मनोज लोहानी
लोन लेनेवालों ने ले ली बैंक मैनेजर की जिंदगी
बैंक प्रबंधन के दबाव और कर्जदारों के कर्ज वापस न करने की फांस से बैंक मैनेजर को मुक्ति मिली भी तो गले में फांसी का फंदा डालकर। यह मामला लोन लेकर कर्ज चुकता न कर पाने के बाद आत्महत्या करने से एकदम उलट है। यहां तो लोने देने वाले बैंक मैनेजर को ही लोन की रिकवरी न होने के चलते मौत चुननी पड़ी।
देहारदून में शुरू हुई कांग्रेसियों की 'नारायण' परिक्रमा
देहरादून का फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (एफआरआई) परिसर अब एकाएक खास हो चला है। वजह है उत्तराखंड की राजनीति के भीष्म पितामह नारायण दत्त तिवारी का यहां डेरा। दो दिन पहले तिवारी जब देहरादून पहुंचे तो उनके स्वागत करने को गिनती के लोग थे। दूसरे दिन उनसे मिलने वालों की संख्या बढ़ी और अंतत: अब कांग्रेस के करीब-करीब सभी दिग्गज उनसे मिलने जा पहुंचे हैं।...उत्तराखण्ड की राजनीति को तारेंगे नारायणदत्त तिवारी
उम्र के आखिरी पड़ाव पर सेक्स स्केंडल के थपेड़े झेल रहे आंध्र प्रदेश के निवर्तमान राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी अब घर लौट आए हैं। तिवारी जी देहरादून में डेरा डाल चुके हैं। सैक्स स्केंडल के बाद तिवारी फिलहाल इस मुद्दे पर नारायण के भरोसे रहते हुए देहरादून को ही बाकी जिंदगी का ठिकाना बनाने वाले हैं, ऐसा उन्होंने स्पष्ट तौर पर कह दिया है और साथ यह भी कि अब उन्हें औरतों से बात करते डर लगता है..।...फिर प्रकट हो गये पायलट बाबा
हजारों लोगों की गाढ़ी कमाई पर कुंडली मारकर बैठे कथित महायोगी पायलट बाबा आखिरकार प्रकट हो ही गए हैं। वही पायलट बाबा जो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में आठ हजार लोगों को एक रुपये में कंप्यूटर शिक्षा के नाम से करीब 412 करोड़ 90 लाख रुपया बटोरकर गायब थे।...छह दिसंबर का दिन और रामलीला मैदान में निकाहनामा
इस मामले को क्या किसी की नासमझी कहें? क्या रामलीला मैदान को निकाह के लिए ऐलाट करने का तहसीलदार का फैसला गलत था? या फिर सांप्रदायिक सौहार्द को तार-तार करने की क्या यह कोई साजिश थी? प्रशासन की इस मामले में अब क्या भूमिका होनी चाहिए? क्या जो भी हुआ वह नहीं होना चाहिए था? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब ढूंढते हुए उत्तराखंड की आर्थिक राजधानी हल्द्वानी इन दिनों सुलग रही है।...पकड़ा गया श्रम विभाग का घूसखोर डिप्टी कमिश्नर
श्रम विभाग के काफी चर्चित और रिश्वतखोरी के लिए जाने जाना वाला उत्तराखण्ड प्रशासन का डिप्टी कमिश्नकर आखिरकार सोमवार को विजिलेंस टीम की गिरफ्त में रंगे हाथ आ गया। लेबर लाइसेंस बनाने के एवज में 15 हजार रुपयों की रिश्वत लेते हुए विजिलेंस टीम ने उसे आफिस में ही धर दबोचा। इस घटना के बाद विभाग में अंदरखाने हड़कंप मचा हुआ है।...पायलट बाबा, आइकावा और अरबों का खेल
महायोगी पायलट बाबा का नाम आपने जरूर सुना होगा। यह वही बाबा हैं जो आस्था चैनल में तमाम बार अपनी जापानी शिष्या केइको आइकावा के साथ उपदेश देते नजर आते हैं। मगर लोगों को उपदेश देने वाले बाबा ने अपने कुछ शिष्यों के साथ एक रुपये में कंप्यूटर शिक्षा के नाम से ऐसा खेल चलाया कि उत्तराखंड ही नहीं मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश से लेकर तमाम पड़ोसी राज्यों में ४१२ करोड़ ८० लाख रुपये के वारे-न्यारे हो गए। एक योगी बाबा, उनसे जुड़ी साध्वी के साथ दो नटवर लालों के इस खेल में एक दो नहीं बल्कि पूरे आठ हजार लोग हलाल हुए थे। मुसीबत उन लोगों की ज्यादा है जिन्होंने किसी तरह पैसों का प्रबंध कर इस संस्था से जुडऩे का जुगाड़ किया। एक रुपये में कंप्यूटर शिक्षा के नारे के साथ लोगों के बीच जाने वाली आइकावा के खिलाफ उत्तराखंड सरकार ने अब सीबीसीआईडी जांच करने का फैसला किया है। इसके बाद बाबा फिलहाल कुटिया से मयशिष्या गायब हैं।...कलह के बीच किंगमेकर बने निशंक
उत्तराखंड में भारतीय जनता पार्टी के भीतर इन दिनों जो कुछ भी चल रहा है उससे पार्टी का बंटाधार होता साफ दिख रहा है। गुटों में बंटी बीजेपी के लिए अब पार्टी संगठन के नियम कानूनों की भी कोई अहमियत नहीं रह गई है। पार्टी में वही हो रहा है जिसके पीछे किसी भी बड़े नेता का कोई निहितार्थ हो। पार्टी संगठन में तमाम पदों को लेकर जिस तरह का घमासान मचा है उससे पार्टी संगठन की गरिमा भी तार-तार होती दिख रही है। ताजा प्रकरण भाजपा के नए प्रदेश अध्यक्ष बिशन चुफाल की ताजपोशी के बाद का है।...फिर अपनों से ठगा गया पहाड़
इन पहाड़ों की नियति शायद यही है. दरकते, पहाड़ों को देखकर लगता है की पहाड़ों के शरीर जिस तरह बिखर रहे हैं विकास के अभाव में उसकी आत्मा भी मर रही है. सूनसान होते इन पहाड़ों की आधी से ज्यादा आबादी मैदान को ठिकाना बना चुकी है तो बची आबादी भी वहां का रास्ता पकड़ने को है. कहाँ का विकास और कैसा पर्वतीय राज्य? राजधानी के नाम पैर पहाड़ पहले ही विकास के उन हिमायतिओ से धोखा खा चुका है जो पहाड़ के विकास के नाम पैर गैरसेन का ढोल पीट-पीटकर अपनी राजनीति का गाना चमका चुके थे, और मौका लगते ही उसी पहाड़ की पीठ में चुरा घोंपकर सत्ता के सौदेबाजों के रत्न बन गए...Author info
