भारत की कहानी
May
08
2012
अथ श्री गोबर गणेश कथा
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माहेश्वर नगर पंचायत में लिपिक के पद पर कार्यरत मंगेश जोशी के अनुसार यह मन्दिर गुप्त कालीन है। औरंगजेब के समय में इसे मस्जिद बनाने का प्रयास किया गया था। जिसके प्रमाण इस मन्दिर का गुंबद है, जो मस्जिद की तरह है। बाद में श्रद्धालुओं ने यहां पुनः मूर्ति की स्थापना करके, वहां पूजा प्रारंभ किया।
गोबर गणेश मंदिर में गणेश की जो प्रतिमा है, वह शुद्ध रुप से गोबर की बनी है। इस मूर्ति में सत्तर से पचहत्तर फीसदी हिस्सा गोबर है और इसका बीस-पच्चीस फीसदी हिस्सा मिट्टी और दूसरी सामग्री है। इसीलिए इस मंदिर को गोबर गणेश मंदिर कहते हैं। इस मंदिर की देखभाल का काम ‘श्री गोबर गणेश मंदिर जिर्णोद्धार समिति’ कर रही है। विद्वानों के अनुसार मिट्टी और गोबर की मूर्ति की पूजा पंचभूतात्मक होने तथा गोबर में लक्ष्मी का वास होने से ‘लक्ष्मी तथा ऐश्वर्य&rsq
की प्राप्ती हेतु की जाती है।मंदिर के पुजारी अस्सी वर्षिय दत्तात्रेशी के अनुसार गणेश जी का स्वरूप भूतत्व रुपी है। ‘महो मूलाधारे’ इस प्रमाण से मूलाधार भूतत्व है। अर्थात मूलाधार में भूतत्व रुपी गणेश विराजमान है। और गणपति के ग्लोंबीज का विचार करने से पहले यह अवगत होता है कि ‘तस्मादा एतस्मा दात्मन आकाशः सम्भूतः आकाशादायुः वायोरग्नि आग्नेरापः
May
06
2012
दमन का दण्डकारण्य
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क्रांतिकारी आदिवासी महिला संघ, (के.ए.एम.एस.) आज देश का सबसे बड़ा और सबसे मजबूत महिला संगठन. जिनके कंधों पर बंदूकें हैं, और जेहेन में वर्तमान संरचना का खारिजनामा. उन्हें दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में बस वह जमीन चाहिए जहाँ उनकी पीढ़ीयां ६०० ईसा पूर्व से रहती आयी हैं. जिसे अब टाटा एस्सार और जिंदल को दिया जा रहा है. ६०० इसापूर्व से लेकर १३२४ तक दण्डकारण्य में गणतंत्रात्मक प्रणाली प्रचलित थी. यह आदिवासियों की अपने लिये अपनी संस्कृति के अनुरूप बनाई गयी प्रणाली थी. जिसके बाद यहां राजतंत्र का प्रभाव रहा पर वह प्रभाव ज्यादातर इस रूप में रहा कि दण्डकारण्य के जंगलों से राजाओं को हाथियों की जरूरत होती थी और इन जंगलों से वे इसकी पूर्ति करते थे. आदिवासी समाज में राजशाही गैर-आदिवासी समाजों जैसी कभी नहीं रही बल्कि यह संक्रमण था कि राजशाही जैसी व्यवस्थाएं आदिवासी समाजों में पहुंची. बावजूद इसके राजा की सेना वहां की पूरी जनता होती थी और राजा बाहरी संबंध बनाने का एक माध्यम. यह १९६५ तक (राजा भंजदेव) दंडकारण्य के इलाके में होता आया. आदिवासियों के समाज में बाहरी शासकों ने कोई सांस्कृतिक हस्तक्षेप नहीं किया. अंग्रेजी शासन काल में जब भी दण्डकारण्य में दखल का प्रयास किया गया, आदिवासियों ने
May
01
2012
मधु लिमये के समाजवादी सरदार
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मधु लिमये होते तो ९० साल के हो गए होते. मुझे मधु जी के करीब आने का मौक़ा १९७७ में मिला था जब वे लोकसभा के लिए चुनकर दिल्ली आये थे. लेकिन उसके बाद दुआ सलाम तो होती रही लेकिन अपनी रोजी रोटी की लड़ाई में मैं बहुत व्यस्त हो गया. जब आरएसएस ने बाबरी मस्जिद के मामले को गरमाया तो पता नहीं कब मधु जी से मिलना जुलना लगभग रोज़ ही का सिलसिला बन गया. इन दिनों वे सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके थे और लगभग पूरा समय लिखने में लगा रहे थे.
