बियाबान में शोर
May
12
2012
सियासत का गुनाह और बेगुनाहों की सियासत
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दरअसल आतंकवाद के नाम पर निर्दोष मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी के खिलाफ 2007 से शुरु हुए आन्दोलनों से इस पूरी प्रक्रिया को समझने की कोशिश की जा सकती है कि किस तरह झूठे आरोप, झूठी घटना, झूठी पुलिस, सरकार की वायदा खिलाफी और लोकतांत्रिक ढांचे की लंबी न्याय प्रक्रिया ने इस पूरे समुदाय को बेजुबान बनाने का हर संभव प्रयास किया। पर बाटला हाउस एनकाउंटर मुस्लिम केंद्रित राजनीति का वो प्रस्थान बिंदु था जब मुस्लिम बाबरी विध्वंस की उस पुरानी सांप्रदायिक राजनीति से अपने को ठगा महसूस करते हुए अपने उपर आतंकवाद के नाम पर हो रहे उत्पीड़न के खिलाफ लामबंद होते हुए हिंदुस्तान की राजनीति में नए अध्याय का शुरुआत करने लगा। जो सत्ताधारी पार्टियों के भविष्य के लिए शुभ संकेत न था और वे फिर से उसे पुराने ढर्रे पर लाने को बेचैन थीं।
आज जो सपा सरकार बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को छोड़ने की बात कह रही है, उसी के समर्थन वाली केन्द्र सरकार के दौर में बाटला हाउस फर्जी एनकाउंटर हुआ। दरअसल सपा की कोई नीति नहीं है और यह एक फासिस्ट एजेंडे के तहत कार्य कर रही है नहीं तो यही सरकार उस वक्त मानवताविरोधी परमाणु समझौता के जहां पक्ष में बिकी वहीं आज यह एनसीटीसी
May
08
2012
भेड़ियों की भीड़ में मेमनों सी मिमियाहटें
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हम तय करें अपना पक्षः
अब सवाल यह उठता है राज्य का नक्सलवाद जैसी समस्या के प्रति रवैया क्या है? क्या राज्य इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानता है या माओवाद को एक ऐसी संगठित आतंकी चुनौती के रूप में देखता है, जिसका लक्ष्य 2050 तक भारत की राजसत्ता पर बंदूकों के बल पर कब्जा करना है। नक्सली अपने इरादों में बहुत साफ हैं। वे कुछ भी छिपाते नहीं और हमारे तंत्र की खामियों का फायदा उठाकर अपना क्षेत्र विस्तार कर रहे हैं, हजारों करोड़ की लेवी वसूल रहे हैं और अपने तरीके से एक कथित जनक्रांति को अंजाम दे रहे हैं। हर साल हमारी सरकारें नक्सल आपरेशन के नाम पर हजारों करोड़ खर्च कर रही हैं, किंतु अंजाम सिफर है। हमारे हिस्से बेगुनाह आदिवासियों और सुरक्षाकर्मियों की लाशें ही आ रही हैं। सवाल यह भी उठता है कि क्या भारतीय राज्य नक्सलवाद से लड़ना चाहता है? क्या वह इस समस्या के मूल में बैठे आदिवासी समाज की समस्याओं के प्रति गंभीर है? क्या स्वयं आदिवासी समाज के बडे पदों पर बैठे नेता, अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस समस्या का समाधान चाहते हैं? क्या इस पूरे विमर्श में आदिवासी या आदिवासी नेतृत्व कहीं शामिल है? इन सवालों से टकराएं और इनके ठोस
May
07
2012
जंगल में अमंगल
