परत-दर-परत
May
16
2012
कोयले के लूट की काली कहानी
By
झारखण्ड में कोयले की लूट
झारखण्ड निर्माण के बाद रां को अपनी सरकारों से बड़ी उम्मीद बनी थी कि लोग सुरक्षित होंगे और विकास की नई परिभाषा गढ़ी जाएगी। परन्तु विकास के लिए सरकारों ने केन्द्र सरकार के साथ मिलकर राज्य के खजानों को देशी-विदेशी कम्पनियों को लूटने की छूट देकर झारखण्डी जनता का अपमान किया है। जैसा कि आप जानते हैं, झारखण्ड प्रदेश में कोयले का कुल भण्डार 78935.475 मिलियन टन है जो भारत के राज्यों में प्रथम स्थान रखता है, जिसका बाजार मूल्य 235 लाख 80 हजार 794 करोड़ रुपया है। इस भण्डार में से 9994.475 मिलियन टन कोयले का भण्डार 67 कोयला ब्लॉकों में आवंटित किया गया है। इनमें से 22 ब्लॉक सरकारी एवं 45 ब्लॉक निजी कम्पनियों का आवंटित किए गए हैं। ये भण्डार स्पंज, आयरन, ऊर्जा, पिग आयरन, स्टील तथा व्यवसायिक उपयोग के लिए कैप्टिव कोयला ब्लॉक के रूप में आवंटित किए गए हैं। झारखण्ड बनने के बाद जो कोयला ब्लॉक आवंटित किए गए, उसकी मात्रा 9709.475 मिलियन टन है। इस आवंटित कोयले का वर्तमान बाजार भाव से मूल्य 29 लाख 12 हजार 842.50 करोड़ रुपया है। ये ब्लॉक 30 वर्षों के लिए आवंटित किए गए हैं, अर्थात वर्तमान दर से प्रतिवर्ष 97094.75 करोड़
May
08
2012
विश्वव्यापी वंशवाद
By
भारत में नेहरू-घांदी परिवार केंद्रीय राजनीति का केंद्रबिन्दु है। पाकिस्तान में बीते तमाम दशकों में भुट्टो परिवार का दबदबा रहा है। श्रीलंका में भंडारनायके तो बांग्लादेश में मुजीबुर्रहमान और जिया-उर-रहमान परिवारों के वंशज सत्ता के केंद्र में हुआ करते हैं। भारत के तमाम प्रदेशों में राजनीति के अनुवांशिक अलंबरदार क्षत्रप बने बैठे हैं। प्रणव मुखर्जी या डॉ. मनमोहन सिंह समग्र कुशाग्रता और योग्यता के बावजूद कांग्रेसी राजनीति में तीसरे पायदान से ऊपर नहीं उठ सकते। उन्हें सोनिया घांदी और राहुल घांदी के बाद ही पार्टी कैडर में सम्मान हासिल होगा। आजम खां मुस्लिम वोट बैंक के ठेकेदार बन सकते हैं, पर जब राजनीतिक विरासत देने की बात आएगी तो न केवल यादव परिवार बल्कि पूरा समाजवादी कुनबा अखिलेश सिंह यादव को अंगीकार करता है। बीजू पटनायक ने तो कभी नवीन पटनायक को राजनीतिक वारिस के तौर पर पेश भी नहीं किया, पर नवीन पटनायक ही अंततः बीजू जनता दल के तारणहार बने। चौधरी चरण सिंह की लोकदल पर अजीत सिंह की बजाय मुलायम सिंह यादव की पकड़ बेहतर हुआ करती थी, बावजूद इसके जाट वोट बैंक आज दिन तक अजीत सिंह का अनुगमन करता है। शेख अब्दुल्ला-फारूख अब्दुल्ला के बाद उमर अब्दुल्ला ही नेशनल कांफ्रेंस के सूत्रधार बनते हैं। मुफ्ती
May
01
2012
ओसामा बिन आतंक का अगला निशाना
By
