संवाद
Sep
19
2011
पत्रकार ही कलम काटे तो क्या करें?
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संडे इंडियन को मैं तब से जानता हूं जबसे इसका प्रकाशन शुरू हुआ. लेकिन जिन पत्रकार महोदय के बारे में मैं आपसे बात करना चाहता हूं उन्हें मैं आज भी नहीं जानता. ये पत्रकार महोदय हैं राजेश कुमार श्रीवास्तव. संक्षेप में श्रीवास्तव का श्री उठाया और नाम के आगे लगाकर श्री राजेश हो गये. अब हमारी मजबूरी है कि गुस्से और खीज में भी उनका नाम लेना हो तो श्री राजेश ही कहना होगा. इन श्री राजेश ने कोई साल सवा साल पहले बड़े लाचारी में संडे इंडियन में नौकरी पाई थी. वहां ओंकारेश्वर पाण्डेय की सहमति से समूह ने नौकरी की अनुमति दी और ओंकारेश्वर के ही संपादकत्व वाले भोजपुरी संस्करण में संस्थापित कर दिया. नौकरी मिली तो श्री राजेश का आर्थिक संकट कट गया. पैसा कितना मिलता है इससे ज्यादा एक आधार मिल गया. नौकरी करनेवाले लोग जानते हैं कि नौकरी केवल बाह्य जीवन का ही आधार नहीं होती है. यह आंतरिक रूप से भी आपको अस्थिर और स्थिर करती है. रोज कमाने खानेवालों से अलग इनके जीवन का दृष्टिकोण छापामार शैली में नहीं सोचता है. ये लोग स्थाई रेजिमेन्ट की तरह व्यवहार करते हैं. हर महीने अगले महीने का जुगाड़ पक्का होता चलता है.
लेकिन अपने श्री
Jun
27
2011
अमीरी का प्रतीक गढ़ने की गरीबी
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अमीरी व्यापक अर्थों में बड़ी गरीबी है. अपने देश के सबसे बड़े अमीर मुकेश अंबानी ने एक बार कहा था कि एक सीमा के बाद आपके नाम के आगे पैसों की संख्या बढ़ती जाती है जिसका आपके वास्तविक जीवन में कुछ लेना देना नहीं होता है. दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति वारेन बफेट का सादा जीवन भी यही बताता है कि रूपये पैसे और उससे बनायी गयी अकूत संपदा आखिरी अमीरी नहीं है. उस अमीरी को पाने के चरम पर पहुंच जाने के बाद वह सब होना असार हो जाता है जिसके लिए कुछ लोगों का भाग्य उनका साथ दे देता है. यानी शीर्ष पर पहुंचने के बाद मुकेश अंबानी और वारेन बफेट भी यही समझातें है अति अमीरी भी एक प्रकार की गरीबी ही है. वहां पहुंचने के बाद वे कुछ ऐसा धन खोजते हैं जो रूपये पैसे से नहीं खरीदा जा सकता.
यह तो शीर्ष पर बैठे लोगों की दार्शनिक बातें हैं. इसलिए हम न तो वारेन बफेट की बात करते हैं और न ही मुकेश अंबानी की. इन लोगों को सर्वाधिक अमीर होने के संदेह में छोड़ देते हैं. उससे नीचे अरबपतियों और करोड़पतियों की फौज भी अमीर ही मानी जाएगी. मेरिल लिंच की रिपोर्ट बता रही
Feb
25
2011
शुद्ध विचार का अशुद्ध व्यापार संभव नहीं
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सद्गति तो सबका अभीष्ट है. इंसान या फिर समाज के रूप में हमारी इच्छा सद्गति ही होती है. जैसे किसी व्यक्तित्व की पूर्ण अभिव्यक्ति उसके सद्गति अवस्था में होती है वैसे ही कोई समाज सद्गति को प्राप्त न हो तो उसमें रचनात्मकता का जन्म नहीं हो पाता. जन्म हो भी जाए तो दुर्गति को प्राप्त समाज उसका संरक्षण नहीं कर पाता है. अपना तीन साल का अनुभव बताता है कि हम सब सद्गति इच्छा में हैं. अवस्था दुर्गति वाली है.
