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Aug

18

2014

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एशिया आये पोप

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एशिया आये पोप

यात्रा के शुरुआती पांच दिन पोप फ्रांसिस कोरिया में रहे। इसके पूर्व पोप जॉन पौल द्वितीय ने सन् 1986 तथा सन् 1989 में दक्षिण कोरिया की यात्राएँ की थी। मार्च 2013 में कैथलिक ईसाइयों का प्रमुख बनने के बाद पोप फ्रांसिस की एशिया के लिए यह पहली यात्रा है। हालांकि वे चीन नही जा रहे है जहां प्रतिबधों और तमाम तरह के अवरोधों के बावजूद कैथोलिक चर्च लगातार बढ़ रहा है और विभिन्न सोत्रों से मिल रही जानकारी के मुताबिक वहां उसके अनुयायियों की संख्या कई करोड़ हो गई है। वे भारत भी नही आ रहे है जहां रोम के एशियाई मिशन को स्थापित करने के बाद सेंट फ्रांसिस जेवियर ने अपना शरीर त्यागा था। और आज भारत में वेटिकन का साम्राज्य तेजी से फैल रहा है। वे फिलपीन्स भी नही जा रहे है जहां करीब आठ करोड़ कैथोलिक ईसाई है।

पोप की इस यात्रा के दो प्रमुख लक्ष्य हैं। पहला, छठवें एशियाई युवा दिवस के समारोहों का नेतृत्व करना तथा दूसरा कोरियाई कलीसिया के 124 शहीदों को धन्य घोषित कर वेदी का सम्मान प्रदान करना। यह 124 वे लोग उन दस हजार कोरयाई लोगों में से है जिन्होंने 19वीं शताब्दी में कनफयूश्यस बहुल कोरिया में दमन चक्र को

Aug

14

2014

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खतरे में है राष्ट्रध्वज का सम्मान

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खतरे में है राष्ट्रध्वज का सम्मान

मालूम हो कि राष्ट्रध्वज को फहराने का अधिकार नागरिकों के मूलभूत व अभिव्यक्ति के अधिकार का हिस्सा है। संविधान की कण्डिका 2 अनुच्छेद 19 में साफ तौर पर कहा गया है कि नागरिकों के द्वारा राष्ट्रध्वज का सम्मान किया जाना चाहिए यानि इसके उचित उपयोग पर कोई बंदिश नहीं है। साथ ही, उक्त खण्डपीठ में इस बात पर भी जोर दिया गया कि भारतीय नागरिकों को ध्वनज संहिता के अनुसार शिक्षित किया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायलय के 22 सितंबर, 1995 के निर्णय के मुताबिक भी भारत का प्रत्येक नागरिक राष्ट्रीय ध्वज के घ्वजारोहण के लिए स्वतंत्र है।

बता दें कि हमारे राष्ट्रध्वज को 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने स्वीकार किया था और 14 अगस्त,  1947 को संविधान सभा के अर्धरात्रि के अधिवेशन में भारत के महिलाओं के तरफ से श्रीमती हंसीबेन मेहता ने राष्ट्रध्वज को संविधान सभा के अध्यक्ष श्री राजेन्द्र प्रसाद को प्रतीक स्वरुप भेंट किया था। राष्ट्रीय ध्वज को एक निश्चित आकार देने के लिए 23 जून, 1947 में एक अस्थायी समिति का गठन किया गया, जिसके अध्यक्ष बने राजेन्द्र प्रसाद और सदस्य क्रमश: मौलाना अबुल कलाम आजाद, श्री के. एम. पणीकर,  सुश्री सरोजिनी नायूड, श्री के. एम. मुंशी और डॉ बी. आर. अम्बेडकर को बनाया

Aug

13

2014

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यजीदी, हिन्दू और हिन्दुस्तान

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छह दिन बाद सिंजर की पहाड़ियों पर अभी भी हजारों यजीदी फंसे हुए हुए हैं जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं छह दिन बाद सिंजर की पहाड़ियों पर अभी भी हजारों यजीदी फंसे हुए हुए हैं जिनमें ज्यादातर महिलाएं और बच्चे हैं

