जनता दरबार
May
17
2012
सुरक्षा के ताबूत में स्वार्थ की कील
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इस साल की शुरुआत में केंद्र सरकार ने गृह मंत्रालय के उस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी जिसके तहत नैशनल काउंटर टेररिज्म सेंटर(एनसीटीसी) की स्थापना होनी थी. मूल योजना के अनुसार यह संगठन १ मार्च २०१२ से अपना काम करना शुरू कर देता. इसके लिए जारी किये गए सरकारी नोटिफिकेशन में बताया गया था एनसीटीसी एक बहुत ही शक्तिशाली पुलिस संगठन के रूप में काम करेगा. ऐसे प्रावधान किये गए थे आतंकवाद के मामलों की जांच एनसीटीसी के अफसर किसी भी राज्य में कर सकेगें. इन अफसरों को संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ्तार करने के अधिकार दिए गए थे. यह तलाशी भी ले सकेगें और इंटेलिजेंस इकठ्ठा करने के अधिकार भी इस संगठन के पास होगा. एनसीटीसी के पास नैशनल सेक्योरिटी गार्ड को भी तलब करने का अधिकार दिये जाने का प्रस्ताव है.
कारगिल में हुए संघर्ष में इंटेलिजेंस की नाकामी के बाद केंद्र सरकार ने एक ग्रुप आफ मिनिस्टर्स का गठन किया था जिसने तय किया कि एक ऐसे संगठन की स्थापना की जानी चाहिए जो आतंरिक और वाह्य सुरक्षा के मामलों की पूरी तरह से ज़िम्मेदारी ले सके.मंत्रियों के ग्रुप ने कहा था कि एक स्थायी संयुक्त टास्क फ़ोर्स बनायी जानी चाहिए जिसके पास एक ऐसा संगठन भी
May
10
2012
गुटबाजों के कारण गर्दिश में फंसे दल
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खबर के अनुसार इससे पहले बैठक में बहुत उत्तेजक बहस हुयी और इसी बीच राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी ने फोन पर संघ के नजदीकी गुलाब चन्द कटारिया की प्रस्तावित जनजागरण यात्रा का समर्थन करते हुए तिथि भी तय कर दी, इससे वसन्धुरा राजे सिन्धिया बिफर गयीं। उनका विश्वास है कि इस तरह की यात्रा का नेतृत्व करने वाला मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी बन सकता है इसलिए उनके अलावा किसी और के नेतृत्व में यह यात्रा नहीं होना चाहिए। उल्लेखनीय यह है कि भाजपा की मातृपितृ संस्था आरएसएस कटारिया के नेतृत्व में यात्रा के पक्ष में थी, क्योंके वे संघ के समर्पित स्वयं सेवकों में माने जाते हैं।
दूसरी ओर राजस्थान के ही भरतपुर में उसी दिन कांग्रेस की सम्भागीय कार्यशाला चल रही थी जिसमें पूर्व सांसद विश्वेन्द्र सिंह और उनके समर्थकों ने कई पदाधिकारियों की लात घूंसों से पिटायी कर दी व कपड़े फाड़ दिये और प्रदेश अध्यक्ष डा. चन्द्रभान समेत मंचासीन लोग देखते ही रह गये। पूर्व राज परिवार से सम्बन्धित उक्त पूर्व सांसद ने भी पार्टी कार्यकर्ताओं के असंतुष्ट होने का बहाना बनाते हुए कहा कि भरतपुर में पार्टी के अध्यक्ष का पद एक ऐसे व्यक्ति को सौंप दिया गया है जिसकी भाजपा नेताओं से गहरी सांठ
Apr
29
2012
माया नहीं अखिलेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है
