देश प्रदेश
May
17
2012
राजनीतिक मनमर्जी की निर्मम बनर्जी
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मूलत: कांग्रेसी पृष्ठभूमि की ममता कांग्रेस में विभिन्न पदों पर रहने के बाद सन १९८४ में इंदिरा लहर पर सवार होकर पहली बार ससंद में पहुंची और वो भी दिग्गज सोमनाथ चटर्जी को उनके गढ़ जाधवपुर में शिकस्त देकर। १९८४ का चुनाव अटलबिहारी वाजपेई, हेमवतीनंदन बहुगुणा और सोमनाथ चटर्जी जैसे राजनिति के दिग्गजों की इंदिरा लहर में हार को लेकर चर्चित रहा है। कांग्रेस के तत्कालीन नेता राजीव गाँधी ने बड़ी चतुराई से इन दिग्गजों को उनके घर में ही मात दी थी। ऐसे वातावरण में दिल्ली पहुंची ममता ने शयद उसी जोश और जूनून को अब तक कायम रखा है।
बंगाल कांग्रेस में सिद्दार्थ शंकर राय ,प्रणव मुखर्जी और प्रिय्रंदास मुंशी से ममता की कभी नहीं बनी। अति महत्वाकांक्षी ममता १९९१ में नरसिम्हा राव की सरकार में मंत्री भी रहीं। लेकिन शुरू से ही ममता की छबि एक लड़ाकू नेत्री की बनी जिसकी किसी से भी पटरी नहीं बैठती। कभी अमर सिंह तो कभी रामविलास पासवान किसी ना किसी से ममता का वाद -विवाद बना ही रहा।
अंतत: ममता ने सन ९७ में कांग्रेस से नाता तोड़ कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया। ममता समय के साथ राजनतिक लाभ के लिए किसी का भी साथ ले सकती है और
May
16
2012
मध्य प्रदेश में माफिया राज
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अवैध कारोबार पर नकेल कसने की कोशिश में सरकार के कारिंदे कहीं बँधक बनाये जा रहे हैं , कहीं सरेआम रौंदे जा रहे हैं या फ़िर बदमाशों के गोली, लाठी,डंडे खाने को मजबूर हैं। सत्ता का गुरुर अब मगरुरी में तब्दील होता जा रहा है। जो अधिकारी अपना ईमान और ज़मीर बेचने को राज़ी नहीं है, वो सत्ताधारी दल के लोगों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। उन्हें झूठे आरोपों में फ़ँसाकर निलंबन या बार-बार तबादले की सज़ा दी जा रही है।
यह हमारे लोकतंत्र की विडंबना है कि जब एक जाँबाज युवा पुलिस अधिकारी मुरैना में खनन माफियाओं की चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने लहू की अंतिम बूँद भी धरती पर बहा रहा था... तब हमारे प्रदेश के मुखिया होली के रंगों में सराबोर हो रहे थे । जब उस युवा पुलिस अधिकारी की पत्नी अपनी कोख में साढ़े आठ माह के शिशु को लेकर अपने सुहाग को मुखाग्नि दे रही थी... फाग गाते, ढोल मँजीरे बजाते हमारे प्रदेश के मुख्यमंत्री की तस्वीरें अखबारों और चैनलों में छाई थीं।
एक ऐसी हत्या, जिसकी चर्चा केवल प्रदेश में ही नहीं, बल्कि देश में हो रही हो, उस घटना पर सूबे के मुख्यमंत्री का बयान
May
11
2012
कारिन्दों की काली कमाई
