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Jul

23

2014

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धरनई की रोशनी

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धरनई की रोशनी

धरनई गांव में रविवार को हुए इस प्रयोग के जरिये देश में संभवत: पहली बार एक पंचायत ने माइक्रो ग्रिड बिठाकर खुद को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर घोषित कर दिया. दिलचस्प यह है कि गांव की रातों का अंधेरा दूर करने के लिए न किसी को एक इंच विस्थापित होना पड़ा, न पर्यावरण हो रहा है, न वे किसी कोल ब्लॉक की सप्लाई पर आश्रित हैं और न ही उन्हें निरंतर सप्लाई के लिए किसी एजेंसी का मुंह जोहना पड़ेगा. यहां के रातों का अंधेरा गांव के आकाश में जगमगाने वाले सूरज ने ही मिटाया है. वैकल्पिक स्रोतों के जरिये देश और दुनिया का ऊर्जा दारिद्र्य मिटाने का सपना देखने वालों के लिए यह बड़ी जीत है.

धनरुआ के सोलर माइक्रो ग्रिड के निर्माण में कुल 3 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. अब इन तीन करोड़ रुपये के निवेश के बाद गांव तकरीबन दो दशक तक चौबीसो घंटे निर्बाध बिजली का इस्तेमाल कर सकता है. बिना टैरिफ में वृद्धि किये. इस योजना के क्रियान्वयन से जुड़ी संस्था ग्रीनपीस के प्रतिनिधि बताते हैं कि 3 करोड़ की राशि तो इतनी छोटी है कि इतना तो किसी गांव तक पोल, बिजली के तार और ट्रांसफार्मर लाने में खर्च हो जाते

Jul

23

2014

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विकास का जनविरोधी आंदोलन

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नजर में विकास के सगुण रूप हैं- स्मार्ट सिटी, विशेष निवेश क्षेत्र अथवा राष्ट्रीय निवेश एवं विनिर्माण क्षेत्र, बुलेट ट्रेनों के जरिये देश के महानगरों को जोड़ने वाली हीरक चतुर्भुज परियोजना, हाई-टेक् टाउनशिप, मेगा प्रकल्प, 6-8 सड़कों वाले एक्सप्रेसवे, ऐसे इलाके जिनमें शहरी सुविधाएँ सुलभ कराने वाला आधारभूत ढाँचा मौजूद होने के साथ-साथ गाँव की आत्मा भी हो, सूचना प्रौद्योगिकी पार्क, नाभिकीय ऊर्जा संयन्त्र, दु्रत मालवाही रेल गलियारे और उससे संलग्न औद्योगिक गलियारे, व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स, सुपर स्पेशियलटी हॉस्पिटल, आईआईटी, आईआईएम, एम्स, तरह-तरह की कारोबारी शृंखलाएँ आदि। उनका अभियान है कि इन सारी गतिविधियों को फास्ट-ट्रैक किया जाय। कहने का मतलब यह है कि उनके प्रस्तावों का त्वरित निस्तारण हो यानी उन्हें फौरन मंजूरी मिले और उनके क्रियान्वयन में आने वाली हर बाधा को तत्काल दूर किया जाय। जाहिर है कि विकास के इस मॉडल के वाहक देशी-विदेशी कॉरपोरेट समूह या घराने होंगे।

विकास के इसी मॉडल से निकलता है कॉरपोरेट-नीत बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद का जिन्न। देश के ऊपर लादे जा रहे विकास के इस मॉडल की धुरी जनगण नहीं, कॉरपोरेट महाबली हैं। लोग अपने समुदायों, इलाकों, प्राकृतिक संसाधनों, स्वरोज़गारी परम्परागत स्रोतों या अवसरों तथा सामाजिक सम्बन्धों से बेदखल होते जाते हैं। विस्थापन की त्रासदी वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी झेलने

