से ज़िम्मेदारी ले सके.मंत्रियों के ग्रुप ने कहा था कि एक स्थायी संयुक्त टास्क फ़ोर्स बनायी जानी चाहिए जिसके पास एक ऐसा संगठन भी
May
16
2012
मध्य प्रदेश में माफिया राज
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अवैध कारोबार पर नकेल कसने की कोशिश में सरकार के कारिंदे कहीं बँधक बनाये जा रहे हैं , कहीं सरेआम रौंदे जा रहे हैं या फ़िर बदमाशों के गोली, लाठी,डंडे खाने को मजबूर हैं। सत्ता का गुरुर अब मगरुरी में तब्दील होता जा रहा है। जो अधिकारी अपना ईमान और ज़मीर बेचने को राज़ी नहीं है, वो सत्ताधारी दल के लोगों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। उन्हें झूठे आरोपों में फ़ँसाकर निलंबन या बार-बार तबादले की सज़ा दी जा रही है।
यह हमारे लोकतंत्र की विडंबना है कि जब एक जाँबाज युवा पुलिस अधिकारी मुरैना में खनन माफियाओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने लहू की अंतिम बूँद भी धरती पर बहा रहा था... तब हमारे प्रदेश के मुखिया होली के रंगों में सराबोर हो रहे थे । जब उस युवा पुलिस अधिकारी की पत्नी अपनी कोख में साढ़े आठ माह के शिशु को लेकर अपने सुहाग को मुखाग्नि दे रही थी... फाग गाते, ढोल मँजीरे बजाते हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री की तस्वीरें अखबारों और चैनलों में छाई थीं।
एक ऐसी हत्या, जिसकी चर्चा केवल प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश में हो रही हो, उस घटना पर सूबे के मुख्यमंत्री का बयान
May
16
2012
कोयले के लूट की काली कहानी
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झारखण्ड में कोयले की लूट
झारखण्ड निर्माण के बाद रां को अपनी सरकारों से बड़ी उम्मीद बनी थी कि लोग सुरक्षित होंगे और विकास की नई परिभाषा गढ़ी जाएगी। परन्तु विकास के लिए सरकारों ने केन्द्र सरकार के साथ मिलकर राज्य के खजानों को देशी-विदेशी कम्पनियों को लूटने की छूट देकर झारखण्डी जनता का अपमान किया है। जैसा कि आप जानते हैं, झारखण्ड प्रदेश में कोयले का कुल भण्डार 78935.475 मिलियन टन है जो भारत के राज्यों में प्रथम स्थान रखता है, जिसका बाजार मूल्य 235 लाख 80 हजार 794 करोड़ रुपया है। इस भण्डार में से 9994.475 मिलियन टन कोयले का भण्डार 67 कोयला ब्लॉकों में आवंटित किया गया है। इनमें से 22 ब्लॉक सरकारी एवं 45 ब्लॉक निजी कम्पनियों का आवंटित किए गए हैं। ये भण्डार स्पंज, आयरन, ऊर्जा, पिग आयरन, स्टील तथा व्यवसायिक उपयोग के लिए कैप्टिव कोयला ब्लॉक के रूप में आवंटित किए गए हैं। झारखण्ड बनने के बाद जो कोयला ब्लॉक आवंटित किए गए, उसकी मात्रा 9709.475 मिलियन टन है। इस आवंटित कोयले का वर्तमान बाजार भाव से मूल्य 29 लाख 12 हजार 842.50 करोड़ रुपया है। ये ब्लॉक 30 वर्षों के लिए आवंटित किए गए हैं, अर्थात वर्तमान दर से प्रतिवर्ष 97094.75 करोड़
May
16
2012
भ्रष्ट राजा और बेशर्म प्रजा
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हालांकि अदालत ने राजा को सशर्त जमानत दी है किन्तु सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब २जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ी जांच का क्या होगा? क्या अब जांच की निष्पक्ष उम्मीद की जानी चाहिए? क्या राजा अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मुद्दे को कमजोर नहीं करेंगे? क्या जमानत मिल जाने से राजा पर लगे तमाम दाग स्वतः धुल जायेंगे?