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मध्य प्रदेश में अब तक की सबसे बड़ी छापेमारी करते हुए लोकायुक्त पुलिस ने स्वास्थ्य विभाग के संचालक अमरनाथ मित्तल और जूनियर आडिटर गणेश प्रसाद किरार के यहां से करीब सवा सौ करोड़ रूपये की संपत्ति जब्त की है। यह अकेला ऐसा मामला नहीं है। आयकर, लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू ने पिछले तीन सालों में करीब तीन सौ से ज्यादा जगह छापे मारे और करीब एक हजार करोड़ रुपये की काली कमाई उजागर की है। वहीं जांच एजेंसियों की माने तो अभी भी यहां के अधिकारियों-कर्मचारियों की तिजोरी और लॉकरों में करीब 10000 करोड़ की काली कमाई पड़ी हुई है। जानकारी के अनुसार आयकर विभाग ने तीन सालों में एक दर्जन से ज्यादा अफसरों के यहां छापा मारकर करीब 700 करोड़ रुपये से ज्यादा की अघोषित संपत्ति का खुलासा किया है। भ्रष्टाचार का नजारा यह है कि भ्रष्ट अरबपति अफसरों और करोड़पति क्लर्को, बाबुओं, चपरासियों में एक-दूसरे को पछाडऩे की होड़-सी चल रही है। लोकायुक्त संगठन द्वारा पिछले ढाई वर्ष में प्रदेश में 203 रिश्वतखोर अधिकारी-कर्मचारियों को पकड़ा। 81 के यहाँ छापामार कार्रवाई कर 103 करोड़़ की संपत्ति जब्त की है। इन सरकारी आंकड़ों से मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है, जिसे लेकर विपक्ष ने सत्तारूढ़
May
08
2012
कांग्रेस का मिशन डिफीट
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वैसे भी यह कांग्रेस की परंपरा रही है कि बहुमत मिलने के पश्चात् ही निर्वाचित सदस्यों की बैठक में आलाकमान का फरमान सुनाया जाता है कि कौन बनेगा प्रदेश का मुख्यमंत्री. अभी हाल में ही उत्तराखंड राज्य में भी ऐसा ही हुआ है. यह तय करना पूर्ण रूप से आलाकमान के हाथ में रहता है कि वह निर्वाचित सदस्यों में से किसी को नेता घोषित करे या बाहर से किसी को ला कर बैठाये. यह बात दीगर है कि कांग्रेस की इस स्थापित परम्परा से अधिकतर नेता नाखुश हैं और इसे लोकतान्त्रिक पद्दति के विपरीत बताते हैं.
हिमाचल प्रदेश कांग्रेस में भी विगत काफी समय चल रही नेताओं की गुटबाजी से साधारण कार्यकर्ता बहुत ही असमंजस की स्थिति में थे. गुटबाजी और भीतरघात व बढ रहे अनुशासनहीनता के कारण ही पांच राज्यों व दिल्ली के स्थानीय निकायों के चुनावों में कांग्रेस की यह (दुर) दशा हुई है. परन्तु सत्ता के मद में मस्त दिल्ली में बैठी दोनों सरकारों और संगठन के शीर्ष नेतृत्व ने अपनी कमियों को दूर करने की अपेक्षा भ्रष्टाचार और महंगाई से त्रस्त आम जनता को ही ऑंखें तरेरना शुरू कर दिया. पांच राज्यों के चुनावों के नतीजों के बाद तो इनको समझ जाना चाहिए था
May
07
2012
राजे के राज से संघ की रंजिश
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प्रदेश के संघनिष्ठ नेताओं को वसुंधरा राजे से कितनी एलर्जी है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और पूर्व उप प्रधानमंत्री व वरिष्ठ भाजपा नेता लाल कृष्ण आडवाणी के यह साफ कर देने पर कि आगामी विधानसभा चुनाव वसुंधरा राजे के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा, गुलाब चंद कटारिया व ललित किशोर चतुर्वेदी ने यह कह विवाद पैदा किया कि ऐसा पार्टी में तय नहीं किया गया है। उसी कड़ी में जब संघ के नेताओं को पता लगा कि वसुंधरा जल्द ही प्रदेश में अपने आपको स्थापित करने के लिए रथ यात्रा निकालने की तैयारी कर रही हैं, कटारिया ने खुद मेवाड़ अंचल में यात्रा निकालने की घोषणा कर दी।
