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Jun

05

2016

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कब युवा होगी कांग्रेस?

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कब युवा होगी कांग्रेस?

यानी सोनिया और राहुल के बीच फंसी कांग्रेस। यानी अभी सोनिया गांधी के हाथ में कमान है तो गंठबंधन को लेकर कांग्रेस लचीली है। सहयोगी भी सोनिया को लेकर लचीले हैं। अगर राहुल गांधी के हाथ में कमान होगी तो राहुल का रुख सहयोगियों को लेकर और सहयोगियों का कांग्रेस को लेकर रुख बदल जायेगा। तो क्या कांग्रेस के भीतर राहुल गांधी से बड़ा कोई सवाल नहीं है। और राहुल गांधी के सामने कांग्रेस के सुनहरे युग को लौटाने के लिये खुद के प्रयोग की खुली छूट पाने के अलावा कोई बड़ा सवाल नहीं है। या फिर पहली बार गांधी परिवार फेल होकर पास होने के उपाय खोज रहा है । यानी गांधी परिवार को लेकर कांग्रेस में इससे पहले कोई सवाल नेहरु इंदिरा या राजीव के दौर में जो नहीं उठा वह सोनिया के दौर में राहुल गांधी को लेकर उठ रहे हैं। तो यह कांग्रेस की नही गांधी परिवार के परीक्षा की घड़ी है । लेकिन सवाल ये है कि क्या वाकई कांग्रेस बदलने को तैयार है। राहुल गांधी भी कांग्रेस के संगठन में ऐसा कोई परिवर्तन करने को तैयार है जिससे में नये चेहरे,नयी सोच, नये विजन का समावेश हो। क्योंकि कांग्रेसी कद्दावर नामों को ही देखिये।

May

30

2016

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मुल्ला मंसूर का नासूर

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मुल्ला मंसूर का नासूर

जनरल जिया के जमाने में पाकिस्तान ने घोषित तौर पर आतंकवाद को अपनी स्टेट पॉलिसी का हिस्सा बना लिया था। पाकिस्तान में उस मुल्ला मिलिट्री एलायंस को मजबूत किया गया जो कि इकहत्तर की जंग में अलग अलग होकर बांग्लादेश में लड़ रही थी। भुट्टो की राख पर खड़े हुए जनरल जिया ने इसे आधिकारिक जामा पहनाते हुए मुजाहिद घोषित किया और अमेरिका के कहने पर अफगानिस्तान में सोवियत फौजों के खिलाफ इस्तेमाल करना शुरू किया। जिया उल हक का पहला अफगान मुजाहिद बना गुलबुद्दीन हिकमतियार। अफगान मूल का गुलबुद्दीन अफगानिस्तान पर शासन करना चाहता था। अफगानिस्तान के सोशलिस्ट सांचे में वह फिट नहीं हुआ तो उसने इस्लामिक स्टेट का रास्ता अख्तियार किया। इसी रास्ते को जिया उल हक ने वह सच्चा रास्ता माना जो किसी मुसलमान का आखिरी लक्ष्य होता है।

गुलबुद्दीन से शुरू हुई अफगानिस्तान में तालिबान की कहानी आज मुल्ला मंसूर तक आ गयी है। जिस तालिबान को पाकिस्तान ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने के लिए पैदा किया था वह खुद उसके कब्जे में आ गया। अफगानिस्तान में तालिबान अमेरिकी रणनीति का हिस्सा था। तालिबान के जरिए उसने सोवियत संघ को बाहर निकाला और फिर खुद सामने आकर तालिबान को बाहर निकाल दिया। उस नार्दर्न एलायंस

Apr

20

2016

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सरकारी नाकामियों की ट्रेन

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सरकारी नाकामियों की ट्रेन

लेकिन अबकी ऐसा नहीं हुआ है। तेल के इस कनस्तर में पानी भरा गया है और उसे सीधे उस लातूर तक पहुंचाया गया है जहां करीब बीस दिन से पानी पर धारा 144 लगी हुई है। अगर किसी भी कुएं, बावड़ी के पास एकसाथ पांच दस लोग इकट्ठा हो गये तो पुलिस तत्काल कार्रवाई करने के लिए आजाद है। पता नहीं इस ट्रेन पर कौन सी धारा लगाकर लातूर भेजा गया है लेकिन इस ट्रेन की जलधारा से लातूर की प्यास बुझ जाएगी इसकी कोई गारंटी किसी के पास नहीं है।

