अन्ना हजारे

Mar

28

2012

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सौ मन की संसद और टके भर की टीम अन्ना

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जिन शरद यादव को कल अन्ना हजारे ने अपने मंच पर बैठाया था, बाद में उन्हीं की आलोचना बताता है कि टीम अन्ना अपरिपक्व और अराजक है जिन शरद यादव को कल अन्ना हजारे ने अपने मंच पर बैठाया था, बाद में उन्हीं की आलोचना बताता है कि टीम अन्ना अपरिपक्व और अराजक है

इसमें शक नहीं कि पिछले दो-तीन दषक में हमारे राजनेताओं की प्रामाणिकता और प्रतिष्ठा घटी है लेकिन उन्हें ‘चोर, बलात्कारी, अपराधी’ आदि कह देना और सभी को एक ही डंडे से हांक देना आखिर किस बात का सबूत है? क्या इसका नहीं कि इस आंदोलन को चलानेवाले लोग गहरी हताशा से ग्रस्त हो गए है? उन्हें पता चल गया है कि जिसे वे आंदोलन समझ रहे थे, वह आंदोलन था ही नहीं, वह सीधा-सरल जन-आक्रोश था। भ्रष्टाचार के विरूद्ध जो हांडी साल भर से खदाबदा रही थी, वह रामलीला मैदान पर अचानक फूट पड़ी। लोकपाल के नाम पर जब इसी हांडी को मुंबई के चूल्हे पर दुबारा चढ़ाया गया तो वह काठ की हांडी सिद्ध हुई। अब फिर जंतर-मंतर पर भीड़ जमा करने के लिए नया टोटका लाना पड़ा। ‘व्हिसिल-ब्लोअर्स’ के परिजन को जमा करना पड़ा।

क्या यह टोटकेबाजी किसी गंभीर आंदोलन का आधार बन सकती है? आप कितने टोटके लाएँगे और कब तक लाते रहेंगे? यदि संसद ने लोकपाल बिल पास कर दिया तो फिर आपके पास करने के लिए क्या रह जाएगा? कुछ भी नहीं। कुछ भी नहीं का डर सबसे बड़ा डर है। यही डर अनाप-शनाप बुलवा रहा है। आप जिस डाल पर बैठे हैं, उस पर

Dec

28

2011

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गद्दार कांग्रेस ने हमारे साथ धोखा किया- अन्ना हजारे

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गद्दार कांग्रेस ने हमारे साथ धोखा किया- अन्ना हजारे

इसी के साथ अन्ना हजारे ने मुंबई में अपने अनशन को समाप्त करने की घोषणा कर दी. अनशन को समाप्त करते हुए उन्होंने कहा कि अब जेल भरो आंदोलन भी नहीं होगा. अन्ना हजारे ने कहा कि कांग्रेस ने जिस तरह से हमारे साथ धोखा किया है उसका जवाब देने के लिेए हम उन पांच राज्यों में जाएंगे जहां चुनाव होनेवाले हैं. कांग्रेस को गद्दार कहते हुए अन्ना हजारे ने कहा कि हम गद्दारों को सबक सिखाएंगे. असहज परिस्थितियों में अनशन को समाप्त करते हुए अन्ना हजारे ने यह जरूर कहा कि आगामी 31 दिसंबर और 1 जनवरी को दिल्ली में दो दिन का अनशन करेंगे.

अन्ना हजारे ने जिन परिस्थितियों में मुंबई के अनशन को आधे पर ही समाप्त कर दिया उसके लिए वहां रहा खालीपन भी जिम्मेदार है. अन्ना के मुंबई अनशन में लोग नहीं आये. इसके कई कारण बताये जा रहे हैं. एक बड़ा कारण यह है कि शहरी मध्यवर्ग इन दिनों शीतकालीन छुट्टियां मनाने में व्यस्त है इसलिए भी अन्ना के अनशन तक लोग नहीं पहुंच पाये. एक और बड़ा कारण जगह का चुनाव है. एमएमआरडीए के जिस मैदान में अन्ना हजारे को जगह दी गई वहां बिना निजी साधन के पहुंचना मुश्किल काम था इसलिए

Dec

11

2011

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अन्ना के अनशन का आठवां आयाम

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11 दिसंबर को दिल्ली के जंतर मंतर पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे 11 दिसंबर को दिल्ली के जंतर मंतर पर बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे

