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Aug

01

2014

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अटल दौर से आगे बढ़े नरेन्द्र मोदी

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अटल दौर से आगे बढ़े नरेन्द्र मोदी

मारन की राजनीति कोई हिन्दूवादी राजनीति नहीं थी। द्रविण राजनीति में वे हिन्दू विरोधी राजनीति के लिए जाने जाते थे। लेकिन देश तो देश होता है। कहते हैं उस वक्त अमेरिका के दबाव में अटल बिहारी वाजपेयी ने खुद फोन करके मारन को वार्ता में न अड़ने की सलाह दे दी। मारन पीछे हट गये। देश लौट आये। दो साल बाद उनकी मौत भी हो गयी। लेकिन आज करीब तेरह साल बाद अगर हम देश के लघु और कुटीर उद्योगों की हालत देखें तो समझ में आता है कि अमेरिका के दबाव में अगर अटल बिहारी वाजपेयी ने मारन को न रोका होता तो आज सूई धागा लेकर चीन हमें इस तरह नाथ न रहा होता। हालांकि उस समझौते के बाद चीन का विश्व व्यापार संगठन में प्रवेश हुआ लेकिन ऐसे ही व्यापारिक समझौतों का सहारा लेकर दुनिया के विकसित देश तीसरी दुनिया के देशों में बाजार तलाशते हैं और अपनी अर्थव्यवस्था ठीक करते हैं।

इसलिए आज अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अमेरिका के लाख दबाव के बाद भी किसानों की सब्सिडी को नब्बे से पहले वाली स्थिति में न ले जाने का कठिन फैसला लिया है तो यह बड़े हौसले वाला फैसला है। अमेरिका को दुनिया के

Aug

01

2014

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जग हंसे, 'हंस' रोय

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जग हंसे, 'हंस' रोय

कुर्सियां आधे से ज्‍यादा खाली थीं। लोग अनमने थे। किसी पुरानी आदत के अचानक छूट जाने की एक अपरिचित सी गंध सभागार में व्‍याप्‍त थी, जब अभय कुमार दुबे ने स्‍वागत करते हुए रघुवीर सहाय के हवाले से कह डाला, ''...हल्‍की सी दुर्गंध से भर गया सभाकक्ष।'' राजेंद्रजी चश्‍मे के पीछे से देख रहे थे कि ऐंकर बने दुबे ने कैसे मंच संचालन की शुरुआत में ही सबके लिए 15-15 मिनट की कड़ी मीयाद तय कर दी, लेकिन खुद भूमिका बांधने में 22 मिनट तक बोलते रह गए थे। वे देख रहे थे कि कैसे जगमति सांगवान ''मुंशी प्रेमचंद के नायक-नायिकाओं के सपनों को साकार करने'' का बीड़ा उठा रही थीं। उन्‍होंने बखूबी इस बात पर ध्‍यान दिया कि मुकुल केसवन ने कैसे 15 मिनट का तय वक्‍त कांग्रेस के ''ज़ूलॉजिकल नेशनलिज्‍म'' को अंग्रेज़ी में सही साबित करने में गंवा दिया और एक कुशल टीवी ऐंकर की भांति दुबे ने केसवन की बात पर मुहर भी मार दी। राजेंद्रजी ने तब मुंह बिचकाया, जब अरुणा रॉय ने अपने 25 मिनट के संबोधन में 15 मिनट यह समझाने में गंवा दिए कि वे राष्‍ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्‍य क्‍यों बनीं और सत्‍ता के सामने उन्‍होंने कितना सच बोला है।

''सच''... हां,

Jul

29

2014

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मोदी गरीब विरोधी

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10 सालों से कांग्रेस के "अत्याचार" को जारी रखने का बीड़ा, अब नरेंद्र मोदी ने अपने कन्धों पर उठा लिया है। 10 सालों से कांग्रेस के "अत्याचार" को जारी रखने का बीड़ा, अब नरेंद्र मोदी ने अपने कन्धों पर उठा लिया है।

पिछले 10 सालों से कांग्रेस के "अत्याचार" को जारी रखने का बीड़ा, अब नरेंद्र मोदी ने अपने कन्धों पर उठा लिया है। मोदी ने बहुत झूठ बोला। सफ़ेद झूठ। नरेंद्र मोदी की रैलियों को कवर करने व उनका गुणगानकर उन्हें महान "योगी" बताने वाले "महान वेतन भोगी" पत्रकारों और मीडिया मालिकों को भले परदे के पीछे बहुत कुछ मिला हो और मोदी की अंधभक्ति में लगे रहे लोगों ने भले मोदी को "भगवान" मान लिया हो, मगर आज सब शर्मसार हैं। हालांकि 60 दिन बाद भी झूठी दुहाई बाकी है। ये वही लोग हैं जो महज़ 15 दिनों में अरविन्द केजरीवाल से हिसाब मांग रहे थे, और मनमर्जी हिसाब न मिलने पर गरियाने लगे थे।

