खेल खिलाड़ी
Dec
24
2011
खेल भावना से दें खेल का भारत रत्न
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भारतीय संविधान में खेल के दर्जे को मात्र मनबहलाव गतिविधि में रखे जाने के कारण ही खेलों को दोयम दर्जा मिलता रहा है। जब सभी खेल संगठनों के प्रमुख देश की राजनीति में विद्यमान गणमान्य नेता हैं तो फिर देश में खेल माहौल क्यों नहीं बन पाया है? क्यों खेल मंत्री को संसद के सामने प्रार्थना करना पड़ी है कि देश के महान खिलाड़ियों को भी भारतरत्न दिया जाए। और क्यों इन नेताओं के लिए खेल चलाना सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिए महत्वपूर्ण रहा है?
मान लीजिए सचिन तेन्दुलकर को पहला भारतरत्न मिलता है तो उनके पहले के महान खिलाड़ियों के लिए यह सम्मान बेमानी हो जाएगा। फिर सचिन तेन्दुलकर के बाद किसको देंगे। सचिन तेन्दुलकर से पहले क्रिकेट को अपने समय में लोकप्रिय बनाने वाले सी के नायडू से लेकर सुनिल गावस्कर, बिशन सिंह बेदी और कपिल देव जैसे खिलाड़ियों का फिर क्या होगा? वैसे भी सचिन तेन्दुलकर जैसी लोकप्रियता की स्थिति में हैं कि उनको भगवान लिखने वालो की कमी नहीं है। भारत रत्न, आस्था में भगवान माने गए व्यक्ति से बढ़ा नहीं हो सकता है। सचिन को भारतीय जनता रत्न तो मानती ही आ रही है।
भारत रत्न पर यह भारतीय
May
21
2011
अम्बुस मार्केटिंग का आईपीएल
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इन अफवाहों और खबरों के बीच कि आईपीएल के दर्शक क्रिकेट को दया का पात्र बना रहे हैं, अपनी पहुंच फिरोजशाह कोटला ग्राउण्ड तक बनी. शाम के सात बजे उन्हीं संदीप जोशी ने टिकट दिया और गेट नंबर 17 का रास्ता समझा दिया. जितनी देर गेट के बाहर रहे आने जाने वालों का तांता लगा रहा. आईटीओ और लालकिले दोनों ही ओर से हांफते कांपते आने वालों का तांता लगा हुआ था. मोटे थुलथुल पतियों के साथ तत्परता से कदमताल करती मोटापे की शिकार उनकी पत्नियां ही आश्चर्य पैदा नहीं कर रही थीं. क्रिकेट के इस समाजवाद में उन सबका स्वागत है जो बाजार के आगे नतमस्तक हो चुके हैं. देश में नाना प्रकार के नागरिक हैं और अपने नागरिकों की जितने प्रकार की वैरायटी हो सकती है वे सब यहां दिख रहे हैं. बच्चे, किशोर, नौजवान और वयस्क किसी अवस्था की कमी नहीं. हर अवस्था के लोग दिल्ली डेयरडेविल्स और पुणे वैरियर्स के "युद्ध" के साक्षी बनने को आतुर हैं. हालांकि आईपीएल पर आतंकी हमले की कोई चेतावनी नहीं है लेकिन पुलिस की मुस्तैदी देखने लायक है. सिर्फ सेना पीछे छूट गयी है नहीं तो पुलिस, पैरा मिलिट्री और कमाण्डो तीनों तरह के सुरक्षा कर्मी अपनी सभी प्रकार की
Apr
05
2011
दब्बू से हुए दबंग
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28 वर्षो के बाद एक बार फिर टीम इंडिया क्रिकेट की विश्व चैंपियन बनने में कामयाब हुई है। जब पहली बार टीम इंडिया क्रिकेट की चैंपियन बनी थी तब भारत में क्रिकेट नंबर खेल नहीं था। हॉकी उन दिनों क्रिकेट से कहीं ज्यादा लोकप्रिय हुआ करती थ। तब हॉकी के खिलाड़ियों के बारे में तमाम किवदंतियां प्रचलित थी। मसलन जर्मनी में आयोजित बर्लिन ओलंपिक के दौरान एडॉल्फ हिटलर ने हॉकी के फॉरवर्ड खिलाड़ी ध्यानचंद को जर्मन टीम में शामिल होने का न्यौता दिया था। ध्यानचंद का नाम तब जनरल नॉलेज के हर छात्र को याद हुआ करता था। आज किसी से आप ध्यानचंद के नाम का जिक्र करेंगे तो लोग उन्हें वैज्ञानिक या लेखक समझेंगे।
