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Oct

17

2014

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काले धन पर काला मन

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काले धन पर काला मन

2011 से सुप्रीम कोर्ट वरिष्ठ अधिकवक्ता राम जेठमलानी की शिकायत पर एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाकर काले धन का पता लगाने की कोशिश कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में जब जब केन्द्र सरकार से जवाब मांगा गया तत्कालीन यूपीए सरकार के प्रतिनिधि (एटार्नी जनरल) ने यही कहा कि नाम सार्वजनिक कर पाना संभव नहीं है। तत्कालीन केन्द्र सरकार का तर्क था कि इसमें मुख्य रूप से दो दिक्कत है। पहली दिक्कत यह है कि जिन देशोंं में भारत के लोगों का बेनामी या अवैध धन जमा है उनसे हम किस आधार पर सूचना मांगे। सूचना सिर्फ उसी व्यक्ति के बारे में मांगी जा सकती है जिसके बारे में भारत सरकार की एजंसियां कोई आर्थिक धोखाधड़ी की जांच कर रही होंं। जब अवैध या बेनामी धन रखनेवाले का नाम ही पता नहीं है तो फिर उसके खिलाफ कार्रवाई किस आधार पर करें। अब अगर केन्द्र सरकार टैक्स हैवेन देशोंं में भारत का काला धन जमा करनेवालोंं का नाम पता पूछने जाए तो वहले से ऐसी संधियां हुई पड़ी हैं कि वे अपने यहां भारतीय मूल के लोगोंं के धन का बखान ही नहीं कर सकते। जाहिर है, केन्द्र सरकार के सामने यह दोहरी मुश्किल थी। यही मुश्किल आज भी है

Oct

17

2014

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जयम्मा को जमानत

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साथी शशिकला के साथ जयललिता साथी शशिकला के साथ जयललिता

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता को बीते सितंबर महीने की 27 तारीख को कर्नाटक की एक विशेष अदालत ने आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी करार देते हुए चार साल की सजा सुनाई थी। जयललिता पर अदालत ने सौ करोड़ रूपये का जुर्माना भी लगाया था और उनके अन्य तीन साथियोंं को भी दोषी करार देते हुए अलग अलग सजा और जमानत मुकर्रर किया था। करीब अठारह साल चली अदालती कार्रवाई में जज डिकून्हा द्वारा सुनाये गये ऐतिहासिक फैसले के बाद अब जमानत के लिए जयललिता के पास हाईकोर्ट जाने का रास्ता बचा था। जयललिता की तरफ से तत्काल वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने कर्नाटक हाईकोर्ट में जमानत की अर्जी के साथ साथ भारतीय दंड संहिता की धारा 389 का इस्तेमाल करते हुए पूरे मामले को ही खत्म करने की अर्जी लगाई गयी थी। कर्नाटक हाईकोर्ट ने अर्जी तो स्वीकार कर ली लेकिन जमानत देने से इंकार कर दिया।

इसके बाद स्वाभाविक तौर पर जयललिता के वकीलों के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का रास्ता बचता था। जयललिता के वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट में जमानत की अर्जी दाखिल कर दी जिसपर सुनवाई करते हुए आज अदालत ने जयललिता सहित सभी चार आरोपियों को जमानत तो दे दी लेकिन इसकी

Oct

16

2014

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न्याय का गला घोंटती न्यायपालिका

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न्याय का गला घोंटती न्यायपालिका

ऐसा कई बार हुआ है जब कोर्ट का निर्णय आया तब तक व्यक्ति बेगुनाही में जेल काटा या फिर जितनी सजा थी, उससे कही ज्यादा साल जेल में गुजार दिए। हाल ही में फाइट फार ह्यूमन राइट्स सोसाइटी की जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बिना सुनवाई के अनुसूचित जाति, जनजाति समुदाय के जेल में बंद 31 हजार विचाराधीन कैदियों के मामले को गंभीर मसला बताता। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि इस समस्या के समाधान के लिए सभी राज्यों के गृह सचिवों की छह सप्ताह के अंदर बैठक बुलाई जाए। साथ की कोर्ट ने यह भी कहा है कि मूक दर्शक बने रहने के बजाय उसे केंद्रीय एजेंसी के रूप में काम करके राज्यों से बात करनी चाहिए। संभवत गुलाम भारत में आंदोलनकारियों को छोड़ दे तो ऐसे शायद ही उदाहरण मिले जिसमें अंग्रेजों ने बिना ट्रायल के वर्षों तक विचाराधीन कैदियों से अपनी जेले भरी हो। आज भारत की आजादी के  68 साल बाद भी न्यायिक प्रक्रिया इतनी सहज नहीं बन पाई कि बिना पैसे व पहुंच के साधारण आदमी त्वरित न्याय मिल सके। स्वयं कोर्ट के जज तक यह कह चुके हैं कि देर से मिला न्याय अन्याय जैसा है।