दुश्मन के "खून से प्यास" बुझानेवाला मराठवाड़ा बीते एक दशक से पानी की प्यास नहीं बुझा पा रहा है, दिनों दिन सूखता जा रहा है। हर साल किसी न किसी कुएं और बावड़ी की तलछटी में पानी कांछते इंसानों के फोटो हम देखते रहते हैं। जैसे डांगर पर गिद्ध मंडराते हैं वैसे ही पानी पर मराठवाड़ा मंडराता है। ऐसे में वह दृश्य  ज्यादा शुकून देनेवाला है जो पेटभर पानी लेकर प्यास बुझाने जा रहा है। सरकार यही कर सकती है। इसलिए बहुत उदारता से यह कर भी रही है।

सरकार पानी नहीं पैदा कर सकती। वह पानी निकाल सकती है लेकिन पानी पैदा करने का उसने अपने

Mar

29

2016

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इकबाल के पाकिस्तान का आतंक से इस्तकबाल

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इकबाल के पाकिस्तान का आतंक से इस्तकबाल

लाहौर में आत्मघाती हमले के बाद सेना प्रमुख राहिल शरीफ ने जो मीटिंग की उसके बाद सेना के अधिकारी के हवाले से डॉन अखबार का दावा है कि सिर्फ आतंकवाद ही नहीं बल्कि पंजाब से "मजहबी मानसिकता" को नेस्तनाबूत करने का निर्णय भी लिया गया है। अगर यह सच है तो सेना कहे चाहे कुछ लेकिन पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ उसका अभियान पाकिस्तान को ऐसी मुसीबत में फंसाने जा रहा है जिसका अंदेशा उसे जरूर होगा।

पाकिस्तान में पंजाब ही आतंकवाद की मदरलैण्ड है। कश्मीर में, अफगानिस्तान में, सिन्ध में और खैबर पख्तूनवा में जहां कहीं जिहादी आतंकवाद फैला है उसकी नर्सरी पंजाब ही रही है। और पंजाब में आतंकवाद का चेहरा सिर्फ आतंकवादी नहीं है बल्कि उसका सियासी, जमाती और खुराफाती चेहरा भी है। नवाज, शाहबाज ही नहीं बल्कि सेना भी इन चेहरों का इस्तेमाल अपनी सुविधा के लिहाज से करते रहे हैं।

पंजाब सिन्ध की तरह सीधी जलेबी नहीं है जहां रेन्जर्स जो चाहेंगे करेंगे और भुट्टो खानदान बयान देकर चुप हो जाएंगे। पंजाब जरा दूसरे तरह की जमीन है। एक पंजाबी आतंकी गुट लश्कर-ए-झांगवी के मलिक इशाक की गलती से एक मुटभेड़ मे
हो गयी झांगवी के आतंकवादियों ने पंजाब के होम मिनिस्टर को

Feb

24

2016

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इक्कीसवीं सदी में भी दलित

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इक्कीसवीं सदी में भी दलित

भारत में उक्त वर्ग के शोषण की मुक्ति के लिए बने कई कानूनों के बावजूद दलितों का शोषण करने वाले दबंग कानूनी दांव पेचों के दम पर सजा होने से बच जाते हैं। कई मामलों में ऐसा प्रतीत हुआ है। जिसमें अधिकांशतः पुलिस एवं संबंधित प्रशासन पीड़ित पक्ष के बजाए आरोपियों के पक्ष में खड़ा नजर आता है। मसलन् हरियाणा के मिर्चपुर कांड में दलित बाप बेटी को जलाने की घटना की जांच कर रहे आयोग ने रिपोर्ट में उल्लेख किया कि सैकड़ों उपद्रवी लोग दलितों के घरों को जलाते रहे और पुलिस मूक दर्शक बनी रही। रिपोर्ट में ड्यूटी मजिस्ट्रेट की लापरवाही का भी जिक्र किया गया है। रोहित वेमुला की आत्महत्या के मामले में दो बार हैदराबाद जा चुके राहुल गांधी को मिर्चपुर का काण्ड नजर नहीं आया। क्योंकि उनकी पार्टी के शासन काल में मिर्चपुर काण्ड घटित हुआ था। बिहार के जहानाबाद जिले में एक दिसम्बर 1997 को लक्ष्मणपुर बाथे गांव में दबंगों ने 58 दलितों के घरों में आग लगाकर उन्हें मार दिया था। जिनमें 27 महिलाएं और 16 बच्चे भी शामिल थे। लक्ष्मणपुर बाथे काण्ड में भी कुछ ऐसा ही हुआ। वर्षों तक मुकदमा चला और सबूतों के अभाव में अदालत ने सभी आरोपियों को