बाबरी मस्जिद के बारे में आरएसएस और बीजेपी वाले उन दिनों सरदार पटेल के हवाले से अपनी बात कहते पाए जाते थे. हम लोग भी दबे रहते थे क्योंकि सरदार पटेल को कांग्रेसियों का एक वर्ग भी हिन्दूवादी बताने की कोशिश करता रहता था. उन्हीं दिनों मधु लिमये ने मुझे बताया था कि सरदार पटेल किसी भी तरह से हिन्दू साम्प्रदायिक नहीं थे. दिसंबर १९४९ में फैजाबाद के तत्कालीन कलेक्टर केके नायर की साज़िश के बाद बाबरी मस्जिद में भगवान् राम की मूर्तियाँ रख दी गयी थीं. केंद्र सरकार बहुत चिंतित थी. ९ जनवरी १९५० के दिन देश के गृहमंत्री ने रूप में सरदार पटेल
Apr
30
2012
बलात श्रम का अभिशाप
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बलात श्रम सर्वव्यापी है। यह कृषि, निर्माण, घरेलू काम, ईंट भट्ठे व यौन व्यापार सभी क्षेत्रों में और हर महाद्वीप, हर अर्थव्यवस्था व लगभग हर देश में पाया जाता है। इसके बावजूद यह विरोधाभास ही है कि इसे ‘हमारे समय की सबसे अप्रकट समस्याओं में से एक’ बताया जाता है।
मानव तस्करी बलात श्रम से जुड़ा शायद सबसे ‘हाई प्रोपफाइल’ पहलू है। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के अध्ययन का अनुमान है कि यह दुनिया-भर में कराए जाने वाले बलात श्रम का मात्रा एक बटा पांचवां हिस्सा है। मानव तस्करी जिसके तहत आर्थिक शोषण के लिए लोगों को भर्ती की जाती है व लोगों को यहां से वहां ले जाया जाता है, इसमें एक जगह से दूसरी जगह भिन्नता पायी जाती है। संक्षेप में, आंकड़े बताते है
तस्करी से लाये गये अधिकतर लोग संक्रमणकालीन व औद्योगिकृत देशों/क्षेत्रों में काम करने को विवश होते हैं। इनमें से लगभग आधे लोगों को यौन शोषण के लिए तस्करी की जाती है। ये सभी महिलाएं या बच्चे होते हैं। लेकिन इन अप्रिय परिस्थितियों का मानव तस्करों को जबरदस्त लाभ होता है। आई.एल.ओ. का अनुमान है कि मानव तस्करी से तस्करों को हर वर्ष 32 करोड़ डॉलर का मुनाफा होता है।इस तरह का शोषण केवल
Apr
25
2012
टूट गया तिलिस्म धूमिल पड़ गई 'छवि'
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प्रशासन और छवि के बीच ताजा विवाद की जड़ गांव में बनी एक नाड़ी (छोटे आकार का तालाब) है। छवि का आरोप है कि इसका निर्माण गैर-कानूनी ढंग से हो रहा है और इससे मुख्य तालाब तक पहुंचने वाला पानी रुक जाएगा। वे कहती हैं, ‘गांव वालों ने बड़ी मेहनत से तालाब का जीर्णाेद्धार करवाया। यदि इसके पानी के रास्ते में नाड़ी बनेगी तो यह कैसे भरेगा। यह जानते हुए भी एसडीएम ने इसके निर्माण की अनुमति दे दी।’ छवि को ज्यादा पीड़ा इस बात की है कि वे इस मामले को शीर्ष स्तर तक उठा चुकी हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। वे बताती हैं, ‘मैं इस मामले को लेकर मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पंचायतीराज मंत्री से मिल चुकी हूं, लेकिन सिवाय आश्वासन के कुछ भी नहीं मिला है। प्रशासन कार्रवाई करने के नाम पर मजाक कर रहा है। इससे ज्यादा हास्यास्पद बात क्या होगी कि जिन एसडीएम ने नाड़ी बनाने की अनुमति दी टोंक कलेक्टर ने उनकी अगुवाई में ही जांच कमेटी बना दी। क्या कोई कभी खुद को ही दोषी ठहरा सकता है? जिस तरह से प्रशासन पूरे मामले को ले रहा है, उससे साफ है कि कहीं न कहीं वह राजनीतिक दखल से दबाव
Apr
22
2012
कस्तूरी अब कहां बसै?