इस पर जैसे ही वसुंधरा के इशारे पर कटारिया से व्यक्तिगत रंजिश रखने वाली पार्टी महासचिव व राजसमंद विधायक किरण माहेश्वरी ने विरोध किया तो बवाल हो गया। उसी का परिणाम है ताजा जलजला, जिसमें वसुंधरा ने एक बार फिर इस्तीफों का हथकंडा अपना कर केन्द्रीय नेतृत्व को मुश्किल में डाल दिया है। हालांकि विवाद बढऩे पर कटारिया अपनी यात्रा स्थगित करने की घोषणा कर चुके हैं, अर्थात अपनी ओर से विवाद समाप्त कर चुके हैं, मगर इस
May
06
2012
वसुंधरा की धरा पर भाजपा की औकात
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ना तो दिल्ली की चलेगी और ना राजस्थान की किसी और बिल्ली की चलेगी। और वसुंधरा के सामने पूरी बीजेपी के एक बार फिर बौनी और बेजार साबित हो जाने से भी बड़ी खबर यह है कि जो लोग अगले साल बीजेपी को सत्ता में पक्का आता हुआ देख रहे थे, वे बहुत सहम गए हैं। इस घटना से उनको लगने लगा है कि हालात अब भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। अंदर का माहौल पिछले चुनाव जैसा ही है। वसुंधरा का अड़ियल रवैया भी बिल्कुल वैसा ही है, जिसकी वजह से पिछली बार पूरी पार्टी डूब गई थी। अपन आज तक यह तो नहीं जान पाए कि ये बांछें होती कहां हैं, पर इतना जरूर जानते हैं कि बीजेपी में इस बवाल के बाद राजस्थान में कांग्रेस और अशोक गहलोत की बांछे बहुत खिल रही हैं।
मामला सिर्फ इतना सा है कि गुलाबचंद कटारिया मेवाड़ इलाके में बीजेपी के प्रति सदभावना जगाने के लिए लोक जागरण यात्रा निकाल रहे थे। जो, वसुंधरा राजे के चंगुओं को नागवार गुजर रही थी। उनको लग रहा था कि इससे कटारिया का कद बहुत बढ़ जाएगा और उनकी औकात घट जाएगी। सो, चंगुओं के चेताने पर वसुंघरा जागी और अपने कद
Apr
24
2012
सेना से उलझी धूमल सरकार
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द्वितीय विश्व युद्ध से ही सेना के कब्जे में चल रहे इस मैदान को जहाँ सेना सामरिक महत्व का बताते हुए इस पर अपना कब्ज़ा छोड़ने को तैयार नहीं है वहीँ धूमल सरकार इस कब्जे को गैर-कानूनी बताते हुए इसे स्थानीय प्रशासन को देने की बात कर रही है ताकि खेल-कूद गतिविधियों के लिए यहाँ एक बहुउद्देशीय स्टेडियम का निर्माण किया जा सके. अन्नाडेल मैदान पर सेना के कब्जे को गैर कानूनी बताते हुए पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल ने एक वक्तव्य में कहा कि- "अन्नाडेल मैदान पर सेना का गैर-कानूनी कब्जा है, क्योंकि इसकी लीज की अवधि 30 वर्ष से भी पहले समाप्त हो चुकी है." वहीँ दूसरी ओर सरकार के समर्थन और इस मैदान पर बहुद्देश्यीय स्टेडियम के निर्माण के लिए उतरी हिमाचल प्रदेश क्रिक्रेट एसोसिएशन (एचपीसीए) ने इसे स्थानीय प्रशासन को देने की मांग की है. विदित हो कि मुख्यमंत्री धूमल के पुत्र व भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सांसद अनुराग ठाकुर ही एचपीसीए के अध्यक्ष हैं. मैदान पर अधिकार पर उठे इस विवाद के पीछे में अनुराग ठाकुर का हाथ होने के आरोप भी लगाये जा रहे हैं.
