राजनीति

May

15

2012

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गद्दी छोड़ो गड़करी

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नितिन गडकरी को मोहन भागवत के करीबी होने का लाभ मिल रहा है नितिन गडकरी को मोहन भागवत के करीबी होने का लाभ मिल रहा है

बीजेपी के इतिहास में शायद पहली बार है कि जब केंद्रीय नेतृत्व क्षेत्रीय सूरमाओं के सामने इतना लचर और पस्त दिखाई देता है। पार्टी अभी भी गल्तियों से सबक सीखने को तैयार नहीं है, इसके उलट बीजेपी नेता इस गुमान और अहंकार में चूर हैं कि जिसे पार्टी के खिलाफ जितना मोर्चा खोलना हो खोल ले, हश्र सभी का एक दिन बलराज मधोक, वाघेला, उमा-गोविंद और कल्याण सिंह जैसा ही होगा। यानी अपने पुरुषार्थ का भरोसा छोड़, उस कहानी और किंवदंती के प्रचार और प्रसार में बीजेपी आलाकमान जुटे हैं जो संयोग से कुछ मामलों में सच साबित भी हुई है। लेकिन जो पहले होता रहा, आगे भी होगा, कौन गारंटी लेगा? झारखंड में बाबू लाल मरांडी की लगातार बढ़ती हैसियत क्या बीजेपी के नेता महसूस नहीं कर पा रहे। आखिर बीजेपी पुरानी कहानी को लेकर गफलत में क्यों है? अटल बिहारी वाजपेयी जैसा कद्दावर और उदार नज़रिए का नेता अब बीजेपी के पास नहीं है, जिसे जन्म कुंडली में ही ‘शत्रुहंता’ का अमोघ दैवीय राजनीतिक सुरक्षा कवच हासिल था। मतलब अटल बिहारी के खिलाफ जिसने भी उंगली उठाई, बीजेपी में कम से कम उस नेता का तो सफाया हो ही गया। वाजपेयी को कुछ करना नहीं पड़ा, सब कुदरत

May

11

2012

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कहां का कामराज प्लान, कौन सी कांग्रेस?

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कहां का कामराज प्लान, कौन सी कांग्रेस?

कामराज प्लान 1961 में चीन से मिली जबरदस्त हार के बाद नेहरु के औरे की कहानी खत्म होने के बाद तब आया जब चार उपचुनाव में से तीन में कांग्रेस को हार मिली और गैर कांग्रेसवाद का नारा बुंलद होने लगा। 1963 में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहते हुये कामराज ने सरकार और संगठन में जिस तरह पार्टी संगठन को महत्ता दी उसके बाद लोहिया के गैर कांग्रेसवाद का नारा कांग्रेसियो को इस तरह अंदर से डराने लगा या कहे नेहरु के औरे के खत्म होने से सिहरन दौड़ी की केन्द्र और राज्यो में एक साथ तीन सौ कांग्रेसी मंत्रियों ने इस्तीफे की पेशकश कर दी। नेहरु ने सिर्फ आधे दर्जन इस्तीफे लिये। और उसमें भी लालबहादुर शास्त्री, मोरारजी देसाई और जगजीवन राम सरीखे नेता थे। जाहिर है नेहरु के दौर के अक्स में मनमोहन सिंह की सरकार को देखना भारी भूल होगी। क्योंकि सरकार और पार्टी संगठन पर एक साथ असर डालने वाले नेताओ में प्रणव मुख्रजी के आगे कोई नाम आता नहीं। यहां तक कि मनमोहन सिंह भी पद छोड पार्टी संगठन में चले जाये तो 24 अकबर रोड पर उनके लिये एक अलग से कमरा निकालना मुश्किल हो जायेगा। क्योंकि मनमोहन सिंह का औरा प्रधानमंत्री बनने के बाद

May

09

2012

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कांग्रेस के पोर्न स्टार की कसमसाहट

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कांग्रेस के पोर्न स्टार की कसमसाहट