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तो बस्तर के जंगल में माओवादियों के सामानांतर सरकार की यह पहली तस्वीर थी। या फिर सरकार का मतलब सिर्फ सुरक्षा घेरे में अधिकारियों की मौजूदगी होती है यह जंगल में एलेक्स को लेने पहुंचे अधिकारियों के 35 किलोमीटर मौजदूगी से समझने की दूसरी तस्वीर है। संयोग से ठीक दो बरस पहले 6 अप्रैल 2010 को जिस चीतलनार कैंप के 76 सीआरपीएफ जवानो को सेंध लगाकर माओवादियों ने मार दिया था। उसी चीतलनार कैंप से महज 55 किलोमीटर की दूरी पर कलेक्टर एलेक्स मेनन जंगल में बीते 13 दिनों तक रहे। लेकिन सुरक्षा बल उन तक नहीं पहुंच सके। जबकि दो बरस पहले गृह मंत्री चिदंबरम ने देश से वादा किया था कि चार बरस में माओवाद को खत्म कर देंगे और नक्सल पर नकेल कसने के साथ साथ विकास का रास्ता भी साथ साथ चलेगा। लेकिन इस जमीन का सच है क्या।
23 बरस पहले पहली बार नक्सली बस्तर के इस जंगल में पहुंचे। दण्डकारण्य का एलान 1991 में पहली बार बस्तर में किया गया। पहली बार नक्सल पर नकेल कसने के लिये 1992 में बस्तर में तैनात सुरक्षाकर्मियो के लिये 600 करोड़ का बजट बना। लेकिन आजादी के 65 बरस बाद भी बस्तर के इन्ही जंगलों में
May
05
2012
सिनेमा के सौवें साल में कुछ भूले बिसरे सवाल
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आख़िर पूरे चालीस की भी तो नहीं हुई थी. इतनी कामयाब फिल्मों की कामयाब नायिका के पास मरते वक़्त हस्पताल का ख़र्चा चुकाने के लिए भी पैसा न था. कमाल अमरोही कहाँ थे? कहाँ थे धर्मेन्द्र और गुलज़ार? क्या किस्मत है! जब पैदा हुई तो माँ-बाप के पास डॉक्टर के पैसे चुकाने के पैसे नहीं थे. चालीस साल बंबई में उसने कितना और क्या कमाया कि मरते वक़्त भी हाथ खाली रहे. माहजबीन स्कूल जाना चाहती थी, उसे स्टूडियो भेजा गया. वह सैयद नहीं थी, इसलिए उसके पति ने उससे बच्चा नहीं चाहा और एक वह भी दिन आया जब उसे तलाक़ दिया गया. क्या सिनेमा के इतिहास में मीना कुमारी का यह शेर भी दर्ज होगा:
तलाक़ तो दे रहे हो नज़र-ए-क़ेहर के साथ
जवानी भी मेरी लौटा दो मेहर के साथ
क्या कोई इतिहासकार इस बात की पड़ताल करेगा कि मधुबाला मरते वक़्त क्या कह रही थी? उसे तो तलाक़ भी नसीब नहीं हुआ. उसके साथ ही दफ़न कर दिया गया था उसकी डायरी को. कोई कवि या दास्तानगो उस डायरी के पन्नों का कुछ अंदाज़ा लगाएगा? अगर बचपन में यह भी मीना कुमारी की तरह स्टूडियो न जा कर किसी स्कूल में जाती तो क्या होती
Apr
30
2012
वे कहां खो गये जो कलेक्टर नहीं थे
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आखिर एक कलेक्टर जो ‘सुराज’ लाना चाहता है, उसे बंधक बनाया जाना कितना उचित है के जवाब में; एक बूढ़ा कलेक्टर जिसने सरकार की नीतियों से तंग आकर वर्षों पहले कलेक्टरी से इस्तीफा दे दिया है, कहता है- ‘युद्ध में सही और गलत को नहीं आंका जा सकता’. तो क्या सुराज=युद्ध? किसी डिक्सनरी के पन्नों में ऐसे मायने नहीं जोड़े गए हैं. पिछले दो-तीन दशकों में छत्तीसगढ़ के इतिहास में ऐसे कई शब्द हैं जिनके अर्थ खोजना व्यर्थ है; पर जिनका जिक्र करना यहां बेहद जरूरी. कि अखबारों में कलेक्टर की रिहाई के लिए उलझन भरे, दुखी और चिंतित लोगों के शब्द जो काले अक्षरों में छप रहे हैं, वह बेहद स्याह पक्ष है, ‘सभ्य’ और अभिजात्यों का पक्ष.
