आदमीनामा

May

10

2012

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कॉमरेड कैफ़ी आजमी

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कॉमरेड कैफ़ी आजमी

कैफ़ी आज़मी को गए १० साल हो गए. अवाम के शायर कैफ़ी इस बीच बहुत याद आये लेकिन किसी से कह भी नहीं सकते कि मुझे कैफ़ी की याद आती है. मैं अपने आपको उस वर्ग का आदमी मानता हूँ जिसने कैफ़ी को करीब से कभी नहीं देखा. लेकिन हमारी पीढी की एक बड़ी जमात के लिए कैफ़ी प्रेरणा का स्रोत थे. एक सामंती सोच वाले लेकिन गरीब परिवार से आये व्यक्ति को कैफी की जिस नज़्म ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया था वह उनकी मशहूर नज़्म 'औरत'  है. छात्र जीवन में उसे मैंने बार बार पढ़ा. मैं बयान नहीं कर सकता कि औरत को कुछ भी न समझने वालों के गाँव का होते हुए मैंने किस तरह से अपनी ही माँ और बहनों को किस तरह से बिलकुल अलग किस्म के इंसान के रूप में देखना शुरू कर दिया था.

बाद में जब मैं दिल्ली में आकर रहने लगा तो इस नज़्म को पढ़ते हुए मुझे अपनी दोनों बेटियाँ याद आती थीं. मैं गरीबी में बीत रहे उनके बचपन को इस नज़्म के टुकड़ों से बुलंदी देने की कोशिश करता था. हालांकि यह नज़्म मैंने कभी भी पूरी पढ़ कर नहीं सुनायी लेकिन इसके टुकड़ों को हिन्दी या अंग्रेज़ी

Apr

26

2012

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गीत फरोश मन्ना

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गीत फरोश मन्ना

पिता के मरते ही उसके बेटे बेटी उनकी याद में कोई स्मारिका छाप बैठें, खुद लेख लिखें, दूसरों से लिखाते फिरें, उनकी स्मृति, योगदान में स्थाई रूप से देने हेतु उनके नाम से कोई संस्था, संगठन खड़ा कर दें, यह सब बिल्कुल जरूरी नहीं होता है. उनकी मृत्यु के बाद हमने इस बात को पूरी तरह निभाया. न खुद कुछ लिखा, न लिखवाया. दूसरा कारण, उनकी एक कविता थी- कलम अपनी साध, और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध.' तो मन की बात ठीक एकाध कभी नहीं सूझी. सूझी भी तो मन्ना की शर्त- तेरी भर न हो - लागू करने के बाद कभी कुछ ऐसा बचता नहीं था लिखने लायक.

हम सब उन्हें मन्ना कहते थें. भाषा को बिगाड़ने का पाप जिन संबोधनों से लगता हो, वैसे संबोधन पिता के लिए तब प्रचलित नहीं हुए थे. लेकिन तब के नाम - बाबूजी, पिताजी, बाबा आदि से भी हम और वे बच गये थे. खूब बड़े भरे-पुरे परिवार में मंझले भाई थे. पिताजी के बड़े भाई उन्हें प्यार से सिर्फ मंझले कहते थे और फिर दादा दादी से लेकर सभी छोटे बहन, भाई यानी हमारे चाचा, बुआ आदि भी उन्हें आदर से मंझले भैया ही कहने लगे थे. मुझसे

Apr

22

2012

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पत्रकारिता के पितामह हमारे पांडे जी

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पत्रकारिता के पितामह हमारे पांडे जी

रज्जो बाबू के बारे में कहा जाता है कि राष्ट्रीय होने निकली हिन्दी की अखबारी पत्रकारिता के लिए अगर कोई आदिपुरुष है तो वह रज्जो बाबू ही हैं. रज्जो बाबू हों या फिर प्रभाष जोशी ये दोनों ही राहुल बारपुते की पैदाइश थे. नई दुनिया में रहते हुए राहुल बारपुते ने जो रत्न हिन्दी पत्रकारिता को दिये उसमें रज्जो बाबू और प्रभाष जोशी का नाम सर्वोपरि है. सर्वोपरि इसलिए क्योंकि इंदौर से यही दो पत्रकार दिल्ली दरबार आये और एक ने नवभारत टाइम्स को राष्ट्रीय अखबार बनाया तो दूसरे ने एक्सप्रेस समूह में शामिल होकर जनसत्ता का प्रकाशन शुरू किया. नवभारत टाइम्स तब अब जैसा बिल्कुल नहीं था और इसी अखबार ने सबसे पहले देश को यह अहसास कराया कि कोई राष्ट्रीय अखबार भी होना चाहिए. संभवत: रज्जो बाबू की धारदार लेखनी ने लोगों की धारणा बदल दी. और कोई चार दशक के अंदर आज हमारे पास दहाई की संख्या में हिन्दी के भीमकाय राष्ट्रीय अखबार हैं.

