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Apr

18

2014

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बना रहे विरोध रस!

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बना रहे विरोध रस!

क्या मोदी सिर्फ बनारस में लड़ रहे हैं? क्या इसी एक सीट से सरकार का फ़ैसला होने जा रहा है। क़रीब चार सौ सीटों पर बीजेपी लड़ रही है। क्या वहाँ मोदी नहीं हैं। मोदी ने खुद से लड़ने के लिए साल भर का मौक़ा दिया। वो सितम्बर से अभियान पर हैं। सैंकड़ों रैलियाँ कर चुके हैं। विरोधियों के पास इतना लंबा वक्त था। मोदी ने प्रोपैगैंडा किया तो वे क्या कर रहे थे। उन्हें किसने रोका था जनता के बीच जाकर बताने के लिए। क्या वे गए। मोदी जीत के लिए नए नए गठबंधन बना रहे हैं और विरोधी आपस में लड़ने के लिए बेताब हैं। मोदी का लक्ष्य साफ़ है मगर विरोधी को पता नहीं कि पहले मोदी से लड़े या सपा से सीपीएम से या बसपा से या किसी से। विरोधी आपस में लड़ते हुए मोदी से लड़ने का स्वाँग रचा रहे हैं। क्या लेफ़्ट के लिए सोशल मीडिया नहीं बना है। मोदी का विरोध करने वाले सोये रहे। युवाओं को शुरू से ही नकारा बताने लगे। उनसे संवाद का प्रयास नहीं किया। अपने इसी आलस्य पर पर्दा डालने के लिए सब बनारस जा रहे हैं। कान खुजाते हुए ताल नहीं ठोकी जाती। सब लस्सी पीकर और

Apr

16

2014

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तमाशा-ए-टीवी जो हम देखते हैं

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तमाशा-ए-टीवी जो हम देखते हैं

शहर, क़स्बा और गाँव। चाय वाले लेकर स्टोर वाले तक। टीचर से लेकर 'फटीचर' तक। कई लोग मिले जिन्हें लगता है कि जो वो कह रहे हैं वो दिखेगा नहीं। इसलिए जो पहले से दिख रहा हैं वही कह रहे हैं। विकास और नेतृत्व जैसे सवालों पर वैसे ही बोल देते हैं जैसे टीवी बोलता है। जैसे टीवी सुनना चाहता है। कैमरा बंद होने के बाद ऐसी कई आवाज़ें सुनने को मिलीं जो अपने ही कहे का उल्टा थीं। लोग भी टीवी से खेल रहे हैं। झट से कोई कार्यकर्ता आम आदमी बन जाता है। बाद में पता चलता है कि वो किसी पार्टी का है। सारे कार्यकर्ताओं को पता है कि चुनाव के टाइम में पत्रकार आ सकता है।

गाँव के किसी कोने में शूट कर रहे हैं अचानक पार्टी के लोग चले आते हैं। प्रभुत्व पार्टी के लोग। पीछे से ज़ोर ज़ोर से नारे की शक्ल में बात करने लगते हैं। अचानक भीड़ भी वही बोलने लगती है। टीवी के पैदा विमर्श ने ज़मीन पर ऐसे लोगों का दबदबा बढ़ा दिया है। ऐसे लोगों के आने के बाद लोग चुप हो जाते हैं। उसे ही बोलने देते हैं। जिसे मैं कई बार भरमाना कहता हूँ। जो ऊँचा बोलता

Apr

15

2014

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दलाल पत्रकारिता का दागदार दौर

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दलाल पत्रकारिता का दागदार दौर

उदाहरण के तौर पर "इंडिया टी. वी." को लें, ये चैनल पूरी तरह भाजपा के समर्थक चैनल के तौर पर खुद को स्थापित कर चुका है! इस चैनल के मालिक रजत शर्मा और भाजपा नेताओं के "मधुर" सम्बन्ध छिपाए नहीं छिप रहे! "इंडिया टीवी" की वेबसाइट देख लें तो एक झटके में लगेगा कि ये भाजपा और नरेंद्र मोदी का मुखौटा है, जहां 10 खबरों में से 5 भाजपा या मोदी को समर्पित रहती हैं! "जी न्यूज" की बात करें तो "फिरौती" मांगने के आरोप में ये न्यूज़ चैनल खुद नज़रबंद है! पहले से ही भाजपा के प्रति "नरमी" दिखाने वाले इस चैनल को कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल के पलटवार ने, खुलकर "भाजपाई चैनल" बना दिया है! जी न्यूज के मालिकान तो, अब, भाजपा नेताओं के साथ मंच साझा कर रहे हैं! इस चैनल को मालूम है कि भाजपा ही एक ऐसी पार्टी है जो इसको "फ़िरौती" के आरोपों से बचा सकती है!

