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डिग्गी पैलेस में साहित्य की डुगडुगी

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डिग्गी पैलेस में साहित्य की डुगडुगी
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इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 22 जनवरी को जयपुर में पंडित झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यान में प्रेस परिषद के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू जब बोल रहे थे कि “देश और लोगों की असली समस्याओं से भटकाने के लिए जनता को धर्म, फिल्म, क्रिकेट और गैर जिम्मेदार मीडिया की अफीम का नशा दिया जा रहा है.”, उसी दौरान जयपुर में ही एशिया के सबसे बड़े साहित्यिक उत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का तीसरा दिन ओप्रा विन्फ्रे को पाकर अभिभूत था. पूरा डिग्गी पैलेस प्रसिद्ध टीवी एंकर ओप्रा विन्फ्रे के प्रशंसकों से अटा पड़ा था. हजारों की संख्या में लोग ‘नो इंट्री’ के बाद भी डिग्गी पैलेस के अंदर दाखिल होना चाहते थे.

आयोजकों के अनुसार अंदर पैर रखने की जगह नहीं थी. बाहर खड़े लोग आयोजकों की इस दलील को अनसुना करके, किसी भी कीमत पर अंदर जाने की जल्दी में थे. भला हो जयपुर पुलिस का, जो अंदर और बाहर के बीच दीवार बनके खड़ी थी और बिना आयोजकों की इजाजत के उन्होंने किसी को अंदर नहीं जाने दिया.

जयपुर में हो रहा एशिया का सबसे बड़ा साहित्यिक उत्सव अन्ना का आंदोलन नहीं था, जो कोई भी आमो-खास सिर उठाकर चला आए. ना ही यह दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाला पुस्तकों का मेला था कि दस रुपए का टिकट लीजिए और हक से अंदर जाइए. साहित्य उत्सव में तो पास लेकर भी लोग सड़कों पर मारे-मारे फिर रहे थे. जिनकी जेब में पास नहीं था, ऐसे सैकड़ों लोगों का हाल क्या बताएं?

एशिया का सबसे बड़ा साहित्य का यह रेला, माफ कीजिएगा मेला भारत की सरकार के ‘अतुल्य भारत’ के विज्ञापन जैसा ही दिख रहा था. डिग्गी पैलेस साइनिंग से फिल गुड का भी वहां एहसास था. वास्तव में यह आयोजन देश की तरक्की का प्रतीक है. बढ़ते हुए सेंसेक्स और बढ़ती हुई जीडीपी का आइना है. पूरे आयोजन में अन्ना का आम आदमी नदारद था. लोकपाल और भ्रष्टाचार, कुपोषण और भूख जैसे विषय किसी साहित्यकार, लेखक और फिल्मकार के एजेंडे में शामिल नहीं थे. वास्तविकता यह है कि शशी थरूर का कैटल क्लास, पुस्तक मेलों में जाकर ही खुश है. साहित्य की रैली में उसका क्या काम?

पूरे आयोजन में दो ही वर्ग के लोग थे, एक खास लोगों के क्लास से ताल्लुक रखने वाले और दूसरे अति विशिष्ट क्लास से ताल्लुक रखने वाले. आयोजन में जो लोग खास नहीं थे, वे सभी अति विशिष्ट थे. यह आयोजन खाये-पीये और अघाये लोगों के लिये था, जिनके अवकाश के क्षणों में यह सब कुछ घट रहा था और भूख, प्यास, गरीबी व जीवन के द्वंद्व पर बात करने से उनके प्रमाद में खलल पड़ती थी.

डिग्गी पैलेस से यही कोई दस बारह किलोमीटर की दूरी पर चल रहे व्याख्यानमाला में काटजू का व्याख्यान जारी था, “ देश में 80 फीसदी लोग परेशान हैं, गरीब हैं, बेरोजगारी ऐसी है कि चपरासी के एक पद के लिए एक हजार आवेदन आते हैं. इसमें एमए पास भी होते हैं. महंगाई आसमान छू रही है. सरकारी अस्पताल की दशा बदत्तर है और शर्म की बात यह है कि ढाई लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं.”