तना घना तो वटवृक्ष बना. शाखाएं फूंटी तो अंग्रेजीवालों की आंखें फूटी. राहुल बारपुते ने इंदौर से जो रत्न निर्मित किये उन रत्नों ने अपनी अपनी क्षमता अनुसार रत्नों की लड़ियां लगा दीं. अस्सी और नब्बे के दशक में जब हिन्दी पत्रकारिता राष्ट्रीय

Apr

05

2012

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अहिंसक क्रांति की यमनी अग्रदूत

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अहिंसक क्रांति की यमनी अग्रदूत

चाय के प्याले में तूफान खड़ा कर यमन के भ्रष्टाचारी और दमनकारी सत्ताधारियों से उनके पद से उखाड़ फेंकने का काम इस 33 साल की युवती, जिसे यमन की जनता ‘क्रांति की जननी‘ कहते हैं, ने किया है। तवाकुल ने कभी महात्मा गांधी को देखा तो नहीं, लेकिन सही मायने में उन्होंने महात्मा को समझा है। बंदूक का जवाब फूलों से दे कर उसने यमन की धरती पर ‘जास्मीन आंदोलन‘ को जन्म दिया, जो महात्मा गांधी के अहिंसा के मार्ग पर चला और तवाकुल ने यमन को दमनकारियों से चंगुल से मुक्ति दिलाई।

एक खास बातचीत के दैरान तवाकुल ने भारत में पहली बार आने पर कहा ‘मैं अपने पिता के देश में पहली बार आई हू‘। भारत मेरे पिता की भूमि है, क्योंकि मोहनदास करमचंद गांधी जिसे पूरा भारत पिता कहता है, वह हमारे यमन के भी राष्ट्रपिता हैं। हमने यमन में जो भी हासिल किया है, वह बापू के अहिंसा के मार्ग पर चलकर ही पाया है। हाल ही में यमन पर अमेरिकियों द्वारा किए गए ड्रोन हमले में कई लोग मारे गए। क्या अमेरिकियों का यमन पर बम बरसाना सही है? यह पूछने पर तवाकुल ने कहा कि मैं इस बात को मानती हूं कि बमों

Apr

05

2012

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दलित देव बाबू जगजीवन राम

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दलित देव बाबू जगजीवन राम

आज़ादी के बाद जब पहली सरकार बनी तो वे उसमें कैबिनेट मंत्री के रूप में शामिल हुए और जब तानाशाही का विरोध करने का अवसर आया तो लोकशाही की स्थापना की लड़ाई में शामिल हो गए. सब जानते हैं कि 6 फरवरी 1977 के दिन केंद्रीय मंत्रिमंडल से दिया गया उनका इस्तीफ़ा ही वह ताक़त थी जिसने इमरजेंसी के राज को ख़त्म किया. उसके बाद उन्हें इस देश ने प्रधानमंत्री नहीं बनाया क्योंकि वे दलित थे. हालांकि उनको ही प्रधानमंत्री होना चाहिए था. केंद्र में वे जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडलों में रहे. कृषि और खाद्य मंत्री के रूप में उन्होंने देश की खाद्य समस्या का ऐसा हल निकाला कि आज तक अनाज के लिए हमें किसी मुल्क के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ा. बंगलादेश की स्थापना के समय वे रक्षा मंत्री थे. सेना को जो नेतृत्व उन्होंने दिया वह अपने आप में एक मिसाल है. उन दिनों एक बहुत ही गैर ज़िम्मेदार आदमी अमरीका का राष्ट्रपति था, उसने भारत को धमकाने के लिए हिंद महासागर में अमरीकी सेना का परमाणु हथियारों से लैस विमानवाहक पोत, 'इंटरप्राइज़' भेज दिया था. बाबू जगजीवन राम ने ऐलान कर दिया कि अगर 'इंटरप्राइज़'  बंगाल की खाड़ी में ज़रा सा भी आगे