अनुसूचित

Oct

15

2014

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मतगणना से पहले मनगणना

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मतगणना से पहले मनगणना

जाहिर है, बाजार का हथियार हो चुके न्यूज चैनलों ने झूठ बोला। कमोबेश हर उस चैनल ने पांच बजे की दुहाई दी जिसके झोले में कोई न कोई सर्वे एजंसी बैठी हुई थी। इधर मतदान शुरू हुआ और उधर सर्वे एजंसियोंं के लोग मैदान में मौजूद (अगर रहे हों तो) लोगों से पूछताछ करके अपनी रिपोर्ट तैयार करने लगे होंगे। निश्चित रूप से हर चैनल जानता रहा होगा कि वे साढ़े छह बजे के पहले कोई आंकलन प्रसारित नहीं कर सकते लेकिन पांच से साढ़े छह बजे के बीच का मार्जिन लेने की कोशिश कमोबेश हर चैनल ने की। जो लोकतंत्र के यज्ञ में मत की आहुति दे रहे थे हो सकता है उनके लिए यह डेढ़ घण्टे का मार्जिन कोई मायने न रखता हो लेकिन जो लोकतंत्र का कारोबार करते हैं उनके लिए एक मिनट में दस सेकेण्ड के छह स्लॉट होते हैं और हर स्लॉट की कीमत बाजार में मौजूद दर्शकों की मांग से तय होती है। दर्शकों से झूठ बोलकर हासिल किये गये डेढ़ घण्टे की मार्जिन में लोकतंत्र के पहरेदारों ने कितने स्लॉट बनाये होंगे और हर स्लॉट की क्या कीमत वसूली होगी यह उनका मार्केटिंग डिपार्टमेन्ट ही जानता होगा इतना तय है कि ये घण्टे

Oct

14

2014

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दिल्ली पुलिस का महिषासुर मर्दन

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पत्रिका के विवादास्पद अंक में प्रकाशित वह चित्र जिसमें दुर्गा को महिषासुर के साथ अंतरंग होने का दावा किया गया है पत्रिका के विवादास्पद अंक में प्रकाशित वह चित्र जिसमें दुर्गा को महिषासुर के साथ अंतरंग होने का दावा किया गया है

सच्‍चाई यह थी कि उस वक्‍त दुनिया भर में चर्चित इस कार्टून पर पत्रिका ने एक कोने में करीब दो सौ शब्‍द की अनिवार्य टिप्‍पणी की थी जिसके साथ कार्टून का एक थम्‍बनेल प्रकाशित था, जिसे आधार बनाकर दिल्‍ली पुलिस कमिश्‍नर ने अपने ही सिपाही से पत्रिका के खिलाफ एक एफआइआर इसलिए करवा दी क्‍योंकि दो अंकों से पत्रिका की आवरण कथा कमिश्‍नर के खिलाफ़ छप रही थी जिसे मैंने और अवतंस चित्रांश ने संयुक्‍त रूप से अपने नाम से लिखा था। स्‍पष्‍टत: यह दिल्‍ली पुलिस द्वारा बदले की कार्रवाई थी, लिहाज़ा प्रभाष जोशी से लेकर राहुल देव तक पूरी पत्रकार बिरादरी का आलोकजी के समर्थन में उतर आना बिल्‍कुल न्‍यायसंगत था।

अब इसके साथ व्‍यावसायिक पत्रिका ''फॉरवर्ड प्रेस'' का मामला रखकर देखिए। बताया जा रहा है कि एक शिकायत के आधार पर आरोप यहां भी वही है कि कुछ लोगों की भावनाएं दुर्गा-महिषासुर पौराणिक कथा के पुनर्पाठ के कारण आहत हुई हैं। लिहाज़ा अंक ज़ब्‍त हुआ और चतुर्थ श्रेणी के कुछ कर्मचारी जेल चले गए। सच्‍चाई क्‍या है? सच्‍चाई उतनी ही है जितनी दिखती है- मतलब एक शिकायत हुई है कंटेंट के खिलाफ़ और कार्रवाई हुई है। इसके पीछे की कहानी यह है कि महिषासुर विरोध के लिए