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दिल्ली में एक अजीब माहौल बन रहा है कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार के खिलाफ कुछ न कुछ लिखना ज़रूरी है वरना निष्पक्ष पत्रकार के रूप में पहचान नहीं बन पायेगी. यहाँ इस विषय पर बात नहीं की जायेगी कि राहुल गांधी की छींक को भी खबर बनाकर अभिभूत होने वालों और अखिलेश यादव के राजनीतिक निर्णयों को मामूली बताने वालों की मानसिकता क्या है. अभी डेढ़ महीने पहले उत्तर प्रदेश की जनता ने इस मानसिकतावालों को उनकी औकात बता दी थी और राजनीति के जनवादीकरण की मिसाल पेश की थी. दिल्ली में एक ऐसा वर्ग है जो लगातार कोशिश कर रहा है कि उत्तर प्रदेश की मौजूदा सरकार को राज्य की पिछली सरकार के खांचे से बाहर ही न आने दिया जाए. दोनों सरकारों की तुलना ऐसे बिन्दुओं पर की जाए जिनपर डेढ़ महीने में कोई बदलाव हो ही नहीं सकता. मसलन अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के साथ साथ ही टेलिविज़न चैनलों पर हाहाकार मच गया था कि राज्य में अपराध बढ़ रहा है. अब सब को मालूम है कि जिस राज्य में अपराध और राजनीति में चोली दामन का साथ है वहां बिजली के स्विच ऑन या ऑफ़ करने से अपराध पर
Apr
18
2012
एमसीडी का एबीसीडी
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हार पर साफगोई से बात करते हुए कांग्रेस सांसद व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित ने सही ही कहा है कि मंहगाई ने नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की लुटिया डूबो दी। दरसल दिल्ली में कांग्रेस को एकसाथ दो सत्ताविरोधी लहर का का सामना करना पड़ा। एक तो केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ बने माहौल ने दिल्ली नगर निगम में बीजेपी के भ्रष्टाचार की पोल खुलने से बचा लिया तो दूसरी वजह ने याद दिला दी कि शीला दीक्षित सरकार पर राष्ट्रमंडल खेल के दौरान लगे आरोप मतदाताओं के जेहन में आज भी जिंदा है। इन दोनों सच्चाई से मुंह मोडने के लिए बहाने तलाशे जा रहे हैं।
मुंबई म्युनिसपल कारपोरेशन और अब दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस की आस पर पानी फेर कर लोगों ने बता दिया है कि गुस्से से भरे लोगों ने वोट करने वक्त यह सोचने की ताकत गंवा दी है कि वह नगर निगम के लिए वोट कर रहे हैं या मनमोहन अथवा शीला दीक्षित की सरकार के खिलाफ रायशुमारी का इजहार कर रहे हैं। गुस्से का ही नतीजा है कि कुल मतदान में खुद के हिस्से आए कम मत प्रतिशत के बावजूद बीजेपी बल्ले बल्ले कर रही है।
Apr
05
2012
अठन्नी रह गया आईपीएल का उत्साह
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कहा जाता है कि अति हमेशा बुरी होती है। चार वर्ष पहले आईपीएल को लेकर दर्शकों की तरफ से काफी रिस्पांस मिला था। आईपीएल शुरू होने के पहले ही अखबार और टीवी इसके विज्ञापनों से लद जाते थे। मैच के दौरान तो सिनेमा घरों में सन्नाटा छा जाता था। आईपीएल के चलते नई फिल्में भी रिलीज नहीं होती थीं। पहले आईपीएल समारोह में अक्षय कुमार, ऋतिक रोशन और केटरीना कैफ की उपस्थिति से लोगों को खूब मनोरंजन हुआ था। इस बार ऐसा कुछ भी दिखार्ठ नहीं दे रहा है। बालीवुड को भी आईपीएल का भय नहीं है, इसीलिए एजेंट विनोद और हाऊसफुल 2 भी प्रदर्शित हो गई। इसके बाद 6 अप्रैल को टाइटेनिक का थ्री डी संस्करण रिलीज हो रहा है, संभव है उस दिन मैदान खाली रहें और सिनेमाघरों में भी़ उमड़ पड़े। टीवी पर विज्ञापन देने वाली कंपनियों में भी उत्साह दिखाई नहीं दे रहा है। सुपरस्टॉर अमिताभ बच्चन को बुलाकर यदि अपना उद्धार कर लेती है, तो उसका भला हो सकता है, पर इसकी उम्मीद कम ही है। बच्चन जी इसके पहले ‘मिस वर्ल्ड’ के कर्ताधर्ता रह चुके हैं। वह स्पर्धा भी कामयाब नहीं हो पाई थी।
