जंतर मंतर
Apr
05
2012
चुपचाप चला गया पांच अप्रैल
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5 अप्रैल 2011 भारतीय इतिहास की कुछ उसी तरह की अहम तारीख है जैसे कि 15 अगस्त 1947 या फिर 26 जनवरी 1950। आजादी या गणतंत्र की तारीख से 5 अप्रैल 2011 की तारीख थोड़ा अलग मायने की है, अलग महत्व की है। आजादी और गणतंत्र की तारीखें ऐसी तारीखें हैं जिस दिन देश को अपनी आजादी और अपने गणतंत्र के होने का अहसास मिला। और, वो अहसास हमारा गर्व बना। क्योंकि, 15 अगस्त 1947 के बाद कम से कम सीधे तौर पर किसी विदेशी का हम पर शासन नहीं रहा और 26 जनवरी 1950 के बाद हमने खुद के बनाए संविधान के लिहाज से एक देश के तौर पर खुद को चलाना सीखा। 5 अप्रैल 2011 का भी महत्व अगर देखा जाए तो, इन दोनों ही तारीखों से कुछ कम नहीं है। लेकिन, 5 अप्रैल 2011 की तारीख अलग इस मायने में है कि इस दिन जो, उम्मीद की किरण दिखी थी वो, अब तक अहसास में नहीं बदल पाई है।
5 अप्रैल 2011 को, जो उम्मीद की किरण थी वो, थी भ्रष्टाचार मुक्त भारत की। 5 अप्रैल 2011 को जंतर-मंतर पर किशन बाबूराव उर्फ अन्ना हजारे जब अनशन पर बैठे तो, अंदाजा ही नहीं था कि इस
Mar
20
2012
कुडनकुलम में कोहराम
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सोमवार को ही हमारे संघर्ष समिति के एडवोकेट शिवासुब्रमण्यम और राजलिंगम को गिरफ्तार कर लिया गया और उनके ऊपर धारा 121, 121A और 153A के तहत मामला दर्ज किया गया है. अब हमें नहीं पता कि पुलिस उन्हें कहां लेकर गई है. इसी तरह एक और लीडिंग एक्टिविस्ट को इदिन्थकराई आते हुए गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें तिरुनलवेली पुलिस हेडक्वार्टर में रखा गया है. पुलिस ने पूरे इलाके में धारा 144 लगा दिया है और किसी भी तरह की सार्वजनिक गतिविधि पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है. लोगों की आवाजाही भी रोक दी गई है और पूरे इलाके में कर्फ्यू का माहौल कायम कर दिया गया है. पुलिस के जवाब नौकाओं और पैदल रास्तों से यहां पहुंच रहे हैं.
इदिन्थकराई में मेरे सहित 15 लोग अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे हैं जिसमें आठ पुरुष और सात महिलाएं शामिल हैं. हमारे आस पास भारी संख्या में पुलिस बल तैनात कर दिया है जिनका घेरा लगातार कसता जा रहा है. फिर भी अभी हमारी अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल जारी है. हमारी मांग है कि -
1. जिन कामरेड्स को पुलिस ने गिरफ्तार किया है उन्हें तत्काल रिहा किया जाए
2. तमिलनाडु राज्य सरकार द्वारा जिस प्रस्ताव को मंजूरी दी गई
Feb
29
2012
झीनी झीनी फटी चदरिया
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“बुनकर”! सिर्फ एक पेशा नही बल्कि प्रतीक भारतीयता का, मिट्टी की सौंधी महक का। स्वतंत्रता सेनानियों ने करघा के आसरे क्रांति का ख्वाब देखा और स्वतंत्रता प्राप्ति की तरफ अग्रसर हुए। स्वतंत्र तो हम हुए परंतु करघा दम तोड़ता गया। कपास से कपड़े तक के सफर में करघे पर जिंदगियाँ दम तोड़ती नज़र आती है। सिलसिला बदस्तूर जारी है। गाँधी जी ने कहा था कि “उत्पादन आम लोगों द्वारा किया जाए, जिससे समाज के पिछड़े लोग भी विकास की मुख्यधारा में शामिल हो सकें”। 25 लाख हैंडलूम देशभर में है जिनमें 40 से 50 लाख लोग दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने की जद्दोजहद में अपना पूरा दिन सूत, रेशम और चरखे के बीच बिता देतें है। लेकिन सिर्फ वो संतुष्ठ हैं । छोड़ देना चाहते हैं इस काम को, लेकिन सांस्कृतिक और परिवेशिक मजबूरियों के साए में उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन तो सुनहरी सुबह आएगी। चरखे के घूमने के साथ दिनचर्या शुरू होती है और सूरज ढलने तक चरखा हाथ में ही रहता है ।