Oct

13

2014

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कर्मयोगी कैलाश और कॉरपोरेट मीडिया

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कर्मयोगी कैलाश और कॉरपोरेट मीडिया

ये कौन हैं... किस क्षेत्र से जुड़े हैं... किसलिए... वगैरह - वगैरह। एेसे कई सवाल हवा में उछले जब  कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। क्योंकि लोगों की इस बारे में जानकारी बहुत कम थी। बचपन बचाओ आंदोलन की चर्चा यदा-कदा शायद अखबारों में पढ़ी भी गई हो, लेकिन इसे चलाने वाले और अंत में नोबल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी के योगदान से अधिकांश लोग लगभग अनभिज्ञ ही थे। भले ही नोबल पुरस्कार मिलने के बाद से तमाम चैनल और समाचात्र पत्र आज उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हों। कैलाश से ज्यादा प्रचार तो अपने देश में तालिबानियों के हमले का शिकार हुई मलाला युसूफजई को मिला। यह मामला एक सुपात्र की उपेज्ञा का ही नहीं, बल्कि इस बहाने मीडिया की कार्य़शैली व क्षमता भी सवालों के घेरे में कैद हो जाती है।

सवाल उठता है कि अगर  देश की राजधानी दिल्ली से अपना आंदोलन चलाने वाले कैलाश सत्यार्थी अब तक मीडिया की रोशनी से वचित रहे तो उन हजारों निस्वार्थ स्वयंसेवकों का क्या जो देश के कोने-कोने में खुद दिए की तरह जल कर समाज को रोशन करने का कार्य कर रहे हैं। आज कैलाश सत्यार्थी और उनके आंदोलन को लेकर दर्जनों तरह की

Oct

13

2014

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सत्यार्थी को नोबेल सम्मान

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सत्यार्थी को नोबेल सम्मान

कैलाश सत्यार्थी का जीवन कर्म यह है कि उन्होंने नब्बे के दशक में बालश्रम के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी मुहिम की शुरूआत की। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने बड़ी संख्या में बाल मजदूर मुक्त कराये। उनकी संस्था का दावा है कि कैलाश सत्यार्थी के प्रयास से करीब अस्सी हजार बच्चे बाल श्रम से मुक्त करवाये गये। मुक्त करवाने के बाद इन बच्चों का पुनर्वास किया गया और अब इसमे से अनेक बच्चे स्कूलों में शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं किन्तु विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या बालश्रम भारत की अनेक प्रमुख समस्याओं में कोई स्थान भी रखता है कि नहीं? 

विश्व के विकसित देशों की मान्यता के आधार पर बालश्रम एक बड़ी समस्या है किन्तु भारत जैसे देश में चोरी डकैती, बलात्कार, मिलावट, जालसाजी, आतंकवाद, चरित्र पतन, भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता, जातीय कटुता जैसी गंभीर समस्याओं को पीछे छोड़ते हुए बालश्रम जैसी महत्वहीन अथवा कम महत्त्व की समस्या के समाधान से जुड़े व्यक्ति का नोबेल पुरस्कार के लिए चुनाव या तो आयोजक देशों की अपनी सोच से जुड़ा है अथवा कहीं न कहीं उनका कोई स्वार्थ भी हो सकता है। बालश्रम आर्थिक विषमता का परिणाम है, कारण नहीं। यदि आर्थिक विषमता कम होगी तो बालश्रम अपने आप कम हो जायेगा

Oct

10

2014

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अंधेरे में गांधी की कर्मभूमि

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अंधेरे में गांधी की कर्मभूमि

बिजली कमी का मुख्य कारण ऊर्जा प्राप्ती के लिए प्रकृति के सीमित संसाधन जैसे कोयला, कच्चा तेल एंव पेट्रोलियम पर जरुरत से ज्यादा निर्भरता है। जैसे-जैसे देश का विकास हो रहा है वैसे-वैसे ऊर्जा की खपत की मांग बढ़ती जा रही है। जिस अनुपात में मांग बढ़ रही है उस अनुपात में प्रकृति के सीमित संसाधन  के द्वारा बिजली का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। इस वजह से बिहार का बिजली उत्पादन 200 मेगावाट भी नहीं है। बिहार में बिजली सुधार को लेकर किये गये वादें खोखले साबित हो रहे हैं।