आईपीएल दर्शकों के उत्साह में कमी आने का सबूत है
Apr
02
2012
धन प्रतिनिधि की गिरफ्त में जन प्रतिनिधि
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ऐसा बताते हैं कि लोकतांत्रिक संसद की शुरुआत इंग्लैण्ड से हुई। इंग्लैण्ड के संसद के शुरुआती दौर में देश के शाही खानदान के लोग, बड़े-बड़े पैसे वाले सदस्य हुआ करते थे। जब अमरीका 1776 में आजाद हुआ ब्रितानी गुलामी से, तो उसने भी लोकतंत्र अपनाया। पर 1861-65 के गृहयुद्ध में अमरीका की लोकतांत्रिक व्यवस्था चरमरा गयी और उद्योगपतियों ने उसका लाभ उठाकर लोकतंत्र पर अपना शिकंजा कस लिया। जो कुछ उस देश में होने जा रहा था, उसे देखकर अपनी मृत्यु से ठीक पहले राष्ट्रपति इब्राहिम लिंकन ने कहा था, ‘‘कारपोरेट सिंहासन पर बैठ गये हैं-नतीजन उच्च स्थानों पर भ्रष्टाचार का युग आयेगा और धन सत्ता लोगों के पूर्वाग्रहों का लाभ उठाकर अपना शासन बढाने की पूरी कोशिश तब तक करेगी जब तक सम्पत्ति कुछ हाथों में न सिमट जाय और लोकतंत्र समाप्त न हो जाय।’’
आजाद होने पर भारत ने भी इग्लैण्ड, अमरीका जैसे देशों की तर्ज पर देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनायी, केन्द्र में संसद बनी, प्रदेशों में विधानसभाएं गठित र्हुईं। इनमें वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराकर जनप्रतिनिधि भेजे गये। आजादी की लम्बी लड़ाई का प्रभाव देश में था और कोई 15 साल तक लोकतांत्रिक व्यवस्था कमोवेश ठीक चलती रही। लोगों के बीच से सामान्य लोग
Mar
29
2012
जनता की छटपटाहट है अन्ना की आहट
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बेशक, उपवास के दौरान इस्तेमाल हुए एक कहावत (मुहावरे) पर संसद में हंगामा हुआ। क्या ये विश्वास किया जा सकता है कि सदन में बैठने वालों को ये मालूम न हो कि 'चोर की दाढी में तिनका' एक कहावत है और ये कि इसका अर्थ है दोषी का चौकन्ना रहना? फिर ये हंगामा क्यों? असल में टीम अन्ना का निशाना इस बार व्यापक था। एनडीए के संयोजक शरद यादव मुहावरा प्रकरण से जुड़ गए। देश के लोक जानते हैं कि साफ़ छवि वाले शरद भाषणों के दौरान अक्सर बहक जाते हैं, संसद में भी और संसद के बाहर भी। राहुल गांधी पर उनके अमर्यादित बयान से कांग्रेसी नेता बेहद नाराज हुए थे। बावजूद इसके २६ मार्च को संसद में टीम अन्ना पर तिलमिलाए शरद यादव का वही कांग्रेसी मेज थपथपा कर साथ दे रहे थे।
कांग्रेसी, दरअसल उस मकसद को कामयाब होता देख रहे थे जिसके तहत महीनो पहले बड़े जतन से यूपीए सरकार के कुछ मंत्रियों ने आन्दोलन को टीम अन्ना वर्सेस संसद में तब्दील करने की कोशिश की थी। कांग्रेस की सधी प्रतिक्रिया से संकेत मिलने लगा है कि पार्टी अब आन्दोलन के प्रति आक्रामक नीति का त्याग करने के मूड में है। सुषमा स्वराज का संसद
Mar
24
2012
राज्यसभा बिकाऊ है
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राजनीति के वर्तमान दौर में जिस तरह से संसदीय राजनीति में सत्ता के हर रंग को लोकतंत्र का रंग बना दिया गया है उसमें लोकतंत्र ही कैसे ठस हो गया है, यह राजयसभा के सीटों की तस्वीर उभार देती है। पिछले साल राज्यसभा के कुल 245 सदस्यों में से 128 सदस्य उघोगपति, व्यापारी, बिल्डर या बिजनेसपर्सन रहे। यानी राज्यसभा के आधे सांसदो का राजनीति से सिर्फ इतना ही लेना-देना रहा कि राजनीतिक दलों का दामन पकड़कर अपने धंधो को फलने-फूलने के लिये संसद