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Nov

24

2014

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नेहरू मिस दि बस, बट नाऊ ही कैन कैच द मेट्रो

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नेहरू मिस दि बस, बट नाऊ ही कैन कैच द मेट्रो

आज भारत में कोई समस्या है तो नेहरू की वजह से है। जात-पात से लेकर दाल-भात तक की समस्याएं नेहरू की वजह से हैं। नेहरू न होते भारत की अनेक समस्याएं न होतीं। नेहरू की जगह अगर मैं भी होता तो भी नेहरू से बेहतर ही होता। नेहरू की जगह आप भी होते तो भी नेहरू से बेहतर होते। नेहरू न होते तो हम आई फोन कब का बना चुके होते, नेहरू न होते तो बुलेट ट्रेन भी हमीं बनाने वाले थे, नेहरू न होते तो ओबामा भी हमीं पैदा करने वाले थे। नेहरू न होते तो हम संविधान लागू होने से पहले क्रिकेट का विश्व कप जीत लेते। नेहरू न होते तो आज भारत की सीमा बीजिंग तक होती और अफगानिस्तान हमारा सबसे छोटा प्रदेश। नेहरू के होने से कितना कुछ होना रह गया। नेहरू न होते तो आज की शाम बोलने की ज़रूरत ही न होती। नेहरू न होते तो हम संविधान लागू होने से पहले क्रिकेट का विश्व कप जीत लेते। नेहरू न होते तो आज भारत की सीमा बीजिंग तक होती और अफगानिस्तान हमारा सबसे छोटा प्रदेश। नेहरू के होने से कितना कुछ होना रह गया। नेहरू न होते तो आज की शाम बोलने की ज़रूरत

Nov

23

2014

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हद में रहे हरियाणा पुलिस

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हद में रहे हरियाणा पुलिस

मुख्यमंत्री खट्टर यह न भूलें कि इससे देश में और स्वयं हरियाणा में भी यह भावना फैल रही है कि पुलिस केवल हिन्दू समाज के साधु संतों को ही नष्ट करने पर तुली है। यह भावना सघन होना किसी दृष्टि से उचित नहीं है। सबसे पहले मुख्यमंत्री पुलिस को यह निर्देश दें कि वह अनावश्यक मीडिया ब्रीफिंग से, फोटो खिंचवाने से बचे। यह अत्यंत आवश्यक है। लगता ही नहीं है कि हरियाणा सरकार पुलिस को संयमित करने का कदम उठा रही है।

क्या किसी आश्रम में कंडोम मिलना, गर्भ जांच के किट्स मिलना अपराध है? क्या शक्तिवर्धक दवाइयों का इस्तेमाल करना अपराध है? आज तो सामान्य आय वाले घर में भी शक्तिवर्धक दवाइयां मिलतीं हैं। आश्रम में पति पत्नी रहते होंगे, स्त्री पुरुष मित्र होंगे......इसमें पुलिस को क्या समस्या है? इसी तरह किसी आश्रम में स्वीमिंग पुल का होना भी अपराध नहीं है? क्या पुलिस यह साबित करना चाहती है कि लाखों की संख्या में जो भक्त वहां आते थे वे सब कामुक थे और और कामवासना की तृप्ति के लिए आते थे? फिर निजी सुरक्षा गार्ड रखना भी अपराध नहीं है। भारत में ऐसे लोगों की भारी संख्या है जो निजी गार्ड रखते हैं। आप उन्हें कमांडो कह

Nov

22

2014

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और वह आखिरी ब्रेकिंग न्यूज

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और वह आखिरी ब्रेकिंग न्यूज

चैनल के साथ क्या हुआ यह जानना जितना जरूरी है उतना ही यह जान लेना जरूरी है कि समाचार के कारोबार में उतरनेवाले व्यापारियों के साथ ऐसा क्यों होता है? अब तक कम से कम तीन चैनल तो ऐसे हैं ही जो कारोबार की मदद करने के लिए समाचार के कारोबार में उतरे थे, लेकिन ज्यादा देर तक टिक नहीं पाये। एस-1, वायस आफ इंडिया और अब पी-7 न्यूज। भले ही इन चैनलों ने भी पत्रकारिता करने का दावा किया हो लेकिन इन चैनलों को चालू करने का मकसद कहीं न कहीं कारोबार को मदद करना ही था। लेकिन इन्हें यह नहीं पता कि समाचार एक ऐसा कारोबार है जिसे सिर्फ और सिर्फ पत्रकार ही कर सकता है। जरूरी नहीं कि वह पेशेवर पत्रकार हो लेकिन पत्रकारिता और जनसरोकारों की संवेदनशीलता वह सामग्री है जो किसी मीडिया का मसाला तैयार करता है। पूंजी के बल पर मीडिया संस्थान को खड़ा तो किया जा सकता है लेकिन उसे बहुत देर तक खड़ा नहीं रखा जा सकता। पी-7 के साथ भी यही हुआ।

