सभा-संगत
Mar
14
2011
हिन्दी को मांजो...रगड़ो... बदलो... और चला दो!
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सत्यानंद निरुपम ने माइक थामते ही एक 'सत्यनुमा' सवाल दागा या यूं कहें कि एक बयान दे डाला कि - 'हिंदी जैसे चल रही है, वैसे नहीं चल सकती।' दूसरी बात उन्होंने कही कि हिन्दी के साथ कई दिक्कतें हैं, जिन्हें दूर किया जाना चाहिए। सत्यानंद निरुपम के मुताबिक हिंदी के सबसे बड़े हितैषी अकादमिक क्षेत्र के लोग हैं। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर भी चिंता जाहिर की कि हिन्दी में कोई ऐसी पत्रिका क्यों नहीं जिसे एक लाख लोग खरीद कर पढ़ते हों। परिचर्चा के दौरान बीच-बीच में निरुपम कुछ ऐसे ही 'तराने' छेड़ते रहे जिससे 'हिन्दी मन' उद्वेलित होता रहा। जाहिर है उनके हर बयान से सहमति और असहमति दोनों की पर्याप्त गुंजाइश थी और शायद यही निरुपम का मकसद भी था। बहस चल निकली और बड़ी गर्मजोशी के साथ चलती रही।
दिल्ली विश्वविद्यालय के व्याख्याता आशुतोष कुमार ने पहली पंक्ति में हिन्दी साहित्य का हिन्दी समाज से रिश्ता तोड़ डाला। उनकी माने तो अब साहित्य और समाज में वो जान-पहचान नहीं रही जो इस भाषा की जान भी थी और पहचान भी। इसके लिए उन्होंने रामचंद्र शुक्ल के हिन्दी साहित्य के इतिहास को अकादमिक क्षेत्र का बुनियादी ग्रंथ बनाए जाने को जिम्मेदार ठहराया। आशुतोष
Feb
27
2011
बलिहारी बाबा रामदेव
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रामदेव उस पंथ से आते हैं जिसने भारत में पहली बार हिन्दुओं को 'हिन्दू' कहकर संगठित करने का काम शुरू किया. आर्य समाज से पूर्व किसी ने भी हिन्दुओं के लिए कोई सामािजक संगठनात्मक ढांचा खड़ा नहीं किया था. यह काम स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया. आर्य समाज से पहले हिन्दुओं का एक संगठन के बतौर निर्माण या इस्तेमाल की बात किसी ने सोची नहीं थी. 1875 से मुंबई में शुरू हुआ आर्य समाज आंदोलन कोई एक शताब्दी बाद ही अप्रासंगिक हो गया. लेकिन इस दौर में आर्य समाज एक विकसित पंथ बन चुका था। लेकिन एक पंथ होने के बाद भी उसका प्रभाव आधुनिक भारत में नगण्य है. ऐसे में जब बाबा रामदेव का बतौर योग गुरू सामाजिक उभार हुआ तो बिखरा हुआ आर्य समाज चुपके से उनके पीछे एकत्रित हो गया. आज दिल्ली की रैली में रामदेव के पीछे खड़ा आर्य समाज साफ दिखाई दे रहा था. मंच पर अगर स्वामी अग्निवेश नेपथ्य में संयोजन कर रहे थे तो नीचे स्रोताओं में बड़ा वर्ग महर्षि दयानन्द का अनुयायी नजर आ रहा था. जिस प्रकार स्वामी दयानन्द सरस्वती सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता को सन्यास का हिस्सा मानते थे, आर्य समाज को जीवन में उतारनेवाले सन्यासी भी मानते हैं कि
Feb
16
2011
हिंदी साहित्य के लिए पंजाबी के दूत
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जिसमें अणखी के अमूल्य साहित्यिक योगदान को याद करते हुए उनकी विरासत को सहेजने का संकल्प लिया गया। उनकी विलक्षण प्रतिभा का आंकलन करते हुए वक्ताओं ने लब्बोलुआब निकाला कि वाकई अणखी हिंदी साहित्य के लिए पंजाबी के दूत समान थे। यहां उल्लेखनीय है कि अणखी उन चुनिंदा पंजाबी लेखकों में शुमार हैं, जिनकी कई रचनाएं पाठकों के बीच इतनी लोकप्रिय हुई कि उनके हिंदी अनुवाद भी प्रकाशित करने पड़े।