अफगानिस्तान की सरजमीं को अगर अमेरिकी नेतृत्ववाली फौजों ने नियत समय पर छोड़ दिया तो अफगान सत्ता-अमेरिकोन्मुखी कठपुतली सरकार के पास होगी या पाकिस्तान परस्त तालिबान के कब्जे में? क्या आतंकवाद एक बार फिर पाकिस्तान के पश्चिमी पड़ोसी के गर्भ से निकलकर पूर्वी पड़ोसी भारत में निर्यात होने लगेगा? क्या भारत अपनी आतंरिक सुरक्षा को लेकर चौकस है? आतंकवाद पर अमेरिका की क्या रणनीति हो सकती है? आतंकवाद की अर्थव्यवस्था किन भू-भागों पर विस्तार पाएगी? पाकिस्तान के शासक क्या सोचते हैं? ओसामा के खात्मे के एक साल बाद की स्थितियों की पड़ताल जरूरी है।
मौत की बरसी पर एलर्ट: 2 मई को ओसामा की पहली बरसी के निमित्त अमेरिका ने पूरी दुनिया में एलर्ट जारी कर रखा है। यदि किसी अमेरिकी संस्थान पर लादेन की मौत की याद में कोई आतंकी कार्रर्वा होती है तेा अमेरिका तत्काल जवाब देने के लिए तत्पर है। शेष दुनिया में अमेरिका ने ऐसी नाकाबंदी की है कि अल कायदा और तालिबान अमेरिकी विरोधी कार्रवाई करने से पहले ड्रोन के मार के भय से आक्रांत हैं। तालिबान अपनी पूरी ताकत लगा कर फिलहाल सिर्फ अफ-पाक (अफगानिस्तान-पाकिस्तान) क्षेत्र में ही अमेरिकी हितों पर हल्ला बोल की हिम्मत जुटा सकता है। अमेरिका भी जानता है कि पाकस्तिान
Apr
24
2012
संगीनों के साये में जिन्दगी का साया
By
यह मार्च की पतझड़ का मौसम है. पेड़ों की पत्तियां सूख कर गिर चुकी हैं और रात के तकरीबन नौ बजे हैं जब हम जंगल में अपना रास्ता भूल चुके हैं. झारखण्ड झाड़ों का प्रदेश है और यहां घूमते हुए यह महसूस किया जा सकता है कि यहां राज्य, नौकरशाही और लोकतंत्र सब अपना रास्ता भूल चुके हैं. यह गढ़वा और लातेहार के बीच की कोई जगह है. मेरे साथ दैनिक भास्कर के पत्रकार सतीश हैं जिन्हें कुछ महीने पहले माओवादी होने के आरोप में पुलिस द्वारा प्रताड़ित किया जा चुका है. सड़क जैसी कोई चीज इन्हीं पत्तियों के नीचे दबी है जो साहस के साथ बगैर किसी पुल के नदी और नालों के उस पार निकल जाती है, मसलन नदी को सड़क नहीं, सड़क को नदी पार करती है.
हम मोटरसाईकल को बार-बार रोक, पीछे मुड़ कर देखते हैं और स्वाभाविक भय के साथ आगे बढ़ जाते हैं. सूखी पत्तियों पर घूमते पहिए किसी के पीछा करने का आभास देते हैं. यह पहियों के रौंदने से पत्तियों के चरमराने की आवाज है. साखू के फूल पूरे जंगल को खुशबू से भरे हुए हैं पर खौफ और भय किसी भी खुशबू और आनंद पर भारी होता है. सतीश को इन
Apr
10
2012
विडंबनाओं और विरोधाभासों की पुनरावृत्ति
By
इस सम्मलेन से उम्मीद की जा रही थी कि पार्टी नए तेवर और तरीके के साथ भारतीय राजनीति में अपनी खोयी हुयी ज़मीन को पाने और उसे बढ़ाने की जुगत और जज़्बे के साथ नज़र आएगी. लेकिन, इसके उलट यह सम्मलेन और इसकी क़वायदें पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए दिखे.
