जन-जीवन
Mar
26
2012
अनमोल हुई अनुपम की 'तालाब'
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करीब बासठ चौसठ साल के जीवन में जो कुछ कमाया है वह यह किताब ही है. सीता बावड़ी से सजी हुई. सीता जी की ही तरह सर्व सुख दायिनी. सर्व सौभाग्य दात्री. किताब के कवर पेज की इस सीता बावड़ी के "बीचोबीच एक बिन्दु है जो जीवन का प्रतीक है. मुख्य आयात के भीतर लहरें हैं, बाहर हैं सीढ़ियां. चारों कोनों पर फूल हैं जो जीवन को सुगंध से भर देते हैं." किताब जहां पन्नों का साथ छोड़कर मन का साथ पकड़ लेती है वहां बताती है कि यह सीता बावड़ी और कुछ नहीं बल्कि एक ऐसा प्रतीक है जो जमीन पर नहीं बल्कि भारतीय समाज के जीवन में मौजूद है गोदना बनकर. "एक पूरे जीवन दर्शन को आठ दस रेखाओं में उतार पाना कठिन काम है लेकिन हमारे समाज का बड़ा हिस्सा बहुत सहजता के साथ इस बावड़ी को गुदने की तरह अपने तन पर उकेरता है."
शुरू से लेकर आखिर तक सीता बावड़ी से सजी यह किताब भारत में 'तालाब कैसे बनाएं' की बजाय 'तालाब ऐसे बनाएं' का विवरण है. तालाब की कहानी पेज नंबर 5 से शुरू होती है और पेज नंबर 86 पर खत्म हो जाती है. लेकिन साथ में बाइस पन्नों की संदर्भ सूची है
Jul
27
2011
मुंबई शहर की समेकित बाल विनाश योजना
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समेकित बाल विकास योजना (आईसीडीएस) और उसी की तर्ज पर ही महाराष्ट्र राज्य में संचालित योजना “एकात्मिक बाल विकास योजना” के तहत कुल ८८ हजार २ सौ ७२ आँगनवाड़ियों को संचालित किया जा रहा है और बताते है कि महाराष्ट्र में इस योजना से ८६ लाख ३२ हजार बच्चे लाभान्वित हो रहे है किन्तु जब हमने इस आँगनवाड़ी योजना को लेकर मुंबई की स्थिति की जानकारी इकट्ठी की तो हमने पाया कि इन आँगनवाड़ियों (बालवाड़ी) की आड में भारी पैमाने पर गडबडियां की जा रही हैं. इन आँगनवाड़ियों (बालवाड़ी) से संबंधित गडबड़ियों एवं भ्रष्टाचार में आकंठ तक डूबे प्रकल्प अधिकारियों ( Project Officer) से लेकर आँगनवाडी कार्यकर्ता सभी शामिल है. इस योजना के मुंबई में संचालन का जिम्मा कुल ३२ प्रकल्प अधिकारियों ( Project Officer) पर है प्रत्येक प्रकल्प अधिकारी के अंतर्गत २० से २५ आँगनवाड़ी (बालवाड़ी) प्रत्येक आँगनवाड़ी (बालवाड़ी) में अनौपचारिक स्कूल पूर्व शिक्षा प्राप्त कर रहे कम से कम ३० और अधिक से अधिक ५० बच्चे है. इस तरह मुंबई में सरकार द्वारा चलाई जा रही इन आँगनवाड़ियों (बालवाड़ी) में लगभग २८ हजार बच्चे अनौपचारिक स्कूल पूर्व शिक्षा प्राप्त कर रहे है.