पूंजी के बल पर दल बल के साथ मीडिया के मैदान में उतरा पर्ल समूह के पास पैसे की कोई कमी न थी, न है। अगर कुछ नहीं है

Nov

21

2014

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आधी सदी का समाजवादी

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आधी सदी का समाजवादी

समाजवादी विचारधारा की बात करते ही वर्तमान राजनैतिक परिवेश में पहला नाम सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का ही उभर कर सामने आता है। उनके समर्थक उन्हें समाजवादी विचारधारा का एक मात्र नेता मानते रहे हैं, साथ ही मुलायम सिंह यादव भी स्वयं को कट्टर समाजवादी ही कहते रहे हैं, पर मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक जीवन पर नजर डालें, तो उनके समाजवादी होने पर भी कई प्रश्न चिन्ह लगे नजर आते हैं, इसीलिए वर्तमान दौर के सर्वश्रेष्ठ समाजवादी नेता होने के बावजूद उनके समर्थकों के अलावा कोई और उन्हें समाजवादी विचारधारा का नेता मानने को तैयार नहीं दिख रहा है। राजनैतिक जीवन में मुलायम सिंह यादव के नाम कई ऐसी उपलब्धियां दर्ज हैं, जिन्हें राजनीति के इतिहास में न चाहते हुए भी सुनहरे अक्षरों से दर्ज करना ही पड़ेगा, पर कई ऐसे दाग भी हैं, जो उनके समाजवादी होने पर हमेशा सवाल उठाते रहेंगे। मुलायम सिंह यादव को उनके चाहने वाले ‘नेताजी’ नाम से संबोधित करते हैं एवं जमीनी नेता होने के कारण उन्हें ‘धरतीपुत्र’ भी कहा जाता है। वास्तव में वह स्वयं में बेहद अच्छे इंसान भी हैं। पत्रकारों से तो वह और भी अच्छी तरह से पेश आते हैं। किसी भी सवाल पर वह निरुत्तर नहीं होते।

Nov

21

2014

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सांप्रदायिकता और संघ परिवार की सफलता

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सांप्रदायिकता और संघ परिवार की सफलता

इशारा शिवसैनिकों की ओर था। इस घटना को दुर्भाग्यशाली बताते हुए संसद में अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि मुझे बताया गया है कि इस समय अडवाणीजी का चेहरा आँसुओं से भरा हुआ था। बहरहाल उनकी बात का देश को भरोसा नहीं हुआ था तथा बाद में कई भाजपा शासित रहे राज्यों में हुये चुनावों में भाजपा पराजित हो गयी थी।

इस गैरराजनैतिक अभियान के सहारे अपनी डूब चुकी पार्टी को पुनर्जीवित करके दो सदस्यों से दो सौ सदस्यों तक पहुँचाने और बाद में केन्द्र में सरकार बना लेने के खेल के बारे में बहुत सारा लिखा जा चुका है और अन्दर की कहानी जानने के प्रति उत्सुकता रखने वालों के लिए सारी सामग्री ढेर सारी पुस्तकों, पत्रिकाओं, कविताओं, कहानियों और उपन्यासों तक में उपलब्ध है। उल्लेखनीय यह है कि इस अवसर पर जब पूरी दुनिया के समाचार विचार माध्यम संघ परिवार की निन्दा से भरे हुये थे तब धर्मनिरपेक्षत

सबसे बड़े अलमबरदारों में से एक सुप्रसिद्ध लेखक सम्पादक राजेन्द्र यादव ने हंस के जनवरी 2003 के सम्पादकीय में अपनी आलोचना का केन्द्र मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बनाते हुये लिखा था कि उनके शाहबानो वाले मामले पर लिये गये रुख और उसके लिए दिल्ली में एक बड़ी रैली करके ईँट

Nov

21

2014

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सेल्फी शौकीन संपादकों के मार खाये 'मीडिया कमाण्डो'

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सेल्फी शौकीन संपादकों के मार खाये 'मीडिया कमाण्डो'