काटजू बोल रहे थे और इधर डिग्गी पैलेस में कुछ युवक-युवतियां तमाम पुलिसिया रुकावट के बावजूद ओप्रा विन्फ्रे की एक झलक पाने के लिए दीवार लांघने की कोशिश करते पकड़े गए. आयोजकों द्वारा खास लोगों के लिए जारी किए गए सारे पास कुछ घंटों के लिए अमान्य घोषित कर दिए गए थे. अति विशिष्ट लोगों का बाहर जाना और अंदर आना निर्बाध गति से चल रहा था.

कई बार लगता है कि इस महान साहित्यिक फसाद की जड़ चेतन भगत और उन जैसे पापुलर कल्चर के लोग हैं, जिन्होंने अंग्रेजी साहित्य को उंगली पकड़ के भारत में बिकना सिखाया. ‘जो बिकेगा, वो टिकेगा’, एमबीए साहित्य का यह जुमला जयपुर साहित्यिक उत्सव ने खूब समझा. वैसे जयपुर के साहित्य उत्सव में ना इस बार जयपुर नजर आया और ना ही साहित्य. वर्तमान समय की चुनौतियों से जो बचकर निकल जाए, समाज की वर्तमान चुनौतियों से आंख चुराए और हर तरफ ऑल इज वेल, ऑल इज वेल का नारा दे, वह आमिर खान की ब्लॉक बस्टर फिल्म तो हो सकती है, आप ही कहिए, उसे साहित्य उत्सव कैसे कहा जाए?

आयोजन से किसी को क्या शिकायत हो सकती है, शिकायत इसके फार्मेट से है. आयोजकों से है और प्रायोजकों से है. आयोजन को लेकर यह खबर आई कि इसमें माफियाओं का पैसा लगा है. कुछ जनवादी संस्थाओं और व्यक्तियों द्वारा जारी एक बयान पर गौर करें- आयोजन को अमेरिकी सरकार की संस्था अमेरिकन सेंटर का सहयोग प्राप्त है. फिर दुनिया के 132 देशों में 8000 से अधिक परमाणु हथियारों से लैस 702 अमेरिकी सैनिक ठिकाने क्यों बने हुए हैं?

हम कोका कोला द्वारा इस आयोजन के प्रायोजित होने के विरुद्ध इसलिए हैं क्योंकि इस कंपनी ने केरल के प्लाचीमाड़ा और राजस्थान के कला डेरा सहित 52 सयंत्रों द्वारा भूजल का भयानक दोहन किया है जिस कारण इन संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को पानी के लिये अपने क्षेत्र से बाहर के साधनों पर आश्रित होना पड़ा है. इस फेस्टिवल की एक प्रायोजक रिओ टिंटो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी खनन कंपनी है, जिसका इतिहास फासीवादी और नस्लभेदी सरकारों से गठजोड़ का रहा है और इसके विरुद्ध मानवीय, श्रमिक और पर्यावरण से संबंधित अधिकारों के हनन के असंख्य मामले हैं. केन्द्रीय सतर्कता आयोग की जांच के अनुसार इस आयोजन की मुख्य प्रायोजक डीएससी लिमिटेड को घोटालों से भरे कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन के दौरान 23 प्रतिशत अधिक दर पर ठेके दिए गए.

क्या अच्छे साध्य के लिए, अच्छा साधन मिलना आज के समय में नामुमकिन हो गया है? साहित्य समारोह में शामिल हुए, एक प्रकाशक एस आनन्द का एक पत्रकार को यह कहना भी खूब रहा- “दिस इज लाइक ए पंजाबी वेडिंग विद सम लिटरेचर थ्रोन इन विदआउट मेंहदी ... म्यूजिक इज ऑलसो अवलेबल.” यानी यह उत्सव एक पंजाबी शादी जैसा है, जिसमें मेंहदी की रस्म भर नहीं है, कुछ साहित्य भी डाला गया है. संगीत भी है.22 तारीख आठ बजे वर्ल्ड क्लास जयपुर के लिए पूरा शहर मैराथन में दौड़ रहा था और दस बजे पूरा शहर मानों जयपुर के डिग्गी पैलेस के बाहर खड़ा था. अंदर ओप्रा विन्फ्रे ने एनडीटीवी की बरखा दत्त की फर्राटेदार भाषा की तारीफ की और बदले में बरखा ने पूरी बातचीत में तीन बार पूछा- ‘क्या आप मुझे हायर करेंगी?’