इराक और ईरान में अगर भारतीय लोगों के प्रति बहुत गहरा मान सम्मान है तो उसका कारण कोई तेल का कारोबार नहीं है। सदियों से भारत और ईरान और इराक के करीब रहा है तो आज भी वहां की किस्सागोई में बसता है। शायद यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र में भारत की सरकार अगर किसी मुद्दे पर ईरान या इराक का साथ नहीं देती तो वहां से विरोध के स्वर नहीं बल्कि मातम के स्वर सुनाई देते हैं। वे शायद यह मानते हैं कि सिन्धु घाटी मेसोपोटामिया और पारस की खाड़ी का स्वाभाविक मित्र है। हाल फिलहाल तक इराक में सद्दाम हुसैन का शासन रहा हो कि ईरान में अयातुल्ला खोमैनी का दौर। भारत या हिन्दू विरोधी स्वर शायद ही कभी सुनाई दिये हों। ईरान से तो भारत का गहरा नाता रहा है और आज भी ईरान में हिन्दोस्तानी होना फक्र की बात समझी जाती है लेकिन इराक भी कभी भारत का दुश्मन नहीं रहा है। हां, यह बात दीगर रही है कि भारत की परतंत्र विदेश नीति के कारण वह खुलकर कभी इन देशों के समर्थन में भी नहीं उतर पाया है। यह तो ठीक है कि भारत ने सद्दाम के सफाये के वक्त मित्र देश होने से

Aug

11

2014

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नग्नता और अश्लीलता

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नग्नता और अश्लीलता

एक बार पढ़ना-बोलना सीख जाने के बाद हम बालसुलभ भोलेपन से दुनिया को नहीं देख सकते. अब हमारे और हमारी आस-पास की दुनिया के बीच हमारे ज्ञान और अनुभवों का पर्दा है. चूंकि बात यहां आमिर खान की फ़िल्म के एक पोस्टर से जुड़ी हुई है इसलिए एक फ़िल्म का उदाहरण भी यहाँ मौजूं होगा. हाल ही में आयी फ़िल्म ‘आँखों देखी’ के बाऊजी जब से सिर्फ़ अपनी आँखों देखी पर यकीन करने की ठान लेते हैं तब से उन्हें वो चायवाला भी खूबसूरत नज़र आने लगता है जिसे उन्होंने पहले कभी ध्यान से देखा भी नहीं था. हम असलियत नहीं बल्कि असलियत की सांस्कृतिक हस्तक्षेप से बनी छवि देखते हैं. इसलिए नग्नता हमारे लिए सिर्फ़ निर्वस्त्र होने से ज़्यादा कुछ हो जाती है. इसी वजह से तथाकथित सभ्य समाज में इसकी एक शॉक वैल्यू है जिसका उपयोग अलग-अलग तरीके से होता रहा है.

उदाहरण के तौर पर भारतीय सशक्त सेना बलों के द्वारा एफ्स्पा की आड़ में किये जाने वाले बलात्कारों के विरुद्ध मणिपुर मदर्स के न्यूड प्रोटेस्ट या फिर इंद्र देवता को प्रसन्न करने के लिए ग्रामीण महिलाओं का नग्न होकर हल चलाना ले सकते हैं. रूटीन से अलग होने ने ही नग्नता को उसकी शॉक वैल्यू

Aug

08

2014

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आंख खुली अमेरिकी की

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फारस की खाड़ी में खड़े अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर एच डब्लू बुश पर उतरता मानव रहित बमवर्षक विमान फारस की खाड़ी में खड़े अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर एच डब्लू बुश पर उतरता मानव रहित बमवर्षक विमान

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की आंख अचानक से खुली जरूर है लेकिन अनायास नहीं खुली है। 10 जून को जब आइसिस के आतंकियों ने इराक की जमीन पर कब्जा करना शुरू किया तो अमेरिका ने हस्तक्षेप करने की बजाय सिसायत करना शुरू कर दिया। इराक में रोज मीलों की दर से आगे बढ़ते इस्लामिक आतंकी रोज नये नये शहर कब्जा करते जा रहे थे और अमेरिका राजनीतिक सहमति के बिना हस्तक्षेप करने से कतरा रहा था। अमेरिका के लिए यह राजनीतिक सहमति थी इराकी प्रधानमंत्री अल मलीकी की विदाई। सीरिया में सक्रिय आतंकी अचानक से इराक की तरफ क्यों आगे बढ़ गये और शहर दर शहर कब्जा करने लगे यह सवाल तो बाद में उभरा लेकिन अल मलीकी की विदाई की शर्त रखकर अमेरिका ने आइसिस से अमेरिकी रिश्तों के शक को और पुख्ता कर दिया। इसे सिर्फ संयोग तो नहीं माना जा सकता कि सीरिया में अमेरिका और आइसिस दोनों ही अल असद की 'तानाशाही' को समाप्त कर देना चाहते हैं।

