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घोटाला और घाघपना

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घोटाला और घाघपना
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ये नख से शिख तक भ्रष्टाचार के दलदल में धंसी सरकार द्वारा की गयी अब तक की सबसे बड़ी नैतिक हत्या है। इसरो के के पूर्व प्रमुख माधवन नायर समेत देश के तीन शीर्ष अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के खिलाफ किसी भी सार्वजनिक उपक्रम में सेवा देने पर लगायी गयी पाबंदी हैरान कर देने वाली है। देश के लिए लगभग २७ प्रतिष्ठापरक परियोजनाओं को मुकाम तक पहुंचाने वाले माधवन और उनके साथियों को दी गयी सजा साफ़ बताती है कि राजनीति के शस्त्र-शास्त्र न सिर्फ संसद और विधानसभाओं में बल्कि देश के गौरव कहे जाने वाले प्रतिष्ठानों में भी पूरी ताकत के साथ मौजूद हैं।

एस-बेंड का घोटाला सिर्फ जनता के धन का घोटाला नहीं था बल्कि ये राष्ट्र की सुरक्षा के साथ भी की गयी एक बहुत बड़ी दगाबाजी थी मनमोहन सिंह जिनके अधीन इसरो काम करता है और उनकी केबिनेट २ लाख करोड़ के इस महा -घोटाले से जिस तरह से खुद के दामन को पाक-साफ़ बताकर देश के शीर्ष वैज्ञानिकों के सर पर सारा ठीकरा फोड रही है ,उसका असर मत्वपूर्ण अनुसंधानों पर भी पड़ सकता है।

गौरतलब है कि इसरो के प्रतिष्ठान एंट्रिक्स कार्पोरेशन द्वारा देवास जिनके दो लाख करोड़ के एस बैंड घोटाला मामले में देवास कम्युनिकेशन ने कहा है कि एस बैंड आवंटन का पूरा मामला सरकार और केबिनेट की जानकारी में था। कैबिनेट की मंजूरी के बाद ही देवास मल्टीमीडिया को एस-बेंड के स्पेक्ट्रम आवंटित किये गए थे। हालाँकि केबिनेट और इसरो के मौजूदा अध्यक्ष भी आश्चर्यजनक ढंग से सरकार को इसकी जानकारी होने की बात से इनकार कर रहे हैं।

इस पूरे गडबडझाले को जानने से पहले हमें एस-बेंड को समझना होगा। एस-बैंड उन रेडियो तरंगों को कहते हैं, जिनकी फ्रीक्वेंसी (आवृत्ति) दो और चार गीगा हर्ट्स के बीच होती है। इसकी पारंपरिक सीमा पहले अल्ट्रा हाई फ्रीक्वेंसी (यूएचएफ) और सुपर हाई फ्रीक्वेंसी (एसएचएफ) के बीच तीन गीगा हर्ट्ज तक थी, जिसे बढ़ाकर चार कर दिया गया है। यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम के माइक्रोवेब बैंड (वह तरंग, जिसकी आवृत्ति 0.3 गीगा हर्ट्ज से 300 गीगा हर्ट्ज के बीच होती है) का ही एक हिस्सा होता है।मुख्य तौर पर एस-बेंड का इस्तेमाल रक्षा तकनीक  से जुड़े अलग-अलग कार्यों जैसे समुद्री सतह पर मौजूद जहाज के रडार और सूचना भेजने और पाने से संबंधित सैटेलाइटों (विशेषकर अमेरिका अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा अंतरिक्ष यान और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से संपर्क साधने में इस्तेमाल किए जाने वाले सैटेलाइटों) के लिए किया जाता है। इसका उपयोग डिजिटल ऑडियो रेडियो सैटेलाइट (डीएआरएस) रेडिया सिस्टम, जैसे कि सीरियस सैटेलाइट रेडियो और एक्सएम सैटेलाइट रेडियो में भी किया जाता है। पूर्व में दूरदर्शन एस-बेंड का इस्तेमाल करके ही अपना प्रसारण करता था।
 
अजीब ये था कि इसरो ने इस दुर्लभ स्पेक्ट्रम से 70 मेगा हर्टज को 20 साल के लिए  दे दिया है। यह स्पेक्ट्रम एमटीएनएल व बीएसएनएल को लगभग साढ़े बारह हजार करोड़ रुपए में दिया गया, जबकि देवास मल्टीमीडिया को मात्र एक हजार करोड़ में आवंटित किया गया। सोचने वाली बात ये है कि इतने कम दामों में वो तकनीक जिससे देश के कोने -कोने में आसानी से पहुँच बनायीं जा सकती थी एक निजी कंपनी को सौंप दे दी गयी। वो कंपनी जो देश की सुरक्षा व्वयस्था के लिए कहीं से भी जिम्मेदार नहीं है। देवास, अगर यही स्पेक्ट्रम लीज पर अगर किसी भी विदेशी कंपनी को सौंप देता तो देश की सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा  खतरा पैदा हो सकता था। ग़ौरतलब है कि देवास मल्टीमीडिया को इसरो के एक पूर्व अधिकारी ने शुरू किया था।
 