जार्ज पंचम ने आज से सौ साल पहले दिल्ली के एक छोर पर दरबार लगाया था. वह भी 11 दिसंबर ही था और यह भी 11 दिसंबर ही है जब अन्ना का दरबार लगा है. सौ साल तो नहीं लगे लेकिन बीते एक साल में इस जंतर मंतर ने एक अदद अन्ना हजारे को आंधी और दूसरा गांधी जरूर बना दिया है. पिछले साल नवंबर दिसंबर में यही अन्ना हजारे यहां आये थे तो उनके इर्द गिर्द कुल जमा दो पांच सौ लोग थे. लेकिन आज साल भर बाद न केवल जंतर मंतर अन्ना हजारे के जलवे देख रहा है बल्कि राजनीति भी लुटियन्स जोन से निकलकर जंतर मंतर पर दस्तक दे रही है. अप्रैल के अनशन में जिन अन्ना हजारे के समर्थकों ने नेताओं को अनशन स्थल पर आने से मना कर दिया था, और जो आ गये थे उन्हें अपमानित करके भगा दिया था, आज वही अनशनकारी उन्हीं नेताओं के भाषण सुन रहे हैं.

सुना हुआ भाषण पूरा हजम नहीं हो रहा है इसलिए अगली पंक्तियों में बैठे लोग बीच बीच में मनमाफिक बात न होने पर विरोध में हाथ भी लहरा रहे हैं लेकिन ऊधर मंच से नेताओं का भाषण जारी रहता है. इधर विरोध के हाथ

Nov

09

2011

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अण्णा की अनशनलीला का असमय अंत

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अण्णा की अनशनलीला का असमय अंत

सोशल नेटवर्किंग मीडिया के उस वर्ग ने अण्णा के आंदोलन में जितना बखूबी सदुपयोग किया गया उससे भी अण्णा लीला और जास्मिन क्रांति का साम्य दिखाना स्वाभाविक था। जिस रिकी पटेल ने इजिप्त, जॉड्रन और ट्यूनीशिया में सोशल मीडिया का उपयोग किया था वही रिकी पटेल अण्णा हजारे की अनशनलीला में भी योगदान कर रहा था। ऐसे में तहरीर चौक और जास्मिन क्रांति से अण्णा की अनशनलीला की तुलना सहज स्वाभाविक घटना थी।

केजरीवाल का बड़बोलापन
जंतर-मंतर और रामलीला मैदान की अण्णा की अनशनलीला के बीच इस देश की खोजी मीडिया ने टीम अण्णा के जनलोकपाल विधेयक प्रारूप समिति के सदस्य द्वय प्रशांत-शांति भूषण के दो भूखंड घपलों और एक जनहित याचिका मैनेज करने के संवाद की ऑडियो सीडी सार्वजनिक की। इस विवाद ने टीम अण्णा पर पहला छींटा उछाला। स्वाभाविक अंदाज में अण्णा हजारे और उनकी टीम ने इन आरोपों को सरकारी षड्यंत्र करार देकर खुद के पाकसाफ होने का स्वयं निर्णय सुना दिया। रामलीला मैदान के 12 दिवसीय अनशन पर भारत की विधायिका के सर्वोच्च मंच संसद में चर्चा हुई। इस चर्चा के दौरान शरद यादव, लालू

व, रामगोपाल यादव समेत विपक्ष के अधिकांश वक्ताओं ने जिस अंदाज में टीम अण्णा के वादों-इरादों पर शक जाहिर

Sep

05

2011

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कमीशन की कमाई पर लोकतंत्र से लड़ाई

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कमीशन की कमाई पर लोकतंत्र से लड़ाई

यह तो हुई अधिकारिक रूप से विदेशी सहायता की बात। पता नहीं, कहां कहां से कितना क्या क्या अनधिकृत रूप से मिला भी या नहीं मिला, यह अपन नहीं जानते। मगर इतना जरूर जानते हैं कि हमारे देश की बहुत सारी सच में सामाजिक काम करनेवाली संस्थाओं को भी अपने ही देश में सहायता जुटाने में हजार किस्म की तकलीफें आती हैं। पर, ये दोनों पट्ठे ठेट अमरीका से भी इतना सारा माल निकाल ले आते हैं, यह अपने आप में बहुत बड़ी बात आपको भी जरूर लगती होगी। मामला आईने की तरह साफ है कि इन दोनों को वे सारे रास्ते पता है कि कहां से घुसकर क्या क्या करके कितना माल बटोरा जा सकता है।

पौने चार लाख डॉलर कोई छोटी रकम नहीं होती। हमारे देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिनको अगर आप एक करोड़ का आंकड़ा लिखने को कहेंगे, तो उनको बहुत दिक्कत आएंगी। लिखने के पहले कई कई बार उंगलियों के पोर पर इकाई दहाई सैकड़ा हजार की गिनती करेंगे। फिर कहीं जाकर लिख पाएंगे। और इस सवाल का जवाब तो आप और हम भी एक झटके में शायद ही दे पाएं कि एक करोड़ में कितने शून्य लगते हैं। इससे भी आगे जाकर

