बारूद

Jan

26

2011

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गणतंत्र का उत्सव पर्व

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गणतंत्र का उत्सव पर्व

गणतंत्र के इकसठवें साल की पूर्व संध्या पर जब महामहीम राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने देश को संबोधित किया और देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर चिंता जताई तो उत्सव शर्मा पुलिस के हत्थे चढ़ चुका था. अभी भी वह पुलिस की हिरासत में है. कानून की दवाई खा खा कर बीमार हो चुके इस देश में अब किसी से भी उत्सव के बारे में पूछेंगे तो वह यही कहेगा कि कानून को अपना काम करना चाहिए. यह उत्सव उस देश में पैदा हो गया है जिसकी लगभग आधी आबादी 25 साल से नीचे है. यह आधी आबादी कई तलों पर बंटी हुई है. बड़ी संख्या गांवों में है जो शहर आने को आतुर है. गांव इतने गये गुजरे हो गये हैं कि वे हमारे नौजवानों को थामें नहीं रख सकते. जिन परंपरागत उद्योगों और व्यवस्थाओं में ग्रामीण भारत जीवन पाता था उन्हें पूरी तरह से उजाड़ दिया गया है. ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था और समाज व्यवस्था ऐसे भ्रंस पर आ खड़ी हुई है कि नवप्रभात दूर दूर तक दिखाई नहीं देता. जैसे उद्योग में उत्पादन की लघु इकाई अनायास साबित कर दी गयी वैसे ही समाज व्यवस्था के लघु स्वरूप गांव को इतना अस्तित्वहीन बना दिया गया है कि

Jan

25

2011

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मोंटेक और ब्रजेश भी पद्म विभूषण हो गये

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मोंटेक और ब्रजेश भी पद्म विभूषण हो गये

पद्म पुरस्कार की तीन श्रेणिया हैं. पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री. भारतीय अंकशास्त्र में पद्म परम संख्या है. यानी उस संख्या के आगे कोई ईकाई दहाई नहीं जुड़ सकती. इसलिए भारत ने सुपर कम्प्यूटर बनाया तो वह परम पद्म था. यानी सर्वोच्च इकाई तक गणना करने में सक्षम. पद्म पुरस्कारों का नामकरण भी उसी समझ से किया गया है. इसलिए ये भारत रत्न के बाद सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार हैं जिन्हें हर साल गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर देश के सर्वोच्च प्रशासक राष्ट्रपति घोषित करते हैं. लेकिन हर बार इन पुरस्कारों में कुछ नाम ऐसे होते हैं जिन्हें देखकर पद्म संख्या की कल्पना और उनके स्वभाव में तालमेल नहीं बैठ पाता है.

इस बार भी 13 पद्मविभूषण, 31 पद्म भूषण और 84 पद्मश्री घोषित किये गये हैं. कल्पनालोक में इन पुरस्कारों के प्रति आपके मन में जो भी आदर हो उसे संजोकर रखिए. लेकिन जरा कल्पना करिए कि अगर मोंटेक सिंह अहलूवालिया और ब्रजेश मिश्र हमारे देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कारों के लिए चुने जाते हैं तो पुरस्कार की गरिमा गिरती है या फिर इन नामों की महिमा बढ़ती है, तय कर पाना मुश्किल है. मोंटेक सिंह अहलूवालिया यूपीए सरकार में मनमोहन के ब्रजेश मिश्रा हैं. ठीक वैसे ही

Jan

14

2011

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आखिरकार अमर बने खबर

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आखिरकार अमर बने खबर

समाजवादी पार्टी से बाहर निकलने के बाद अव्वल तो विधिवत अपना इलाज करवाया. फेफड़ा गुर्दा ठीक कराने के बाद उन्हें नये सिरे से अपनी राजनीतिक जमीन तलाशनी थी. सो निकल पड़े एक बार फिर उत्तर प्रदेश की ओर. उत्तर प्रदेश में अजीत सिंह के पश्चिमांचल की तर्ज पर पूर्वांचल की मांग शुरू कर दी. कुछ यात्राएं भी कर लीं. ठाकुरों के मसीहा बनने की कोशिश भी कम नहीं की. लेकिन मामला बना नहीं. अव्वल तो यूपी के ठाकुरों ने उन्हें ठाकुर मानने से ही इंकार कर दिया इसलिए उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश में न समर्थन मिलना था न मिला.

दलाली से राजनीति की दहलीज पर पांव जमाने वाले अमर सिंह के पैर पदयात्राएं करेंगे इस पर उतना ही यकीन करना चाहिए जितना इस बात पर कि अमर सिंह मुलायम के समाजवाद को स्वीकार करके उनके साथ चल रहे थे. मुलायम के समाजवाद की आधी धोती को भोगवाद के लंगोट तक ला देनेवाले अमर सिंह के लिए राजनीति का मतलब सिर्फ दलाली, अय्याशी और व्यापारिक घरानों तथा सत्ता प्रतिष्ठान में ओहदेदारी है. अमर सिंह जमकर बीट कर सकें इसके लिए पहले उन्हें मुलायम की लालटोपी मिली हुई थी और उन्होंने उस लाल टोपी को विधिवत गंदा किया भी लेकिन लाल टोपी

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