दक्षिणायन
Mar
28
2011
भरोसे के संकट में हम भारत के लोग
By
अगर छत्तीसगढ़ समेत देश के अन्य जगह पर हुए आतंकवाद के सन्दर्भों पर नज़र डालें ऐसा भी देखा गया है कि आतंकी खुद सरकार को बदनाम करने के लिए भी पुलिस या सेना की वर्दी पहन कर वारदात करते रहे हैं ताकि सरकार को बदनाम किया जा सके. इसके अलावा देश के अंदर या बाहर के भी किसी युद्ध भूमि पर जवानों द्वारा भी कई बार आपा खो कर किये गए कारवाई से इनकार नहीं किया जा सकता है. लेकिन बस्तर में सवाल तो यह है कि जब दोनों पक्ष एक-दुसरे पर आरोप लगा रहे हों तो आखिर भरोसा किया किस पर जाय? निश्चित ही ऐसे मौके पर सही विकल्प के रूप में देश में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार को ही रखना होगा. अभी तक का अनुभव भी यही कहता है कि नक्सल के पैरोकार बुद्धिजीवी जान-बूझ कर लोकतंत्र को कमज़ोर करने, एक सोची समझी साज़िश के तहत ही झूठ पर झूठ गढते रहे हैं. उनके कई झूठों का न्यायालय और लोकतंत्र के विभिन्न स्तंभों द्वारा पर्दाफ़ाश भी किया जाता रहा है.
जैसे सबसे पहले छत्तीसगढ़ में ‘सलवा जुडूम’ कायकर्ताओं द्वारा कथित तौर पर किये जा रहे मानवाधिकार हनन की खबर दुनिया भर में उछाला गया. मामले