वैसे, भजन, भोजन और ‘भोग’ का यह कायदा है कि उसे परदे में किया जाए, तो करनेवाले को खूब आनंद आता है। लेकिन जब उसको लोग देख लेते हैं, तो आपका आनंद तो हवा हो ही जाता है, उल्टे लोगों को उसका बहुत मजा आता है। सिंघवी के मामले में भी यही हुआ। वे राजस्थान से राज्यसभा के सांसद हैं। कुछ दिन पहले तक कांग्रेस के नेता भी थे। रोज टीवी पर दिखते थे। सब जगह जाते थे। संसद में भी खूब उछलते थे। कांग्रेस की तरफ से बहुत बोलते थे। पर, अब बोलती बंद है। आंखों में शर्म है और टीवी की स्क्रीन से भी पूरी तरह से गायब। कहीं नहीं दिखते। ना संसद में, ना कांग्रेस मुख्य़ालय में, और ना ही कहीं किसी समारोह में। सुप्रीम कोर्ट में तो खैर जाएं भी किस मुंह से। वहीं तो अभिषेक मनु सिंघवी को सेक्स करते पूरी दुनिया ने सरेआम देखा, जी भर कर देखा। जिस सुप्रीम कोर्ट में वकालात करके रोजी रोटी चलाने के साथ वे देश के बड़े आदमी बने, उसी सुप्रीम कोर्ट के अहाते में बने अपने ही दफ्तर में सेक्स करते सीड़ी में समा गए। एक घर तो डायन भी टालती है। पर, सिंघवी ने ना तो

Apr

30

2012

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जोशी की जय आडवाणी की क्षय

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जोशी की जय आडवाणी की क्षय

मई महीने में भाजपा कार्यकारिणी की बैठक होनी हैं, जहां पार्टी के अगले अध्यक्ष पर अहम फैसला होगा। लिहाज़ा संघ नेताओं की पूरी टीम की बीजेपी के कद्दावर नेताओं के साथ चर्चा में व्यस्त है। अप्रैल 2012 के दूसरे सप्ताह में जहां संघ के सरकार्यवाह भैय्याजी जोशी और सह सरकार्यवाह सुरेश सोनी ने दिल्ली में बीजेपी नेतृत्व का जायजा लिया, वहीं महीने के आखिर में नब्ज़ टटोलने का काम खुद सरसंघचालक मोहन भागवत ने किया।

बगैर मांगे सलाह नहीं देने के आदती संघ के बड़े प्रचारकों ने बीजेपी पर पकड़ ढीली होने पर लंबे वक्त तक चुप्पी साधे रखी। नतीजा ये निकला कि, एनडीए सरकार के वक्त जो एजेंडा संघ ने दशकों के अथक परिश्रम से तैयार किया, सब पर एक-एक कर पानी फिरने लगा। धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों को एक तरफ भी रख दें तो देश के सर्वांगीण विकास और आर्थिक नीतियों को लेकर भी संघ के आनुषांगिक संगठनों की अनदेखी खुले तौर पर हुई। सच्चाई ये भी रही कि एक तरफ बीजेपी नेता सुशासन और इंडिया शाइनिंग का नारा चमका रहे थे वहीं, संघ के विचारक ने खुलकर बीजेपी शासन की आर्थिक नीतियों को कटघरे में खड़ा किया। अमीरी-गरीबी के बढ़ते अंतर को साल 2000 में ही संघ

Apr

28

2012

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राजनीति की रामरेखा

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राजनीति की रामरेखा

सीबीआई की विशेष अदालत ने जैसे ही बंगारू लक्ष्मण को चार साल की सजा और एक लाख के जुर्माने की सजा सुनाई बंगारू के वकील की प्रतिक्रिया बाद में सुनाई पड़ी, पहले वे बोल पड़े जो राजनीति के रामपद पर आसीन हैं. संसद और संसद के बाहर तू तू मै मै का ऐसा सिलसिला चल पड़ा कि यह सोचने की फुर्सत भी नहीं रही कि नेता नेता आखिरकार मौसेरे भाई होते हैं. यह संदेश कोई और नहीं बल्कि वही अदालत दे रही है जिसने बंगारू को सजा सुनाई है. बंगारू को सजा सुनाने से पहले अदालत ने जो आदेश तैयार किया है उसमें एक दिलचस्प दलील दी है.

न्याय देवी के आंख की पट्टी उतारते हुए माननीय न्यायाधीश ने मानों उनसे कहा कि आप किताबों को का मनन करते करते थक गई हैं इसलिए आप समाज की ओर देखिए. समाज के ये मौसेरे भाई कैसी गंदगी फैला रहे हैं उसका अनुभव करिए तब बताइये कि बंगारू के बारे में क्या फैसला लिखें? मानों न्याय देवी ने अपने नयनों उघाड़ते हुए सबकुछ देखा और जज महोदय को संदेश दिया कि समाज में ऐसी धारणा बनती जा रही है कि ऊंचे लोग कोई भी अपराध करें उनका कुछ नहीं बिगड़ता. इसलिए कुछ