काल्पनिक "मोदी फैन क्लब" के अरूण पुरी का आज-तक, शर्माजी और भाजपा के चहेते दीपक चौरसिया का इंडिया न्यूज़, भाजपा के मुखपत्र के रूप में कुख्यात (माफ़ कीजियेगा-विख्यात) हो चुका इंडिया टीवी, मोदी के प्रिय मुकेश अम्बानी के आईबीएन सहित भाजपा की विचारधारा से प्रभावित एबीपी न्यूज़ और अन्य छुटभैये अनगिनत मीडिया के नाम हैं जिन्हें इस बात का पुरज़ोर खंडन करना चाहिए कि मोदी की झूठी वाहवाही गलत थी और है। मगर कहाँ है इस बात की गवाही? ना तो मोदी के झूठे वायदों

Jul

27

2014

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एप्पल का चाइनीज भाई 'एमआई'

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एप्पल का चाइनीज भाई 'एमआई'

इस फोन का नाम है एमआई-3 और इस फोन को बनानेवाली कंपनी का नाम है शाओ-मी। अभी चार साल पहले चीन में खड़ी की गई शाओमी टेक कंपनी का कारोबार ज्यादातर दक्षिण एशिया में ही है और चीन के बाहर भारत पहला बड़ा बाजार है जहां चीन की इस कंपनी ने कदम रखा है। चाइनीज में शाओ-मी का मतलब होता है चावल का छोटा दाना। अपने चावल के इसी छोटे दाने को ब्राण्ड बनाकर कंपनी ने अब तक तीन मोबाइल फोन चीन के बाजार में उतारे हैं। एमआई सीरिज के इन तीन सेलफोन में एमआई-3 भारत में लांच किया गया है। जिसके बारे में तकनीकि समीक्षक बता रहे हैं कि अगर एप्पल एन्डरायड फोन बाजार में लांच करता तो शायद कुछ ऐसा ही होता। तो क्या वास्तव में एमआई-3 एप्पल के टक्कर का फोन है? वह भी इतनी कम कीमत में कि कोई सामान्य उपभोक्ता उसे खरीद सकता है?

महज तीन साल में चीन में शाओमी ने अच्छी पकड़ बना ली है। कहते हैं जैसे अमेरिका में एप्पल के आईफोन के उपभोक्ता सिर्फ आईफोन इस्तेमाल करते हैं और सिर्फ उपभोक्ता नहीं बल्कि उसके समर्थक भी होते हैं कुछ उसी तरह का माहौल शाओमी ने चीन में एमआई सीरीज के फोन

Jul

26

2014

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हाफिज सईद से हुई पहली मुलाकात

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हाफिज सईद से हुई पहली मुलाकात

जनवरी 2000। रावलपिंडी का फ्लैशमैन होटल। पाकिस्तान टूरिज्म डेवल्पमेंट कारपोरेशन के इस होटल में दोपहर 3 बजे के करीब एक कद्दावर शख्स कमरे में घुसा। गर्दन से नीचे तक लटकती दाढी। हट्ट-कट्टा शरीऱ। सफेद पजामा और कुरता पहने शख्स ने कमरे में घुसते ही कहा कॉफी नहीं पिलाइयेगा। कुछ पूछने से पहले ही वह शख्स खुद ही कुर्सी पर बैठा और हमारे कुछ भी पूछने से पहले खुद ही बोल पड़ा।

इंडिया से आये हैं?
जी।

कई दिनों से हैं?
जी।

तो रुके हुए क्यों है?
जी, हम लश्कर के मुखिया मोहम्मद हाफिज सईद का इंटरव्यू लेने के लिये रुके हैं।

क्या आपकी बात हो गयी है?
जी नहीं।

तो फिर क्या फायदा?
फायदा-नुकसान की बात नहीं है। दिल्ली में लालकिले पर हमला हुआ तो हम पाकिस्तान यही सोच कर आये हैं कि इंटरव्यू करेंगे तो भारत में भी लोग जान पायेंगे कि लश्कर के इरादे क्या हैं।

आपने लश्कर के चीफ की कभी कोई तस्वीर देखी है?
नहीं।

तो फिर इंटरव्यू की कैसे सोच ली?
पत्रकार के तौर पर पहली बार हमारे भीतर आस

कि हो ना हो यह शख्स लश्कर से जुड़ा है। तो तुरंत कॉफी का आर्डर दे दिया।

दरअसल हाफिज सईद से मुलाकात का मतलब क्या

Jul

25

2014

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भाषा की साजिश, भारत के खिलाफ