शिवलाल कुमार रुपोलिया गोनाहा ब्लॉक पश्चिम चम्पारण के रहने वाले हैं। वे विगत 3 सालों से चाय की दुकान चला रहे हैं। शिवलाल कहते हैं, “राजीव गांधी ग्रामीण विधुततीकरण योजना तो सिर्फ पोल खड़े करती है, बिजली नहीं देती”। इस गांव में सालों से बिजली नहीं है और बिजली आयी भी तो कुछ जगह सिमट कर रह गयी। शिवलाल बताते हैं, ‘हमारा गांव रुपोलिया बीच का क्षेत्र है, यहां पर लगभग 150 घर है, जिसके पास बिजली नहीं है’। शिवलाल अपने यहां रोशनी करने के लिेए सोलर लाइट का उपयोग करते हैं। यह पूछे जाने पर कि आपको सोलर लाइट का तरकीब कहां से मिला तो वे

Oct

07

2014

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पाथरी में पाथर पानी

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पाथरी में पाथर पानी

यह सच नागपुर से सटे भंडारा जिले के उस पाथरी गांव का है, जिसका जन्म संघर्ष के दौर में आंदोलन से हुआ और जिसकी मौत विकास की उस अविरल रेखा से होने जा रही है जो बांध परियोजना के नाम पर जमीन, जिन्दगी, गांव के गांव खत्म कर रहा है या आबाद इसकी परिभाषा कभी मुंबई-दिल्ली गढ़ नहीं पाये। पाथरी गांव की सरंपच रीना भूरे को भरोसा है सरकार बांध बनाने के लिये उजाड़ रही है तो बसायेगी भी। तो गांव में चाय की बैठकी का एकमात्र ठिहा चलाने वाले प्रभु लांजवार वोटिंग वाले दिन गांव वालों को आखिरी चाय पिलाकर जिन्दगी से ही विदा हो जाना चाहते हैं। वहीं हटवार परिवार की त्रासदी तो इनके नाम से जुड़ी है। पीढियों से रहते आये ७२ बरस के रामदशरथ हटवार ने अपने पिता से लेकर अपने बच्चो के नाम के साथ पाथरी शब्द जोड़ दिया। खुद को वह रामदशरथ पाथरी कहते लिखते हैं। कौडू देशभुख महात्मा गांधी के साथ पग मिलाये और विनोबा भावे के साथ मध्यभारत की धूल भूदान आंदोलन के लिये फांकी । लेकिन अब हर रास्ता बंद है क्योंकि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के सपने को पूरा करने के लिये गोसीखुर्द बांध परियोजना पांच जिलों की सियासत

Oct

05

2014

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साहेब के नाम साहेब का सम्मान

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मुंबई के रेसकोर्स में शिवाजी को प्रणाम करते प्रधानमंत्री मोदी मुंबई के रेसकोर्स में शिवाजी को प्रणाम करते प्रधानमंत्री मोदी

प्रधानमंत्री हो जाने के बाद भी नरेन्द्र मोदी अपने चुनावी अंदाज में ही हैं। जिस तरह से उन्होंने आम चुनाव से पहले साठ साल बनाम साठ महीने का नारा दिया था उसी तर्ज पर अब वे साठ साल बनाम साठ महीने के हिसाब का नारा दे रहे हैं। नरेन्द्र मोदी कह रहे हैं कि जिन लोगों ने साठ साल में कुछ नहीं किया वे हमसे छह महीने का हिसाब मांग रहे हैं। चुनावी रैलियों में रूटीन भाषण की तर्ज पर वे कांग्रेस पर जबर्दस्त हमलावर हैं और कांग्रेसमुक्त भारत के अपने संकल्प को एक बार फिर दोहरा रहे हैं। मुक्ति का यह संकल्प उस हरियाणा और महाराष्ट्र में है जहां कांग्रेस की सरकारें बीते पंद्रह सालों से हैं। इसलिए नरेन्द्र मोदी यह कहना नहीं भूलते कि कैसे बीते पंद्रह सालों में कांग्रेस ने हरियाणा और महाराष्ट्र को बर्बाद कर दिया है।

निश्चित रूप से एक विपक्षी पार्टी के नेता के रूप में नरेन्द्र मोदी का इन राज्यों में कांग्रेस पर बर्बादी का आरोप लगाना गलत नहीं है। लेकिन क्या इस बात से इंकार किया जा सकता है कि अब वे इस देश के प्रधानमंत्री हैं और जो हिसाब वे इन राज्य सरकारों से मांग रहे हैं वही हिसाब राज्य के

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.