अनुमान के अनुसार हथकरघा उद्योग से जुड़े 60 फीसदी लोग गरीबी रेखा से नीचे यानि बी.पी.एल के अंतर्गत आते हैं। बड़े धड़ल्ले से प्रचार किया जाता है कि खादी हमारी
Dec
11
2011
अन्ना के अनशन का आठवां आयाम
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जार्ज पंचम ने आज से सौ साल पहले दिल्ली के एक छोर पर दरबार लगाया था. वह भी 11 दिसंबर ही था और यह भी 11 दिसंबर ही है जब अन्ना का दरबार लगा है. सौ साल तो नहीं लगे लेकिन बीते एक साल में इस जंतर मंतर ने एक अदद अन्ना हजारे को आंधी और दूसरा गांधी जरूर बना दिया है. पिछले साल नवंबर दिसंबर में यही अन्ना हजारे यहां आये थे तो उनके इर्द गिर्द कुल जमा दो पांच सौ लोग थे. लेकिन आज साल भर बाद न केवल जंतर मंतर अन्ना हजारे के जलवे देख रहा है बल्कि राजनीति भी लुटियन्स जोन से निकलकर जंतर मंतर पर दस्तक दे रही है. अप्रैल के अनशन में जिन अन्ना हजारे के समर्थकों ने नेताओं को अनशन स्थल पर आने से मना कर दिया था, और जो आ गये थे उन्हें अपमानित करके भगा दिया था, आज वही अनशनकारी उन्हीं नेताओं के भाषण सुन रहे हैं.
सुना हुआ भाषण पूरा हजम नहीं हो रहा है इसलिए अगली पंक्तियों में बैठे लोग बीच बीच में मनमाफिक बात न होने पर विरोध में हाथ भी लहरा रहे हैं लेकिन ऊधर मंच से नेताओं का भाषण जारी रहता है. इधर विरोध के हाथ
Nov
14
2011
खबर नरक से नहीं बुंदेलखण्ड से है
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अहिंसक आंदोलन कर रहे ग्रामीणों की माँग है कि जुझार पहाड़ के खनन को तुरंत रोका जाए। 700 एकड़ में फैला यह पहाड़ बड़ा पहाड़ के नाम से भी जाना जाता है। ग्रामीणों के विद्रोह तेवर देख प्रशासन के भी हाथ-पाँव फूले हुए हैं। मीडिया में खबर आने के बाद एसडीएम सदर विन्ध्यवासिनी राय, सीओ अखिलेश्वर पांडेय व माइन्स सर्वेयर आरएन यादव ने गाँव का दौरा किया और ग्रामीणों की परेशानी जानने की कोशिश की। उत्तर प्रदेश सरकार के पूर्व श्रम मंत्री बादशाह सिंह भी गाँव वालों के समर्थन में धरने पर बैठ चुके हैं।
....जैसे नरक में रह रहे हों
जुझार पहाड़ ग्रामीणों की धार्मिक मान्यताओं से भी जुड़ा है, पहाड़ पर लाला हरदौल और महेश्वरी देवी का मन्दिर है। सबसे अनोखी बात यह है कि पहाड़ पर एक कुँआ है। पहाड़ पर पानी होना विलक्षण माना जाता है। लोगों के अनुसार यह कुँआ 850 वर्ष पुराना है और अब भी दुरूस्त है। लेकिन खनन माफियाओं की मनमानी और कारगुजारियों के चलते प्रकृति के गोद में बसा बरी और जुझार गाँव नरक बन गया है। लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हैं। लगातार और तेज धमाकों से यहाँ कोई भी निर्माण करना संभव नहीं है। गाँव के सारे भवनों
Aug
04
2011
अन्ना फिर उतरो मैदान में