हॉकी हारी, क्रिकेट चढ़ा
भारत में आयोजित विश्वकप हॉकी में भारतीय टीम पांचवें नंबर पर रही। पाकिस्तान का प्रदर्शन बेहतर रहा। 1982 में दिल्ली में एशियाड खेलों के आयोजन हुए। एशियाड खेलों में तमाम तरह की प्रतियोगिताएं हुई। लेकिन हर किसी का ध्यान हॉकी पर था। हॉकी के फाइनल में जब पाकिस्तान और भारत पहुंचे तो पूरे देश का ध्यान एशियाड पर केंद्रित हो गया। एशियाड के दौरान ही भारत में रंगीन टीवी लांच हुआ था। फाइनल के मुकाबले के दिन बड़े पैमाने पर लोगों
Apr
04
2011
एक कमजोर क्रिकेट प्रेमी की आपबीती
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मुझे अपनी इस कमजोरी पर नाज है। मगर तनाव के क्षणों में धीर-गंभीर होने या होने का अभिनय करने वाले तमाम वीरों और वीरांगनाओं से ईर्ष्या जरूर होती है। ऐसा लगता है कि जीवन की उपलब्धियां उन्हीं की धरोहर हैं। उनका कितना स्वतंत्र व्यक्तित्व है। मैं धारा में बहता हूं और वो धारा को बनाते या मोड़ते हैं। मानता हूं कि जीवन मे कुछ करने के लिए इस टाइप की बाजारू खूबियां होनी ही चाहिए लेकिन क्या मेरे जैसे कमजोर आदमी के लिए कोई सोशल सिक्योरिटी स्कीम नहीं होनी चाहिए? इसीलिए हैरानी होती है कि यहां तक जीवन कैसे जी गया। जो कर रहा हूं वो कैसे हो रहा है?
ऐसे कमजोर और पूर्वकालिक क्रिकेट प्रेमी को जनसत्ता के संपादक ओम थानवी जी ने घर बुला लिया मैच देखने। सपत्नीक अविनाश, सुर, सपत्नीक समरेंद्र, बिपत्नीक मिहिर और विनीत कुमार के बीच मैं अपनी पत्नी के न आने पर अकेला मौजूद रहा। विशालकाय होम थियेटर पर फाइनल। शानदार माहौल में मैच देखते हुए एक बार हिंदी ग्रंथी कुलमुला उठी और महसूस करने लगी कि कुलीनता हिंदी का स्वाभाविक लक्षण है। हम हमेशा 'स्ट्रगल मोड' में नहीं रहते। मनोरंजन और शौक को भी महत्व देते हैं। तभी इतने इंतजाम और ठाठ
Apr
04
2011
युगधर्म क्रिकेट और विश्वगुरू भारत
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क्रिकेट को युगधर्म कहने के कारण हैं. कहते हैं भारत में पहली बार क्रिकेट 1721 के आस पास खेली गयी. वह भी वर्तमान गुजरात के बड़ौदा नामक शहर में जब ईस्ट इंडिया कंपनी के नाविकों ने टाइमपास करने के लिए अपने पसंदीदा खेल क्रिकेट का सहारा लिया. इस घटना के बहुत बाद 1792 में देश के बिल्कुल दूसरे छोर पर कलकत्ता में क्रिकेट एण्ड फुटबाल क्लब का गठन किया गया. यानी देश के पश्चिमी हिस्से से पूर्वी हिस्से तक की यात्रा करने में उसे लगभग सत्तर साल लग गये. लेकिन पूरब से दक्षिण पहुंचने में सत्तर साल नहीं बल्कि केवल सात साल लगे. 1799 में श्रीरंगपट्टनम में एक और क्रिकेट क्लब की स्थापना की गयी. 1799 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने हैदराबाद के निजाम की मदद से भारत के गौरवशाली शासक टीपू सुल्तान के किले पर धावा बोला था और 4 हजार ब्रिटिश सैनिकों के साथ लगभग 46 हजार भारतीय सैनिकों को लेकर ब्रिटिश कंपनी बहादुरों ने टीपू सुल्तान को ध्वस्त कर दिया. अपनी बची खुली 30 हजार सेना के साथ टीपू सुल्तान अपना किला नहीं बचा सके और 4 मई को टीपू सुल्तान मारे गये. इसके बाद ही भारत में दूसरे क्रिकेट क्लब की स्थापना श्रीरंगपट्टनम में की गयी.
