आधार परियोजना का कॉरपोरेट विचार
विप्रो देश की जानी मानी आईटी कंपनी है. विप्रो के निदेशक अजीम प्रेमजी अपनी सदाशयता के लिए जाने जाते हैं. लेकिन इन दिनों विप्रो के अजीम प्रेमजी को एक कष्ट है. उनका यह कष्ट निजी नहीं है और वह हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करता है इसलिए इसका जिक्र जरूरी है. अजीम प्रेमजी की कंपनी को इस बात का दुख है कि अगर हर भारतीय को पहचानपत्र देनेवाली आधार परियोजना नष्ट हो जाती है तो उनका 30 करोड़ का निवेश बेकार चला जाएगा. यह 30 करोड़ रूपया उन्होंने ऐसे उपकरण खरीदने में निवेश किये हैं जो इंसान की आंखों, अंगुलियों की छाप ग्रहण करके उनका एक डाटाबेस तैयार करती है और वह डाटाबेस आगे चलकर लोगों की पहचान करने में काम आयेगी.
विप्रो वह कंपनी है जो इस परियोजना में महाराष्ट्र सहित देश के कई अन्य हिस्सो में लोगों का बायोमिट्रीक डाटाबेस इकट्ठा कर रही है. जब से वित्त मामलों की संसदीय समिति ने इस परियोजना को लाल झंडी दिखाई है तब से कारपोरेट घराने परेशान हैं. ऊंचे स्तर पर लॉबिंग हो रही है और पहले से विरोध कर रहे गृहमंत्री चिदम्बरम पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे पापुलेशन रजिस्टर के बहाने इसका विरोध बंद कर दें. अब खुद नंदन नीलकेनी ने एक रास्ता सुझाया है कि अगर गृहमंत्रालय चाहे तो वे नेशनल पापुलेशन रजिस्टर को आधार परियोजना के साथ मिला सकते हैं ताकि दोनों तरह के डाटा दोनों पक्ष इस्तेमाल कर सकें. इन दो तरह के पक्षों में एक तो सरकार है फिर दूसरा पक्ष कौन है?
यह दूसरा पक्ष कारपोरेट घराने हैं जो आधार परियोजना के सबसे बड़े हिमायती हैं. उनकी यह हिमायत अनायास नहीं है. आधार परियोजना के जरिए कारपोरेट घराने देश के हर नागरिक का एक डाटाबेस अपने पास रखना चाहते हैं ताकि भविष्य में व्यापारिक गतिविधियों को ज्यादा सटीक तरीके से अंजाम दिया जा सके. इसी महीने जनवरी में दुनिया की जानी मानी पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने आधार परियोजना को अपनी कवर स्टोरी बनाया है. कवर स्टोरी में इस बात की जमकर वकालत की गई है कि आधार परियोजना के रास्ते में कोई रुकावट नहीं आयेगी. वही इकोनॉमिस्ट बता रहा है कि आधार परियोजना सफल हो जाने के बाद "कंपनियां और उनके ग्राहक दोनों फायदे में रहेंगे." इस फायदे को नीलकेनी के हवाले से और स्पष्ट करते हुए इकोनॉमिस्ट लिखता है कि "कंपनियों के लिए यह बहुत आसान होगा कि वे ज्यादा सटीक तरीके से अपने ग्राहकों की पहचान कर सकें. ऐसा होने के बाद बैंक उन लोगों की पहचान आसानी से कर सकेंगे कि वे किसे ऋण दें और किसे न दें. मोबाइल कंपनियां भी क्रेडिट देने के पहले कस्टमर का आंकलन कर सकेंगी. इन्श्योरेन्स कंपनियों को भी इस परियोजना से बहुत लाभ होगा क्योंकि उन्हें पता होगा कि वे जिनको पालिसी बेच रहे हैं वे वास्तव में इस लायक हैं या नहीं. स्कूल रिकार्ड की तरह मेडिकल रिकार्ड रखे जा सकेंगे." द इकोनॉमिस्ट और नीलकेणी इस परियोजना के ऐसे ही अनेक फायदे गिना रहे हैं.
आधार परियोजना के पक्ष में जो तर्क नीलकेणी दे रहे हैं वे सीधे सीधे कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाले हैं. तो क्या भारत सरकार अपने पैसों को खर्च करके एक ऐसी परियोजना को पूरा करवा रहा है जो भविष्य में अपने नागरिकों को कंपनियों के सामने चारा बनाकर फेंक देगा. नंदन नीलकेणी जैसे कारपोरेट दिग्गज अगर अपनी इन्फोसिस की नौकरी छोड़कर देश की लोकतंत्र को मजबूत करने आये थे तो उसके पीछे आर्थिक हित नहीं होगा ऐसा सोचा भी नहीं जा सकता. पूरी तरह से अमेरिका समर्थक नंदन नीलकेणी की आईटी जमात को इस परियोजना में दोहरा फायदा मिल रहा है. इस पूरी परियोजना को पूरा करने और बाद मे इसे चलाये रखने के लिए कारपोरेट घरानों को स्थाई व्यापार मिल रहा है और एक ऐसा डाटाबेस मिल रहा है जो उन्हें अपना व्यापार बढ़ाने में मदद करेगा. इस समय इस परियोजना की लागत करीब 18,000 करोड़ रूपया है.
हालांकि परियोजना का विरोध व्यापक हो चला है और संसदीय समिति के अलावा सरकार में भी इसको लेकर विरोध है लेकिन कारपोरेट लॉबी के दबाव में परियोजना पर काम जारी है. अब तक करीब 20 करोड़ लोगों को आधार कार्ड दिया जा चुका है और प्रतिदिन दस लाख लोगों का डाटाबेस तैयार किया जा रहा है. नंदन नीलकेणी की कोशिश है कि इस परियोजना को कैबिनेट से मंजूरी दिलवा दी जाए ताकि संसद की वित्तीय समिति की सिफारिश को नाकाम किया जा सके. इसलिए हो सकता है कारपोरेट लॉबी के दबाव में आनेवाले एक दो दिनों में कैबिनेट इस परियोजना पर कुछ विरोधों को शांत करते हुए आगे जाने की मंजूरी दे दे लेकिन सवाल उन नागरिकों से है जो आधार कार्ड बना रहे हैं. आज जो लोग कंपनी की टेलीमार्केटिंग से इतने परेशान हो चले हैं कि एक फोन काल न आने देने के लिए क्या क्या जतन करते हैं वे अपने जिस्म से जुड़ी सारी जानकारी कंपनियों के हवाले कर देंगे? इस परियोजना का विरोध करनेवाले गोपाल कृष्ण की शिकायतों और सवालों का अंबार है. उनके पास इस बात के तथ्य और प्रमाण है कि हिटलर ने ऐसे ही डाटाबेस को इस्तेमाल करके यहूदियों का सफाया किया था और उससे भी पहले महात्मा गांधी ने ऐसी ही एक परियोजना का दक्षिण अफ्रीका में विरोध किया था जो भारतीयों की शिनाख्त के लिए तैयार किया जा रहा था.
जिस तरह से कारपोरेट घराने और अमेरिकी प्रतिष्ठान इस परियोजना के लिए लॉबिंग कर रहे हैं उससे अब साफ हो गया है कि आधार परियोजना और कुछ नहीं बल्कि कारपोरेट घरानों की लंबी रणनीतिक योजना है ताकि भविष्य में कंपनियां इस देश के आम आदमी को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल कर सकें. अब जबकि हम यह जान गये हैं तो क्या अब भी आधार के जरिए अपनी पहचान बनाना चाहेंगे?
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Sanjay Tiwari
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