पर्यावरण
May
12
2012
विष रस भरा कनक घट जैसे
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जलनीति के इस मसौदे को अगर देखा जाय तो पहली नजर में मन खुश हो जाता है। जलनीति में पहली बार जल-संकट से निजात के लिए एक एकीकृत दृष्टिकोण को महत्ता दी गई है। ऐसा लगता है कि साफ पेयजल और स्वच्छता के साथ-साथ पारिस्थितिकीय जरूरतों को भी प्राथमिकता दी गई है। पर जब इस मसौदे को हम गहराई से परखते हैं, तो साफ हो जाता है कि किस तरह से इसमें लच्छेदार भाषा का इस्तेमाल करके शब्दों का एक खेल खेला गया है।
मसौदे के सोने जैसे घड़े में जहर भरा हुआ है यानी ‘विष रस भरा कनक घट जैसे’। कई महत्वपूर्ण तथ्य मसौदे से नदारद हैं। पानी को एक मौलिक मानवाधिकार के रूप में कोई विशेष महत्व नहीं दिया गया है जबकि इसके ठीक विपरीत संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने जब 2010 में ‘पेयजल के मानवाधिकार’ का प्रस्ताव पारित किया था तब भारत ने पुरजोर वकालत की थी। लेकिन इस मसौदे में ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिल रहा है। और तो और पानी को एक बाजार की वस्तु बनाने के लिए कई तरह के सुझाव और तर्क दिए गए हैं। इतना ही नहीं जल-सेवाओं में सरकारी भूमिका को भी सीमित कर दिया गया है जबकि अगर
May
03
2012
आधुनिकता का कचरा
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इलैक्ट्रोनिक साधनों के बिना जिंदगी गुजारना किसी भयावह सपने से कम नही है। बिना कंप्यूटर के ऑफिसो में काम नामुमकिन होता जा रहा है, घरों में बच्चे विडियोगेम खेलने के लिए कंप्यूटरों का इस्तेमाल करने लगे हैं, स्कूली सिलेबसों में कंप्यूटर जरूरी हो गया है। तेजी से बढ़ते कंप्यूटरमेनिया से ई-वेस्ट में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। जहाँ पहले एक कंप्यूटर की उम्र 7 से 8 साल हुआ करती थी वहीं वो घटकर 3से 4 साल हो गई है। देश में अभी करीब 8 करोड़ कंप्यूटर हैं और आप जानकर चौंक जाएंगे कि अगले पाँच साल में इसकी संख्या बढ़कर दोगुनी से भी ज्यादा हो जाएगी। लोगों के घरों में मनोरंजन के साधन टेलीविजन की आबादी भी 2015 तक बढ़कर 24 करोड़ के आसपास पहुँच जाएगी। वहीं बात की जाए मोबाइल्स की तो भारत में इसके यूजर भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में लगभग 70 करोड़ मोबाइल इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ई-वेस्ट का प्रबंधन करने वाली कंपनियों का मानना है कि किसी मोबाइल फोन को 98 फीसदी तक रिसाइकिल किया जा सकता है, उसी तरह कंप्यूटर की रिसाइकिलिंग भी कई तरह के नए उत्पादों को जन्म दे सकती है। मेमोरी डिवाइस, एमपी3 प्लेयर
Apr
26
2012
घड़ियाल के आंसू निकल रहे हैं
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कहा जाता है कि खनन माफिया चंबल से बालू का खनन करने के नाम पर घडियालो के अंडो को नष्ट कर रहे है। चंबल संेचुरी के बडे अफसर इन खनन माफियाओ के खिलाफ कोई बडी कार्यवाही अमल मे नही पा रहे है क्यो कि स्थानीय स्तर पर काबिज सेंचुरी अफसर अपने सीनियरो को गुमराह करने वाली रिर्पोट दे रहे है इसी वजह से खनन माफियाओ को कुछ भी नही बिगड रहा है।