इन आँगनवाड़ी (बालवाड़ी) के प्रत्येक बच्चे के लिए पूरक पोषाहार के रूप में मध्यान्ह भोजन (Mid
Jul
11
2011
भारत पर बढ़ता जनसंख्या दबाव
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फिर भी बढ़ती जनसंख्या देश की सबसे गंभीरतम समास्याओं में प्रमुख समास्या है जिस पर चिंता तो अवश्य जताई जाती है पर ठोस समाधान के लिए कोई भी आगे आने को तैयार नही है। जनसंख्या को नियंत्रण करने में हमारी सरकारे, समाज और व्यवस्था लगातार असफल होते जा रहे है और इसको नियंत्रण करने के लिए चलाये जा रहे कार्यक्रम मजाक का विषय बन कर रह गये है। आज हम आबादी के मामले में चीन के बाद दूसरे नम्बर पर है अगर इसी तरह हमारी आबादी बढ़ती रही तो कोई संदेह नही कि हम चीन को पीछे छोड़ देगें। क्योंकि चीन ने अपने यहां आबादी को नियंत्रित करने के लिये सख्त कदम उठाये है। चीन में दूसरी संतान के बाद दंपतियों पर परिवार नियोजन का नियम लागू रहता है और वह उसे बलपूर्वक लागू भी करते है। हमारे यहा लोकतंत्र है कम से कम हम आम सहमति से इसे अपना सकते है लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि हम अपना वोट बैंक छिटक जाने के डर से इस पर चर्चा करने से भी कतराने लगे है।
जनसंख्या के बढ़ते दबाव के कारण हम बुनयादी सुविधायों में लगातार पीछे जा रहे है शहरों पर बढ़ते लगातार दबाव के चलते शिक्षा, चिकित्सा, सामाजिक
Jul
07
2011
अजब प्रेम की गजब कहानी
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सवाल यह है कि शादी के फौरन बाद उसमें अपने पति को असलियत बताने की हिम्मत कैसे आ गई? यदि वह शादी से पहले ऐसा कर पाती तो नितीश की जिंदगी दोराहे पर खड़ी नहीं होती। न ही उसके परिवार की इज्जत तार-तार होती। जैसे इतना ही काफी नहीं था। अब वही आरती अपने पिता के पास पहुंचते ही नितीश और उसके परिवार को अदालत में खींचने की साजिश कर रही है और ‘पत्नी’ के बाद ‘बहन’ के रिश्ते को भी बदनाम करने पर तुली नजर आ रही है।
दरअसल, मीडिया ने युवा पीढ़ी को जेट रफ्तार से बहुत आगे पहुंचा दिया है, जबकि समाज अभी पुरानी मान्यताओं और रूढ़िवाद में ही फंसा हुआ है। आरती प्रकरण को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। आरती घर वालों से छुपकर शादी तो कर लेती है, लेकिन रूढ़िवादी पिता के सामने उसे बताने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। अब जब वह पिता के संरक्षण में चली गई है तो एक बार फिर वह सब कुछ करने तैयार है, जो पिता चाहता है। सच तो यह है कि हम सब के अंदर कहीं न कहीं जातिवाद और धर्म इतना गहरे पैठ किए हुए है कि उससे बाहर आना नहीं चाहते।
Jun
15
2011
प्रवासी हैं, परग्रहवासी नहीं
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यह पीड़ा किसी एक व्यक्ति की नहीं है बल्कि महानगर में झुग्गियों में बसने वाले लाखों-करोड़ों लोगो की यही जुबानी है। शहर की 35 से 40 प्रतिशत आबादी झुग्गी-बस्तियों में बसती है यह ऐसी जगहें है जहा लोग नारकीय स्थितियों में जीवन व्यतीत कर रहे है। कोई उनकी मदद नही करना चाहता क्योंकि उन पर अवांछित प्रवासी होने का ठप्पा लगा दिया गया है। यह सच है कि वह प्रवासी है लेकिन वह किसी बहारी देश से नही आये है, वह भारतीय हैं। गरीबी ने उन्हें शहरों की खाक छानने को मजबूर कर दिया है वे दिल्ली जैसे महानगर की