कैग रिपोर्ट के अनुसार, राजा के कार्यकाल में हुए २जी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकारी खजाने को १.७५ लाख करोड़ रुपये का चूना लगा था, क्या जनता का वह धन जो विकास कार्यों में खर्च होना था, राजा के तिहाड़ से बाहर आने से उसकी भरपाई होगी? और भी न जाने कितने सवाल हैं जो अब तक अनुत्तरीय हैं| राजा के तिहाड़ से बाहर आने के सवाल पर मनमोहन सिंह अपने चिर-परिचित अंदाज में चुप्पी साध गए तो तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता का मानना है कि अब २जी स्पेक्ट्रम घोटाले को कमजोर करने के प्रयास
ोंगे। वहीं स्वामी ने राजा की जान को खतरा बताते हुए उनकी सुरक्षा की मांग की है। कुल मिलाकर अब इस मामले का लगभग पटाक्षेप हो चुका है बस पर्दा गिरना बाकी है। और जनता तो वैसे भी ३जी-४जी के जमाने में २जी को
बात करामात
- लोकतंत्र का लोप
- कार्टून पर न जाओ, कार्टून बन जाओगे
- आंसूओं के बाजार में आमिर खान का दरबार
- हमारे हॉलीवुड की हेट स्टोरी
- भाजपा का सांस्कृतिक बंगारूवाद
- अभिसेक्स मनु सिंघवी, सीडी और सियासत
- बसु का बयान और सरकार का निकम्मापन
- राहुल गांधी के नये गॉडफादर होंगे अहमद पटेल
- नैय्या पार लगाएंगे नरेन्द्र मोदी
- राहुल, पिछड़ा परिवार और सपा का उम्मीदवार
बियाबान में शोर
- सियासत का गुनाह और बेगुनाहों की सियासत
- भेड़ियों की भीड़ में मेमनों सी मिमियाहटें
- जंगल में अमंगल
- दमन का दण्डकारण्य
- सिनेमा के सौवें साल में कुछ भूले बिसरे सवाल
- वे कहां खो गये जो कलेक्टर नहीं थे
- सदन की गरिमा न गिराओ सचिन
- संसद को नकारा न बनाओ सचिन !
- सेना में साजिश के असली सूत्रधार
- खूनी खरबपतियों के नाक पर नकेल
परत दर परत
- विश्वव्यापी वंशवाद
- ओसामा बिन आतंक का अगला निशाना
- संगीनों के साये में जिन्दगी का साया
- विडंबनाओं और विरोधाभासों की पुनरावृत्ति
- भ्रष्टाचार का नेशनल हाईवे
- बजट में उपेक्षित ग्रामीण भारत
- मुलायम का राज कांशीराम का काज
- राजीव गांधी से राहुल गांधी तक कांग्रेस के तीन दशक
- न रामदेव की कांव कांव, न अन्ना हजारे का दांव
- हार के कांग्रेसी शिल्पकार
जंतर मंतर
- झीनी झीनी फटी चदरिया
- अन्ना के अनशन का आठवां आयाम
- खबर नरक से नहीं बुंदेलखण्ड से है
- अन्ना फिर उतरो मैदान में
- अनशन के साथ ही टूट गया विश्वास
- अनशन की छीनाझपटी में अन्ना निकले आगे
- प्रहसन का पीड़ादायी पटाक्षेप
- आयोजित अनशन से प्रायोजित प्रहसन तक
- जेपी लूट रहा है जमीन
- डासना, कासना, टप्पल से अल्फा, गामा, बीटा की ओर
पहरेदार
- अर्थमेव जयते!
- जेल से फरार हो गया जेलर
- आखिर वह कैबिनेट मंत्री कौन है जिसने एक्सप्रेस में खबर प्लांट करवायी?
- दागदारों के निशाने पर बेदाग जनरल
- गुजरात के मोदियुरप्पा
- किंग की कर्जखोरी का किंगफिशर काण्ड
- कानपुर की कोचिंग मंडी
- सुशासन बाबू का शत प्रतिशत झूठ
- दुश्मन के दर पर मुसलमानों का मसीहा
- अकाल मौत के गाल में समा गये 500 नौनिहाल
कॉरपोरेट मी़डिया
- मुकेश अंबानी के ताल पर मीडिया का नंगा नाच
- आप ही बताएं कि इन्हें नेशनल न्यूज चैनल क्यों कहा जाए?
- कांग्रेस का पिट्ठू है काटजू...जय हिन्द!
- मार्कण्डेय 'लाल' के हसीन सपने
- टीवी का ट्वीट ट्वीट
- नकारा निर्मल बाबा का जयकारा
- न्यूजरूम में नहीं है दलित बसेरा
- शेखर गुप्ता पर मैं सवाल उठाता हूं कि...
- निर्मल बाबा का मीडिया मर्दन
- राजेन्द्र माथुर के न होने के बाद