चंबल सेंचुरी के डीएफओ सुजाय बनर्जी ने बताया कि चंबल नदी मे इस समय घडियालो के प्रजनन के बाद बालू मे कई हजार की तादात मे घडियाल के अंडे नजर आ रहे है इस समय निषेचन की प्रकिया चल रही है जिससे ऐसी उम्मीद बनी हुई है कि घडियाल की आबादी मे जरूर ही प्रगति होगी लेकिन ऐसी भी खबरे आ रही है चंबल मे कई जगह खनन किया जा रहा है जिससे घडियाल के अंडो को नष्ट किया जा रहा है। इस तरह की रिर्पोटो के मिलने के बाद संेचुरी अफसरो को खनन पर रोक लगाने के संदर्भ मे ना केवल निर्देश दिये गये है बल्कि खनन माफियाओ के खिलाफ कार्यवाही
े के लिये संबधितो से कहा गया है।पर्यावरणीय संस्था सोसायटी फार कंजरवेशन आफ के सचिव
Apr
09
2012
देख रही हो न गंगा माई, अब हम हवा में उड़ रहे हैं
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पहलेजा घाट से बच्चा बाबू के जहाज़ से एलसीटी घाट तक की यात्रा में एक ही कसक होती थी। उफनती लहरों के बीच उबला अंडा बाबूजी खिला दें। उसका पीला हिस्सा और ऊपर काली मिर्च की कतरनें। धोती कुर्ता में पितृपुरुष जब पूछ लेते थे कि खाना है तो लगता था कि गंगा की तरह कितनी ममता है इनमें। गांव से पटना की बीच गंगा ज़रूर होती थी। उसके बाद स्कूल के रास्ते में कई वर्षों तक समानांतर बहती रही। ठीक से याद है कि ज़माने तक गांव से लेदी(गाया का चारा) और हमलोगों के खाने का अनाज नाव पर लाद कर आता था। गंगा ले आती थी। जब नाव आती थी तो घर मलाहों से भर जाता था। मछली का स्वाद बदल जाता था। उनकी चमकती बाज़ुओं की बलिष्ठता आकर्षित करती थी। लगता था कि कितनी शक्ति है इन मलाहों में। सिक्स पैक वाले ख़ानों से बहुत पहले हमने स्वाभाविक बलिष्ठता अपने गांव के मलाहों में देखी थी। मालूम नहीं था कि सड़क और मोटर क्रांति नदियों से सामाजिक रिश्ते को खत्म कर देगी। और फिर एक दिन नदियां भी खत्म होने लगेंगी।
फिर वो वक्त आया जब पटना एशिया से लेकर विश्व तक में प्रसिद्ध हो गया।
Mar
04
2012
नदी जोड़ने का नापाक फैसला
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सपने दिखाने वाली ऐसी योजनाएं अपने साथ जो पेचीदगियां लाएंगी उसका भान फिलहाल अधिकाँश लोगों को नहीं है। इन पर देश-व्यापी विमर्श चलेगा। प्रकृति-प्रेमी , पर्यावरंविद, इकोसिस्टम के जानकार, कृषि विश्लेषक, अर्थ-शास्त्री, समाज-सेवी , एन जी ओ , संस्कृति-कर्मी और स्थानीय स्तर पर जन-हस्तक्षेप करने वाले समूह ( इनमें माओवादी थिंक-टेंक भी होंगे ) अपनी आशंका जताएंगे। ये विमर्श स्वस्थ भी होगा औए माथे पर सिकन भी पैदा करेगा। इसके उलट योजना समर्थक गुलाबी तस्वीर पेश करने से नहीं चूकेंगे। वे बताएंगे कि कैसे इस कदम से भारत दुनिया की सबसे मजबूत अर्थ-व्यवस्था बन सकेगा। सुखाड़ क्षेत्र को पानी और बाढ़ वाले इलाके कि जलजमाव से मुक्ति और साथ ही जल -बिजली की अपार संभावना बेशक ये सुहानी तस्वीरें हैं।
क्या बाढ़ सचमुच इतना बुरा है? क्या नदियों वाले इलाके के लोग बाढ़ नहीं चाहते? जल-जमाव से मुक्त होने के बाद क्या वे पश्चिमी भारत के लोगों की तरह ज्वार-बाजरा उपजाने के लिए लालाइत होंगे? और क्या ऐसा होने पर उनकी संस्कृति यानि जीवन-शैली नहीं बदल जाएगी? क्या राजस्थान चावल उत्पादक राज्य बन कर इठलाएगा? नदियाँ जोड़ी जाएँगी तो जमीन की प्रकृति बदलेगी। इसे कोई रोक नहीं पाएगा। इसका असर वहां रहनेवाले लोगों पर होगा। जब भविष्य में राजस्थान
Jan
20
2012
शहर के पानी की बदबूदार कहानी