उत्पादक शक्ति है इस शहर के आर्थिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है, पूंजीपतियों से लेकर मध्यवर्गीय और मंत्रियों से लेकर सरकारी बाबूओं तक यह अपनी सेवाएं देते है इस सबके बावजूद हम इन्हें महानगर पर एक दाग के समान देखते है हालांकि हम यह भी जानते है कि अगर यह न हो तो हमारा जीवन कितनी मुश्किलों भरा होगा। इस सबके बावजूद हम इनसे लेना ही चाहते है और बदले में उन्हें अच्छा जीवन स्तर और रिहाईश देने की उपेक्षा दुत्कार देते है।
इसी सप्ताह मुझे गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘झुग्गी-झोपड़ी एकता मंच’ के एक कार्यक्रम में अमंत्रित किया
Jun
12
2011
मंहगे पेट्रोल की सस्ती राजनीति
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हैदराबाद में पेट्रोल की कीमत वाली मिसाल इसलिए कि पडोसी देश पाकिस्तान में भी एक हैदराबाद है। वहां के हैदराबादी लोग हमारे हैदराबाद की तुलना आधी कीमत यानी महज पैतीस रूपए लीटर की दर से पेट्रोल अपनी गाड़ियों में भरवाते हैं। सिर्फ हैदराबाद ही नहीं करांची, एबटाबाद, लाहौर और इस्लामाबाद यानी पूरे पाकिस्तान में लोग उतनी रकम में दो लीटर पेट्रोल खरीद लेते हैं जितने में हम भारतीय मनमसोसकर महज एक लीटर पेट्रोल अपने वाहन में भरवाते हैं।
तो हमारा कसूर क्या है? एक ही बाजार से खरीदी गई पेट्रोल की कीमत हमसे ज्यादा क्यों वसूलती है सरकार? हमारा अफसोस इसलिए भी गहरा है कि हमारी अजब गजब की दावेदारी है। हम दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक देश हैं , स्वस्थ लोकतंत्र के नागरिक हैं, सरकार को कल्याणकारी मुद्रा में रखने को मजबूर करने का ताकत हममे बहुतों से ज्यादा है। ये बातें हम गर्व करते रहते हैं। कहते नही अघाते कि जोर से विरोध पर आजादी के बाद से कई मर्तबा हमने सरकारें बदल दी हैं। तो फिर पेट्रोल जैसी निहायत जरूरी पदार्थ की आसमान छूती कीमत पर हम चुप क्यों हैं? क्या है हमारी मजबूरी ?
समाजशास्त्र से निकला इसका सीधा जवाब सिर्फ ये हो
May
11
2011
पेट भरें या पर्यावरण बचाएं किसान?
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समाचार माध्यमों में एक ही मुद्दे पर जितने तरह के समाचार आते हैं वे वस्तुत: एक भ्रम की स्थिति बना देते हैं। मसलन एक तरफ ये खबर हैं कि कृषि योग्य जमीन और उत्पादकता दोनों घट रही है तो दूसरी तरफ ऐसी खबरें भी आ रही हैं कि पैदावार बहुत बम्पर हुई है और सरकार के पास उसे रखने की जगह तक नहीं है। कृषि मंत्री का यह भी दबाव है कि गेहू का काफी दिनों से बंद पड़ा निर्यात फिर से शुरु कर दिया जाय,हालाँकि बढ़ती खाद्य मुद्रा स्फीति को देखते हुए सरकार अभी इसके पक्ष में नहीं है। यहॉ यह जान लेना उचित होगा कि जिस प्रकार मानव उपभोग या उपयोग की बहुत सी वस्तुऐं एक ही स्थान या देश में उपलब्ध नहीं होतीं और जरुरतमंद देश उनका आयात-निर्यात करते रहते हैं,खाद्यान्न भी उसी श्रेणी में हैं। अविखंडित सोवियत रुस जैसे विशाल भौगोलिक क्षेत्रफल वाले देशों में भी कृषि योग्य जमीन बहुत कम थी और अपनी खाद्य जरुरतों के लिए वह भारत जैसे देशों पर निर्भर रहता था और विखंडन के बाद आज भी उसकी यही स्थिति है।
दुनिया में तमाम ऐसे देश हैं जहॉ औद्योगिक प्रगति तो बहुत ज्यादा है लेकिन कृषि वहाँ उनकी घरेलू
Apr
28
2011
अलविदा टाईपराईटर!