धूमल का बयान पश्चिमी कमान की ओर से जारी उस बयान के बाद आया, जिसमें कहा
Apr
22
2012
कार्टून बन गये संघर्ष करनेवाले
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अगर बंगाल के सियासी तौर तरीको में बीते चार दशकों को तौलें तो याद आ सकता है कि एक वक्त सिद्रार्थ शंकर रे सत्ता के हनक में नक्सलबाडी को जन्म दे बैठे। फिर नक्सलबाडी से निकले वामपंथी मिजाज ने सिंगूर से लेकर नंदीग्राम तक जो लकीर खिंची उसने ममता के मां,माटी मानुष की थ्योरी को सत्ता के ड्योढी तक पहुंचा दिया। लेकिन इन सियासी प्रयोग में वामपंथ की एक महीन लकीर हमेशा मार्क्स-एंगेल्स को याद करती रही। शायद इसीलिये तीन दशक की वामपंथी सत्ता को उखाडने के लिए ममता की पहल से कई कदम आगे वामपंथी बंगाल ही चल रहा था जिसे यह मंजूर नहीं था कि कार्ल मार्क्स और फ्रेड्रिक एंगेल्स को पढ कर वामपंथी सत्ता ही वामपंथ भूल जाये। लेकिन सत्ता पलटने के बाद वाम बंगाली हतप्रभ है कि अब तो कार्ल मार्क्स और एंगेल्स ही सत्ता को बर्दास्त नहीं है। वाम विचार से प्रभावित अखबार भी सत्ता को मंजूर नहीं हैं। जिस अतिवाम के हिंसक प्रयोग को वामपंथी सत्ता की काट के लिये मां, माटी, मानुष का नारा लगाकर ममता ने इस्तेमाल किया गया उसी अतिवाम के किशनजी का इनकांउटर कराकर ममता ने संकेत दे दिये कि जब संसदीय सियासत ही लोकतंत्र का मंदिर है तो इसके
Apr
13
2012
बदलाव के नाम पर बदले की राजनीति
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ममता के शासन के तौर तरीकों की निगहबानी करने वालों को अब उनका लहजा रास नहीं आ रहा है। कालेजों से लेकर अस्पतालों तक- हर जगह तोडफोड़ और हिंसक कारर्वाइयां बंगाल में रोजमर्रा के समाचारों के शीर्षक बन चुके हैं। यही नहीं, कालेजों में शिक्षकों पर ममता की पार्टी के लोग लगातार हमले चला रहे हैं। ऐसी एक नहीं, अनेक वारदात हुयी हैं, जहां कालेजों में आचार्यों को धकियाया गया, कक्ष से बाहर लाकर पीटा गया। अस्पतालों में अधीक्षकों पर वामपंथी समर्थक होने का इलजाम लगाकर बदसलूकी की गयी। डीजल-पेट्रोल का मूल्य बढने के बाद किराया बढ़ाने की मांग करने वाले आटो रिक्सा चालकों को सरेआम थप्पड़ रसीद करने के लिए ममता के चहेते विधायक परेश पाल खुद मैदान में उतरे। आटो चालकों को मीडिया के सामने जमकर पीटा, उठ बैठ करायी और ऊपर से तपर्रा यह कि ऐसा जनहित में किया गया। ऐसी वारदातों पर ममता बनर्जी का मुक समर्थन जनता की निगाह में उनके खुद के नारे का विलोम प्रतीत हो रहा है। लोग साफ कहने लगे हैं कि ममता बनर्जी स्वयं बदले की राजनीति को प्रश्रय दे रही हैं।
गत दिसम्बर महीने में एक निजी अस्पताल में आग लगने की वारदात के बाद ममता ने बढ़चढ़कर जिस
Apr
12
2012
गुंडई की सुविधाजनक सफाई
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उत्तर प्रदेश के २००७ के चुनावों में जनता के सामने दो विकल्प थे– समाजवादी पार्टी का अपराध और गुंडाराज और बहुजन समाज पार्टी का भ्रष्टाचार. प्रदेश की जनता ने साफ़ सन्देश देते हुए आगामी पांच साल के लिए भ्रष्टाचार को चुना और समाजवादी पार्टी के अपराध और गुंडाराज को नकार दिया. चुनाव से पूर्व के साढ़े तीन साल के शासनकाल में समाजवादी पार्टी ने कार्यकर्ताओं को छूट के बहाने छेड़-छाड़, अपहरण, लूट, बलात्कार, ह्त्या, डकैती जैसे जघन्यतम अपराधों पर अंकुश लगाने का कभी कोई संकेत नहीं दिया था. जिसका खामियाजा उसे विगत चुनावों में भोगना पड़ा. प्रदेश की बेबस जनता ने पूर्व में इन दोनों दलों की सरकारों को भोगा था. वो इन दोनों दलों की शासन की नीति और नीयत से अनजान ना थी. ऊंची जातियों खासकर ब्राह्मणों ने ने खुलकर हरिजन-समर्थक बसपा का साथ दिया था.
बसपा को चुनने का उनका मंतव्य साफ़ था, गुंडा-राज से मुक्ति और धन देकर अपने काम करा लेने की आजादी. जैसा कि हुआ भी यही कि धन-शक्ति संपन्न लोगों के काम प्राथमिकता के आधार पर बसपा सरकार में किये गए. गरीब और शोषित समाज का आधार वोट-बैंक को संतुष्ट करने के लिए सरकारी योजनाओं में स्थान देने में कोई गुरेज नहीं की