सतलोक आश्रम की कवरेज के दौरान जिन पत्रकारों/ कैमरामैनों/ फोटोग्राफरों ने भी मार खाई, कम-से-कम मैं तो उन्हें “मीडिया-कमांडो” की उपाधि से कतई नहीं नवाज सकता। वजह, काबिलियत, अनुभव और सूझ-बूझ की पत्रकारिता तो तब थी, जब ढोंगी बाबा रामपाल और हरियाणा पुलिस की मिली-भगत, और दोनो के बीच कई दिन से चली आ रही, जोड़-तोड़ की “अंदरखाने की कहानी” को बाहर लाकर कोई साथी (पत्रकार) उन्हें “नंगा” कर लेता। जिसके बाद हरियाणा सरकार का कोई “गुर्गा” या फिर हरियाणा पुलिस का कोई नंबरदार आला-अफसर चैनल/ अखबार के दफ्तर में बैठा “मिमिया” या “रिरिया-गिड़गिड़ा” रहा होता।

इस पूरे प्रकरण में तो साफ जाहिर है कि, हरियाणा सरकार, राज्य पुलिस ने जितना चाहा, उतना मीडिया का “हिसाब से” इस्तेमाल किया। जब बात आई “अपनी कमजोरियों को छिपाने की” तो उसी पुलिस ने मीडिया को खुले खेतों में, मीडिया के ही खुले-कैमरों के सामने दौड़ा-दौड़ाकर “कूट लिया या “कुटवा” दिया।

ऐसे में सवाल यह पैदा होता है, कि आखिर समझदार कौन साबित हुआ और न-समझ कौन? इस्तेमाल कौन हुआ? मीडिया या फिर पुलिस! जग-जाहिर है कि, इस पूरे एपीसोड में मीडिया का ही बेजा “इस्तेमाल” हुआ और मीडिया की ही फिर “कुटाई” की गयी। बात फिर वहीं आ जाती है...मीडिया

Nov

20

2014

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विचार नहीं, व्यवहार की बात करिए

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विचार नहीं, व्यवहार की बात करिए

फिर हम नाम जोड़कर विचार को जोड़ देते हैं। राम का विचार, कृष्ण का विचार, दयानंद, विवेकानंद का विचार, मार्क्स, लेनिन का विचार, गांधी का विचार, नेहरू का विचार फिर ऐसे चले आइए तो दुनिया के नेताओं की  छोड़ें, भारत में अभी नरेंद्र मोदी का विचार। लगता है कि सब विचार ही है जो सब करता है। और विचार ही महत्वपूर्ण है। और तो और बुखारी का विचार, आसाराम का विचार और ताजा-ताजा बात करें रामपाल का विचार।  हिसार के बरवाला में जो कुछ हुआ उसे विचारक इस तौर पर देख ले रहे हैं कि ये दो विचारों की लड़ाई थी। आर्यसमाजी विचार और कबीरपंथी विचार। इससे भी आगे मामला बढ़ गया। कहा ये भी जा रहा है कि कांग्रेस की  सरकारी रामपाल के विचारों की थी। इसलिए सब मस्त रहा। अब आई बीजेपी की सरकार के विचार आर्यसमाजी हैं। इसलिए रामपाल के लिए सब पस्त हो गया।

लेकिन, मैं जब देख पा रहा हूं तो दरअसल दुनिया की हर लड़ाई व्यवहार की लड़ाई है। विचार की कोई लड़ाई ही नहीं है। विचार तो जबरदस्ती, ऐसे ही रामपाल टाइप बरवाला गांव जैसा अपना किलानुमा आश्रम बनाने के लिए बता दिया जाता है। विचार तो लगभग सब एक ही हैं।

Nov

20

2014

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संतों को निशाना बनाना ठीक नहीं

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संतों को निशाना बनाना ठीक नहीं

रामपाल के मामले में न्यायालय का यह आदेश भी चिंताजनक है कि अन्य आश्रमों और डेरों की भी छानबीन की जाए। सरकार को इसके खिलाफ अपील करनी चाहिए। यह तो कोई बात नहीं हुई कि एक आश्रम के प्रमुख ने यदि कोई गलत किया तो आप सबको संदेह के दायरे में ले आयें। इससे लोगों के अंदर खीझ पैदा हो रही है और यह आवाज उठ रहा है कि केवल हिन्दू साधु संतों को ही निशाने पर लेने की कोशिश की जा रही है। इस प्रकार की भावना न पैदा हो यह पुलिस, न्यायालय दोनों का दायित्व है। आखिर यह प्रश्न तो उठेगा ही कि केवल डेरे और आश्रम ही क्यों? दूसरे संप्रदाय और मजहबों के बारे में भी ऐसा ही निर्देश क्यों नहीं?