इस साहित्यिक समारोह की अध्यक्षता संयुक्त रुप से नामवर लेखक-इतिहासविद् मनमोहन बावा, पंजाबी ट्रिब्यून के मुख्य संपादक वरिंदर वालिया, यूनिस्टार पब्लिकेशन्स चंडीगढ़ के हरीश जैन, प्रसिद्ध नाटककार-लेखक प्रो. अजमेर औलख और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रो. अजय बसारिया ने की। इस दौरान अणखी की तीन चर्चित पुस्तकों का भी विमोचन किया गया। इनमें बलदेव बधान द्वारा संपादित और एनबीटी इंडिया द्वारा प्रकाशित 59 कहानी के संग्रह च्रामसरुप अणखी दियां चौंणविया कहानियांज् के अलावा यूनिस्टार पब्लिकेशंस चंडीगढ़ द्वारा प्रकाशित उनका अंतिम व अधूरा उपन्यास पिंड दी मिट्टी और कुलदीप मान द्वारा संपादित उनके दोस्त व सह-लेखक को समर्
अपनी मिट्टी दा रूख शामिल रहीं। यह रचनात्मक कार्य कर वास्तव में अणखी के सह-लेखकों, प्रशंसकों और परिजनों ने उनकी साहित्यिक विरासत को सहजने का व्यवहारिक-संकल्प लिया।इस दौरान श्री बावा ने अपने
Feb
13
2011
प्रवासी कथाकार का दर्द
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सैनिक और विशाल भारत का संपादन करते वक्त पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी प्रवास और उसकी पीड़ा के संपर्क में आ गए थे। जिसका नतीजा बाद में प्रवास और प्रवासी रचनात्मकता के उनके गहन अध्ययन में नजर आया। लेकिन आज प्रवास का मकसद बदल गया है। आज के प्रवास में मजबूरी नहीं बल्कि शौक है। बेहतर या उससे भी आगे की कहें तो सपनीली जिंदगी की तलाश आज के प्रवास का अहम मकसद बन गया है। शायद यही वजह है कि मशहूर कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव प्रवासी लेखन को खाए-अघाए लोगों का लेखन कहने से खुद को रोक नहीं पाते। यह सच है कि प्रवासी लेखन को लेकर इन दिनों हिंदी साहित्यिक समाज में खास आलोडऩ है। लेकिन इसके पीछे विशुद्ध रचनात्मक वजह नहीं है। बल्कि आज ब्रिटेन -अमेरिका या कनाडा जैसे समृद्ध देशों में रह-रहे रचनात्मक लोगों को सबसे ज्यादा अपनी रचनात्मक पहचान की मान्यता हासिल करने से जुड़ गया है।
लेकिन ऐसा नहीं कि प्रवासी रचनात्मकता को पहचान पहले से हासिल नहीं रही है या फिर प्रवासी लेखक को यथेष्ट सम्मान नहीं मिलता रहा है। अगर ऐसा होता तो आज से करीब चौथाई सदी पहले गंगा में अमेरिका में रह रही लेखिका सुषमा बेदी का उपन्यास
Feb
11
2011
आह गडकरी, वाह गडकरी
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जिन वसुंधरा राजे का विरोध न करने के लिए उन्हें राज्य में पार्टी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना पड़ा, उन वसुंधरा राजे की मौजूदगी भी थी. दिल्ली के संघी भाई और भाजपाई सभी इकट्ठा थे. हाल खचाखच भरा हुआ था. लेकिन अध्यक्ष जी का कहीं अता पता नहीं. संपर्क करने पर पता चला कि हैलिकाप्टर चल चुका है वे पहुंच जाएंगे. इस बीच आयोजकों ने चाय नाश्ता करवाकर कार्यक्रम की शुरूआत कर दी. जिन्हें बोलना था उन्होंने बोलकर छुट्टी पा ली. भारतीय राजनीति में जनसंघ की सांगठनिक और वैचारिक जड़े जमानेवाले पंडित दीनयदाल उपाध्याय पर पीएचडी करनेवाले डॉ महेश शर्मा को बोलते हुए सुनिये तो समझना मुश्किल होता है कि वे बौद्धिक बने रहकर गलती कर रहे हैं या फिर चुनावी राजनीति में जाकर. वे पत्रकारिता भी करते हैं इसलिए उन्हें पत्रकारिता की "राष्ट्रवादी" दर्शन की जबर्दस्त समझ है. वे भाजपा में कुछ उन उदारवादी लोगों में हैं जो राजनीति में लिखने पढ़ने की आदत को गलत नहीं मानते हैं. इसलिए उनसे विद्वता की उम्मीद करने पर निराशा नहीं मिलती है.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय को वर्तमान राजनीतिक संदर्भों में जितनी सटीकता से महेश शर्मा विश्लेषित करते हैं, दूसरा कोई नहीं कर सकता. जिन दिनों वे दिल्ली में राज्यसभा सांसद
