कॉरपोरेट मीडिया

May

09

2012

10
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मुकेश अंबानी के ताल पर मीडिया का नंगा नाच

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मुकेश अंबानी के ताल पर मीडिया का नंगा नाच

रिलायंस इंडस्टीज कंपनी बनी कर्ज मुक्त इकाई.... हिन्दुस्तान. पेज नबंर ... 13
मुकेश अबांनी ने निभाया वादा, रिलायंस को बनाया कर्जमुक्त ..... दैनिक जागरण, पेज नं. 11
मुकेश ने पू
ा कर्ज से छुटकारा दिलाने का वादा... जनसत्ता .... पेज नबंर ...10
कर्ज मुक्त कंपनी बनी रिलांयस .... दैनिक भाष्कर ... पेज नबंर ......... 
r />कर्जमुक्त रिलायंस .............. हरिभूमि

यह कुछ अखबारों की हेडलाइनें हैं। इन अख

ं के हेडलाइन देख कर लगता है कि सही में रिलायंस और मुकेश अ्रंबानी की इकाई कर्जमुक्त हो गयी है। पर कहानी कुछ और ही है। रिलायंस इंडस्टीज न तो कर्जमुक्त कंपनी है और न ही रिलायंस का मालिक मुकेश अंबानी ने शेयर धारकों से कर्जमुक्त होने का वायदा निभाया है। हेडलाइन में अखबारों ने रिलायंस इंडस्टीज को जरूर कर्जमुक्त कंपनी बना दिया पर पूरी खबर पढ़ने पर अखबारों का दिवालियापन और मुकेश अंबानी के सामने नतमस्तक होने के नजारे को देख सकते हैं, जान सकते हैं। रिलायंस इंडस्टीज के पास 70 हजार 252 करोड़ की पूंजी है जबकि 68 हजार 259 करोड़ का कर्ज रिलायंस इंडस्टीज कंपनी के उपर है। जब रिलायंस ने अपने उपर का 68 हजार 259 करोड़ का कर्ज चुकाया ही नहीं है तो फिर वह कंपनी कर्जमुक्त हुई

May

07

2012

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आप ही बताएं कि इन्हें नेशनल न्यूज चैनल क्यों कहा जाए?

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आप ही बताएं कि इन्हें नेशनल न्यूज चैनल क्यों कहा जाए?

हिन्दुस्तान की जनसँख्या १२० करोड़ के करीब है! कुल राज्य ३५ (७ केंद्र-शाषित सहित)! पर हमारे न्यूजचैनलों के न्यूज कमरों में तवज्जो सिर्फ दिल्ली-एन.सी.आर. और मुंबई की खबरों को! जी हाँ, ये हाल है भारत के न्यूज़ चैनल्स का जो अपने साथ "नेशनल न्यूज़ चैनल" का टैग लगाते हैं। न्यूज़ का सामान्य अर्थ इस तरह से लिया जा सकता है- नॉर्थ+ईस्ट+वेस्ट+साउथ की खबरों का प्रसारण! पर कौन सा ऐसा चैनल है जो इस परिभाषा के करीब भी है?

कभी-कभी अंगरेजी चैनल्स, एन.डी.टी.वी. इंडिया और ज़ी न्यूज़ जैसे चैनल इस और कदम बढ़ाते दिखते हैं! पर "कभी-कभी" एक औपचारिकता का नाम होता है! ज़्यादातर चैनल्स तो इस "कभी-कभी" से भी कभी इत्तेफाक नहीं रखते! क्यों? क्या कारण है कि राष्ट्रीय समाचार चैनल्स के लिए इस तरह की बाध्यता नहीं रखी गयी और उन्हें राष्ट्रीय न्यूज़ चैनल का लाइसेंस दे दिया गया? क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय इस पर ध्यान नहीं देता या फिर इस तरह का कोई प्रावधान (लाइसेंस बाँटते वक़्त) तय नहीं किया जाता! क्षेत्रीय और राष्ट्रीय चैनल्स में क्या अंतर है? दिल्ली के आस-पास अपना ऑफिस या प्रसारण-केंद्र खोल कर यहीं आस-पास की ख़बरों को ज़्यादा तवज्जो देना ही "नेशनल"

द की भरपाई है?

दर्शक अगर १५ लगातार नेशनल

Apr

26

2012

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कांग्रेस का पिट्ठू है काटजू...जय हिन्द!

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कांग्रेस का पिट्ठू है काटजू...जय हिन्द!