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मनमोहन सरकार पहले भी गलत थी और दुबारा मुगालते में है। पिछली बार जब अन्ना हजारे ने अनशन की बात कहीं थी तब भी डा मनमोहनसिंह ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। सबने सोचा कुछ नहीं होगा। अन्ना हजारे फालतू आदमी है। फालतू आदमी की धमकी फालतू है। पर वह फालतू आदमी अनशन से राष्ट्रनायक बना। मनमोहन सरकार सोई हुई पाई गई। फिर वहीं हो रहा है। सरकार और कांग्रेस गलतफहमी में है कि अन्ना हजारे फेल होगे। उनका अनशन पीटेगा। रामदेव के फ्लाप शौ से सरकार कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास में है। अन्ना हजारे को अनशन पर नहीं बैठने देने वाले हालात बनाने की कोशिश है। क्या ऐसा होगा? दरअसल अन्ना हजारे का पिचके गुब्बारे की थीसिस देने वाले तर्क देते है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढा करती। अन्ना हजारे को मीडिया ने बनाया है। अब मीडिया व नेता बिरादरी को सिविल सोसायटी की अराजकता के खतरे समझ में आ गए है। ये बातें आम आदमी की सोच से विपरित है। मध्य वर्ग हो, नौजवान हो या गरीब, वह अन्ना हजारे को अपनी उम्मीद मान चुका है। अन्ना इसलिए नायक है क्योंकि वे जनता की भाषा बोल रहे है, उसकी तकलीफ बता रहे है। इसलिए सरकार वापिस
Jun
13
2011
अनशन के साथ ही टूट गया विश्वास
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हमें उम्मीद थी कि जैसे दिल्ली में लोगों की भारी भीड़ के कारण कानून व्यवस्था के अस्त व्यस्त होने का खतरा पैदा हो गया था, वैसा ही कुछ हरिद्वार में भी होगा. इसलिए हम तीन साथी दिल्ली से शनिवार की सुबह तीन बजे ही बाबा रामदेव के आश्रम के लिए निकल पड़े थे। जैसी हमें उम्मीद थी कि रास्ते जाम मिलेंगे, हुआ भी वैसा ही लेकिन कारण बाबा का सत्याग्रह नहीं बल्कि गंगा दशहरा का होना साबित हुआ. शनिवार को गंगा दशहरा का त्योहार था इसलिए यह भ्रम हुआ कि रास्ते में जो भीड़ मिल रही है, वह हरिद्वार नहीं बाबा रामदेव के द्वार जा रही है। रुड़की में जब हमारे जाने का रास्ता बदल दिया गया तो इस बात की पुष्टी हो गई कि बाबा रामदेव का आंदोलन उफान पर है. लेकिन शायद ऐसा नहीं था.
जाम और थोड़ी बहुत अपनी गल्तियों और आराम तलबी के कारण छह सात घंटों का सफर हमने तेरह-चौदह घंटे में पूरी किया. हरिद्वार पहुंचकर हम सीधे बाबा के आश्रम गए. दोस्त शंभू ने कहा भी कि वहां जाने का कोई फायदा नहीं है, वहां कुछ नहीं मिलने वाला. बाबा तो अस्पताल में होंगे. फिर कौन मिलेगा पातंजली योगपीठ में?
शंभू के इस तर्क
Jun
09
2011
अनशन की छीनाझपटी में अन्ना निकले आगे
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अन्ना से अनशन का आइडिया लपककर जो बाबा रामदेव अपने सितारे बुलंद करना चाहते थे उसी आइडिया से उनके सितारे गर्दिश में चले गये हैं. न रामदेव अनशन करने रामलीला मैदान आते, न कांग्रेस से उनका पाला पड़ता और न उन्हें वह सब भुगतना पड़ता जिसे वे आज भुगत रहे हैं. एक जून को विशेष विमान से इंदौर से दिल्ली पहुंचे रामदेव का रुतबा तब आसमान पर जा टिका जब केन्द्र के चार वरिष्ठ मंत्री उनकी सेवा में एयरपोर्ट पहुंच गये. हालांकि खबर यह भी है कि वारंट लेकर पुलिसवाले भी वहां पहुंचे थे लेकिन उस दिन रामदेव को गिरफ्तार इसलिए नहीं किया क्योंकि सरकार को लगा कि अभी गीदड़ को शहर के और अंदर तक आ जाने दो. लेकिन चार दिन पहले जो सरकार एयरपोर्ट पर उनके चरणों में बिछी दिख रही थी, चार दिन बाद उसी सरकार ने रामदेव को जनाने कपड़े में घसीटकर पहले एम्बुलेंस में भरा फिर एक जहाज में भरकर देहरादून छोड़ आयी. देहरादून से हरिद्वार पहुंचे तो पहली बार एक सच बोला कि सरकार उनको अन्ना हजारे के खिलाफ इस्तेमाल करना चाह रही थी.