पूरे आयोजन में स्वामी अग्निवेश अकेले ऐसे व्यक्ति होंगे, जिन्होंने उत्सव के मंच पर खड़े होकर भी स्पष्ट बयानी की. यह आयोजकों का प्रबंधन कौशल ही था कि विवादों में रहने वाले स्वामीजी का बयान इस बार किसी विवाद की वजह नहीं बन सका. स्वामीजी ने कहा-“ सलमान रुश्दी के मामले में जो हुआ, गलत हुआ. सरकार ने रुश्दी की पुस्तक प्रतिबंधित की, लेकिन उन्हें रोकना गलत है. इसकी जांच होनी चाहिए. खुफिया सूचनाएं आधारहीन थीं तो झूठ बोलने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होनी चाहिए.”

स्वामीजी ने यह भी कहा- “प्रगतिशील मुसलमानों को सलमान रुश्दी के पक्ष में सामने आना चाहिए था, इसमें शबाना आजमी, जावेद अख्तर, असगर अली इंजीनियर जैसे लोगों का मौन ठीक नहीं है.”

वैसे जयपुर साहित्य उत्सव के प्रबंधकों के प्रबंधन कौशल का इस अर्थ में कायल हुआ जा सकता है कि उन्होंने जयपुर को दुनिया के साहित्यकारों के बीच एक केन्द्र के तौर पर स्थापित किया है. भले आपकी शिकायत हो कि यहां तो साहित्य की उत्सवधर्मिता भर थी लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि यह होने के बाद भी एक आयोजन के अंदर दुनिया भर के इतने चर्चित चेहरों को एक साथ जुटा पाना वाकई काबिले तारीफ है. आईआईएम, अहमदाबाद को इनके प्रबंधन कौशल को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करने पर एक बार विचार अवश्य करना चाहिए.

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सिकंदर हयात 26/01/2012 09:19:35
किसी जमीनी बढ़िया काम की इनसे उम्मीद ही बेकार हे लगभग सारे ही भारतीय अंग्रेजी लेखक बेकार होते हे इसका कारण ये हे की पूरब या भारत में अंग्रेजी पिशाच होने का मतलब ही होता हे एक ऐसा इंसान जिसने यहाँ की बेहद जटिल तनाव भरी , अपमान शोषण भरी, जिम्मेदारियों के भोझ से कुचली हुई जिन्दगी बिलकुल नहीं जी होती हे उपर से यहाँ अंग्रेजी का इस कदर भयंकर दबाव हे और ये बजाय की इस दबाव के खिलाफ आवाज उठाकर आम आदमी को कोई रहत देने की जगह इस दबाव की सवारी गांठ कर खुद को बहुत बड़ी तोप ही मान कर घर से चलते हे जाहिर हे की इस मानसिकता साथ न कोई महान लेखन न कोई महान आयोजन न कोई महानता और न ही कोई महान आत्मा सामने आ सकती हे इसका कोई सवाल ही नहीं उठता ये लगभग सब शराबी कवाबी बदमिजाज बददिमाग सुविधाभोगी चरित्र ---- होते ही हे
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Ashish Kumar

Ashish Kumar बेतिया से पढ़ना शुरू किया और दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ ली. दसवीं कक्षा पहुंचने तक आधा दर्जन स्कूलों को नाप चुके आशीष कुमार 'अंशु' आजकल एक घुमंतू पत्रकार के तौर पर देश को नाप रहे हैं. लिखते-पढ़ते स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं और सोपानस्टेप के लिए घूमते-फिरते कार्यरत भी हैं.
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