मीडिया का रवैया भी दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस ढंग से कुछ मामलों को सनसनीखेज बनाकर यह छवि दी जा रही है कि ज्यादातर साधु संत अपराध, यौन दुष्कृत्य .....में संलिप्त हैं वह भयावह और खतरनाक है। एक पत्रकार के रुप में हमारी भूमिका जितना तथ्य है उतना दिखाना, छापना और उतने के आधार पर ही अपना विचार भी देना है। इस समय मीडिया की भूमिका इससे परे जा रही है। वह फैसला दे रही है। यह

Nov

19

2014

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हिन्दुअन की हिन्दुवाई देखो

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हिन्दुअन की हिन्दुवाई देखो

विश्व हिन्दू कांग्रेस का आयोजन दिल्ली में हो इसमें कोई आश्चर्य नहीं। दिल्ली में एक ऐसी पार्टी की सरकार बन चुकी है जो अपने आपको हिन्दू धर्म का प्रतिनिधि दल मानता है। है या नहीं है इस पर बहस अपनी जगह लेकिन राजनीतिक हिन्दुत्व का जो उभार बीते दो दशकों में हुआ है उसके लहर पर सवार यह दल और इस दल को नियंत्रित करनेवाले वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक हिन्दू निष्ठा पर शक नहीं किया जा सकता। सरकार बनने के बाद इस निष्ठा ने नये आयाम तलाशने शुरू कर दिये और विश्व हिन्दू कांग्रेस नये आयाम की इसी तलाश का परिणाम है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा स्थापित विश्व हिन्दू परिषद को बने पचास साल हो गये। देश दुनिया में जगह जगह हिन्दू शक्ति के उभार के जलसे चल भी रहे हैं, लेकिन जरूरी यह था कि दिल्ली में कुछ ऐसा आयोजन किया जाता जो विश्व हिन्दू परिषद के वैश्विक उपस्थिति का अहसास करा देता। विश्व हिन्दू कांग्रेस विश्व हिन्दू परिषद के उसी ग्लोबल फुटप्रिंट को अहसास कराने का आयोजन है।

इसलिए आयोजन से जुड़ी जो जानकारियां दी जा रही हैं उसमें सिर्फ यह नहीं बताया जा रहा है कि दुनिया के कितने देशों से कितने बुद्धिजीवी, विचारक

Nov

17

2014

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कश्मीर में चुनाव की राजनीतिक चुनौतियां

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हंदवारा की एक रैली में सज्जाद गनी लोन की रैली में उमड़ा कश्मीरी जनसैलाब हंदवारा की एक रैली में सज्जाद गनी लोन की रैली में उमड़ा कश्मीरी जनसैलाब

एक ओर जम्मू और कश्मीर में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिद्दीन ने लोगों को धमकी दे दी है कि वो आने वाले विधानसभा चुनाव से दूर रहें और उसनें पुलवामा जिले में धमकी भरे पोस्टर भी लगा दिए हैं कि लोग दहशत में आ जाएँ और चुनावी प्रक्रिया से दूर रहें. इस प्रकार के धमकी भरे पोस्टरों से स्वाभाविक ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया और सरकार को एक चुनौती प्रस्तुत हो गई है.

दूसरी ओर बीएसएफ की एक इंटेलिजेंस रिपोर्ट में कहा गया है कि आतंकी जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में गड़बड़ी फैला सकते हैं और हिजबुल मुहाहिद्दीन, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद दक्षिणी कश्मीर में सुरक्षा बलों, राजनैतिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों पर आतंकी हमलें कर सकते हैं. कश्मीर में तहरीक-ए-तालिबान के कमांडर मोहम्मद अब्दुल वली अलियास कुरैशी द्वारा 22 आतंकी दस्तों को तैयार करके रखना भारतीय सेना और प्रशासन दोनों के लिए एक चुनौती बन गया है.

तीसरी चुनौती कि चर्चा करें तो वह यह है कि हाल ही में जब पिछले माह कश्मीर में विधानसभा चुनाव

्रक्रिया प्रारम्भ हुई तब पाकिस्तान तुरंत सक्रिय हो उठा. पाक नें अपनी शैतानी अलगाव वादी योजना पर और तेज काम प्रारम्भ किया और अलग अलग मोर्चों पर भारत विरोधी अभियान को हवा देंनी शरू कर दी.

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.