बात करामात
May
16
2012
भ्रष्ट राजा और बेशर्म प्रजा
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हालांकि अदालत ने राजा को सशर्त जमानत दी है किन्तु सबसे बड़ा सवाल यह है कि अब २जी स्पेक्ट्रम घोटाले से जुड़ी जांच का क्या होगा? क्या अब जांच की निष्पक्ष उम्मीद की जानी चाहिए? क्या राजा अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर मुद्दे को कमजोर नहीं करेंगे? क्या जमानत मिल जाने से राजा पर लगे तमाम दाग स्वतः धुल जायेंगे?
कैग रिपोर्ट के अनुसार, राजा के कार्यकाल में हुए २जी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकारी खजाने को १.७५ लाख करोड़ रुपये का चूना लगा था, क्या जनता का वह धन जो विकास कार्यों में खर्च होना था, राजा के तिहाड़ से बाहर आने से उसकी भरपाई होगी? और भी न जाने कितने सवाल हैं जो अब तक अनुत्तरीय हैं| राजा के तिहाड़ से बाहर आने के सवाल पर मनमोहन सिंह अपने चिर-परिचित अंदाज में चुप्पी साध गए तो तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता का मानना है कि अब २जी स्पेक्ट्रम घोटाले को कमजोर करने के प्रयास
ोंगे। वहीं स्वामी ने राजा की जान को खतरा बताते हुए उनकी सुरक्षा की मांग की है। कुल मिलाकर अब इस मामले का लगभग पटाक्षेप हो चुका है बस पर्दा गिरना बाकी है। और जनता तो वैसे भी ३जी-४जी के जमाने में २जी को
May
15
2012
लोकतंत्र का लोप
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नेता माइक लुटेरे की भूमिका में हैं। अफसर ऐंग्लो-अमेरिकन तंत्र का विधिक प्राधिकार प्राप्त लुटेरा बना खड़ा है। न्यायपालिका कानूनी पेंचों की ऐसी उलझन बन गई है कि डोर सुलझाने की संवैधानिक कसरत वाले कभी सिरे तक पहुंचते ही नहीं। नेता सत्ता को लूटतंत्र का सामान न माने तो चुनावी राजनीति में पैर रखने की ताकत कभी न जुटा पाए। संसद सिर गिनने गिनाने के तंत्र से अधिक मायने का न रहने पाए यह दलों के औपनिवेशिक आका तय कर चुके हैं। इसी का परिणाम है कि कोई भी अण्णा-बाबा-केजरीवाल जैसा व्यक्ति भी सांसदों को चीख-चीख कर हत्यारा-लुटेरा-बलात्कारी कहता है तब भी जनता के बीच से कोई प्रतिरोध का स्वर नहीं बुलंद होता। अपनी जाती औकात बचाने के लिए सांसदों को विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव का शस्त्र लहराना पड़ता है।
लोकतंत्र का लोप: सशस्त्र सेनाओं और सरकार के बीच इतना भी विश्वास नहीं बचा है कि वे भावी सैन्य प्रमुख की नियुक्ति में निष्पक्षता का अहसास कर सकें। डॉ. मनमोहन सिंह सरकार की दूसरी पारी जिस शर्मनाक अंत की ओर बढ़ रही है उससे आम आदमी में लोकतांत्रिक प्रणाली के प्रति गहरा अविश्वास पैठ कर जाए तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और गृहमंत्री पी. चिदंबरम
May
15
2012
कार्टून पर न जाओ, कार्टून बन जाओगे