मीडिया का काम वक्त देना नहीं होता है मिस्टर काटजू, मीडिया का काम हर वक्त अपना काम करना होता है. खैर, अब काटजू सोशल मीडिया के पीछे पड़े हैं. तो क्या, पापी सिंघवी का वीडियो जो सोशल मीडिया ने रिलीज कर दिया. अरे काटजू भाई, कांग्रेसियों के नंगेपन को ढंकने की आप चाहें जितनी कोशिश कर करा लें, लेकिन ध्यान रखिएगा, जनता सब समझती है. आपको आपके तेवर व सोच के हिसाब से सोशल मीडिया को थैंक्यू बोलना चाहिए कि इस मीडिया ने आपके कोर्ट और आपकी सत्ता के डर भय के बिना सच को सामने लाने का साहस किया.

आखिर कोई नेता किसी वकील को जज बनाने का प्रलोभन देकर सेक्स कर रहा हो तो उस वीडियो को कैसे पब्लिक में आने से आप रोक सकते हैं? आपकी न्यायपालिका भी न, बड़े लोगों के मामले में तुरंत स्टे टाइप की चीज दे देती है और छोटे लोग मर जाते हैं, कोई सुध लेने नहीं पहुंचता. आप हम सोशल मीडिया वालों को जेल भिजवा दीजिए या फांसी दे दीजिए, बहुत फरक नहीं पड़ेगा, चार मरेंगे तो चार सौ पैदा होंगे. और, जब सोशल मीडिया व न्यू मीडिया को अमेरिका जैसा सर्वशक्तिमान नहीं कंट्रोल कर पाया तो आप किस डाल

Apr

26

2012

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मार्कण्डेय 'लाल' के हसीन सपने

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मार्कण्डेय 'लाल' के हसीन सपने

देश की पहली महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल 25 जुलाई को पूरा हो रहा है और अब कोई भी पार्टी उन्हें रिपीट करने के मूड में नहीं दिख रही है। ऐसा माना जा रहा है कि इस बारे में कांग्रेस की ओर से 10 मई के बाद औपचारिक बातचीत शुरू की जाएगी जिसमें संभावित उम्मीदवारों के नाम पर चर्चा की जाएगी। फिलहाल सरकार की प्राथमिकता आम बजट पारित कराने की है और वित्त विधेयक को पारित कराने के लिए 8 मई की तारीख तय की गई है।
 
फिलहाल जो संवैधानिक स्थिति है उसके मुताबिक कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने दम पर किसी उम्मीदवार को राष्ट्रपति की कुर्सी पर बिठाने की स्थिति में नहीं है। साफ है कि यूपीए और एनडीए दोनों के नेता जिस उम्मीदवार के नाम पर एकजुट होंगे वो ही अगला राष्ट्रपति बनेगा। अभी तक सभी राजनीतिक दल अपने-अपने पसंदीदा उम्मीदवारों की सूची तैयार करने और उन नामों के समर्थकों की संख्या पर गुना-भाग करने में ही जुटे हैं।

अन्ना और रामदेव के आंदोलनों ने साबित कर दिया है कि सोशल नेटवर्किंग साइटों का प्रभाव इन नेताओं के निजी वोटबैंक से ज्यादा असरदार और आक्रामक है। संसद में सभी राजनीतिक दल एक-दूसरे पर बेशक

Apr

21

2012

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टीवी का ट्वीट ट्वीट

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टीवी का ट्वीट ट्वीट

वक्ता की पहचान ट्वीटर के अलग-अलग अकाउंट की तरह है। जिस तरह से ट्वीटर में कोई भी कहीं से फॉलो करता हुआ आ जाता है और बोलने लगता है उसी तरह से टीवी में भी होने लगा है। पहले चंद चेहरे हुआ करते थे अब इन चेहरों का रेंज बढ़ने लगा है। आप कह सकते हैं कि सीमित है लेकिन तब भी दायरा बढ़ा ही है। औपचारिक प्रवक्ताओं के साथ साथ कई अनौपचारिक प्रवक्ता भी स्टुडियो स्टुडियो घूम रहे हैं। एंकर भी अब ट्वीट की तरह बड़बड़ा रहा है। कुछ भी बोलता है। बोलकर छोड़ देता है। लोग आपस में भिड़ जाते हैं।

ऐसा नहीं है कि टीवी पर बहस के कार्यक्रम नहीं थे। मगर वो बहस और चर्चा के कार्यक्रम थे। अब तो टीवी पर लगातार मुद्दे ट्वीटर की तरह ट्रेंड कर रहे हैं। रिपोर्ट गायब है। स्पीड न्यूज़ भी एक किस्म का खुंदकिया खबर ट्वीट है। लो ये लो दनादन। एक पढ़ा नहीं,सुना नहीं कि दूसरा लोड होकर आ गया। पहले वाला नीचे चला गया। जिस तरह आपके ट्वीट की गिनती होने लगती है उसी तरह से स्पीड न्यूज़ ख़बरों को गिनता हुआ आगे बढ़ने लगता है। स्पीड न्यूज एक किस्म का ट्वीट है। खबर अफवाह की