यह अखबारों और किताबों के पन्ने से अलग एक पन्ना हैं ‘पन्ना लाल’ जो छत्तीसगढ़ (छत्तीसगढ़ तब मध्यप्रदेश का हिस्सा था) में उस इलाके के पूर्व डी.आई.जी रह चुके हैं, जिन इलाकों में ये घटनाएं घटित हो रही हैं. १९९२ में जब ‘जन जागरण’ अभियान इन क्षेत्रों में चलाया गया. मकसद था नक्सलियों की सत्ता को खत्म ‘करना’. उसी वर्ष गृह राज्यमंत्री गौरीशंकर शेजवार ने कुछ दिनों बाद नक्सलियों के ‘खात्मे’ की घोषणा कर दी. अयोध्यानाथ पाठक और दिनेश जुगरान महानिरीक्षक
Apr
28
2012
सदन की गरिमा न गिराओ सचिन
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जिस मुल्क में पिछले 10-15 वर्षों में लगभग दो लाख अस्सी हजार किसान खुदकुशी कर चुके हों, करोड़ों पढे-लिखे नौजवान हाथों में डिग्री लिए सड़कों पर चप्पल घसीटते फिर रहे हों, आम आदमी भ्रष्टाचार और महंगाई के शिकंजे में जकड़ा परिवार के लिए दो जून की रोटी के जुगाड़ में धक्के खा रहा हो, उस देश के उच्च सदन में आधे से ज्यादा माननीय सदस्य अरबपति-खरबपति उनकी नुमार्इंदगी कर रहे हैं। चलिए हम इस पर अफसोस नहीं करते हैं। हम बात सचिन पर करते हैं जिन्हें कांग्रेसी सरकार ने राज्यसभा के लिए मनोनीत किया है।
सरकार की मेहरबानी से अब सचिन तेन्दुलकर भी उन अरबपतियों के नजदीक बैठेंगे। नई राजनीतिक सोच का एक पक्ष यह भी देखिए कि कई टिप्पणीकारों की नजर में सचिन के राज्यसभा में पहुंचने मात्र से राज्यसभा की गरिमा बढ़ गई है। अब ऐसे टिप्पणीकारों से कोई पूछे कि क्या सचिन से पहले राज्यसभा की कोई गरिमा नहीं थी? सचिन राज्यसभा में छह साल बिताएंगे। वह खुद ही कहते है कि अभी दो साल और क्रिकेट खेलते रहेंगे। जाहिर है, अभी दो साल तक उनके पास बिल्कुल भी वक्त नहीं होगा, क्योंकि वह साल में पूरे दो सौ दिन क्रिकेट खेलते हैं, फिर उनका अपना होटल
Apr
27
2012
संसद को नकारा न बनाओ सचिन !
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लोकसभा की कठिन डगर और राज्यसभा की आसान राह, संसद के दो-विरोधाभासी चेहरों की मिसाल है! लता मंगेशकर, विजय माल्या, जया बच्चन जैसे ना जाने कितने लोग राज्यसभा में घुस आये और चले गए और फिर आये! जनता-जनार्दन के लिए क्या किया पता नहीं! ऐसे में सवाल ये उठता है कि राज्यसभा के सदस्य होने के लिए कोई पात्रता (सेवा या ज़मीनी लगाव के सन्दर्भ में) तय है या नहीं? या फिर, जिसके पास पैसा है, नाम है और शोहरत है, वो ही उच्च सदन का पात्र है? सचिन के पास नाम-शोहरत और पैसा सब-कुछ है, क्या इसीलिए सचिन राज्यसभा के लायक हैं? या फिर सचिन ने अपनी करोड़ों की दौलत को (बिल गेट्स की तरह) समाज-सेवा के लिए न्योछावर किया है?
सचिन कोई टाटा-बिरला-अम्बानी तो हैं नहीं कि ५० करोड़ का बँगला खरीदने और करोड़ों का बैंक-बैलेंस रखने के बावजूद, करोड़ों रुपये आम आदमी के लिए खर्च कर रहे हैं? विजय माल्या और सचिन में (इस लिहाज़ से) क्या फर्क है? दोनों अपनी-अपनी उपलब्धियों को अपने-अपने निजी हित के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं! दोनों समाजसेवा के लिहाज़ से कोई बहुत जाना पहचाना नाम नहीं हैं! ये बात इसलिए कहना ज़रूरी हो गया है क्योंकि राज्यसभा को एकदम से
Apr
23
2012
सेना में साजिश के असली सूत्रधार
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सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के साथ ही अब निश्चित हो गया है कि विक्रम सिंह ही हमारे अगले सेना प्रमुख होंगे. सुप्रीम कोर्ट में सरकार के कानूनी प्रवक्ता जिन्हें एटार्नी जनरल कहा जाता है, के बताये अनुसार सरकार ने उनकी नियुक्ति से पहले सभी जरूरी औपचारिकताएं पूरी कर ली हैं. केन्द्रीय गृहमंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा संबंधित जांच पड़ताल पूरी कर ली गई है और पूरी तरह से स्वच्छ, धवल और साफ सुथरे पाये जाने के बाद ही सरकार विक्रम सिंह को जनरल नियुक्त कर रही है. क्या सरकारी प्रवक्ता सही बोल रहे हैं? शायद नहीं.