पहुंच गये। संसद सदस्य बनते ही सारे अपराध भी ढक गये और विशेषाधिकार भी मिल गये। यानी नोट के बदले कैसे राज्यसभा को ही धंधे के लाभ में बदला जा सकता है, उसका खुला नजारा नीतियों के जरीये ही उभरता है। मौजूदा वक्त में राज्यसभा के सांसद के तौर पर सबसे ज्यादा उद्योगपति और बिजनेस पर्सन हैं। इनकी तादाद करीब 86 है। जबकि बिल्डर और व्यापारियों की संख्या करीब 40 है । और इसमें से अधिकतर सांसदों की भूमिका राज्यसभा में पहुंचने से पहले किसी पार्टी विशेष के नेताओं के लिये हर सुविधा मुहैय्या कराने की ही रही है। और इस दायरे में क्या कांग्रेस, क्या बीजेपी, हर क्षेत्रीय स्तर के राजनीतिक दल आये हैं। हालांकि वामपंथियों
Mar
17
2012
उम्मीदों के ईश अखिलेश
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मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का काम बहुत ही मुश्किल है. सबसे बड़ा तो यही कि पिछली सरकार ने अपना पांच साल पूरा किया और उसके राज की जो सबसे बड़ी बात राज्य के अंदर और राज्य के बाहर मालूम है ,वह यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री के बहुत करीबी लोगों ने नोयडा और ग्रेटर नोयडा के कुछ लोगों को अपना एजेंट बना रखा था और वे यहाँ पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर अरबों रूपये की वसूली करते थे. बताते हैं कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा में ज़मीन के हर इंच की बिक्री में इन लोगों ने मुख्यमंत्री या उनके भाई के नाम पर उगाही की. पिछले एक हफ्ते से दिल्ली के आसपास के इलाकों में चर्चा है कि जिन लोगों ने पूर्व मुख्यमंत्री के यहाँ वसूली का तंत्र बना रखा था, उन्होंने किसी बिल्डर की मार्फ़त अखिलेश यादव के यहाँ भी अपनी पंहुच बना ली है और कुछ सौ करोड़ रूपये अखिलेश यादव के यहाँ पंहुचा दिया है. अखिलेश यादव का मुख्यमंत्री के रूप में सबसे बड़ा काम होना चाहिए कि इस तरह के लोगों के बारे में पता करें और उनको ऐसी सज़ा दें कि आने वाले पांच वर्षों में किसी की हिम्मत न पड़े कि वह मुख्यमंत्री के नाम
Mar
13
2012
जो वादा किया है वो निभाना पड़ेगा
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नया मुल्ला ज्यादा प्याज खाता है, अगर इस अंदाज में उत्तर प्रदेश की सपा सरकार ने वादों पर वाकई अमल करना शुरू कर दिया तो राज्य के खजाने में भारी सेंध लग सकती है। नए वित्त वर्ष 2012-12 में 12,171.29 करोड़ रुपए की राजस्व बचत दिखानेवाली उत्तर प्रदेश सरकार खटाक से 10,300 करोड़ रुपए से ज्यादा के राजस्व घाटे में आ जाएगी। कारण, सपा ने किसानों की कर्जमाफी की जो घोषणा की है, उस पर एकमुश्त करीब 11,500 करोड़ रुपए खर्च होगा। अन्य लोकलुभावन योजनाओं पर हर साल इसके ऊपर से कम से कम होनेवाला 11,000 करोड़ रुपए का खर्च अलग है।
किसानों की कर्जमाफी के बारे में सपा का चुनाव घोषणापत्र यूं तो चुप है। लेकिन मुलायम सिंह यादव ने कहा था और जीत के बाद अखिलेश ने इसे दोहराया भी है कि उनकी सरकार किसानों के 50,000 रुपए तक के सारे कर्ज माफ कर देगी। बैंक ऑफ बड़ौदा की अध्यक्षता में बनी राज्यस्तरीय बैंकर्स कमिटी के अनुसार दिसंबर 2011 तक कुल बकाया कृषि ऋण 57,700 करोड़ रुपए का था। यूं तो उत्तर प्रदेश के 90 फीसदी किसान लघु या सीमांत किसान हैं और छोटा ऋण ही लेते हैं। फिर भी अगर 50,000 रुपए तक के ऋणों का