Apr

19

2012

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नकारा निर्मल बाबा का जयकारा

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नकारा निर्मल बाबा का जयकारा

बाबा की महिमा की कृपा से एक न्यूज चैनल ने विरोध का मोरचा थाम रखा है, दूसरे ने बहस के नाम पर बाबा के पाखंड को परोसने का खुबसूरत स्वांग रच रखा है, तो तीसरा सीना ठोककर बाबा का आकर्षण बरकरार रहने की बात को प्रचारित कर रहा है। अंधे टीआरपी की होड में औंधे मुंह हांफते दौड़ते न्यूज चैनल्स के एयर टाइम में से पाखंड के प्रचार पर कितना वक्त दिया जा रहा है, इसे रोकने टोकने अथवा गौर करने के लिए कोई तैयार नहीं। पाखंडी बाबा के एक्सक्लूसिव इंटरव्यू, बहस और विरोध के नाम पर जितना प्रचार या दुष्प्रचार दिया जा रहा है वह एक सामान्य दर्शक के लिए उकताने वाला है। खबर अथवा सामान्य ज्ञान की भूख वाले जिज्ञासू दर्शकों को न्यूज चैनल्स पर बाबा की तस्वीर और वीडियो ने विचलित कर रखा है।

आम आदमी को विचलित करने की इस कहानी की शुरूआत आज अप्रैल में नहीं हुई बल्कि करीब तीन महीने पहले जनवरी में हुई थी जब पहली बार गैरजरूरी टाइम स्लाट पर निर्मल बाबा प्रकट हुए थे. मीडिया स्टडीज ग्रुप के एक सर्वेक्षण का कहना है कि जनवरी में पहली बार निर्मल बाबा कुछ चैनलों पर अवतरित हुए. उनके विज्ञापन को "पेड स्लॉट" के

Apr

16

2012

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न्यूजरूम में नहीं है दलित बसेरा

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न्यूजरूम में नहीं है दलित बसेरा

‘राष्ट्रीय मीडिया पर उंची जातियों का कब्जा’ के तहत हाल ही में आये सर्वे ने मीडिया जगत से जुड़े दिग्गजों की नींद उड़ा दी थी। आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी चला। किसी ने समर्थन में दलित-पिछड़ों को आगे लाने की पुरजोर शब्दों में वकालत की तो किसी ने यहां तक कह दिया कि भला किसने उन्हें मीडिया में आने से रोका है। मीडिया के दिग्गजों ने जातीय असमानता को दरकिनार करते हुए योग्यता का ढोल पीटा और अपना गिरेबांन बचाने का प्रयास किया। 

दलित-पिछड़े केवल राष्ट्रीय मीडिया से ही दूर नहीं है बल्कि राज्य स्तरीय मीडिया में भी उनकी भागीदारी नहीं के बराबर है। वहीं उंची जातियों का कब्जा स्थानीय स्तर पर भी देखने को मिलता है। समाचार माध्यमों में उंची जातियों के कब्जे से इंकार नहीं किया जा सकता। मीडिया स्टडी ग्रुप के सर्वे ने जो तथ्य सामने लाये हालांकि वह राष्ट्रीय पटल के हैं लेकिन कमोवेश वही हाल स्थानीय समाचार जगत का है जहां दलित-पिछडे़ खोजने से मिलेंगे। आजादी के वर्षों बाद भी मीडिया में दलित-पिछड़े हाशिये पर हैं। मीडिया के अलावा कई क्षेत्र हैं जहां अभी भी सामाजिक स्वरूप के तहत प्रतिनिधित्व करते हुए दलित-पिछड़ों को नहीं देखा जा सकता है, खासकर दलित वर्ग को। आंकड़े बताते हैं

Apr

14

2012

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शेखर गुप्ता पर मैं सवाल उठाता हूं कि...

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शेखर गुप्ता पर मैं सवाल उठाता हूं कि...

सबने मना कर दिया कि न तो हम इस स्टोरी को टेलीविज़न पर दिखाएंगे, न छापेंगे, क्योंकि यह वाहियात स्टोरी है और यह देश की सेना की छवि ख़राब करने वाली खतरनाक स्टोरी है. मैंने अपने सेना के सोर्सेज से बात की. उन्होंने भी यही कहा कि यह बुलशिट है, लेकिन वहां से मुझे यह ख़बर पता चली कि इंडियन एक्सप्रेस इस ख़बर को छापने वाला है. मुझे लगा कि पत्रकार होने के साथ-साथ इस देश का नागरिक होने के नाते मेरा धर्म है कि मुझे इंडियन एक्सप्रेस को बताना चाहिए कि यह ख़बर अगर वह छापता है तो वह शायद देशहित के ख़िला़फ काम करेगा. मैंने इस विश्वास के आधार पर यह सोचा, क्योंकि मैं जानता हूं कि शेखर गुप्ता अब तक यानी इस रिपोर्ट के छपने तक, जो इंडियन एक्सप्रेस में छपी, एक जुझारू, ईमानदार और बहादुर पत्रकार माने जाते थे.