Feb

24

2016

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नई कृषि नीति के ओर

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नई कृषि नीति के ओर

भारत की 58% जनता प्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है. कृषि उत्पादों की औद्योगिक इकाइयों में लगभग 10% लोग रोजगार प्राप्त करतें हैं. कृषि उत्पादन व इनसे निर्मित उत्पादनों हेतु देश की यातायात व्यवस्था का एक बड़ा प्रतिशत उपयोग होता है. किन्तु इन तथ्यों के मध्य एक अप्रिय तथ्य यह भी विकसित हो रहा है कि प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि कम होती जा रही है, दूसरी ओर भूमि का वितरण अत्यन्त असंतुलित है. देश में आज भी किसानो के पास समस्त कृषि भूमि का 62 प्रतिशत है तथा 90 प्रतिशत किसानों के पास कुल कृषि भूमि का केवल 38 प्रतिशत है. जिस देश में लोकोक्ति प्रचलित थी कि -“उत्तम खेती मध्यम बान करत चाकरी कुकर निदान” अर्थात कृषि कार्य सर्वोत्तम है, बान अर्थात व्यापार को द्वितीय श्रेणी का रोजगार माध्यम तथा नौकरी करनें को कुत्ते की प्रवृत्ति माना गया था; उस देश में आज कृषि को अपनी वृत्ति, व्यवसाय या रोजगार माननें के प्रति घोर उदासीनता आ गई है. देश में आज कृषि के प्रति आकर्षण सतत घटता जा रहा है. भारत की पूर्ववर्ती केंद्र सरकारों की विसंगति पूर्ण नीतियों के कारण कृषि का सकल घरेलु उत्पादन में योगदान 60% से घटकर 17% रह गया है. यह विसंगति

Feb

02

2016

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अमित शाह की असल परीक्षा

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अमित शाह की असल परीक्षा

लेकिन अब इतिहास संभालने का दौर है, जब सत्ता भी है, सबसे बडा संगठन भी है, सबसे बडी तादाद में पार्टी सदस्य भी है। फिर भी उम्मीद की आस तले भविष्य की हार का भय है। क्योंकि जीत के दौर में चुनावी जीत ही अमित शाह ने पहचान बनायी। और हार के दौर में कौन सी पहचान के साथ अगले तीन बरस तक अमित शाह बीजेपी को हांकेंगे यह सबसे बड़ा सवाल है। क्योंकि अगले तीन बरस तक मोदी का मुखौटा पहन कर ना तो बीजेपी को हांका जा सकता है और ना ही मुखौटे को ढाल बनाकर निशाने पर आने से बचा जा सकता है । तो असल परिक्षा अमित शाह की शुरु हो रही है । जहा संगठन को मथना है। नीचे से उपर तक कार्यकर्ताओं को उसकी ताकत का एहसास करना है और ताकत भी देनी है। दिल्ली की डोर ढीली छोड़ कर क्षेत्रीय नेताओं को उभारना भी है।

स्वयंसेवकों में आस भी जगानी है और अनुभवी प्रचारकों को उम्र के लिहाज से खारिज भी नहीं करना है। और पहली बार मोदी की ताकत का इस्तेमाल करने की जगह मोदी को सरकार चलाने में ताकत देना है। तो क्या 2015 में दिल्ली और बिहार चुनाव में

Dec

28

2015

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जकजकी का जलजला

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नाइजीरियाई इस्लामिक मूवमेन्ट के सर्वोच्च नेता इब्राहिम ज़कज़की नाइजीरियाई इस्लामिक मूवमेन्ट के सर्वोच्च नेता इब्राहिम ज़कज़की

नाइजीरिया की कुल 18 करोड़ आबादी में अब ईसाई और मुसलमानों की आबादी आधी आधी हो चुकी है। कुछ स्रोत मुसलमानों की आबादी कुल आबादी का सत्तर फीसदी भी बताते हैं। जो भी हो सच यह है कि नाइजीरिया में मुसलमान बहुसंख्यक हो गये हैं। अभी नाइजीरिया सेकुलर स्टेट है और शासन, प्रशासन और सेना का चरित्र सेकुलर है। लेकिन मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के साथ शरीया कानून लागू करने की मुहिम भी तेज हो गयी है। बीते डेढ़ दशक से सुन्नी आतंकी संगठन बोको हरम नाइजीरिया में शरीया लॉ लागू करने के लिए मारकाट कर रहा है। लेकिन सेकुलरिज्म पर अकेला संकट बोको हरम ही नहीं है। नाइजीरिया के अल्पसंख्यक शिया मुसलमान भी इस्लामिक कायदे कानून के लिए अपने तरीके से सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं।

