विरोध की चिट्ठी
Jan
19
2012
दागदार प्रायोजकों का लिटरेरी फेस्टिवल
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पिछले साल नागरिक समाज ने जयपुर साहित्य सम्मेलन को यह कहकर कटघरे में खड़ा किया था कि इस सम्मेलन के अधिकांश प्रायोजक नागरिक अधिकारों के लिए खतरा पैदा करनेवाले हैं. ऐसे में इन प्रायोजकों को आयोजन में शामिल करके सम्मेलन क्या संदेश देना चाहता है? नागरिक समाज द्वारा यह सवाल उठाये जाने के बाद पिछले साल साहित्य सम्मेलन के आयोजकों ने कहा था कि अभी तक उनके जेहन में ये बातें नहीं थी इसलिए उन्होंने इन प्रायोजकों को शामिल किया लेकिन आगे से वे नागरिक समाज की शिकायतों का ध्यान रखेंगे. लेकिन इस साल भी दागदार छवि वाले प्रायजकों को फेस्टिवल से जोड़कर आयोजकों ने साफ कर दिया है कि पैसे के मामले में वे कोई समझौता नहीं कर सकते.
नागरिक समाज द्वारा जो शिकायत की गई है उसमें लिटरेचर फेस्टिवल के पहले प्रायोजक बैंक आफ अमेरिका पर सवाल उठाया गया है. सिटिजन फोरम फॉर सिविल लिबर्टी की ओर से अपना विरोध दर्ज कराते हुए बताया जा रहा है कि यह बैंक आफ अमेरिका वही बैंक है जिसने विकीलीक्स के लिए आर्थिक संकट खड़ा किया था. जब विकीलीक्स अमेरिकी दस्तावेजों का खुलासा कर रहा था तब इसी अमेरिकन बैंक ने विकीलीक्स को मिलनेवाले सभी धन स्रोतों पर रोक लगा दिया
Jan
14
2012
दलाली के पैसे से दिया जाएगा पत्रकारिता का रामनाथ गोयनका अवार्ड
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दस जनवरी को दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले इंडियन एक्सप्रेस में एक आधे पेज का विज्ञापन छपा था जिसमें बताया गया था कि आगामी 16 जनवरी को दिल्ली में रामनाथ गोयनका एक्सिलेन्स इन जनर्लिज्म एवार्ड दिया जाएगा. यह पुरस्कार कई श्रेणियों में दिया जाएगा जिसमें साल का सबसे बड़ा पत्रकार, हिन्दी श्रेणी में एक पुरस्कार और पर्यावरण की पत्रकारिता के लिए भी पुरस्कार देने की सूचना दी गई है. इस विज्ञापन में जेपी ग्रुप को मुख्य प्रायोजक बनाया गया है. जेपी ग्रुप के बारे में आप जानते ही होंगे लेकिन अगर नहीं जानते तो जान लीजिए कि देश में सीमेन्ट फैक्टरी, बड़े बांधों के जरिए पर्यावरण विनाश के लिए जाना जाता है. उसके विनाशलीला की कहानियां सोनभद्र से लेकर रीवां और टिहरी तक फैली हुई हैं. इसी जेपी ग्रुप को पूरे आयोजन का मुख्य प्रायोजक बनाया गया है.
लेकिन अभी रुकिये इंडियन एक्सप्रेस के महान पत्रकारिता की कहानी यहीं खत्म नहीं होती है. इंडियन एक्सप्रेस ही वह अखबार है जिसने नर्मदा बांधी की खुलकर पैरोकारी की और समय समय पर नर्मदा बांध के खिलाफ चलनेवाले आंदोलनों का विरोध किया और आंदोलनकारियों के खिलाफ खुलकर रपटें प्रकाशित की. इसे पत्रकारिता भी कहा जा सकता है लेकिन हाल में ही इसी इंडियन एक्सप्रेस