Apr

24

2012

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कलाम के नाम को सपा का सलाम

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कलाम के नाम को सपा का सलाम

पिछली बार तो कांग्रेस ने प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के रूप में अपने वफादार मोहरे को राष्ट्रपति पद पर आसीन करवा दिया था किन्तु इस बार उसकी राह आसान नहीं दिखती। वहीं एनडीए भी संख्याबल के लिहाज़ से अपनी पसंद के उम्मीदवार को राष्ट्रपति पद तक नहीं पहुंचा सकता| इन परिस्थितियों में क्षेत्रीय दलों का महत्व एकायक बढ़ गया है। सभी की चिंता इस बात को लेकर है कि कैसे भी अपनी पसंद के व्यक्ति को देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर बैठाया जाए ताकि स्वहितों की निर्बाध पूर्ति होती रहे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में राष्ट्रपति पद के चुनाव हेतु जोड़-तोड़ की राजनीति देश में लोकतंत्र की दशा-दिशा को रेखांकित करती है।

सरकार के घटक दल एनसीपी के मुखिया शरद पवार ने गैर-राजनीतिक व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाए जाने का शगूफा छेड़ा है। यानी शरद पवार को उम्मीद है कि यदि कोई गैर-राजनीतिक व्यक्ति राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनता है तो उसको कमोबेश सभी राजनीतिक पार्टियों का समर्थन मिलेगा, वहीं सपा मुखिया पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे अब्दुल कलाम आज़ाद को राष्ट्रपति पद पर देखना चाहते हैं। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कलाम दूषित राजनीति के दौर में पुनः राष्ट्रपति बनना चाहेंगे? जून-जुलाई २००७ में जब

Apr

17

2012

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बहनजी की बेजा बयानबाजी

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बहनजी की बेजा बयानबाजी

हाँ, उनका यह कहना अवश्य स्वागतयोग्य है कि इन पार्कों में जो खाली जमीन पड़ी है वहां महिलाओं की शिक्षा हेतु स्कूल एवं बच्चों की स्वास्थ्य सुविधाओं हेतु अस्पताल खोलने बाबत सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। चूँकि अखिलेश सरकार का मंतव्य पहले से साफ़ है इसलिए मायावती का कानून व्यवस्था बिगड़ने का बयान लोगों की भावनाओं को भड़काने वाला प्रतीत होता है। सत्ता जाने के बाद मायावती जनता की भावनाओं के साथ खेलकर राजनीति करना चाहती हैं जिसे उचित साबित करना मूर्खता होगी। इस पूरे मामले को लेकर मायावाती अतिरेकता का परिचय दे रही हैं।

अपने पांच वर्ष के कार्यकाल में मायावती का ध्यान मात्र स्वयं की प्रतिमाओं एवं हाथी की मूर्तियों को बनवाने में लगा रहा। प्रदेश में शिक्षा का स्तर बिगड़ गया, स्वास्थ्य सुविधाओं को पलीता लग गया, दर्ज़न भर घोटालों से प्रदेश के खजाने पर विपरीत प्रभाव पड़ा किन्तु इन सबसे बेखबर मायावती ने महापुरुषों के नाम का ढिंढोरा पीट-पीट कर लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया। फिर यदि मायावती मात्र महापुरुषों की प्रतिमाएं स्थापित करने में रुचि दिखाती तो ठीक था किन्तु अपने जीते जी उन्होंने खुद की प्रतिमाओं को भी बहुतायत की संख्या में प्रदेश के कई शहरों में लगवाया जिसकी

Apr

12

2012

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भटक गई भाजपा

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भटक गई भाजपा

इन ३२ सालों में भाजपा लगभग २५ साल तो अटल-आडवाणी की छत्रछाया में पल्लवित हुई। हालांकि आज भी भाजपा अटल-आडवाणी के नाम के सहारे ही राजनीति के सागर में अपनी पतवार संभाले हुए है। अटल-आडवाणी युग के ये साल भाजपा के लिए कई अप्रत्याशित सफलताएं लेकर आए।