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अस्सी के दशक तक मीडिया में प्रिंट का दबदबा चरम पर था, (है तो आज भी किन्तु इलेक्ट्रानिक और वेब मीडिया के आगे इसकी छवि उतनी उजली नहीं बची है) इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है। उस समय संपादकों द्वारा वही रचनाएं प्रकाशन के लिए स्वीकार की जाती थीं, जो सुपाठ्य अक्षरों में या टाईप की हुई हुआ करती थीं। न जाने कितने चलचित्र की पटकथा भी इन्ही टाईपराईटर से कागजों पर उतरी होंगी। कहते हैं कि हालीवुड के मशहूर किरदार जेम्स बांड की सुपर डुपर हिट फिल्मों के लेखक इयान फ्लेमिंग के पास एक सोने का बना टाईपराईटर था।
दुनिया के चौधरी अमेरिका में 1714 में हेनरी मिल द्वारा इस मशीन का अविष्कार किया था। इसके लगभग डेढ़ सौ साल के लंबे सफर के उपरांत क्रिस्टोफर लामथ शोलेज द्वारा इसे 1864 में अंतिम बार नया रूप दिया और तब से इसका स्वरूप यही बना रहा। टाईपराईटर का व्यवसायिक उत्पादन 1867 में आरंभ हुआ था। 1950 के आते आते टाईपराईटर की लोकप्रियता लोगों के सार चढ़कर बोलने लगी। सरकारी कामकाज में टाईपराईटर का उपयोग जरूरी महसूस किया जाने लगा। इसी दौरान अमेरिका की कंपनी स्मिथ कोरोन ने दस लाख टाईपराईटर बेचकर रिकार्ड कायम किया। 1953 में तो
Mar
31
2011
पैसा लाओ डिग्री ले जाओ
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शिक्षा के विकास की गति और सरकारी दावे को देखते हुए सरकार की इस योजना में कोई बुराई नजर नहीं आती। अगर कॉलेज या संस्थान नामचीन हैं तो उन्हें डिग्री के लिए किसी विश्वविद्यालय या डीम्ड विश्वविद्यालय पर क्यों आश्रित रहना चाहिए। कुशल और शिक्षित दिमागों और हाथों की खोज में जुटी दुनिया में इससे भारतीय छात्रों की पूछ और पहुंच ही बढ़ेगी। तभी एशिया और ज्ञान की इक्कीसवीं सदी में भारतीय डंका ठीक तरीके से बज सकेगा। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की इन उम्मीदों और उत्साह पर रंज करना जरूरी भी नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि वैधानिक तरीकों की आड़ में अपने यहां जिस तरह से शिक्षा क्षेत्र में मनमानियां की जा रही हैं, डर उसी की वजह से है। कुछ इसी तरह भारतीय छात्रों का भला चाहते हुए स्वर्गीय अर्जुन सिंह ने डीम्ड विश्वविद्यालयों की सीरिज खड़ी कर दी। शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने और ज्यादा से ज्यादा छात्रों तक को डिग्रियां देने के लिए डीम्ड विश्वविद्यालयों की जो सीरीज खड़ी की गई, उनकी हालत अंदरखाने में जाकर ही पता चल पाएगी।
हकीकत में ये डीम्ड विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटने की दुकानें बन गए हैं। दिल्ली से सटे हरियाणा में दो मानद विश्वविद्यालय हैं। दोनों ने अपने अध्यापकों
Mar
31
2011
मानव तस्करी का गढ़ बना मध्य प्रदेश
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मानव तस्करों ने आधे मध्यप्रदेश को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। मानव तस्करी पर पुलिस की उदासीनता के चलते गोरखधंधे में लिप्त लोगों ने 50 में से 24 जिलों में नेटवर्क जमा लिया। जिलों से गायब कई युवक-युवतियों का अर्से से पता नहीं चल पाया। पुलिस भी मानने लगी है कि ये मानव तस्करी का शिकार हो गए। पुलिस ने दो महीने में मानव तस्करी पर होमवर्क किया तो चौंकाने वाली जानकारियां पाकर आंखें खुल गईं। पुलिस मुख्यालय ने मानव तस्करी को लेकर जनवरी में सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों को एक परिपत्र भेजा था। इसमें महिलाओं व बालक-बालिकाओं के खरीद-फरोख्त के पिछले पांच साल में दर्ज प्रकरणों, अपराध के पीछे किसी संगठित गिरोह के सक्रिय होने और खरीद-फरोख्त की रोकथाम के प्रयास का ब्यौरा मांगा।
मंदसौर और नीमच जिलों में मौजूद बांछड़ा समुदाय खुले आम वेश्यावृत्ति करता है, जहां से मानव तस्करी के मामले उजागर होते हैं। पुलिस की जानकारी में सब कुछ होने के बावजूद इस ओर ध्यान नहीं दिया जाना आश्चर्य का विषय है। पुलिस ने दो महीने में मानव तस्करी पर होमवर्क किया तो चौंकाने वाली जानकारिया पाकर आखें खुल गईं। पुलिस मुख्यालय ने मानव तस्करी को लेकर जनवरी में सभी जिलों के पुलिस अधीक्षकों