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नया घर बनवाना था इसलिए कस्तूरी बाई ने नीवें खुदवाई, ईंटे डलवाई, वह खुश थी कि अब उसके पास एक कमरे का ही सही एक पक्का मकान तो होगा, मगर वह गांव के सवर्णों की घृणित मानसिकता का अंदाजा नहीं लगा पाई। यह गांव के दबंग लोगों को बर्दाश्त नहीं हुआ कि हमारे गांव के मृत पशु उठाने वाले तथा उसका चमड़ा उतारने वाली कौम के लोग अब हम जैसे मकान बनाकर रहे।
14 मार्च 2012 को बालारड़ा गांव में स्थित चारभुजा मंदिर के पास स्थित चौपाल पर कस्तूरी व उसके परिजनों को बुलाकर पूछा गया कि - तुमने मरे पशु उठाना और चमड़ा उतारना क्यों बंद कर दिया। कस्तूरी का जवाब था कि -उसके बच्चे ऐसा काम नहीं करना चाहते है, समाज ने भी पाबंदी लगा दी है। इस पर ग्रामीण भड़क गए। उन्होंने कहा- तुम भांबियों को मृत पशु उठाने होंगे और उनका चमड़ा भी उतारना पड़ेगा, क्योंकि तुम्हारे बाप-दादा भी इस गांव में रहकर यही काम करते थे, इसीलिए उनको इस गांव में बसाया गया था कि वे गांव के मृत पशु उठाए और चमड़ा उतारे,
तुम यह काम नहीं करोगे तो तुम्हारी इस गांव को जरूरत नहीं है, न ही यहां रहने देंगे है, हम तुम्हेंApr
14
2012
अंबेडकर दर्शन से अनभिज्ञ
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सच्चाई यह है कि पश्चिम और दक्षिण भारत में सामाजिक परिवर्तन के जो भी आन्दोलन चले हैं उसमें इस किताब का बड़ा योगदान है. यह काम महाराष्ट्र में उन्नीसवीं सदी में ज्योतिबा फुले ने शुरू किया था . उनके बाद के क्रांतिकारी सोच के नेताओं ने उनसे बहुत कुछ सीखा .. डॉ अंबेडकर ने महात्मा फुले की शिक्षा संबंधी सोच को परिवर्तन की राजनीति के केंद्र में रख कर काम किया और आने वाली नस्लों को जाति के विनाश के रूप में एक ऐसा गुरु मन्त्र दिया जो सही मायनों में परिवर्तन का वाहक बनेगा. डॉ अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ शुरू किये गए ज्योतिबा फुले के अभियान को एक अंतर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य दिया.