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उल्लेखनीय है कि आज विवादास्पद बना दिया गया यह कार्टून २८ अगस्त, १९४९ को विश्व प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट शंकर पिल्लई (1902--1989) ने बनाया था। तब जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधान मन्त्री थे। उन्होंने शंकर से कह रखा था कि उन्हें मित्र होने के नाते भी कार्टून बनाने में बख्शा नहीं जाए। कार्टूनिस्ट शंकर उनके प्रिय मित्र थे। इस कार्टून पर न नेहरू ने और न ही किसी अन्य व्यक्ति ने बीते ६३ सालों में कभी कोई आपत्ति की। अब अचानक कुछ लोगों को यह लगा कि यह कार्टून दलित विरोधी है। यानी इस कार्टून से अम्बेडकर और दलितों का अपमान हो रहा है या लोगों की भावनाएं आहत हो रही हैं। ऐसे कार्टून को एनसीईआरटी की सम्बन्धित पुस्तक से अविलम्ब हटा दिया जाना चाहिए। कार्टून विवाद के चलते एनसीईआरटी की पुस्तक प्रकाशन वाली समिति के सलाहकार योगेन्द्र यादव और सुहास पल्सीकर ने विरोधस्वरूप समिति से त्याग पत्र दे दिया।
किसी पुस्तक को एनसीईआरटी के पाठ्यक्रम में ऐसे ही शामिल नहीं कर लिया जाता है। अनेक जानकार और विद्वान लोग उसे ध्यान से देखते-पढ़ते हैं। इन लोगों के चयन पर ‘दलित विरोधी’ होने का आरोप लगाना ही गलत है। इनमें दलित अधिकारों के समर्थक और उनके लिए लड़ने वाले लोग
May
09
2012
आंसूओं के बाजार में आमिर खान का दरबार
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दरअसल टेलीविजन ने हिन्दुस्तान में आंसुओं को भी बाजार की चीज बना दिया है। किसी रियल्टी शो में डांस बाहर हो जाने के बाद रो रहे प्रतियोगी के आंसू हो, चाहे जिंदगी लाइव की एंकर ऋचा अनिरुद्ध के आंसू हो या फिर आमिर खान के आंसू मैं इनमे कोई अंतर नहीं मानता। जितने आंसू, उतनी टीआरपी, उतनी बिकवाली। ये वो बाजार है जिसमे थका हार आदमी समय, समाज और सरोकारों से जुड़ी बातों के लिए भी नायकों की तलाश करता हैं। भ्रूण हत्या रोकने के लिए आमिर खान की। कंडोम पहनने के लिए सनी लियोन की, साबुन के इस्तेमाल को जानने के लिए करीना कपूर की,तो पोलियो उन्मूलन को सफल बनाने के लिए अमिताभ बच्चन की जरुरत होती है। ये कामयाबी उस वक्त और भी बढ़ जाती है जब इन विज्ञापनों में महिलाओं का इस्तेमाल किया जाता है। सीधे कहें तो आंसू, महिलाएं और नायकों को मिला दीजिए सौ फीसदी सफल एपिसोड तैयार। लेकिन इन सबके बीच ये सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि इन विज्ञापनों, इन धारावाहिकों से करोड़ों रूपए की कमाई करने वाले ये नायक हमारे प्रति उतने ही ईमानदार है, जितने हम इनके लिए हैं? क्या सचमुच करीना कपूर लक्स से ही नहाती हैं या अमिताभ बच्चन
Apr
30
2012
हमारे हॉलीवुड की हेट स्टोरी
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कला के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि सत्ता के मनोरंजन का साधन बना दी जाती है. साहित्य, संगीत, नृत्य, गायकी आदि सभी निजामों और सरमायेदारों के सामने अक्सर अश्लील नुमाइश कराती नज़र आती है. हमारे यहाँ राजा का "बिरद" गाते-गाते भाटों की कई नस्लों अपने गले उधेड़ लिए. नवाबज़ादों की खूंखार ख्वाहिशों के सामने नामालूम कितनी तवायफों ने कोठे पर अपने पों पटक-पटक कर तोड़ लिए. पता नहीं कला की यह नियति कौन लिखता है पर सदियों से कला की यही नियति रही है.