यह किसी से शिकायत नहीं है. किसी तो ताना उलाहना भी नहीं है. क्योंकि ताना उलाहना दें किसको? शिकायत करें किससे? जो हमारी शिकायत का विषयवस्तु है उसकी भी शिकायत की विषयवस्तु कोई और है. एक एक व्यक्ति होते हुए पूरा समाज ही मानों प्रतिक्रियाग्रस्त हो चला है. समाज और व्यक्ति के रूप में हमारी क्रिया करने की शक्ति ही खत्म हो गयी है. हम एक अंतहीन प्रतिक्रिया का परिणाम होकर रह गये हैं. अगर किसी व्यक्ति का जीवन केवल प्रतिक्रिया हो जाए तो कल्पना करिए उसका स्वरूप और स्वभाव क्या होगा? ऐसे ही कोई समाज सिर्फ प्रतिक्रिया करे तो भला सत् तत्व को कैसे धारण कर सकेगा क्योंकि प्रतिक्रिया अपने आप में नकारात्मक होती है.
Jan
12
2011
आखिर कैसे दूर होगा रश्मि हंस के मन का दंश?
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आज प्रिंट हो या कि टेलीवीजन शीर्ष पर अधिकांश वे पत्रकार बैठे हैं जिन्होंने लाइफ को "प्रैक्टिकली" समझ लिया है. इसे आप विसंगति भी कह सकते हैं कि देश के सबसे सशक्त मीडिया माध्यम अखबारों में अव्वल हिन्दी की पत्रकारिता प्रोफेशनल काम काज में सबसे निचले पायदान पर खड़ा है. हिन्दी पत्रकारिता में आज भी किसी लड़की को सिर्फ लड़की होने की योग्यता पर जगह मिलती है और "व्यापक संभावनाएं" दिखाकर उसे यह समझाने की कोशिश की जाती है कि प्रैक्टिकली लाइफ में पत्रकारिता का कैरियर ऐसा ही होता है.
अगर ऐसा न होता तो भला चार साल पहले चंडीगढ़ के पास के एक कस्बे से निकलकर पत्रकारिता करने आयी रश्मि हंस को अपने ही एक पूर्व संपादक के खिलाफ मोर्चा क्यों खोलना पड़ता? अपने चार पांच साल के पत्रकारिता के संपन्न अनुभव के बाद ही रश्मि हंस को लगता है कि नौकरीपेशा ही होना था तो कुछ और कर लेते, अगर पत्रकारिता ऐसी ही होती है तो इससे दूर रहना ही अच्छा. रश्मि हंस ने चार साल पहले पत्रकारिता में कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से डिग्री लेने के बाद बतौर ट्रेनी पत्रकार अमर उजाला के साथ काम शुरू किया था. जब हमने उससे यह जानना चाहा कि आखिर तुमने क्या सोचकर
Dec
27
2010
हिन्दुत्व की चिल्लपो और भाई सुरेश चिपलूणकर
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20 दिसंबर को उन्होंने अपने ी इस योजना के खुलासे के छह दिन ही बीते होंगे कि छब्बीस दिसंबर को सुरेश चिपलूणकर एक बार फिर अपने ब्ला ाई देने लगे, जितने 73 समितियों के अध्यक्ष प्रणब मुखर्जी भी नहीं होंगे। इसके बावजूद मैं जब एक “बेशर्म लसूड़े” की तरह उनसे चिपक ही गया, तो मेरे हिन्दुत्व कार्य को लेकर चन्दा माँगने से पहले वे जितने प्रभावित दिख रहे थे, अब उतने ही बेज़ार नज़र आने लगे और सवाल-दर-सवाल दागने लगे… इससे क्या होगा?" सुरेश चिपलूणकर का यह वाक्य पढ़कर अब और बताने की जरूरत नहीं है कि तथाकथित हिन्दूवादी ताकतों ने उनको औकात बता दिया है.