मेरी शेखर गुप्ता से पहली मुलाक़ात रविवार में रहते हुए तत्कालीन संपादक सुरेंद्र प्रताप सिंह के साथ हुई थी और सुरेंद्र प्रताप सिंह ने ही मेरा परिचय शेखर गुप्ता से कराया था. शेखर गुप्ता को तबसे मैं वरिष्ठ, अपने से ज़्यादा समझदार, अपने से ज़्यादा जानकार और अपने से ज़्यादा बहादुर पत्रकार मानता था. मुझे लगा कि

Apr

14

2012

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निर्मल बाबा का मीडिया मर्दन

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निर्मल बाबा का मीडिया मर्दन

इतना ही नहीं उन पर एक साथ दस सवाल दाग दिए हैं। दिलचस्प मगर अफसोसनाक बात ये है कि ये वही स्टार न्यूज चैनल है, जो प्रतिदिन उनका विज्ञापन भी जारी करता रहा है और अब न्यूज चैनलों पर विज्ञापनों के जरिए चमत्कारों को बढ़ावा देने से की प्रवृत्ति से बचने की दुहाई देते हुए बड़ी चतुराई से बाबा के करोड़ों रुपए कमाने पर सवाल खड़े कर रहा है। इतना ही नहीं अपने आप को ईमानदार जताने के लिए विज्ञापन अनुबंध की तय समय सीमा समाप्त होने के बाद वह इसका प्रसारण बंद करने की भी घोषणा कर रहा है।

सवाल उठता है कि यदि वाकई स्टार न्यूज को चमत्कारी बाबाओं का महिमा मंडन किए जाने पर ऐतराज रहा है, तो यह उसे अब कैसे सूझा कि ऐसे विज्ञापन नहीं दिखाए जाने चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि या तो विज्ञापन की रेट को लेकर विवाद हुआ होगा या फिर ये लगा होगा कि जितनी कमाई बाबा के विज्ञापन से हो रही है, उससे कहीं अधिक का फायदा तो टीआरपी बढऩे से ही हो जाएगा। वजह स्पष्ट है कि जब सारे चैनल किसी के गुणगान में जुटे हों तो जो भी चैनल उसका नकारात्मक पहलु दिखाएगा, दुनिया उसी की ओर

Apr

09

2012

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राजेन्द्र माथुर के न होने के बाद

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अपने मित्रों के साथ राजेन्द्र माथुर (सबसे बाएं हाफ शर्ट में) अपने मित्रों के साथ राजेन्द्र माथुर (सबसे बाएं हाफ शर्ट में)

लेकिन संयोग से राजेन्द्र माथुर जी का निधन उसी बरस हुआ जिस बरस से राजनीति सत्ता ने बाजार के लिये रास्ता खोलना शुरू किया या कहें आर्थिक सुधार की लकीर खींचनी शुरू की। 9 अप्रैल 1991 को राजेन्द्र माथुर का निधन हुआ और 1991 के बाद से मीडिया बदला। पत्रकारिता बदली । या कहे देश के मुद्दे ही बदलते चले गये और मीडिया एक ऐसे मुहाने पर आ खडा हुआ जब राष्ट्रवाद का मतलब दुनिया के बाजार में खुद को बेचने के लिये तैयार करना हो गया। राजनीतिक सत्ता का मतलब उपभोक्ताओं के लिये नीतियों को बनाना हो गया। सरोकार का मतलब हाशिये पर पड़े तबको को और दरिद्र बनाते हुये सत्ता के आर्थिक पैकेज पर निर्भर करना हो गया।

जाहिर है राजेन्द्र माथुर जी की पत्रकारीय लेखन के दौर में [1955-1991] मुद्दे चाहे कई रहे लेकिन मीडिया के भीतर हर मुद्दा सामाजिक-सांस्कृतिक और भौगोलिक तौर पर राष्ट्रवादी समझ लिये ही उभरा। इसलिये चीन से लेकर पाकिस्तान के साथ युद्ध की बात हो या फिर इमरजेन्सी से लेकर स्वर्ण मंदिर में सेना के घुसने का सवाल या मंडल-कंमडल की सियासी समझ। मीडिया का रुख कमोवेश हर मुद्दे के साथ देश को बनाने। फिर बचाने। और आखिर सत्ता के लिये

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