200 साल तक उपनिवेश रहने के बाद हम भले ही राजनैतिक रूप से हमे आजाद कहा जा सकता है परन्तु हम उस बौद्धिक जड़ता को नहीं तोड़ पाए जो उपनिवेश काल में संस्थागत तौर पर पैदा की गई थी.आनंद स्वरुप वर्मा के शब्दों में हमारे दिमाग का "डीकोलोनाइजेशन" नहीं हो पाया. ऐसे में हम नवउदारवाद के सबसे असान शिकार थे. हमारे जनसंचार माध्यमों ने सांस्कृतिक साम्राज्यवाद के सामने हथियार डाल दिए. यह हमारे मीडिया के लिए सबसे आसान और फायदेमंद था.नव उदारवाद के २० साल बाद अब बम्बईया सिनेमा को बाजारू ग्लोबलाइजेसन से नए तरीके का मुकाबला करने पड़ रहा है.नव उदारवाद के साये में जो नई नस्ल पैदा हुई उसके पास अपनी "डब्बाबंद
Apr
29
2012
भाजपा का सांस्कृतिक बंगारूवाद
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गौरतलब है कि सन् 2001 में भारतीय जनता पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण को गुप्त कैमरे के माध्यम से किए गए एक स्टिंग आप्रेशन के दौरान एक लाख रुपये की रिश्वत लेते दिखाया गया था। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ भाजपा के इस 72 वर्षीय नेता ने उस समय एक न$कली हथियार डीलर से इस वादे के तहत एक लाख रुपये की रिश्वत स्वीकार की थी कि वह भारतीय थल सेना को थर्मल वाईनाकुलर(दूरबीन)की आपूर्ति हेतु उसे ठेका दिए जाने में रक्षा मंत्रालय से सिफारिश करेंगे। इस स्टिंग आप्रेशन के पश्चात विभिन्न टीवी चैनल्स पर सांस्कृतिक राष्ट्रवादी दल के इस अध्यक्ष की वास्तविकता पूरे देश ने देखी। उस समय बंगारू लक्ष्बण को न सिर्फ अध्यक्ष पद छोडऩा पड़ा था बल्कि वे राजनीति के पटल से भी अदृश्य हो गए थे। दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायधीश की अदालत ने ग्यारह वर्षों बाद इस मामले पर अपना निर्णय सुनाते हुए बंगारू लक्ष्मण को रिश्वत लेने का दोषी करार देते हुए यह कहा है कि-‘सीबीआई यह साबित कर पाने में सफल रही है कि बंगारू लक्ष्मण ने एक लाख रुपये की रिश्वत ली थी’। अदालत ने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार पर हमारा अपना रवैया ही जुर्म का साथी है। माननीय अदालत ने अपने
Apr
25
2012
अभिसेक्स मनु सिंघवी, सीडी और सियासत
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धमकी पर धमकी: सोशल नेटवर्क यू ट्यूब पर अदालती रोक के बावजूद कोई टेक-एक्सपर्ट अभिषेक सिंघवी की सेक्स सीडी लोड कर रहा था। अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर सिंघवी उसे बारंबार ‘डिलिट’ करवा रहे थे। इस खेल के बीच एक धमकी भी सार्वजनिक हुई जिसमें सिंघवी की सेक्स वीडियो हटाने पर गृहमंत्री पी. चिदंबरम की सेक्स वीडियो लोड करने की चेतावनी दी गई। संभव है कि उक्त धमकी में कोई दम हो, यह भी संभव है कि चिदंबरम की सेक्स वीडियो की धमकी पूरी तरह खोखली हो। भारत की राजनीतिक बिरादरी के लिए सेक्स का यह खेल कोई नया नहीं है। हां, नई टेक्नोलॉजी ने राजनीतिज्ञों के एक वर्ग विशेष के लिए खतरे की घंटी जरूर बजा दी है। वर्ना सत्ता में बैठे लोग तो स्वच्छंद सेक्स को अपना जन्म सिद्ध अधिकार मानते रहे हैं।
स्वच्छंद सेक्स का इतिहास: देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू से लेकर भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी तक के खिलाफ तरह-तरह के सेक्स संबंधों के आरोप उछलते रहे हैं। इस तरह के आरोों में तमाम आरोप आधारहीन और विशुद्ध गॉसिपिंग के अलावा कुछ नहीं हुआ करते, ऐसी प्रबल धारणा वाला बड़ा वर्ग है। जिन मामलों में तथ्य भ्ीा होता है उनमें कानून की बारीकियों और
Apr
23
2012
बसु का बयान और सरकार का निकम्मापन