Apr
02
2011
पहले से फिक्स है टीम इंडिया की जीत
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आज वानखेड़े स्टेडियम पर श्रीलंका और भारत के बीच फाइनल मुकाबला होना है. क्रिकेट के किसी भी मैच में निर्णय में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्रिकेट का मैदान. वानखेड़े स्टेडियम में पिच बनाने का जिम्मा सुधीर नाइक नामक पूर्व क्रिकेटर पर है. कल ही सुधीर नाईक के हवाले से समाचार आया है कि विश्वकप शुरू होने के शुरूआती दौर में ही सचिन तेन्दुलकर और भारतीय टीम के कप्तान मोहिन्दर सिंह धोनी सुधीर नाईक से संपर्क करते हैं. संपर्क का कारण था कि वे जानना चाहते थे कि फाइनल मैच के दौरान पिच का क्या हाल रहेगा? विश्व कप शुरू भी नहीं हुआ और धोनी एवं तेन्दुलकर को फाइनल मैच की चिंता हो गयी थी. यह सामान्य बात नहीं है. फाइनल मैच के पहले भारत को वानखेड़े में कोई मैच नहीं खेलना था. इसलिए पिच के बारे में उनकी चिंता अनावश्यक नहीं हो सकती. धोनी एवं तेन्दुलकर कैसे जानते थे कि फाइनल उनको ही खेलना है? जबकि लीग मैचों के दौरान हालत यह थी कि भारत क्वार्टर फाइनल में पहुंचेगा या नहीं इस पर क्रिकेट विशेषज्ञ बहस कर रहे थे. श्रीलंका ने एक मैच फाइनल के पहले वानखेड़े पर खेल चुका है. श्रीलंका के कप्तान कुमार संगकारा कहते हैं कि
Mar
29
2011
न तलवार चलेगी न बंदूक दगेगी
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अब तक क्रिकेट विश्वकप में हुए भारत व पाकिस्तान के बीच हुए मुकाबलों पर नजर डालते ही यह बात सहज समझ में आ जाती है कि भारतीय टीम के लिए पाकिस्तान को हराना लोहे के चने चबाने जैसा बिल्कुल नहीं है। यह जानकर क्रिकेट प्रेमियों को बेहद खुशी मिलती है कि विश्वकप में भारतीय टीम ने हमेशा भारतीय टीम को हराया है। विश्वकप में भारत और पाकिस्तान के बीच चार बार मुकाबला हो चुका है। चारों बार भारतीय टीम ने पाकिस्तान को हार का स्वाद चखाया है। बताते चले 4 मार्च 1992 विश्वकप में भारत ने पाकिस्तान को 43 रनों से हराया था। मैन आफ द मैच मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को दिया गया था। यह मैच आस्ट्रेलिया के शहर सिडनी में खेला गया था। दूसरा मैच 9 मार्च 1996 को अपने वतन शेरे हिन्द के शहर बैंगलौर में हुआ था, जिसमें भारत ने पाकिस्तान को 39 रनों से हराकर मैच जीता था, मैन आफ द मैच नवजोत सिंह सिद्धू को मिला था, तीसरा मैच 8 जून 1999 को इंग्लैंड के ओल्ड ट्रेफर्ड में खेला गया था, भारतीय टीम ने पाकिस्तान को धूल चटाते हुए मैंच 47 रनों से जीता था जिसमें मैन आफ द मैच बैंकटेश प्रसाद को दिया
Jan
15
2011
खेल में हुआ खिलवाड़
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बैंगलूरू के एक पांचसितारा होटल में सजी मंडी में खिलाड़ियों के नए मालिक बने। खेल में खिलवाड़ हुआ है। महाभारत के समय जरूर चौपड़ का खेल हुआ था। कौरव और पांडवों के बीच हुए खेल में सभी द्रोपदी के चीर हरण के साक्षी बने थे। वैसा ही चीर हरण क्रिकेट खिलाड़ियों की अनुपस्थिति में चौथे आईपीएल के लिए बैंगलूरू में हुआ। जिसका टेलीविजन पर सीधा प्रसारण भी किया गया। फर्क सिर्फ इतना था कि इस नीलामी के कारण कई नए खिलाड़ी करोड़पति बने। और जो पहले करोड़पति थे वे सिर्फ पति रहे। नीलामी का नियम है, वस्तू अपनी असली कीमत पर कभी नीलाम नहीं होती है। वह या तो सस्ते में या महंगे में ही बिकती है। एक तरह का सट्टा होता है।
देश के लिए क्रिकेट खेलना सिर्फ सौभाग्य नहीं हो सकता है। वर्षों की कढ़ी मेहनत, गहरा उत्सर्ग और धुन-लगन के बिना भारत के लिए क्रिकेट खेलना असंभव है। इसलिए खिलाड़ियों को खूब धन मिलना चाहिए ताकि वे खेल के बाद का जीवन आराम और संपन्नता से जी सकें। खेल की लोकप्रियता खिलाड़ियों के खेल के कारण ही बनती है। शिकायत खिलाड़ियों को मिलने वाले धन के आंकड़ों से नहीं है, बल्कि उसके तरीके से है। ऐसा