The Annihilation of caste में डा.अंबेडकर ने बहुत ही साफ शब्दों में कह दिया है कि जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं हो जाता समता, न्याय और भाईचारे की शासन व्यवस्था नहीं कायम हो सकती। जाहिर है कि जाति व्यवस्था का विनाश हर उस आदमी का लक्ष्य होना चाहिए जोअंबेडकर के दर्शन में विश्वास रखता हो। अंबेडकर के जीवन काल में किसी ने नहीं सोचा होगा कि उनके दर्शन को आधार बनाकर राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है। लेकिन उत्तर प्रदेश में
Apr
12
2012
ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ बहुजन क्रांति का बिगुल
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अंबेडकर, मार्क्स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी का, सावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है। ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे। लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। उनका जन्म 11 अप्रैल 1827 को पुणे में हुआ था, माता पिता संपन्न थे लेकिन महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे। उनकी महानता के कुछ खास कार्यों का ज़िक्र करना ज़रूरी है।
1848 में शूद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना कर दी थी। आजकल जिन्हें दलित कहा जाता है, महात्मा फुले के लेखन में उन्हें शूद्रातिशूद्र कहा गया है। 1848 में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई।
Mar
29
2012
राष्ट्रीय धरोहर, रामसेतु और राजनीति
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सुब्रमण्यम स्वामी चाहते हैं कि रामसेतु को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा दिया जाए. ऐसा इसलिए ताकि रामसेतु को नष्ट होने से बचाया जा सके. नहीं, ऐसा नहीं है कि रामसेतु को प्रकृति से बचान के लिए यह याचिका दाखिल की है. यह याचिका रामसेतु को प्रकृति के प्रकोप से बचाने के लिए नहीं बल्कि राजनीति के प्रकोप से बचाने के लिए दाखिल की गई है. तमिलनाडु की राजनीति के दो धड़े हैं. एक है डीएमके और दूसरा है एआईडीएमके. रामसेतु की राजनीति इन्ही दो दलों के बीच आकर अटक गई है और तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक इसे बचाने के सारे उपाय अधर में हैं.
न जाने राम कब पैदा हुए क्योंकि अपने यहां इतिहास वैसा नहीं है जैसा पश्चिम का मिलता है. इसलिए अभी तक यह ही तय नहीं हो सका है राम सवा लाख साल पहले हुए थे, ग्यारह हजार साल पहले हुए थे या फिर पांच हजार साल पहले. लेकिन राम हुए थे इसके प्रमाण देश में अभी भी मौजूद हैं. राम की जन्मभूमि कही जानेवाली अयोध्या से लेकर जंगल में रहनेवाले किष्किंधा तक सब जस का तस मौजूद है. इधर अगर राम के सारे अवशेष शेष हैं तो उधर रावण की लंका भी खोज ली गई
Mar
24
2012
कितना सिन्धी है मस्त कलंदर?
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यह सच है कि आम तौर सिंधी समुदाय के लोग अपने विभिन्न धार्मिक व सामाजिक समारोहों में इसे अपने इष्ट देश झूलेलाल की प्रार्थना के रूप में गाते हैं, लेकिन भारतीय सिंधू सभा ने खोज-खबर कर दावा किया है कि यह गीत असल में हजरत कलंदर लाल शाहबाज की तारीफ में बना हुआ है, जिसका झूलेलाल से कोई ताल्लुक नहीं है। सभा ने एक पर्चा छाप कर भी इसका खुलासा किया है।
पर्चे में लिखा है कि यह गीत सिंधी समुदाय के लोग चेटीचंड व अन्य उत्सवों पर गाते हैं। आम धारणा है कि यह अमरलाल, उडेरालाल या झूलेलाल अवतार की प्रशंसा या प्रार्थना के लिए बना है। उल्लेखनीय बात है कि पूरे गीत में झूलेलाल से संदर्भित प्रसंगों का कोई जिक्र नहीं है, जैसा कि आम तौर पर किसी भी देवी-देवता की स्तुतियों, चालीसाओं व प्रार्थनाओं में हुआ करता है। सिर्फ 'झूलेलालण' शब्द ही भ्रम पैदा करता है कि यह झूलेलाल पर बना हुआ है। असल में यह तराना पाकिस्तान स्थित सेहवण कस्बे के हजरत कलंदर लाल शाहबाज की करामात बताने के लिए बना है।
<्चे में बताया गया है कि काफी कोशिशों के बाद भी कलंदर शाहबाज की जीवनी के बारे में कोई लिखित साहित्य नहीं मिलता।