और वही आइसिस अगर अचानक सीरिया से आगे उत्तरी इराक की तरफ कूच कर जाती है तो अमेरिका मदद करने से पहले राजनीतिक समाधान की मांग रख देता है। जबकि इराक को तत्काल अमेरिका के हवाई मदद की

Aug

08

2014

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फतवा और कानून

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फतवा और कानून

मुस्लिम समुदाय में साक्षरता व शिक्षा का स्तर नीचा होने के कारण व सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन और सुरक्षा की भावना के अभाव के चलते, समुदाय के गरीब तबके के सदस्य आधा-अधूरा ज्ञान रखने वाले इमामों (वह व्यक्ति जो मस्जिदों में नमाज का नेतृत्व करता है) द्वारा जारी फतवों को भी ईश्वरीय कानून समझ बैठते हैं। इन लोगों के दैनिक जीवन में धार्मिक संस्थाएं और संगठन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वे उन्हें मदद और नैतिक सहारा उपलब्ध करवाते हैं जिसके कारण उन पर इन संगठनों का गहरा प्रभाव रहता है। लेकिन कई बार मुफ्ती और इमाम, परस्पर विरोधाभासी फतवे जारी कर देते हैं। सुन्नियों में चार विधिशास्त्र प्रचलित हैं जिसमें - हनफी, हनबली, शफी व मलिकी और शियाओं में तीन-जाफरी, इस्माइली व जैदी। जाहिर है कि जो इमाम या मुफ्ती इन सात विधिशास्त्रों में से जिसे मानता है, वह उसके हिसाब से फतवा जारी कर देता है। ऐसे में इन फतवों में परस्पर विरोधाभास स्वाभाविक है।

हमें उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वागत करना चाहिए जो कि मुस्लिम समुदाय को यह याद दिलाता है कि यद्यपि फतवे जारी करना असंवैधानिक नहीं है परंतु फतवे केवल जारी करने वाले की राय है जो किसी पर बंधनकारी नहीं हैं। उच्चतम न्यायालय ने

Aug

07

2014

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मुलायम का अमर प्रेम

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मुलायम सिंह के साथ अमर सिंह (फाइल फोटो) मुलायम सिंह के साथ अमर सिंह (फाइल फोटो)

वहीँ सपा के कद्दावर नेता माने जाने वाले आज़म खान का कार्यक्रम में न आना इस  बात की तस्दीक करता है के पार्टी में सब कुछ समान्य नहीं. न आने को  महज़ इत्तेफ़ाक नहीं माना जा सकता. बहरहाल राजनीति अवसर का खेल है, सफल राजनीति के लिए अवसर को ही ज्यादा महत्त्व दिया जाता है. लोकसभा चुनाव के बाद जो परिस्थिति समाजवादी पार्टी की हुई है उस हालत में पार्टी का नए समीकरण तलाश करना स्वाभाविक है. नए समीकरण के संकेत कि रेखा जनेश्वर मिश्र पार्क के उदघाटन समाहरोह में मुलायम ने यह कह कर खींच दी के हमारे लोगों ने काम नहीं किया. इस समीकरण में अमर सिंह बखूबी फिट आते हैं. एक वक्त था जब पार्टी में अमर – मुलायम कि जोड़ी को बड़े और छोटे भाई का दर्जा हाँसिल था. अमर कि कही बातों का इतना महत्त्व था कि उनकी बात को पार्टी में नेता नकार नहीं सकते थे.दोनों कि जोड़ी ने सपा में कई इतिहास रचे थे.

अमर सिंह के पार्टी में वापसी होने कि अटकले तेज़ होने के साथ यह सवाल भी अहम हो गया है कि क्या आज़म खान को मना लिया जाएगा? क्योंकि सपा छोड़ कर गए आज़म खान कि वापसी की

Aug

06

2014

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चले गये चाचा चौधरी के प्राण

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प्राण कुमार शर्मा (15 अगस्त 1938 से 5 अगस्त 2014) प्राण कुमार शर्मा (15 अगस्त 1938 से 5 अगस्त 2014)

प्राण का परिवार बंटवारे के बाद भारत आया था, पाकिस्तान से। बंटवारे के बाद भारत आये जैसे पाकिस्तान के बहुत सारे परिवार ठोकरें खा रहे थे उसी तरह प्राण के परिवार को भी अपना पैर जमाना था। लाहौर के करीब कसूर में पैदा हुए प्राण जब भारत आये तो महज नौ साल के थे। इसे सौभाग्य कहें कि दुर्भाग्य जिस 15 अगस्त को भारत पाकिस्तान के लिए आजादी के साथ साथ बंटवारे की यह सौगात लेकर आया था उसी 15 अगस्त को 1938 में प्राण का जन्म हुआ था। और अब वे जिस देश में रहने के लिए आये थे उस देश का जन्मदिन और उनका जन्मदिन एक ही दिन आने वाला था। अगर वे कुछ दिन और होते तो निश्चित रूप से अपना एक और जन्मदिन मना रहे होते लेकिन अगस्त के महीने में दुनिया में आनेवाले प्राण कुमार शर्मा अगस्त के महीने में ही दुनिया को अलविदा कह गये।