इस मामले में "आज तक" (जो विज्ञापन ज़्यादा दिखाता है, समाचार कम) पहले खुल कर भाजपाई खेमे के साथ था! मोदी-मोदी की रट लगाने वालों में "आज तक" उस्ताद रहा! मगर खुलकर एकतरफा प्रसारण का आरोप लगते ही इस चैनल ने बड़ी होशियारी के साथ कूटनीतिक रास्ता

Apr

15

2014

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बन गये मोदी सरकार

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बन गये मोदी सरकार

बताया जाता है की एक घुटी हुई डिप्लोमैट होने के बावजूद पावेल को लहर का थाह सही ढंग से नहीं लग पाया और उन्होंने वाशिंगटन को सही सूचनाएं समय पर प्रेषित नहीं कीं जिसके चलते अमेरिका को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में सभी अमेरिकन कंपनियों के कामकाज पर रोक लगा दी गयी है और सारा धंधा गुजरात की कंपनियों को दे दिया गया है। कोला कम्पनियाँ भाग चुकी हैं और अब वो सिंगापुर से ऑपरेट कर रही हैं, उन्हें इण्डिया में घाटा तो एकदम नहीं हुआ था, लागत से कई गुना अधिक दाम वसूल ही चुकी थीं की क्रिकेट और सिनेमा के सितारों के ऊपर उनका भारी बकाया है क्योंकि विज्ञापनों का करार लम्बा था लेकिन मोदी सरकार बन जाने के कारण धंधा लपेटना पड़ा जिसके कारण विज्ञापन भी बंद हो गए।

सितारों ने नए प्रधानमंत्री जी से गुहार लगायी है की उनको बचाया जाय क्योंकि करार में ये कहीं नहीं था की अगर कंपनी भाग जाएगी तो पैसा वापस लौटाना होगा। बताया जाता है की प्रधानमंत्री कार्यालय से सबको आश्वासन मिल गया है की उनके आर्थिक हित सुरक्षित रहेंगे क्योंकि बुलबुले वाले पानी जैसी सामग्री को उन्हीं सितारों के बल

Apr

14

2014

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मोदी लहर बेअसर

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मोदी लहर बेअसर

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में  जिन दस सीटों पर चुनाव  हुए हैं, वहां भी भाजपा के लोग बहुत आशावान नहीं हैं। नरेंद्र मोदी के आसपास एक लहर बनाने की कोशिश कर रहे भाजपा नेताओं को निराशा हुई है क्योंकि मुजफ्फरनगर के साम्प्रदायिक विवाद के बावजूद भी भाजपा के समर्थन में ऐसी हवा नहीं बन सकी जिस से चुनाव जीता जा सके। इस बात में कोई शक नहीं है कि भाजपा के महासचिव अमित शाह की कोशिशों का नतीजा यह है कि जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अजीत सिंह के साथ चुनाव लड़ने की वजह से वोट मिलते थे वहां हर सीट पर भाजपा बिना किसी गठबंधन के मुख्य लड़ाई में है।

हरियाणा में भी भाजपा को ओम प्रकाश चौटाला के परिवार की पार्टी से दूरी बनाने का नुकसान हो गया है। जिस पार्टी से भाजपा ने हरियाणा में समझौता किया, वह पार्टी राय में कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोक दल के सामने कमजोर नजर आ रही थी। दिल्ली की सभी सीटों पर 1984 वाली लहर के टक्कर का मतदान हुआ लेकिन इस बार सभी सात सीटों पर कांग्रेस कमजोर नजर आई। भाजपा के वरिष्ठ नेताओं का दावा है कि दिल्ली की तीन सीटों पर कांग्रेस की जीत निश्चित है। भाजपा के

Apr

14

2014

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बुरा नहीं है 'बदला' लेना

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बुरा नहीं है 'बदला' लेना

यदि मात्र कल्पना के लिए चुनाव आयोग के कानूनी स्पष्टीकरण का विचार किया जाए या चुनाव आयोग के निर्णय के साथ अपनी देश, मीडिया और कानून व्यवस्था की मानसिकता बनानें के प्रयास में “बदला लेनें” शब्द का बार बार उच्चारण किया जाए तब भी यह ही मन में आता है कि काहे का बदला लेना है? कैसे बदला लेना है? और कहाँ जाकर बदला लेना है? क्या रण भूमि में बदला लेना है? सड़क, बाजार घर के आँगन में बदला लेना है? या मतदान कक्ष में जाकर स्थिर मानसिकता से बदला लेना है??