Feb
11
2011
नर्मदा कुम्भ में राष्ट्र-शत्रुओं का प्रक्षालन
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उधर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष सुरेश पचौरी और कॉंग्रेस के ही महासचिव दिग्विजय सिंह ने बार-बार नर्मदा कुम्भ पर रोक लगाने की मांग की है. ईसाई मिशनरियों के सुर में सुर मिलाते हुए कॉंग्रेस के नेताओं ने नर्मदा सामाजिक कुम्भ को भाजपा का आयोजन बताया. दरअसल कॉंग्रेस के नेताओं में मिशनरियों को पीछे छोड़ देने की होड लगी है. कॉंग्रेस के लिए मध्यप्रदेश में नर्मदा कुम्भ के आयोजन से एक तरफ कुआ तो दूसरी तरफ खाई पैदा हो गयी गई. कॉंग्रेस सांप-छछूंदर की स्थिति में है. कॉंग्रेस के नेता, ईसाईं मिशनरी, सोनिया और वनवासियों को एक साथ खुश करना चाहते है. नेताओं को डर है कि अगर ये खुश नहीं हुए तो नाराज हो जायेंगे. वे ये भी जानते है कि ये तीनो एक साथ खुश भी नहीं हो सकते. असमंजस की स्थिति में कॉंग्रेस के नेताओं ने तय किया कि अभी तो कांग्रेसमाता सोनिया और ईसाई मिशनरी को ही खुश किया जाए. अभी अनुसूचित जनजाति के वोट की दरकार कोंग्रेस को नहीं गई. आने वाला चुनाव उत्तरप्रदेश में है. इसलिए वनवासी समाज के नाराज होने से कॉंग्रेस की राजनीतिक सेहत पर तत्काल कोई असर नहीं पडने वाला. मुसलमानों की ही तरह वनवासी (कॉंग्रेस के आदिवासी) भी कॉंग्रेस के लिए
Feb
07
2011
नर्मदा कुंभ का आतंक और ईसाई समाज
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आगामी 10 से 12 फरवरी को मध्य प्रदेश के मंडला में हिन्दू संगठनों द्वारा नर्मादा के तट पर ‘‘माँ नर्मादा सामाजिक कुंभ’’ का आयोजन किया जा रहा है। राष्ट्रीय स्वयसवेक संघ के बड़े नेताओं सहित इसमें हजारों साधु-संतों के शिरकत करने की सम्भावना है। कुंभ में लाखों आदिवासी समुदाय के लोग इन्हें सुनने के लिए पुंहचने वाले है। आयोजकों का दावा है कि प्रकृति से जुड़ी जनजातियां जो विकास के वह आयाम तय नही कर पाई है, जो किया जाना चाहिए था उन्हें विकास की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए भी यह सामाजिक कुंभ बड़ा सहायक होगा। अब तक भोले भाले आदिवासी समाज को दिग्भ्रमित कर, उनकी भावनाओं का शोषण किया जाता रहा है, जिस पर अंकुश लगाने के लिये राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा अभियान चलाया जा रहा है।
मंडला भारत के सबसे पिछड़े जिलो की सूची में बीसवें स्थान पर है। यहां पर कौल आदिवासी बड़ी संख्या में है। चर्च उनके बीच लम्बे समय से कार्य कर रहा है। हिन्दू संगठनों द्वारा इस क्षेत्र में दखल को चर्च अपने लिए खतरे की घंटी मान रहा है। हालाकि वह सीधे-सीधे ‘‘माँ नर्मादा सामाजिक कुंभ’’ पर रोक लगाने की बात तो नही करता लेकिन मध्य प्रदेश सरकार से
Jan
30
2011
नाहक ही नर्मदा कुंभ
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यह भी सवाल काबिलेगौर है कि आखिर इस कुंभ के लिए मंडला का चयन क्यों किया गया। इसके उत्तर बहुत साफ हैं एक तो मंडला आदिवासी बहुल जिला है और इस इलाके धर्मांतरित लोगों की संख्या बहुत है। किंतु ईसाई संगठनों की चिंताओं को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। संघ परिवार ने इस आयोजन के ताकत झोंक दी है किंतु इतने बड़े आयोजन में जहां लगभग २० लाख लोगों के आने की संभावना है आदिवासी समाज के वास्तविक सवालों को संबोधित क्यों नहीं किया जा रहा है, यह एक बड़ा सवाल है। आदिवासियों