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भाषा की साजिश, भारत के खिलाफ

जिस वक्त मंत्री महोदय संसद में यह वक्तव्य दे रहे थे, उस वक्त दिल्ली के ही मुखर्जी नगर इलाके में दो छात्रों का आमरण अनशन चल रहा था। इन दोनों छात्रों के समर्थन में वहां नियमित तौर पर धरना प्रदर्शन और सभाओं का सिलसिला जारी था। उनके धरने के नौंवे दिन जब सरकार ने संसद में यह ऐलान किया तो उम्मीद बंधी थी कि मोदी सरकार संजीदा है और जरूर भाषाई परीक्षण में अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करेगी। उम्मीद इसलिए भी बंधी थी कि बीजेपी की नयी सरकार के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके गृहमंत्री हिन्दी की हिमायत कर चुके थे। लेकिन लगता है दो महीने के भीतर ही सरकार की नौकरशाही इन दोनों पर इतना हावी हो गयी कि अपनी हिमायत को उन्होंने खुद रद्दी की टोकरी में डाल दिया और यूपीएससी ने सिविल सर्विसेज के लिए प्राथमिक परीक्षाओं की तारीख घोषित कर दी। बस फिर क्या था, छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा और इस बार गुस्सा दिल्ली विश्वविद्यालय से सटे मुखर्जी नगर तक सीमित नहीं रहा बल्कि संसद भवन के दरवाजे तक पहुंच गया।

शुक्रवार को संसद भवन पहुंचने से पहले गुरूवार की शाम मुखर्जी नगर इलाके में ही सिविल सेवा की परीक्षा की तैयारी कर रहे

Jul

25

2014

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एक क्राइम रिपोर्टर की डायरी से वृजबिहारी हत्याकांड

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एक क्राइम रिपोर्टर की डायरी से वृजबिहारी हत्याकांड

बृज बिहारी प्रसाद मिनिस्‍टर से ज्यादा बड़े माफिया थे। उनकी कईयों से रंजिश चल रही थी। वे छोटन शुक्‍ला-भुटकुन शुक्‍ला-देवेन्‍द्र दूबे की हत्‍या में आरोपित हो चुके थे लेकिन बिहार के गैंगस्‍टरों से जब गोरखपुर के श्रीप्रकाश शुक्‍ला एंड कंपनी ने हाथ मिलाया, तबसे बृज बिहारी की मुसीबत बढ़ी हुई थी। श्रीप्रकाश एंड कंपनी गोरखपुर में शुरु में बहुत छोटी थी, लेकिन बिहार के संपर्क में आते ही इतने असलहे मिल गये थे कि कोहराम मचा दिया था। यूपी में श्रीप्रकाश के खात्‍मे के लिए ही सबसे पहले तत्‍कालीन मुख्‍य मंत्री कल्‍याण सिंह ने एसटीएफ बनाया था। अरुण कुमार एसटीएफ के मुखिया थे व सत्‍येन्‍द्र वीर सिंह आपरेशनल चीफ।

बृजबिहारी जानते थे कि मनमाफिक बादशाहत में कील-कांटा सूरजभान सिंह व मुन्‍ना शुक्‍ला हैं लेकिन डर सबसे अधिक इधर मिले श्रीप्रकाश शुक्‍ला से ही था। गजब के दुस्‍साहसी श्रीप्रकाश शुक्ला ने बहुत कम समय में कई असंभव सा अपराध कर दिया था। सूरजभान जेल जा चुके थे। अंडरवर्ल्‍ड में खबर चल रही थी कि जेल के भीतर ही सूरजभान को खत्‍म करा देने की योजना अंतिम रुप में है। श्रीप्रकाश इस क्षति को बर्दाश्‍त नहीं कर सकता था लेकिन मेधा घोटाले में फंसने के बाद मंत्री बृजबिहारी 22-23 कमांडो की ऐसी

Jul

23

2014

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धरनई की रोशनी

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धरनई की रोशनी

धरनई गांव में रविवार को हुए इस प्रयोग के जरिये देश में संभवत: पहली बार एक पंचायत ने माइक्रो ग्रिड बिठाकर खुद को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर घोषित कर दिया. दिलचस्प यह है कि गांव की रातों का अंधेरा दूर करने के लिए न किसी को एक इंच विस्थापित होना पड़ा, न पर्यावरण हो रहा है, न वे किसी कोल ब्लॉक की सप्लाई पर आश्रित हैं और न ही उन्हें निरंतर सप्लाई के लिए किसी एजेंसी का मुंह जोहना पड़ेगा. यहां के रातों का अंधेरा गांव के आकाश में जगमगाने वाले सूरज ने ही मिटाया है. वैकल्पिक स्रोतों के जरिये देश और दुनिया का ऊर्जा दारिद्र्य मिटाने का सपना देखने वालों के लिए यह बड़ी जीत है.