सुरेश चिपलूणकर ब्लागिग की दुनिया में कोई अनजाना नाम नहीं है. इंदौर में रहते हैं और अपने छोटे से व्यवसाय से अपना जीवन चलाते हैं. क्योंकि वे खुद इंटरनेट की खेती करते हैं इसलिए ब्लागिंग की दुनिया में आ गये, कोई तीन साल पहले. यह बिल्कुल ही सुरूआती दौर था. जब घर में ही साइबर कैफे की खेती हो तो फिर भला ब्लागिंग के लिए अलग से क्या समय निकालना? शुरूआत के सीखनेवाले दिनों में सुरेश चिपलूणकर जो थे, उससे उन्होंने अपने आपको बहुत आगे खिसकाया. वे पेशे से
Nov
25
2010
क्षतिपूर्ति से क्षत विक्षत
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वह रचना जो नश्वर होती है, उसके नष्ट होने में भला क्या कष्ट? लेकिन कष्ट तो होता है. फिर भला ऐसा क्यों? ऐसा शायद इसलिए कि हमारा भावनात्मक निवेश नष्ट होने लगता है जिसकी पूर्ति कभी भी संभव नहीं है. ऐसी ही न जाने कितनी अपूर्णीय क्षतियों से गुजरते हुए हम आप सब जीवन के मैदान में डटे हुए हैं. आप सब इतना तो जानते ही हैं कि पिछले कुछ महीनों से व्यक्तिगत रूप से मैं इतनी सारी परीक्षाओं से गुजारा गया हूं कि क्षत विक्षत हो जाने की पूरी संभावना थी. क्यों बच गया? पता नहीं. कैसे बच गया? पता नहीं. लेकिन अब छह महीने बाद लगता है कि बच गये हैं. आधे अधूरे ही सही लेकिन आगे निकल आये हैं. भावनात्मक और मानसिक दंश अब रोग बनकर शरीर पर प्रकट होने लगा है जो इस बात का संकेत है कि आंतरिक कष्ट अपने रास्ते बाहर जा रहा है.
अब हम एक बार फिर आपके पास हाजिर हैं. नयी शुरूआत भी कैसे हो गयी पता नहीं चला. संकट के उस दौर में अदृश्य से कुछ हाथ ऐसे उठे जिन्होंने उन हाथों को थाम लिया जो विस्फोट को संवारने की तमन्ना में सक्रिय रहता है. मेरा
Nov
19
2010
ताकि लाइव रहे मोहल्ला लाइव
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लेकिन ब्लाग ब्लाग होता है और जब हम अपने डोमेन पर आते हैं तो वह वेबसाइट हो जाती है. और वेबसाइट की रेंज एक हजार रूपये से लेकर एक करोड़ सालाना तक कुछ भी हो सकती है. वैसे तो दूर अमेरिका के एक शहर सैन फ्रांसिस्को में बहस चल रही है कि वेब 2 की दुनिया कैसी होगी लेकिन यहां अपने देश में वेब 1 ही अभी तक आकार नहीं ले सका है. दशक की शुरूआत में जब पूरी दुनिया में इंटरनेट की क्रांति का पहला बबूला फूट रहा था तो भारतीय समाज इंटरनेट से आंखें चार करने को भी तैयार नहीं था. कुछ नामी गिरामी बड़ी कंपनियों ने पैसे जरूर लगाए लेकिन उस वक्त न तो नेट की समझ थी और न ही जरूरत तो जो उस पैसे को पैसे में बदलने में कारगर हो सके. इसी दौर में भारत में गूगल का प्रचार प्रसार बढ़ता है और साथ में आती है ब्लागिंग. ब्लागिंग ने भारतीय समाज में वह काम किया जो बड़ी बड़ी पूंजी नहीं कर सकी थी. उसने पहली बार आम लिखने पढ़नेवाले आदमी को इंटरनेट से जोड़ दिया. अविनाश उसी दौर की पैदाइश हैं.
तब एनडीटीवी की नौकरी थी इसलिए बहस के जज्बे में आर्थिक जरूरतें