Sep

01

2011

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जेपी से बड़ा अन्ना का आंदोलन

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जेपी से बड़ा अन्ना का आंदोलन

भागीरथ ने गंगा अवतरण के लिये तप किया। गंगा का अवतरण शंकर की जटाओं तक हुआ और वहॉं से गंगा साकार होकर पृथ्वी तक आई। इस लोकतंत्र के लिये गांधी के नेतृत्व में भारत की जनता ने लम्बा संघर्ष किया। सन् सैंतालीस में लोकतंत्र रूपी गंगा विदेशी गुलामी से मुक्त हुई तथा भारतीय संविधान तक आई। किन्तु हमारे लोकतांत्रिक शंकर की नीयत खराब हो गई। उन्होंने संविधान को अपने स्तर तक समेट कर रोक लिया। संसद ने लोक तंत्र की परिभाषा ही बदल दी। उसे कभी लोक नियंत्रित तंत्र बनने ही नहीं दिया। वह तो लोक नियुक्त पर आकर रूक गई। हमारी वर्तमान संसदीय प्रणाली ने संवैधानिक प्रणाली का दो तरफा दुरूपयोग किया। उसने अपने एक हाथ में तो संविधान को इस प्रकार रखा कि वह उसके लिये ढाल की तरह बचाव करता रहे तो दूसरी तरफ वह दूसरे हाथ की मुठी में इस प्रकार बंद रहे कि वह संसद की मर्जी के बिना हिल डुल भी न सके। अब भागीरथ रूपी अन्ना ने शंकर रूपी संसद के हाथों संविधान रूपी गंगा को मुक्त कराने का अभियान प्रारंभ किया है।

इसके पूर्व भी इस अभियान के नाम पर कई प्रयास हुए। पहला प्रयास जय प्रकाश जी का हुआ जो

Aug

30

2011

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अन्ना के अनशन से चैनलों की चांदी

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अन्ना के अनशन से चैनलों की चांदी

अन्ना हजारे के अनशन की आंधी में करीब एक पखवाड़े तक न्यूज चैनलों का प्राइम टाइम अन्ना टाइम हो गया था. मीडिया पर अध्ययन करनेवाली एक शोध संस्था सीएमएस मीडिया लैब का कहना है कि 16 अगस्त से 28 अगस्त के दौरान किये गये उसके अध्ययन में यह नतीजा सामने आया है कि मोटी कमाई का ही कमाल था कि इन तेरह दिनों के दौरान न्यूज चैनलों का प्राइम टाइम अन्ना टाइम हो गया था.

इस दौरान सीएमएस मीडिया लैब ने हिन्दी के दो और अंग्रेजी के दो चैनलों को मानीटर किया. इसमें हिन्दी के दो स्टार न्यूज और आज तक तथा अंग्रेजी के दो चैनल एनडीटीवी24x7 और सीएनएन-आईबीएन शामिल हैं. यह शोध टीवी के शाम 7 बजे से 11 बजे के बीच का प्रसारण से जुड़ा है जिसे न्यूज इंडस्ट्री में प्राइम टाइम कहा जाता है. समाचार चैनलों ने संयुक्त रूप से 8047 मिनट (91.1%) समय अन्ना के अनशन को दिया. समय खर्च करने के मामले में हिन्दी न्यूज चैनल अंग्रेजी न्यूज चैनलों से आगे रहे और उन्होंने अन्ना के अनशन को कवर करने केल िलए 10 प्रतिशत अधिक समय खर्च किया.