भाषा के एक विश्लेषण में प्रत्येक शब्द के त्वरित और विस्तारित अर्थ होतें हैं. यदि हम बदला शब्द का त्वरित अर्थ मानें तो बदला लेना समाज में लगभग प्रतिदिन उपयोग होनें वाला, प्रत्येक आयु वर्ग में उपयोग होनें वाला और समाज के प्रत्येक स्तर चाहे वह सामान्य व्यक्ति हो, चाहे अधिकारी हो, राजनयिक हो, राजनीतिज्ञ हो, प्रशासनिक हो, साधू संत हो सभी के लिए एक सामान्य सा शब्द है. व्याकरण के नियमों से इतर व्यवहारिक स्तर पर जब सामान्यतः हम किसी भी शब्द के चार अर्थों में उस शब्द का शब्दार्थ खोजते हैं- तात्कालिक अर्थ, विस्तारित अर्थ, शाब्दिक अर्थ और ध्वन्यात्मक अर्थ. अब यदि हम “बदला लेनें”

Apr

12

2014

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जशोदाबेन को जाने दें

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जशोदाबेन को जाने दें

दोनों वयस्क हैं। सार्वजनिक व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह पति पत्नी का रिश्ता भी आदर और बराबरी से निभाये मगर इसके बाद भी बात हज़म नहीं हो रही है कि यह चुनावी मुद्दा कैसे हैं। है भी तो क्या इसलिए कि इसमें मज़ा आ रहा है। चुनावों के समय राजनीतिक दलों की टीम ऐसी रणनीतियों से लैस होती है। कोई किताब लिखता है तो कोई शादी की तस्वीर लेकर आ जाता है। इसी में चुनाव के समय के दो चार दिन निकल जाते हैं।

जशोदाबेन के आत्मसम्मान का आदर किया जाना चाहिए। यह जीवन और चुनाव उनका है। बल्कि अगर पति ने छोड़ भी दिया तो क्या यह कम तारीफ़ की बात है कि उन्होंने खुद को उनके सामने कातर की तरह पेश नहीं किया। यह एक महिला का आत्म सम्मान है। मोदी तीन बार से चुनकर मुख्यमंत्री हैं। वो चाहतीं तो प्रेस कांफ्रेंस कर तमाशा कर सकती थीं। मगर उन्होंने ऐसा नहीं किया। वो गिड़गिड़ा सकती थीं पर ऐसा भी नहीं किया। उन्होंने अपनी ज़िंदगी का रास्ता सम्मान के साथ चुना जिसका हमें आदर करना चाहिए। मियाँ बीबी के बीच सौ बातें होती हैं। तलाक़ होता है और संबंध विच्छेद भी। इसके कई पक्ष

Apr

12

2014

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न बलात्कार ‘ग़लती से’ होता है और न बलात्कारी ‘बेचारे

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न बलात्कार ‘ग़लती से’ होता है और न बलात्कारी ‘बेचारे

बलात्कार पर फाँसी हो या न हो, यह एक अलग बहस है. आपने कहा कि आप बलात्कार के  लिए फाँसी के ख़िलाफ़ हैं. कहिए. इसमें कुछ भी ग़लत नहीं. देश में बहुत-से लोग बलात्कार या किसी भी अपराध में फाँसी दिये जाने के विरुद्ध हैं. लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वे आपकी तरह बलात्कार को ‘लड़कों की मामूली ग़लती’ मानते-समझते हों! आप कहते हैं, “….बेचारे तीन को फाँसी हो गयी, क्या रेप में फाँसी दी जायेगी, लड़के हैं, ग़लती हो जाती है, तीन को अभी फाँसी दे दी गयी मुम्बई में…..” क्या गैंग-रेप ‘ग़लती से’ हो जाता है? क्या ‘गैंग-रेप’ करनेवाले ‘बेचारे’ हैं? और वही लड़के कई लड़कियों से ‘गैंग-रेप’ करते हैं, क्या ये बार-बार गैंग-रेप भी ‘ग़लती से’ ही हो जाता है? क्या बार-बार ‘गैंग-रेप’ करनेवाले ‘बेचारे’ हैं? मुम्बई में शक्ति मिल के बलात्कारियों को आप ‘बेचारा’ समझते हैं तो इससे ज़्यादा घिनौना सोच भला और क्या हो सकता है?