इस दौर की सबसे बड़ी सफलता यह थी कि भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर एक ख़ास पहचान मिली और कांग्रेस के मुकाबले राष्ट्रीय राजनीति में एक मजबूत विकल्प उभरकर सामने आया। १९८४ में दो सांसदों से शुरू हुई पार्टी १९९६ में ही सत्ता के शीर्ष पर जा बैठी| १९९७ में पुनः भाजपा ने अटल बिहारी वाजपाई के नेतृत्व में २४ दलों की गठबंधन सरकार बनाकर उसे सफलतापूर्वक ५ वर्षों तक चलाया| इस मिली-जुली सरक
राजनीति के इस भ्रम को भी तोड़ दिया कि साझा दल मिलकर सरकार नहीं चला सकते| किसी समय समूचे उत्तर भारत के राज्यों में भाजपा अपनी सरकार सफलतापूर्वक चला रही थी वहीं २००८ में पहली बार दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक में कमल खिला| आज देश के ६ राज्यों में पार्टी की सरकार है और तीन राज्यों में वह अपने सहयोगियों के साथ साझा सरकार चला रही है| मगर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चाल,

Apr

12

2012

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कांग्रेस को भारी पड़ रहा है 'अड़ियल गांधीवादी'

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अशोक गहलोत सीपी जोशी और चंद्रभान के साथ अशोक गहलोत सीपी जोशी और चंद्रभान के साथ

अब सवाल यह उठने की नौबत आ गई है कि क्या गहलोत की छुट्टी कर दी जाएगी? समझा जा सकता है कि हाईकमान की कथित थोड़ी टेढ़ी नजर को भांप कर ही असंतुष्ट विधायक तो उछल रहे हैं। मौका ताड़ कर वसुंधरा ने भी कांग्रेस में चल रहे अंतर्विरोध का जिक्र करते हुए हमले तेज कर दिए हैं।

हालांकि असंतुष्ट विधायकों की संख्या कोई ज्यादा नहीं है, इस कारण यकायक तख्ता पटल जैसा खतरा तो नहीं है, मगर असंतुष्टों के जो तेवर हैं, उससे लगता है कि यदि जल्द ही हाईकमान ने स्थिति को नहीं संभाला तो आने वाले दिनों असंतुष्टों की संख्या और बढ़ जाएगी। असंतुष्ट विधायकों ने पिछले दिनों जिस तरह दिल्ली दरबार में जा कर खुले आम शिकायत की, वह बगावत का ही संकेत है। इस बगावत की बानगी देखिए कि कांग्रेस विधायकों

संतुष्ट खेमे के अगुवा माने जाने वाले कर्नल सोनाराम ने गरम लोहे पर चोट करते हुए गहलोत की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया और उन्हें अडिय़ल करार दे दिया। सोनाराम ने खुल कर बयान दिया है कि उनकी मुख्यमंत्री से कोई निजी दुश्मनी नहीं है, मगर उनकी कार्यशैली उन्हें कत्तई पसंद नहीं है। सोनाराम ने कहा कि गहलोत अपने आपको गांधीवादी कहलाते हैं, मगर सच

Mar

29

2012

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वंशवाद का दंशवाद

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वंशवाद का दंशवाद

आज अनेक वरिष्ठ कांग्रेसी राहुल के नेतृत्व के कसीदे रच रहे हैं। चुनाव दर चुनाव असफलताओं के बावजूद पार्टी पर राहुल का दबदबा बरकरार है। ये कांग्रेसी भारतीय लोकतंत्र पर राजवंश की सवारी बरकरार रखना चाहते हैं। कांग्रेस के ये नेता कांग्रेस में राजवंश और भारत में कांग्रेसी राजवंश की अवधारणा को स्थापित करना चाहते हैं। राजवंश के प्रति अंधभक्त कांग्रेसी यह मानने लगे हैं कि कांग्रेस ही भारत है और भारत कुछ और नहीं सिर्फ कांग्रेस है। वे यह भी मानने लगे हैं कि भारत की सत्ता इसी कांग्रेसी राजवंश से संचालित हो सकती है, अन्यथा नहीं।

नेहरू के जमाने से ही पार्टी में लोकतांत्रिक मूल्यों को खत्म कर पारिवारिक आपातकाल को स्थापित करने की शुरूआत हो चुकी थी। आज सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टीगत आपातकाल अपने चरम पर है। वर्षों पहले श्रीमती इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल के जरिए लोकतंत्र का गला घोंट दिया था। इंदिरा गांधी पार्टी ही नहीं देश में भी हिटलरशाही की पर्याय बन गई थीं। इंदिरा गांधी के जमाने में शुरू हुई यह परंपरा जिसमें यह माना जाने लगा था कि वे पार्टी से ऊपर हैं, और पार्टी देश से ऊपर। इंदिरा भारत हैं और भारत इंदिरा। अंधे और मूक-बधिर हो चुके

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