धनरुआ के सोलर माइक्रो ग्रिड के निर्माण में कुल 3 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. अब इन तीन करोड़ रुपये के निवेश के बाद गांव तकरीबन दो दशक तक चौबीसो घंटे निर्बाध बिजली का इस्तेमाल कर सकता है. बिना टैरिफ में वृद्धि किये. इस योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी संस्था ग्रीनपीस के प्रतिनिधि बताते हैं कि 3 करोड़ की राशि तो इतनी छोटी है कि इतना तो किसी गांव तक पोल, बिजली के तार और ट्रांसफार्मर लाने में खर्च हो जाते

Jul

23

2014

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विकास का जनविरोधी आंदोलन

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विकास का जनविरोधी आंदोलन

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नजर में विकास के सगुण रूप हैं- स्मार्ट सिटी, विशेष निवेश क्षेत्र अथवा राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र, बुलेट ट्रेनों के जरिये देश के महानगरों को जोड़ने वाली हीरक चतुर्भुज परियोजना, हाई-टेक् टाउनशिप, मेगा प्रकल्प, 6-8 सड़कों वाले एक्सप्रेसवे, ऐसे इलाके जिनमें शहरी सुविधाएँ सुलभ कराने वाला आधारभूत ढाँचा मौजूद होने के साथ-साथ गाँव की आत्मा भी हो, सूचना प्रौद्योगिकी पार्क, नाभिकीय ऊर्जा संयन्त्र, दु्रत मालवाही रेल गलियारे और उससे संलग्न औद्योगिक गलियारे, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, सुपर स्पेशियलटी हॉस्पिटल, आईआईटी, आईआईएम, एम्स, तरह-तरह की कारोबारी शृंखलाएँ आदि। उनका अभियान है कि इन सारी गतिविधियों को फास्ट-ट्रैक किया जाय। कहने का मतलब यह है कि उनके प्रस्तावों का त्वरित निस्तारण हो यानी उन्हें फौरन मंजूरी मिले और उनके क्रियान्वयन में आने वाली हर बाधा को तत्काल दूर किया जाय। जाहिर है कि विकास के इस मॉडल के वाहक देशी-विदेशी कॉरपोरेट समूह या घराने होंगे।

विकास के इसी मॉडल से निकलता है कॉरपोरेट-नीत बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद का जिन्न। देश के ऊपर लादे जा रहे विकास के इस मॉडल की धुरी जनगण नहीं, कॉरपोरेट महाबली हैं। लोग अपने समुदायों, इलाकों, प्राकृतिक संसाधनों, स्वरोज़गारी परम्परागत स्रोतों या अवसरों तथा सामाजिक सम्बन्धों से बेदखल होते जाते हैं। विस्थापन की त्रासदी वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेलने

Jul

21

2014

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टूट गया टुहिला का तार

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अपने टुहिला के साथ कालीशंकर महली अपने टुहिला के साथ कालीशंकर महली

काली शंकर महली गरीब थे, पर एक उम्दा कलाकार। वह अपने टाटीसिल्वे के हरि नगर के मकान में रहते थे, जहां रास्ता भी नहीं गया है। अपने वाद्य टुहिला के एकलौते वादक। इसे लौह युग से भी पहले का वाद्य इसलिए कहा जाता है कि इसमें किसी भी प्रकार के लोहे का इस्तेमाल नहीं हुआ है। बांस, लकड़ी, लौकी का तुंबा और धागा। इन्हीं चीजों से बनता है यह टुहिला। धागे को एक छोर से दूसरे छोर तक बांध देते हैं। इसके बाद तो एक धागे से इतना दर्द भरा संगीत निकलता है कि आप के रोएं खड़े हो जाए। कहते हंै कि एकांत के क्षणों में इसे धरती आबा बिरसा मुंडा भी बजाया करते थे।

कालीशंकर सिर्फ इस अनोखे और प्राचीन वाद्य को ही नहीं बजाते थे। उतने ही मजे और सुर में सारंगी और बांसुरी भी बजाते। पर, उस छप्परपोश मकान के एक कमरे में उनका टुहिला उदास पड़ा था। एक कोने में उनकी बांसुरी खामोश थी तो दूसरे कोने में सांरगी। उनकी पत्नी सुकरमनी देवी कहती हैं कि वो सारंगी भी बजाते थे और बांसुरी भी। लेकिन उनका मन टुहिला में रमता था। वह टुहिला सिखाने के लिए टाटा तक चले जाते थे ताकि कोई इसे बचा

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.