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इसमें हमारे किसी भी योजनाकार को कोई शक नहीं है कि शहरीकरण जिस गति से बढ़ रहा है उसमें और अधिक तेजी आयेगी. लेकिन इस तेज गति से बढ़ते शहरों को पानी कहां से मिलेगा और वे अपने सीवेज का निष्पादन कैसे करेंगे? जिस रिपोर्ट का हम यहां जिक्र कर रहे हैं उस रिपोर्ट में सीएसई ने इसी सबसे महत्वपूर्ण सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है. लेकिन अपनी पड़ताल के दौरान हमें बहुत आश्चर्य हुआ कि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर देश में न तो कहीं ठीक से डाटा उपलब्ध है, न ही इस बारे में कोई महत्वपूर्ण शोध हुए हैं और सोच के स्तर पर भी गजब का खालीपन है. शहर में रहनेवाले लोगों को पानी उनके घर के अंदर मिल जाता है. वे पानी का उपयोग करने के बाद जो सीवेज निर्मित करते हैं वह नदियों के हवाले कर दिया जाता है जिससे वही नदियां मरने लगती हैं जो शहरों को अपना पानी देकर जीवित रखती हैं. लेकिन हमारा शहरी समाज पानी और नदी के बीच इतना सा भी संबंध जोड़ना नहीं जानता है कि टायलेट फ्लश करने से नदी के मरने का क्या संबंध है? वे जानना तो नहीं चाहते लेकिन उन्हें जानने की जरूरत है.
Dec
24
2011
सुनिए मधुमक्खी का संदेश
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लेकिन जिसे विकसित मनुष्य कह सकते हैं उसने जो कुछ किया उससे केवल पशुओं के अस्तित्व पर ही नहीं बल्कि वनस्पतियों के अस्तित्व पर भी संकट आ गया है. पहले मनुष्य ने पशुओं को मारा होगा लेकिन पशु उससे दूर नहीं भागे थे. लेकिन आज प्रकृति में मौजूद जीव धीरे-धीरे मनुष्य से दूर होते जा रहे हैं. याद करिए आखिरी बार आपने कब किसी घोसले को देखा था? याद करिए कि आपने अपने आस-पास किसी मधुमक्खी के छत्ते को कब देखा था?
प्रकृति का संदेश देने का तरीका मनुष्य द्वारा ईजाद किये गये तरीकों से श्रेष्ठ है ही. इस पर तो शायद ही कोई सवाल उठाये. इंसानों की पिछली पीढ़िया जब विज्ञान को इतने अवैज्ञानिक तरीके से इस्तेमाल नहीं करती थीं तब हम प्रकृति के उपकरणों के सहारे प्रकृति के संदेशों को ज्यादा आसानी से समझ लेते थे. लेकिन हम जितने वैज्ञानिक हुए उतना ही हमने अपने उपकरणों पर भरोसा करना शुरू कर दिया. इंतहा तो तब हो जाती है जब हम भावनात्मक रोगों को मापने के लिए भी मशीनों का इस्तेमल करने लगते हैं. क्या भावनाओं को मशीन से नापा जा सकता है? लेकिन पिछली एक सदी को आप देखिए तो हमारे विकास की वैज्ञानिक सोच ने
Nov
29
2011
बर्बादी के कगार पर बारहसिंघा
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विश्व की दुर्लभतम वन्यजीवों की प्रजातियों में से एक ‘बारहसिंघा’ पिछली सदी तक उत्तर भारत तथा दक्षिण नेपाल में पाया जाता था। वैसे हिमालय की तलहटी के साथ ही आसाम से लेकर पूर्व में सुन्दरवन व पश्चिम में सिन्धु नदी के बाढ़युक्त मैदानों एवं दक्षिण में गोदावरी तक इनकी उपस्थिति के प्रमाण मिले हैं। भारतीय द्वीप में बारहसिंघों की तीन उप प्रजातियां पायी जाती है। जीववैज्ञानिकों में ‘सरबस डुबासोली’ नाम से प्रसिद्ध इस जन्तु को अंग्रेजी में ‘स्वॉप डियर’ भी कहते हैं। भारत-नेपाल सीमावर्ती उत्तर प्रदेश के जिला लखीमपुर-खीरी के विश्व पर्यटन मानचित्र पर स्थापित विख्यात दुधवा नेशनल पार्क क्षेत्र में ‘सरबस डुबासोली’ तथा मध्यप्रदेश के कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में ‘सरबस ब्राडेरी’ के साथ ही आसाम में रंजीत सिंगी प्रजाति मिलती है। लगभग 180 किलो वजन तथा 54 इंच ऊंचे (कंन्धे से) इस मृग (हिरन) के संीग करीब 5 इंच व्यास तथा 30 इंच तक लम्बे होते हैं। वैसे भारत से सटे नेपाल के दक्षिण भाग में भी कुछ बारहसिंघे दिखाई पड़ जाते हैं। नर बारहसिंघों के सिर पर सींगों का जहां खूबसूरत मुकुट होता है वहीं मादा के सिर पर सींग नहीं पाये जाते हैं इसके सींग प्रत्येक साल प्रजननकाल समाप्त होते ही झड़ जाते हैं लेकिन अगला प्रजनन
Nov
11
2011
बाघ के लिए त्रासदी बना इंसान
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इसमें पिछली गणना में सुंदर वन को शामिल नहीं किया गया था जबकि इसबार सुंदर बन के बाघ शामिल हैं। फिर बाघों की संख्या कैसे बढ़ गई यह स्वयं में विचारणीय प्रश्न है। आंकड़े भले ही देश में बाघों की संख्या बढ़ा रहे हों किंतु हकीकत एकदम से बिपरीत है। भारत में बाघों की दुनिया सिमटती ही जा रही है। इसका प्रमुख कारण है कि पिछले कुछेक सालों में मानव और बाघों के बीच शुरू हुआ संघर्ष। बढती आवादी के साथ प्राकृतिक संपदा एवं जंगलों का दोहन और अनियोजित विकास वनराज को अपनी सल्तनत छोड़ने के लिए विवश होना पड़ रहा है। उत्तर प्रदेश के पूरे तराई क्षेत्र का जंगल हो अथवा उत्तरांचल का वनक्षेत्र हो या फिर मध्य प्रदेश, महाराष्ट्, उड़ीसा आदि प्रदेशों के जंगल हों उसमें से बाहर निकलने वाले बाध चारों तरफ अक्सर अपना आतंक फैलाते रहते हैं और वेकसूर ग्रामीण उनका निवाला बन रहे हैं। बाध और मानव के बीच संधर्ष क्यो बढ़ रहा है? और बाघ जंगल के बाहर निकलने के लिए क्यों बिवश हैं? इस विकट समस्या का समय रहते समाधान किया जाना आवश्यक है। वैसे भी पूरे विश्व में बाघों की दुनिया सिमटती जा रही है। ऐसी स्थिति में भारतीय वन क्षेत्र के
Oct
27
2011
गरीब पर गिरेगी अमीर के अय्याशी की गाज
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जिस रिपोर्ट के हवाले से यह खबर आई है कि पर्यावरण में होनेवाले बदलाव के कारण दुनिया के सर्वाधिक गरीब देश सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे वह लंदन की एक रिसर्च संस्था है मेपलक्राफ्ट. मेपलक्राफ्ट बहुराष्ट्रीय कंपनियों से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक के लिए ठेके पर रिसर्च करती है और अपने शोध के लिए विश्वसनीय होने का दावा करती है. इसी शोध संस्था ने पर्यावरण में होनेवाले बदलाव का एक एटलस जारी किया है जिसका नाम है क्लाइमेट चेंज-फोर्थ ग्लोबल एटलस रिपोर्ट. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि विश्व के बिगड़ते पर्यावरण का सबसे अधिक प्रभाव एशिया और अफ्रीका के देशों पर होगा. शोधकर्ता मानते हैं कि जिन अफ्रीकी और एशियाई देशों में बिगड़ते पर्यावरण का सबसे बुरा प्रभाव होगा उसके लिए वे खुद जिम्मेदार हैं क्योंकि जीवन के न्यूननत मानक उन्हें पूरे नहीं किये है जिसका खामियाजा उनको भुगतना पड़ेगा. ये मानक मुख्यरूप से शहरी जीवन और औद्योगिक उत्पादन पर आधारित हैं.
यह शहरी जीवन और औद्योगिक उत्पादन अफ्रीकी और एशियाई देशों तक कैसे पहुंचा यह दार्शनिक विषय है इसलिए रिपोर्ट इस बारे में कुछ नहीं क र बनाकर ही विश्लेषण किये गये हैं. मेपलक्राफ्ट मानता है कि "बेतहाशा जनसंख्या वृद्धि, कमजोर प्रशासन, भ्रष्टाचार, गरीबी और अन्य