जब पांच जून को रामदेव पतंजलि योगपीठ को सुपुर्द हो चुके थे तो अब पांच जून को अन्ना हजारे दिल्ली
Jun
05
2011
प्रहसन का पीड़ादायी पटाक्षेप
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तकनीकि रूप से चार जून बीत चुकी थी. दिनभर चली राजनीतिक उठा पटक और पोल खोल ने बाबा रामदेव के सत्याग्रह को पहले ही महत्वहीन कर दिया था. केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल ने शाम को ही बाबा रामदेव के साथी आचार्य बालकृष्ण की एक चिट्ठी सार्वजनिक कर दी जिसमें सत्याग्रह शुरू होने से पहले ही उसे खत्म करने का आश्वासन दे दिया गया था. सत्याग्रह की विश्वसनीयता पर यह सबसे बड़ा कुठाराघात था. लेकिन इससे बड़ा कुठाराघात रात के एक बजे हुआ. करीब दो घण्टे की सफाई के बाद थके हारे बाबा रामदेव और उनके सत्याग्रही अपनी अपनी जगह विश्राम में चले गये थे. कुछ सत्याग्रही शाम को ही वापस भी लौट गये थे, जो बचे थे वे विश्राम मे थे. रात करीब 11 बजे रामलीला मैदान के चारों ओर पुलिस की करीब पांच हजार की फौज घेरा डालकर खड़ी हो गयी थी. नई दिल्ली स्टेशन की तरफ, अजमेरी गेट की ओर, तुर्कमान गेट की तरफ और जाकिर हुसैन कालेज के चौगिर्द पुलिस की बसे भर भरकर खड़ी कर दी गयीं. रामलीला मैदान की चारों ओर से बैरिकेटिंग कर दी गयी. रामलीला मैदान तक पहुंचनेवाली हर रोड पर नाकेबंदी करके रास्तों को बदल दिया गया था. रात के
May
31
2011
जेपी लूट रहा है जमीन
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दिल्ली से आगरा के रास्ते में ही पता चला कि जन सुनवाई राजा की मंडी के पास जिस जगह पर होनी थी, वहां जिला प्रशासन ने उसकी अनुमति देने से मना कर दिया है. यही नहीं, यह भी खबर मिली कि जिला प्रशासन गावों में किसानों को जन सुनवाई में हिस्सा लेने पर देख लेने की धमकी दे रहा है. किसानों को आतंकित करने और धमकाने के अलावा उन्हें फुसलाया जा रहा है. आयोजकों ने बताया और बाद में पीड़ित किसानों की बात सुनते हुए इसकी पुष्टि भी हुई कि पूरे इलाके में जबरदस्त आतंक का माहौल है.
किसी तरह जल्दी में यूथ हास्टल के सभागार में जन सुनवाई का इंतजाम किया गया. सुनवाई में कोई डेढ़ सौ के आसपास किसान पहुंचे थे. लेकिन वे सभी एक वे एक तरह से अलग-अलग गावों के प्रतिनिधि थे. कोई 12 बजे से शुरू हुई जन सुनवाई 5 बजे तक चली. इसके बाद शुरू हुई किसानों की एक के बाद आपबीती. सबके पास अपना और अपने गांव के दूसरे साथियों का वह दुखड़ा था जिसमें एक्सप्रेसवे और टाउनशिप के नाम पर जबरिया जमीन अधिग्रहण और उसके लिए अपनाए तौर-तरीकों का मार्मिक ब्यौरा था.
किसानों के बयानों से कई बातें सामने आईं जिनके बारे