नाइजीरिया में सिर्फ सुन्नी मुसलमान ही नहीं बल्कि शिया मुसलमान भी एक चरमपंथी समूह है। नाइजीरिया में शिया मुसलमानों की तादात कुल मुसलमानों में पांच फीसदी से भी कम है लेकिन पांच फीसदी का यह विस्तार भी अस्सी के दशक से अब तक हुआ है। उसके पहले नाइजीरिया में शिया मुसलमान नाममात्र के ही थे या बिल्कुल नहीं थे। लेकिन 1979 में इरान ने इब्राहिम ज़कज़की को ईरान बुलाकर शिया इस्लाम की

Dec

05

2015

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आइये इस राजनीतिक इस्लाम पर लानत भेजें

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आइये इस राजनीतिक इस्लाम पर लानत भेजें

ख़बरों के मुताबिक तफ्शीन से शादी के बाद जिहादी कीड़े ने मजबूती के साथ रिज़वान को काटा था,पेशे से स्वास्थ्य टेक्नीशियन था, अच्छी नौकरी, अच्छा वेतन, खूबसूरत बीवी और एक 6 महीने की बेटी का बाप और अमेरिका का निवासी, शिकागो कोई खास दूर नहीं है जहाँ ये पैदा हुआ था.

सही बात है कि शासक वर्ग धर्म को जनता की एकता तोड़ने के लिए कायदे से कम करता है और अपने निहित स्वार्थो की पूर्ति में इसका इंधन खूब इस्तेमाल करता है लेकिन इस तर्क के आवरण में राजनीतिक इस्लाम को बख्श देना मूर्खता होगी. राजनीतिक इस्लाम कथित रूप से अपने आप में एक सम्पूर्ण व्यवस्था का नाम है, आखिर लंदन की सड़कों पर बकरमुहों की जमात "इस्लाम इज सोलुशन" अथवा "शरिया लागू करो" के नारे हवा में से नह

ते , इसके व्यवहारिक और किताबी कारण हैं.

पश्चिमी देशों में जब मैं सर पर टोपी, मुँह पर दाढी, और्के देखता हूँ तो मन ही मन सिहर उठता हूँ. इसे धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर जस्टिफाई नहीं किया जा सकता क्योकि यह व्यवहार अपने आप में एक राजनीतिक स्टेटमेंट है, खुल्लम खुल्ला, पश्चिमी समाज और मूल्यों को चुनौती देता कि देखो, हम अलग है, तुम से जुदा और

Dec

03

2015

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असहिष्णु विपक्ष

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असहिष्णु विपक्ष

संसद में बहस से तस्वीर और साफ हो गई। बहस के दौरान देश ने देखा कि हकीकत में असहिष्णु कौन है? गलत बयानबाजी करने के बाद भी माफी मांगना तो दूर, सीपीएम नेता मोहम्मद सलीम सरकार को ललकार रहे थे। क्या यही सहिष्णुता है? वामपंथियों के बारे में धारणा है कि ये 'आरोप लगाओ और भाग जाओ' की नीति का पालन करते हैं। मोहम्मद सलीम के असहिष्णु व्यवहार से यह भी साबित हो गया।

मंगलवार को जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी राज्यसभा में दलगत राजनीति से ऊपर उठकर आपसी सौहार्द की बात कर रहे थे, ठीक उसी वक्त राहुल गांधी बांहें चढ़ा-चढ़ाकर सरकार पर चिल्ला रहे थे। कलबुर्गी, पानसरे और अखलाक की घटनाओं को उदाहरण बनाकर राहुल गांधी आरोप लगा रहे थे कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में अचानक से असहिष्णुता बढ़ गई है। राहुल गांधी सहित समूच विपक्ष इन घटनाओं के लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार मानने से क्यों पीछे हट जाता है? केन्द्र सरकार को दोष देना ही उनकी सहिष्णुता है क्या? तीनों घटनाएं गैरभाजपा शासित राज्यों में हुई है

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प्रतिपक्ष के असहिष्णुता के गुब्बारे की हवा तब निकल गई जब सरकार ने इन घटनाओं की सीबीआई जांच कराने की मंशा जाहिर की। बहस के

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Arun Tiwari

Arun Tiwari

अरुण तिवारी दिल्ली में रहने वाले स्वतंत्र लेखक हैं।
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।