सन साठ से लेकर 2014 तक प्राण शर्मा जब तक रहे कार्टून बनाते रहे। हालांकि बतौर कार्टूनिस्ट उनके कैरियर की शुरूआत हिन्दी मिलाप से हुई थी 1960 में। करीब दो दशक तक वे अखबारों और पत्रिकाओंं के लिए ही कार्टून बनाते रहे। उनका पहला कार्टून कैरेक्टर दाबू मिलाप से

Aug

02

2014

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पिट गये पत्रकार दो

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न्यूज नेशन के संदीप चौहान और टोटल टीवी के संजय वर्मा न्यूज नेशन के संदीप चौहान और टोटल टीवी के संजय वर्मा

अचानक से नयी बन रही बिल्डिंग का बिल्डर वहां आता है और एक महिला आर्किटेक्ट, ठेकेदार और मजदूरों के साथ मिलकर पत्रकारों पर हमला करवा देता है। हमला करवाते वक्त वह जोर जोर से चिल्लाता है कि 'महिलाओंं के साथ बदतमीजी करता है। महिलाओं के साथ बदतमीजी करता है।' यह बोलता जाता है और अपने मजदूरों के साथ उन्हें घसीटता जाता है। इसमें न्यूज नेशन वाले पत्रकार की दशा खराब थी। जिसको जहां से मौका मिल रहा था, उसे मार रहे थे। कुछ ने वहां पड़े फरसे सरिया तक उठा लिये कि आज काम तमाम कर देते हैं। हालांकि वे ऐसा नहीं कर पाये लेकिन ऐसे मौकों पर आमतौर पर तमाशाई बनी भीड़ सिर्फ तमाशा नहीं देखती है बल्कि वह भी इस पिटाई में हिस्सेदार होती है। जो मार नहीं रहे होते हैं वे या तो उकसा रहे होते हैं या फिर मूक समर्थन कर रहे होते हैं। और यह सब देश के किसी पिछड़े कस्बे या दूसरे दर्जे के शहर में नहीं बल्कि देश की राजधानी दिल्ली के एक कामर्शियल इलाके में हो रहा होता है।

दिखने में सामान्य सी यह घटना उतनी सामान्य नहीं है। इस असामान्य घटना का संकेत बड़ा है। एक पत्रकार का नाम संदीप चौहान

Aug

02

2014

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नीतीश कुमार का ब्रांड बिहार

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नीतीश कुमार का ब्रांड बिहार

उलझन उधर भी है वोटरों के बीच। इस बात की नहीं कि जिस नीतीश को लालू दग्ध कहते नहीं अघाते थे उस बात को आरजेडी सुप्रीमो की समझ का फेर बताया गया बल्कि उधेड़बुन इस बात की है कि नीतीश सीएम नहीं हैं फिर भी ब्रांड बिहार का राग अलापे जा रहे। नीतीश कहते हैं कि बिहार बीजेपी के लोग ब्रांड बिहार की इमेज को बरबाद कर रहे हैं।

यही कोई दस बारह दिन पहले कहा उन्होंने। आपने, हमने हम सबने कहां ध्यान दिया नीतीश की इस गोल्डन पीड़ा पर? अभी तक पहले वाले गोल्डेन वर्ड्स (दिल्ली में दिए उद्गार) पर ही चिपके रहते हम सब। याद है न वो बयान कि टोपी भी पहननी पड़ती है और टीका भी लगाना पड़ता है। तो क्या नीतीश की यूएसपी में बदलाव आ रहा है? क्या ब्रांड बिहार उनके लिए आने वाले विधानसभा आम चुनाव का मुद्दा रहेगा जैसे कि 2014 तक गोल्डेन वर्ड्स के साथ विशेष दर्जा का मुद्दा रहा।

ये ब्रांड बिहार है क्या जो कि भहरा

है? जिस छवि की अकुलाहट में नीतीश बिहार के एडिटर इन चीफ कहलाए उसे इस दफा यानि 19 जुलाई को यहां के उनके अखबारी एडिटर समझने में नाकाम क्यों रहे? न कोई
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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.