दरअसल ये पूरा मामला इसरो के कार्यों और निर्णयों में बढते जा रहे राजनैतिक हस्तक्षेप का परिणाम हैं। इसरो के द्वारा लिए गए सभी बड़े निर्णय सीधे तौर पर प्रधानमन्त्री कार्यालय द्वारा लिए जाते रहे हैं ,ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि देवास को स्पेक्ट्रम आवंटन पर भले ही इसरो के अधिकारियों की सहमति रही हो लेकिन इसमें कहीं न कहीं से राजनैतिक दबाव भी था। सरकार द्वारा की गयी कार्यवाही में सिर्फ वैज्ञानिकों को सजा देकर प्रशासनिक अधिकारियों को खुली छूट देना बनाता है कि कहीं न कहीं से एक बड़े झूठ पर आज भी पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। इस बातसे तनिक भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अंतरिक्ष अनुसंधानों से ज्यादा शास्त्रीय गायन में रूचि रखने वाले इसरो के वर्तमान अध्यक्ष राधाकृष्णन इस मामले में गहरे दबाव में हैं ,और वो उसी लीक पर काम कर रहे हैं जिस लिक पर सरकार चाहती है या फिर जिस लीक पर चलकर चंद्रयान मिशन से माधवन का नाम जुड़ने से जुडी कुंठा का परिमार्जन होता है।

गौरतलब है कि राधाकृष्णन एक अंतरिक्ष वैज्ञानिक कम एक प्रशासनिक अधिकारी ज्यादा है। पद्मविभूषण से सम्मानित माधवन के खिलाफ की गयी कार्यवाही को लेकर देश भर के वैज्ञानिकों की प्रतिक्रियाएं साफ़ संकेत देती हैं कि इस तरह के निर्णय देश के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं। नायर जब कहते हैं कि राधाकृष्णन अयोग्य हैं, और वह इसरो का सर्वनाश कर देंगे। तो ये बात सिर्फ के व्यक्ति नहीं कहता वो कहता है जिसका लोहा सारी दुनिया मानती है। नायर का ये कहना कि  उन्होंने ये सब बदला लेने के मकसद से किया है। वह अपनी ही कसौटी पर खरे नहीं उतर पाए हैं इसलिए वह देश का ध्यान अपनी ओर से भटकाना चाहते हैं। तो हमें इसरो के पिछले दो साल के काम -काज पर भी निगाह डाललेनी चाहिए। ये सच है कि पिछले दो सालों में जबसे राधाकृष्णन ने कार्य ग्रहण किया है किसी भी बड़े प्रोजेक्ट पर काम नहीं हो पाया है ,तमाम योजनाएं लटकी हुई हैं और न ही अंतरिक्ष विज्ञानं से जुड़े किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय समझौते को अमली जामा पहनाया जा सका है।

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anand 27/01/2012 22:50:47
Bhai desh hi girwi ho gaya hai.......
swbhiman hin rastra ka yahi harshra hota hai...
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Durgesh 30/01/2012 19:05:03
friend,
I ,too, am forwarding you a link of news about corruption in Road Construction Department, Bihar. The facts mentioned the news are verified from the Head of the office (i.e. Dilip Kr., Executive Engineer), who, himself, has written 300-350 letters about corruption and about corrupt employees to Dev Narayan Prasad, Chief Engineer, Ganga Bridge Project Wing, Road Construction Department, Bihar, beily Road, Nirman Bhawan, Patna. But Dev Narayan Prasad didn’t take any action against corrupt employees, instead he is suppressing the matters.

Below is the link of news of corruption

https://www.facebook.com/note.php?created&&note_id=109591365814617

You may verify these facts from Dilip Kumar, Executive Engineer at his mobile no-9430830911. You may also post your query at Help centre of Road Construction Department, Bihar at the following link.

http://210.212.23.50/RCD/Guest/frmComplainwin.aspx

Hope you will do your best in exposing this corruption and share this news
total: 2 | displaying: 1 - 2

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Awesh Tiwari

Awesh Tiwari मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है। नेटवर्क6 के संपादक।
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