माकपा दुनिया की सबसे बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों में से एक है तथा सीमित और सिमटते जनाधार के बावज़ूद भारत के राजनीतिक-पटल पर उसका प्रभाव है लेकिन मौज़ूदा वक़्त उसके राजनीतिक इतिहास का सबसे कठिन दौर भी है. बंगाल और केरल के विधानसभा चुनावों में हार, लोकसभा में बहुत-थोड़ी सीटें, गाल में समर्थकों पर माओवादियों-तृणमूल के दस्तों का लगातार हिंसात्मक हमला, माकपा-समर्थि
र संगठनों और कर्मचारी संगठनों का कमज़ोर होना आदि ऐसे कारक हैं जिनके कारण पार्टी का राष्ट्रीय राजनीति में दखल कम हुआ है. ऐसे में यह सम्भावना थी कि पार्टी संगठन और देश के हालात पर खुलकर आत्म-मंथन करेगी और बेहतरी के लिए कारगर कदम उठाएगी. यह उम्मीद इसलिए भी की जा रही थी कि आज भी माकपा में राजनीतिक और बौद्धिक रूप से ईमानदार और सक्षम नेताओं की कमी नहीं है और यह भी कि वैश्विक संकट और देश में उसके कुप्रभाव से त्रस्त जनता को
Apr
07
2012
भ्रष्टाचार का नेशनल हाईवे
By
करोड़ों रुपये की घूसखोरी भी इन योजनाओं में देखने को मिल रही है। वर्ल्ड बैंक इंस्टीट्यूशनल इंटीग्रिटी यूनिट की यह रिपोर्ट विश्व बैंक की मदद से बन रहे राष्ट्रीय राजमार्गों पर आधारित है। इस रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि प्रोग्रेसिव कंस्ट्रक्शन लिमिटेड और पीसीएल-एमवीआर ज्वाइंट वेंचर भ्रष्टाचार कर रहे हैं। इन कंपनियों पर फर्जी वाउचर देकर १४.७१ करोड़ अग्रिम भुगतान लेने, दूसरे चरण में भी फर्जी वाउचरों की मदद से १४.६४ करोड़ और २६.४४ करोड़ अग्रिम लेकर अन्य प्रोजेक्ट्स पर खर्च करने का आरोप है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि प्रोजेक्ट से जुड़े ठेकेदार फर्जी बिल लगाकर विश्व बैंक का पैसा हज़म कर रहे हैं। लखनऊ-मुज्जफ्फरपुर हाइवे योजना में ठेकेदार ने फर्जी बिलों के ज़रिये विश्व बैंक को ४० करोड़ रुपये से ज्यादा की चपत लगाई। यही नहीं ठेकेदार विश्व बैंक का रूपया जो वह राष्ट्रीय राजमार्गों को बनाने हेतु स्वीकृत करता है, उसे किसी अन्य योजना में लगाकर लाखों के वारे-न्यारे कर रहे हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि रिपोर्ट में जिस सड़क निर्माण कंपनी पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए हैं वह हैदराबाद के एक कांग्रेस सांसद की है जिसे एनएचएआई ने पहले तो काली सूची में डाला किन्तु कुछ समय बाद उसे
Apr
06
2012
आंधी आई, चली गई
By
तानाशाही हमेशा ही घातक होती है चाहे वह व्यक्ति की हो या गु्रप की, अथवा संसदीय। लोकतंत्र और तानाशाही बिल्कुल दो विपरीत अवधारणाएं हैं। तानाशाही में शासन का संविधान होता है और लोकतंत्र मे संविधान का शासन। यदि कार्य पालिका, विधायिका तथा संविधान संशोधन एक ही इकाई के पास इकठ्ठा हो तो वह लोकतंत्र नही हो सकता।
स्वतंत्रता के बाद गांधी जी लोक स्वराज्य के पक्षधर थे और नेहरू जी तथा अम्बेडकर जी लोक स्वराज्य की जगह लोकतंत्र के। लोकतंत्र घोषित हुआ किन्तु गांधी जी के मरते ही लोकतंत्र का स्वरूप संसदीय तानाशाही का बना दिया गया। कार्यपालिका पर नियंत्रण, विधायिका के सम्पूर्ण तथा संविधान संषोधन तक के अधिकार संसद ने अपने पास सुरक्षित कर लिये। डा0 लोहिया जयप्रकाश तथा विनोबा से खतरा दिखता था। लोहिया जी से समझौता किया गया, जयप्रकाश को अनदेखा किया गया और विनोबा को सब तरह की सुविधाएं देकर समाज सुधा
ाइन पकडा दी गई। यदि न्यायपालिका ने केशवानंद भारती प्रकरण मे असंवैधानिक तरीके से अंकुश न लगाया होता तो संविधान और संसद तो बिल्कुल ही एक दूसरे के पूरक बन गये थे।
परिणाम हुआ कि संसद लगातार तानाशाही की दिशा मे बढती चली गई और समाज गुलाम होता गया। समाज
Mar
28
2012
बजट में उपेक्षित ग्रामीण भारत
By
बहरहाल इस बजट से कुछ हद तक किसानो को जरूर फायदा होगा और अब किसानों को किसानी घाटे का सौदा नहीं रह जायेगा ! ज्ञातव्य है कि एन एस एस ओ की एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 41 फीसदी किसान अपनी किसानी छोड़ना चाहते है ! 2.5 की ग्रोथ दर से कृषि क्षेत्र जहां अपनी सांसे गिन रहा था तो ऐसे में कृषि एवं सहकारिता विकास के लिए वित्त मंत्री द्वारा चालू वित्त वर्ष आयोजना परिव्यय को 18 फीसदी बढाकर 17123 करोड़ रूपये (2011 -2012 ) से 20 ,208 करोड़ रुपये (2012 -2013 ) करने के साथ-साथ कृषि कर्ज में भी 1 ,00 ,000 करोड़ रुपये का इजाफा करते हुए 4,75,000 करोड़ रुपये (2011 -2012 ) से 5,75,000 करोड़ रुपये (2012 -2013 ) की व्यवस्था कर दी गयी है जिससे कुछ हद तक सूदखोरों से किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है ! साथ ही किसानों को प्रति वर्ष 7 प्रतिशत की दर पर अल्पावधि फसल ऋण के लिए ब्याज आर्थिक सहायता को जारी रखा गया है एवं कर्ज समय से चुकाने वाले किसानो को 3 प्रतिशत की अतिरिक्त राहत की व्यवस्था की जायेगी !