की जिंदगी का मूल प्रश्न है आज उनकी जमीनों,जंगलों और जड़ों से उनका विस्थापन। इसी के साथ नक्सलवाद की आसुरी समस्या समस्या उनके सामने खड़ी है। इस बाजारवादी समय में अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहे इस समाज के मूल प्रश्नों सें हटकर आखिर धर्मांतरण जैसे सवालों से हम क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या ही बेहतर होता कि संघ परिवार इस महाआयोजन के बहाने माओवादी आतंकवाद के खिलाफ एक संकल्प पारित करता और जल, जंगल,जमीन से आदिवासियों की बेदखली के खिलाफ कुछ सार्थक फैसले लेते। किंतु लगता है कि धर्मांतरण जैसे सवालों को उठाने में उसे कुछ ज्यादा ही आनंद आता है।
Jan
24
2011
कलम ही है प्रभावी हथियार-जाहिदा हिना
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जाहिदा हिना ने अपनी मां को याद करते हुए कहा कि अपनी मां को न कभी हंसते देखा न कभी रोते लेकिन एकबार जब वह भारत अपने लोगों से मिलने आयी तब वह खूब रोयी और खूब हंसी थी। उन्होंने विभाजन को समझने की कोशिश की और भारतीय साहित्यों में राहुल सांकृत्यायन, कर्तुएल हैदर, रवीन्द्रनाथ टैगोर इत्यादि को पढा है। उन्होंने कहा कि मेरा हृदय भारत के लोगों, इसके गरीब और पिछडे लोगों के लिए हमेशा धडकता रहता है और इसके लिए उन्होंने लिखना चुना। विभाजन और महिलाओं पर लगातार लिखने वाली जाहिदा ने परवेज मुशरफ से पुरस्कार लेने से इसलिए इन्कार कर दिया था क्योंकि वो सैनिक तानाशाह है। उन्होंने कहा कि उनकी तीन माएं हैं-एक जिस ब्रिटिश भारत में वह जन्मीं और भारत की मीठी यादें दी, दूसरी पाकिस्तान जिसने उसे पाला और स्वयं उनकी मां जिन्होंने उसे जन्म दिया। उन्होंने अपनी पहली कहानी 09 वर्ष की उम्र में लिखी थी। हमारे देश में लडकियों पर अत्याचार होते हैं, जिसकी चीख मेरे लेखन से आप सुनते रहे होंगे। रवीन्द्र नाथ टैगोर की 'काबूलीवाला' कहानी पर आधारित उनकी कहानी 'मिनी' की कहानी है जो अब अफगानिस्तान में रहती हैं और दादी बन चुकी हैं। कहानी का पाठ सुनकर लगभग
Jan
22
2011
आइये जयपुर साहित्य उत्सव की मुखालिफ़त करें
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- दिल्ली में हालिया संपन्न भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे राष्ट्रमंडल खेलों की जाँच कर रहे केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने पाया है कि डी एस पी लिमिटेड को 23% से अधिक की दर से ठेके आवंटित किये गए थे.
- दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी खनन कंपनी रिओ टिंटो समूह के सम्बन्ध कई फासीवादी और नस्लवादी सरकारों से रहे हैं और उस पर दशकों से दुनिया भर में मानवीय, पर्यावरण और श्रमिक अधिकारों के उलंघन के आरोप हैं
- दुनिया की सबसे बड़ी ऊर्जा कम्पनी और आय के हिसाब से सबसे बड़ी कम्पनी शेल तेल कम्वानी ीरिया के लेखक और पर्यावरण कार्यकर्त्ता केन सारो वीवा की मौत की ज़िम्मेदार है
इस उत्सव में हिस्सा ले रहे प्रतिनिधियों के लिये क्या यह संभव है कि वे ओगोनी छात्र संघ के जनवरी 4, 2011 मांग को नैतिक समर्थन दें जिसमें छात्र संघ ने संयुक्त राष्ट्र संघ के आदिवासियों के अधिकारों संबंधी घोषणा की 18 वीं वर्षगांठ पर नीदरलैंड की सांसद से चुप्पी तोड़ते हुए शेल तेल कम्पनी को ओगोनी समुदाय के शोषण, उनके पर्यावरण की बर्बादी और नाईजीरियाई डेल्टा में रह रहे निवासियों की ज़िंदगी तबाह करने के लिये जिम्मेवार ठहराने और कम्पनी को नाईजीरिया से बाहर करने की मांग की है?
क्या