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बसु के मनमोहन सरकार के पोल-खोल बयान से निश्चित रूप से भारत की छवि को धक्का लगा है| चूँकि बसु ने यह बयान अमेरिका में दिया है तो स्वाभाविक है कि वहां भी उनके कथन के निहितार्थ खोजे जा रहे होंगे| कुल मिलाकर बसु के बयान ने भारत में राजनीति गर्मा दी है तो अन्य देश लाभ-हानि का गुणा-भाग करने में लग गए हैं| बयान से देश की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका से अब बसु-सरकार दोनों ही डमेज कंट्रोल करने में लग गए हैं| हालांकि यहाँ गौर करने की बात है कि बसु ने गठबंधन सरकार के दुष्प्रभाव को भी रेखांकित करते हुए कहा है कि गठबंधन धर्म के चलते कोई भी सरकार खुल कर फैसले नहीं कर सकती और यदि इस परंपरा का २०१४ में दोहराव नहीं होता है तो आर्थिक सुधारों में निश्चित रूप से गति आएगी।
बसु के इस बयान से कई लोग सहमत भी हो सकते हैं तो कई असहमति भी जता सकते हैं| १९९७ में अटल बिहारी वाजपेई के नेतृत्व में भाजपा ने ५ वर्षों तक २४ दलों की साझा सरकार सफलतापूर्वक चला राजनीति के इस भ्रम को तोडा था कि साझा दल मिलकर सफलतापूर्वक सरकार नहीं चला सकते। हालांकि
Apr
17
2012
नैय्या पार लगाएंगे नरेन्द्र मोदी
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बीते कुछ वर्षों के कई चुनावों-उप चुनावों से यह साबित हुआ है कि भाजपा का आधार वोट भी उससे छिटका है। यह आधार वोट उसके अपने विचार-साम्य वाले मतदाताओं का है जिनके बीच में भाजपा के लगातार पथ-च्युत होने का संदेश गया है। प्रत्येक राष्ट्रीय राजनीतिक दल किन्हीं अर्थों में क्षेत्रीय भी होता है और इस प्रकार उसे क्षेत्रीय मतदाताओं की आकांक्षा पर भी खरा उतरने की कोशिश करनी पड़ती है। भाजपा के साथ दिक्कत यह हुई कि एक वृहद राष्ट्रीय फलक प्राप्त करने के लिए उसने तमाम क्षेत्रीय दलों से चुनावी गठबंधन किया और इस पर तालमेल बनाने के लिए उसे अपने कई मूल चुनावी मुद्दों को छोड़ना/भूलना पड़ा, और जिन मुद्दों को लेकर उसके सहयोगियों की सर्वानुमति बनी वह मुद्दे अन्य राजनीतिक दलों के भी एजेन्डे में पहले से ही थे। यह राजनीतिक गठबंधनों की विवशता है लेकिन आम मतदाता इतनी बारीक पेचदगियों को नहीं समझता। सतत् चुनाव परिणामों ने दिखाया कि ऐसी विवशता से भाजपा को दीर्घकालिक नुकसान हुआ है। क्षेत्रीय दल किस तरह गठबंधन का नेतृत्व करने वाले दल का भयादोहन करते हैं, इसे केन्द्र में सत्तारुढ़ संप्रग को देखकर जाना जा सकता है।
भाजपा के वैचारिक परिवर्तन की पराकाष्ठा श्री लालकृष्ण आडवानी के कार्यकाल में
Apr
14
2012
निर्मल निंदक जो हुए उनकी नहीं है खैर
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वास्तविक दुनिया में चमत्कार दिखा रहे निर्मल बाबा आभासी दुनिया में भी अपने जमकर जलवे बिखेर रहे हैं, फेसबुक पर बाबा के आफिसिअल पेज को पसंद करने वालों की संख्या साढ़े तीन लाख तक पहुँच गयी हैं, वहीँ उनके ही नाम से बनाये गए अन्य फेसबुक पेजों पर जिन्हें निर्मल दरबार झूठा बता रहा है पर भी एक लाख से अधिक लोग मौजूद हैं। त्वैत पर इनके समर्थकों की सनखया ४० हजार से अधिक है। इनको पसंद करने वालों में न सिर्फ व्यवसायी, शिक्षक, छात्र और फ़िल्मी दुनिया के लोग शामिल है बल्कि पत्रकारों और बुद्धिजीवी भी बाबा की कृपा को लेकर श्रद्धावनत हो रहे हैं। बाबा के पेज पर अगर कोई भी बाबा के विरुद्ध टिपण्णी करता है तो उसे तत्काल बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।
ये नए युग के बाबा है। वास्तविक जीवन में देश की एक बड़ी आबादी को, कर्मठता और कर्त्तव्य परायणता से परे चमत्कारों के सब्जबाग में उलझाकर उनका आर्थिक उत्पीडन कर रहे निर्मल बाबा आभासी दुनिया में भी उतने ही लोकप्रिय हैं। निर्मल बाबा के फेसबुक पेज पर उतने समर्थक हैं जितने बाबा रामदेव के पेज पर भी नहीं है. इस वक्त निर्मल बाबा के लगभग ८ पेज संचालित हो रहे