यूरिया उत्पादन - क्षेत्र में अगले पांच वर्ष में आत्म निर्भरता का लक्ष्य
Mar
17
2012
मुलायम का राज कांशीराम का काज
By
दलितो के मसीहा माने जाने वाले बसपा संस्थापक कांशीराम बैसे तो पूरे देश भर मे याद किये जाते है लेकिन कांशीराम को याद करने वालो की मुलायम के घर इटावा मे कोई कमी नही है। मुलायम सिंह यादव के गृह जिले इटावा के लोगो ने कांशीराम को एक ऐसा मुकाम हासिल कराया जिसकी कांशीराम को एक अर्से से तलाश थी। कहा यह जाता है कि 1991 के आम चुनाव मे इटावा मे जबरदस्त हिंसा के बाद पूरे जिले के चुनाव को दुबारा कराया गया था। दुबारा हुये चुनाव मे बसपा सुप्रीमो कांशीराम ने खुद संसदीय चुनाव मे उतरे। मुलायम सिंह यादव ने समय की नब्ज को समझा और कांशीराम की मदद की जिसके एवज मे कांशीराम ने बसपा से कोई प्रत्याशी मुलायम सिंह यादव के लिये जसवंतनगर विधानसभा से नही उतारा जबकि जिले की हर विधानसभा से बसपा ने अपने प्रत्याशी उतरे थे।
चुनाव लड़ने के दौरान कांशीराम इटावा मुख्यालय के पुरबिया टोला रोड पर स्थित अनुपम होटल मे करीब एक महीने रहे थे। वैसे अनुपम होटल के सभी 28 कमरो को एक महीने तक के लिये बुक करा लिया गया था लेकिन कांशीराम खुद कमरा नंबर 6 मे रूकते थे और 7 नंबर मे उनका सामान रखा रहता था।
Mar
15
2012
राजीव गांधी से राहुल गांधी तक कांग्रेस के तीन दशक
By
तीस बरस बाद के हालात पर गौर फरमाइए, आप कुछ बेहद अलग स्थिति देख पाएंगे और फिर भी दोनों में काफी समानता है. उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के अभियान को भले ही जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी गई, लेकिन जीत हुई है एक क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव की. 1982 में, जब राजीव गांधी ने सत्ता संभाली, तमिलनाडु ही अकेला बड़ा राज्य था, जहां कांग्रेस पार्टी वोट और सीटों के लिए अन्नाद्रमुक जैसे संगठनों पर निर्भर होकर हाशिये पर खड़ी थी. 2012 में, जैसे ही राहुल गांधी ने पार्टी की कमाल अपने हाथों में ली, एक तिहाई भारत में कांग्रेस की हालत ठीक वैसी ही हो गई है.
बहुत से राजनीतिक पंडित और विद्वान कांग्रेस की हाल में हुई लगातार हार की कई वजहें गिना रहे हैं. चंद लोगों ने ही कहा है कि गांधी साम्राज्य का करिश्मा अब धुंधला पडऩे लगा है. कुछ निष्ठुर विश्लेषकों ने तो 2014 के लोकसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं. मेरी व्यक्तिगत सोच है कि हर बार जब भी चुनाव होते हैं, तो ऐसे निष्कर्ष निकालने शुरू कर देना बेहद एकतरफा होता है. 2009