यह तो हुई आपकी बात की बात. अब बात आपकी बात के पीछे छिपी मंशा की! ये बात आपने कहाँ कही? उत्तर प्रदेश में मुरादाबाद की एक चुनावी रैली में. आपको लगा कि ऐसा कह कर आप मुसलिम वोटरों को पुचकार लेंगे. मुम्बई के तीन बलात्कारियों में से

Apr

12

2014

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टाइटैनिक का कायर

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टाइटैनिक का कायर

लगभग इसी समय के आस पास, बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में कई देशों में ‘सेफ्राजेट आन्दोलन' साँसे ले रहा था, जिसमें ‘वोट फॉर वुमन’ के नारे के ज़रिये औरतों को तमाम देशों में मताधिकार दिलाने की जी तोड़ कोशिश हो रही थी. इस आन्दोलन में शामिल औरतों को अक्सर ऐसी नाव दुर्घटनाओं का वास्ता देकर ये यकीन दिलाने की कोशिश की जाती थी, कि जब तक ‘लेडीज़ फ़र्स्ट’ सिद्धांत के पालक-पोषक पुरुष ज़िंदा हैं तब तक उन्हें अपनी चिंता करने की ज़रुरत नहीं. ये मताधिकार नहीं, बल्कि ‘पुरुषोचित व्यवहार’ है जो हमेशा उनका सच्चा हितैषी रहेगा. खीज कर कुछ महिलाओं ने नारा बदल कर ‘वोट फॉर वुमन एंड बोट फॉर मेन’ कर दिया.

ये नारा लैंगिक असमानता की दुधारी प्रवित्ति को रेखांकित करता है, जिसने एक तरफ़ औरतों को मताधिकार नहीं दिया तो वहीं दूसरी तरफ़ आदमियों को लाइफ़बोट में बैठ कर अपनी जान बचाने की आजादी भी नहीं दी. चुनावी माहौल में वोट की चर्चा तो चल ही रही है, मुलायम सिंह की हालिया विवादास्पद टिप्पणी ने ‘वोट-बोट’ की बहस को देसी सन्दर्भ दे दिया है.

लैंगिक असमानता का शिकार स्त्री-पुरुष दोनों ही होते हैं और मुलायम सिंह यादव का ये बयान इस बात का ताजातरीन उदाहरण है. हर

Apr

10

2014

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मोदीफेस्टो

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मोदीफेस्टो

नरेंद्र भाई मोदी स्वयं एक पासपोर्ट साइज फोटो (चेहरे) में बदल चुके हैं. उनका यह फोटो आपको टेलीविजनी परदे पर भाजपा के चुनावी विज्ञापनों से भी ज्यादा समाचारों में दिखता है. इस फोटो का एक संदेश (विचार) है. इसे विकास कहा जा रहा है. एक व्यक्ति के चेहरे पर चस्पा कर दिये गये विकास के इस विचार को सवा अरब की आबादी वाले राष्ट्र का एकमात्र विचार कहा जा रहा है. ऐसे में भारत-भक्त होने का अनिवार्य अर्थ हो चला है मोदी-भक्त होना. मतदाता के रूप में अपना वोट देने का अर्थ है मोदी को चढ़ावा देना, क्योंकि मोदी राष्ट्रदेव हैं. यहां चाहे तो याद करें, हर हर महादेव की तर्ज पर मोदी के प्रचार में बना नारा और जारी नवरात्र के बीच बनारस में ‘या देवी सर्वभूतेषु’ की तर्ज पर ‘या मोदी सर्वभूतेषु राष्ट्ररूपेण संस्थित:’ का गढ़ा गया श्लोक.

यह देश ऐन वोट की घड़ी में एक विचित्र दृश्य देख रहा है. अब तक उसके पास विकल्प रहता आया है अपने निर्वाचन क्षेत्र में विविध पार्टियों के प्रत्याशियों के बीच किसी एक के पक्ष में वोट डालने का. लेकिन इस बार, वह किसी प्रत्याशी को वोट नहीं डालने जा रहा है, वह किसी पार्टी को भी वोट नहीं

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
S Rajen Todariya

S Rajen Todariya

लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय एस राजेन टोडरिया दैनिक भास्कर में बतौर स्थानीय संपादक काम कर चुके हैं। इस वक्त देहरादून से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका जनपक्ष टुडे के प्रधान संपादक हैं।
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

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मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

लंबे समय तक मुख्यधारा की पत्रकारिता करने के सतीश सिंह पिछले एक साल से स्वतंत्र पत्रकारिता और लेखन कर रहे हैं. दैनिक हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, प्रभात खबर, हिन्दुस्तान टाईम्स के लिए काम किया. वर्तमान समय में दिल्ली में कार्यरत.
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.