विक्रम सिंह की देश के पच्चीसवें जनरल के रूप में नियुक्ति के साथ ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के गुप्त अभियान का एक अहम हिस्सा पूरा हो गया. पाकिस्तानी मूल के हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस दिन से प्रधानमंत्री पद की शपथ ली है वे एक गुप्त अभियान चला रहे हैं. वह अभियान है देश के शीर्ष पदों अपनी पसंद या फिर पारिवारिक रिश्तेदारों की नियुक्ति. सेना के सर्वोच्च कमांडर के रूप में अपनी पसंद पहुंचाने की शुरूआत आज नहीं हुई बल्कि आज से बहुत पहले 2005 में ही हो गई थी जब पहली बार 1 फरवरी 2005 को पहले सिख
Apr
19
2012
खूनी खरबपतियों के नाक पर नकेल
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वह बहुत विनम्रता और दृढ़ता के साथ बिना खुद पर यह शक किए हुए कि उन्हें जो करना चाहिए, वह सचमुच कर रहे हैं, कहते हैं, 'जी हां, श्री मुखर्जी कुछ हद तक सही हैं. सीएजी सवाल उठाता है और यह सच है कि बहुत सारे मामलों में पहले ही स्तर पर संतोषजनक जवाब मिल जाते हैं.' यह बात कुछ असंतोषजनक लगती है न ? शायद. खासकर इसलिए कि ऐसे मामलों में मैं खुद कुछ आक्रामक हूं, मैं व्यक्तिगत तौर पर यह पसंद करूंगा कि वह अपनी संवैधानिक सीमाओं को थोड़ा-सा बढ़ाएं, उसे फिर से थोड़ा-सा परिभाषित करें और शायद थोड़ा जोरदार तरीके से सरकार से सीधे भिड़ें. मगर सभी मनुष्यों का एक जैसे मामलों से निपटने का तरीका एक जैसा नहीं होता.
हमारे मौजूदा चुनाव आयुक्त श्री कुरैशी बहुत विनम्रता से बोलने वाले और संगीत प्रेमी व्यक्ति हैं, मगर वही हैं जो बिहार, बंगाल और यूपी के खूनी इलाकों में लोकतंत्र ला पाए! इसी तरह, विनोद राय ऐसे व्यक्ति हैं जो विनम्रता से बोलते हैं, सुर्खियों में रहना नहीं चाहते, मगर अपना काम अद्भुत ईमानदारी, साहस और प्रतिबद्धता से करते हैं, फिर भी टीएन शेषन की तरह उन्होंने सीएजी को एक घरेलू नाम और ऐसी संस्था बना दिया,
Apr
17
2012
सौदागर सरदार
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भ्रष्टाचार भक्त हैं मनमोहन: मनमोहन सिंह के कार्यकाल में सर्वोच्च न्यायालय को जस्टिस बालाकृष्णन जैसा परम भ्रष्ट प्रधान न्यायाधीश मिला। संप्रग के कार्यकाल में संसद में नोट लहराए गए जिसमें रिश्वत देने वाले कानून की पकड़ से अनछुए रह गए, जबकि भ्रष्टाचार उजागर करने वालों को तिहाड़ जेल भेज दिया गया। मनमोहनी युग में ही भ्रष्टाचार रोकने के लिए ईजाद किए गए मुख्य सतर्कता आयुक्त के पद पर पी.जे. थॉमस जैसा भ्रष्ट अफसर नियुक्त किया गया। बालाकृष्णन आज दिन तक क्यों बचे हुए हैं? क्योंकि वे अनुसूचित जाति से आते हैं। थॉमस सीवीसी के पद पर क्यों नियुक्त किए गए? क्योंकि वे अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। संसद में नोट कांड का मुख्य सूत्रधार कानून की पकड़ से क्यों बाहर है? क्योंकि वह अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधि है। प्रधानमंत्री स्वयं अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। उपराष्ट्रपति अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश एस.एच. कापड़िया अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। भावी प्रधान न्यायाधीश भी अल्पसंख्यक समुदाय के हैं। संप्रग की अध्यक्षा सोनिया गांधी खुद अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। कांग्रेस की ओर से भावी प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी अल्पसंख्यक समुदाय का है। भावी राष्ट्रपति के लिए किसी अल्पसंख्यक उम्मीदवार की तलाश है। राकांपा और समाजवादी पार्टी की ओर से तो राष्ट्रपति