दी न्यूज चैनलों ने अपने प्राइम टाइम का 97% अन्ना हजारे के अनशन पर खर्च किया जबकि

Aug

30

2011

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अन्ना की अनशन लीला

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अन्ना की अनशन लीला

भ्रष्टाचार पर अण्णा की दोहरी नीति
विलासराव देशमुख ‘आदर्श’ समेत्टाचार के मामलों में आरोपित है। पिछली बार जब अण्णा हजारे जंतर-मंतर पर अनशन करने गए थे तो भ्रष्टाचार के मामलों के मंत्रिमंडलीय समूह में केंद्रीय मंत्री शरद पवार की सदस्यता पर उन्हें आपत्ति हो गई थी। शरद पवार ने अण्णा की आपत्ति पर मंत्रिमंडलीय समूह से इस्तीफा दे दिया था। जिन अण्णा हजारे को शरद पवार के नाम पर आपत्ति थी, उन्हें विलासराव पर आपत्ति क्यों नहीं हुई? हर मुद्दे पर छिद्रान्वेषण करने वाली मीडिया ने भी भ्रष्टाचार विरोधी अनशन की मध्यस्थता में विलासराव की भूमिका पर आपत्ति क्यों नहीं जताई? टीम अण्णा ने सरकार से वार्ता के लिए दिल्ली के जिस नेता का चयन किया वह भी आश्चर्यजनक है। संदीप दीक्षित दिल्ली के सांसद और वहां की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र हैं। राष्ट्रमंडल खेलों के घपले में सरकार नियुक्त शुंगलू समिति और महालेखा नियंत्रक (सीएजी) की रिपोर्ट में दीक्षित परिवार की घपलेबाजी का पर्दाफाश किया गया है। अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी ने दिल्ली के सत्ता प्रतिष्ठान के एक पहुंचे हुए कलाकार पवन खेड़ा के माध्यम से संदीप दीक्षित की मध्यस्थता स्वीकारी। राष्ट्रमंडल खेलों की अनियमितताओं में संदीप दीक्षित का नाम उछलता रहा है। किरण बेदी-अरविंद केजरीवाल

Aug

27

2011

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जीत में छिपा जख्म

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जीत में छिपा जख्म

सत्ता की कुटिलताएँ आवाम के जज्बातों को ही नहीं उसके संघर्षों को भी रोंद कर अपने किले बचाती है, लेकिन आजाद भारत की यह सबसे बड़ी जन-क्रांति उनने नहीं रौंदी जो हृदयहीन, श्रवण-बाधित तंत्र के एकछत्र सौदागर हैं, इस क्रान्ति को कुचलने में उनकी भी भूमिका निर्णायक रही जो बीसवीं सदी के प्रारंभ में जन्मे और इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ तक के अपने तकरीबन सौ साला सफर में राष्ट्र निर्माण, जनवाद, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, धर्म क्रांति, जन-क्रांति जैसे मनमोहक नारों से आम-आवाम की खोपड़ी में ही नहीं दिलों पर भी राज करते रहे और लोकतंत्र लुटता रहा। अपनी जिद, अपनी जड़ता और अपने अहं ब्रह्मास्मि के अहंकार में डूबे भारत के दो सबसे बड़े (शायद कुल दो) विचार धारात्मक संगठनों ने इस क्रांति को कुचलने में जिस अद्भुत एकता और समन्वय का परिचय दिया वो सिविल सोसायटी के एम.बी.ए. छाप प्रबंधन पर बहुत भारी पड़ा, उस पर भी दांतों तले उंगली दबा लेने वाला आश्चर्य कि ये ‘जनद्रोही’ की भूमिका से न सिर्फ बचे रहे और जनक्रांति की तोपों को सहारा देकर उनका मुंह ‘दस जनपथ’ और ‘नार्थ ब्लाक’ की ओर करते रहे।

होता भी क्यँू नहीं, अगर ‘जन लोकपाल बिल’ केवल सदन में प्रस्तुत भी कर दिया जाता तो

Aug

27

2011

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बदल दीजिये और बदल जाइये

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बदल दीजिये और बदल जाइये

आज वही दौर है जब सारे तर्क कुतर्क सरीखे लगते हैं और मैं हूं अन्ना का नारा ज्यादा विश्वसनीय. विद्वजनों की नजर में यह सब तमाशा है और लोग तमाशाई. अपने सपनों की दुनिया का सपना देखने और उसके पक्ष में शब्दों की लङियां सजाने वाले इन लोगों ने अब जनता को भी खारिज कर दिया है. जैसे इनकी जनता भी किसी स्वर्ग से ही उतरेगी.

जन लोकपाल तो बहाना है
सीधी सच्ची बात है कि अब देश बदलना चाह रहा है. सत्ता पक्ष के व्यवहार से वह आजिज हो चुका है. यहां सत्ता पक्ष का अर्थ कांग्रेस या यूपीए नहीं है, सांसद, विधायक, अफसर, किरानी से लेकर उनके गांव का मुखिया-सरपंच भी, जिसके हाथ में जनता की निधि खर्च करने का पावर है. थानेदार और जज भी जिनके एक फैसले से लोगों की जिंदगियां बदल जाती है. इन सबसे मिलकर बनी सत्ता बेलगाम हो चुकी है. उन्हें लगता है कि वे जो चाहेंगे वही कर डालेंगे. उनके लिए देश की

ोरी अपने एटीएम की तरह है और आम लोग शतरंज के मोहरे. पिछले कुछ सालों से ऐसा माहौल बना है कि अगर आपके बटुए में पैसा है तो सिस्टम आपके पैरों की जूती है. एक भ्रष्ट नेता को सजा
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