Mar

13

2012

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ये जो अपने मुरलीधर राव हैं

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ये जो अपने मुरलीधर राव हैं

गोविन्दाचार्य अपना क्या बचाने की कोशिश कर रहे हैं? शायद वही पुराना ज्ञान जो उनकी राजनीतिक शक्ति बन गया था. सोशल इंजिनियरिंग. इस शब्द का चमत्कारिक इस्तेमाल गोविन्दाचार्य ने ही करना शुरू किया था और अपने छत्रप काल में उत्तर प्रदेश और बिहार में इसका इस्तेमाल भी किया था. गोविन्दाचार्य का गुणा गणित वाला दिमाग तो अभी भी बचा हुआ है लेकिन स्रोताजन (पत्रकार) अब उधर जाना बंद कर चुके हैं. स्रोताजनों को गोविन्दाचार्य से गाय बैल की कहानी सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं है. इसलिए उत्तर प्रदेश के चुनावों के बाद जब उन्होने जंतर मंतर पर तीन दिन का धरना धर दिया तो पुच्छलतारा मीडिया और पिछलग्गू समर्थकों के अलावा धरनास्थल पर कोई खास ध्यानाकर्षण प्रस्ताव पारित नहीं हो सका. लेकिन क्या गोविन्दाचार्य भाजपा में जिस गुणा गणित वाले विश्लेषण के जनक समझे गये वह गुणा गणित होना बंद हो गया है? नहीं. बंद नहीं हुआ है. गोविन्दाचार्य ने गुणा गणित का जो बीजारोपण किया था उसकी कोंपले फूट आई हैं और नये नये नौजवान नेता उसी रास्ते पर चलकर अपनी जड़े जमाने की कोशिश कर रहे हैं. मुरलीधर राव उसी में से एक हैं.

ये जो मुरलीधर राव हैं उन्हें शार्ट करके आप एमडीआर भी कह सकते हैं.

Feb

29

2012

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मौलिक चिंतन का महाजन

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मौलिक चिंतन का महाजन

जैसे ही हमारी समझ साफ होती है हम सहज हो जाते हैं और जैसे ही हम सहज होते हैं हमारा चिंतन मौलिक हो जाता है. लौकिक हो जाता है. पारलौकिक विषयों की रहस्यवादी दुनिया और लौकिक विषयों की वास्तविक दुनिया में कोई भेद ही नहीं है. समझ की पैदाइश हो गई तो यह बात बिल्कुल अटपटी नहीं लगती है कि राजनीतिक सुधारों से व्यक्ति मोक्ष प्राप्त कर सकता है. अभी एक दिन पहले ही अमेरिकी विचारक एन्ड्र्यू कोहेन भी तो यही बोल रहे थे. किसी ने उनसे पूछा कि संसार में समस्याएं क्यों हैं तो उन्होंने कहा कि यह अविकसित रह जाने के कारण है. जैसे ही हमारा विकास पूरा होगा हमारी समस्याएं समाप्त हो जाएगी. एन्ड्रयू जब ऐसा कह रहे थे तो उनका आशय रोटी, कपड़ा और मकान भर से था. सम्यक रूप से भौतिक जरूरतें पूरी हो जाएं तो आध्यात्मिकता को प्रकट होने में वक्त कहां लगता है? भारत जैसे देश में जहां हमारे लिए हमारे राज्य प्रशासन ने अधिकांश जरूरतें पैदा कीं और उन्हें पूरा करने के नाम पर हमें भ्रमित करता है, कम से वहां यह बात अक्षरश: लागू होती है.

बजरंग मुनि का लौकिक चिंतन इन्हीं मौलिक और मूलभूत जरूरतों को पूरा करने की दिशा

Feb

21

2012

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वे रवीन्द्र शाह थे...

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वे रवीन्द्र शाह थे...

दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो के नए संपादक। उसके पहले दिल्ली ब्यूरो की जिम्मेदारी शरद द्विवेदी के जिम्मे थी। जैसा कि अक्सर होता है...बदलाव के वक्त रवींद्र शाह कुछ लोगों को भले लगे और कुछ के लिए बहुत अक्खड़ और बदतमीज। संपादक बनते ही रवींद्र शाह ने सबसे पहला फरमान ये सुनाया कि सब लोग ब्यूरो में दस बजे आएं...क्योंकि मीटिंग तभी होगी। इसके पहले तक लोगों को ग्यारह-साढ़े ग्यारह बजे दफ्तर आने की आदत थी। रवींद्र शाह ने दूसरा फरमान सुनाया- सबके वीकली ऑफ फिलहाल खत्म। सवाल उठे तो जवाब था-अब तक दिल्ली ब्यूरो काम नहीं कर रहा था। अब काम करेगा। अगले दिन उनका एक नया फरमान, दिल्ली ब्यूरो राजनीतिक खबरें छोड़कर ऑफ बीट स्टोरी करे। राजनीति कवर करने की आदत विकसित कर चुके ब्यूरो के पत्रकारों के लिए ये परेशानी भरा फैसला था। लेकिन झक मारकर सबको वही करना पड़ा, जो रवींद्र शाह एसाइन करते। लोग गुस्साते...उनकी आलोचना करते...लेकिन काम करना ही पड़ता। इस तरह उनके बारे में एक धारणा विकसित होती जा रही थी कि उन्हें पत्रकारिता की समझ नहीं है, वे बदतमीज हैं और वे राजनीतिक ब्यूरो को गड़बड़ करने आए हैं।

रवींद्र शाह के नहीं रहने के बाद जाड़े का वह दिन याद आता

Feb

12

2012

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राजनीति का बदनाम व्यापारी: पोंटी चड्ढा

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राजनीति का बदनाम व्यापारी: पोंटी चड्ढा

लहर उठाना पोंटी चड्ढा का जुनून है. शायद इसीलिए कुछ समय पहले जब दिल्ली से एक न्यूज चैनल लांच हुआ तो उसने भी अपने टैगलाइन लिखी कि लहर तो उठेगी. बताते हैं कि लहर उठानेवाले इस चैनल में भी पोंटी चड्ढा का पैसा लगा हुआ था. लेकिन ऐसा नहीं है कि केवल चैनल ही लहर उठा रहा था. शायद यह चैनल में पोंटी चड्ढा का इफेक्ट था कि चैनल भी लहर उठाने से अपने आपको रोक नहीं पाया. वैसे भी पोंटी चड्ढा एक लहर का ही नाम है. उसे लहरों से लगाव भी है शायद इसीलिए उसकी कंपनियों की मदर कंपनी वेव इंक है. आज जिस पोंडी चड्ढा को हम सुनामी के रूप में देख रहे हैं, पिछले एक दशक से उसका पचरम चारों ओर लहरा रहा है. क्या पंजाब, क्या उत्तर प्रदेश और क्या उत्तराखण्ड. पोंटी का परचम चारों तरफ है.

पोंटी ने अपनी जिंदगी में जो कुछ किया है वह डंके की चोट पर किया है. उसने दिल्ली से दुबई तक अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है. जो लोग आज उसे मायावती का करीबी बता रहे हैं उन्हें यह भी जान लेना चाहिए कि वह कल्याण सिंह का भी करीबी रहा है और कलराज मिश्र का भी. वह

Feb

09

2012

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नयी सोच का समाजवाद

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नयी सोच का समाजवाद

दोनों को राजनीति विरासत में मिली है. एक नेहरू-गांधी की विरासत वाली देश की सबसे पुरानी उस कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव है, जिसे देश की उदार और धर्मनिरपेक्ष पार्टी के रूप में जाना जाता है तो, दूसरी उस समाजवादी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष है जिस पर "जातिवादी" और "गुंडो-बदमाशों" की पार्टी होने का आरोप लगता रहा है. दोनों युवराजों की अपनी चुनौतियां हैं लेकिन अखिलेश के लिए चुनौती कहीं ज्यादा बड़ी है. राहुल की चुनौती उत्तर प्रदेश में पार्टी की जड़ों को मजबूत करना है तो आस्ट्रेलिया से इंजीनियरिंग की उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले 38 वर्षीय अखिलेश यादव के लिए चुनौती केवल सपा की "गुंडापार्टी" की छवि को बदलना ही नहीं है, बल्कि पार्टी की सत्ता में वापसी भी है. अखिलेश की चुनावी यात्राओं के प्रमुख और पार्टी के यूथ विंग के मुखिया डा. संजय लाठरा कहते हैं, "सपा एक मात्र ऐसी पार्टी है जिसने उत्तर प्रदेश में इस बार बड़े पैमाने पर युवाओं और महिलाओं को चुनाव मैदान में उतारा है. करीब 122 ऐसे युवाओं को टिकट दिया है, जो उच्च शिक्षा प्राप्त हैं और पहली बार चुनाव मैदान में उतर रहे हैं. इनमें से 75 फीसदी लोग छात्र संघों के पदाधिकारी रहे हैं. तो पहली बार

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