Jul

21

2014

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टूट गया टुहिला का तार

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काली शंकर महली गरीब थे, पर एक उम्दा कलाकार। वह अपने टाटीसिल्वे के हरि नगर के मकान में रहते थे, जहां रास्ता भी नहीं गया है। अपने वाद्य टुहिला के एकलौते वादक। इसे लौह युग से भी पहले का वाद्य इसलिए कहा जाता है कि इसमें किसी भी प्रकार के लोहे का इस्तेमाल नहीं हुआ है। बांस, लकड़ी, लौकी का तुंबा और धागा। इन्हीं चीजों से बनता है यह टुहिला। धागे को एक छोर से दूसरे छोर तक बांध देते हैं। इसके बाद तो एक धागे से इतना दर्द भरा संगीत निकलता है कि आप के रोएं खड़े हो जाए। कहते हंै कि एकांत के क्षणों में इसे धरती आबा बिरसा मुंडा भी बजाया करते थे।

कालीशंकर सिर्फ इस अनोखे और प्राचीन वाद्य को ही नहीं बजाते थे। उतने ही मजे और सुर में सारंगी और बांसुरी भी बजाते। पर, उस छप्परपोश मकान के एक कमरे में उनका टुहिला उदास पड़ा था। एक कोने में उनकी बांसुरी खामोश थी तो दूसरे कोने में सांरगी। उनकी पत्नी सुकरमनी देवी कहती हैं कि वो सारंगी भी बजाते थे और बांसुरी भी। लेकिन उनका मन टुहिला में रमता था। वह टुहिला सिखाने के लिए टाटा तक चले जाते थे ताकि कोई इसे बचा

Jul

20

2014

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कश्मीर में अवसरवाद की राजनीति

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कांग्रेस की इस घोषणा से पहले जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री ओमर अब्दुल्ला सोनिया गांधी से मिलकर गठबंधन खत्म करने की मंशा जता चुके थे, यह उन्होंने कांग्रेस की घोषणा के बाद ट्वीट करके बताया। ओमर अब्दुल्ला का कहना है कि दस दिन पहले ही वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले थे और उनको कहा था कि राज्य में वे अकेले चुनाव मैदान में जाएंगे। शायद इसके बाद ही कांग्रेस ने तय किया कि भले ही ओमर अब्दुल्ला निजी तौर पर उन्हें सूचित कर रहे हैं लेकिन वह सार्वजनिक तौर पर इसकी घोषणा करेगी। रविवार को उसने वही किया। तो इसमें ऐसा क्या खास है जिसका जिक्र करना इस मौके पर जरूरी है?

याद करिए एनडीए का शासनकाल। एनडीए में एक ऐसा दल भी शामिल था जिससे समर्थन की उम्मीद शायद ही कभी बीजेपी को रही हो। लेकिन नेशनल कांफ्रेस ने देश के नाम पर यह किया और कमोबेश पूरे एनडीेए शासन के दौरान राज्य में फारुख अब्दुल्ला सरकार चलाते रहे और आखिर के एक साल ओमर अब्दुल्ला विदेश राज्य मंत्री भी बने। लेकिन 2002 में राज्य में हुए चुनाव में कांग्रेस ने पीडीपी के साथ मिलकर सत्ता में वापसी कर ली और फारुख अब्दुल्ला सत्ता से बाहर हो गये।

Jul

19

2014

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मौका-ए-वारदात मोहनलालगंज

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जगह जरूर दिल्ली नहीं लखनऊ का मोहनलालगंज है लेकिन वारदात भी कम वीभत्स नहीं है। एक अस्पताल में नौकरशीपेशा विधवा स्त्री के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्याकांड का मामला है। गुरूवार की सुबह पहली बार छुटपुट खबरों के साथ प्रकाश में आया यह मामला हो सकता है एक गैंगरेप की घटना समझकर बहस का मुद्दा न बन पाता लेकिन बहस का मुद्दा बना सोशल मीडिया पर आई कुछ तस्वीरोंं के कारण। मोहनलालगंज के बालसिंहखेड़ा गांव में एक हैंडपंप के पास क्षत विक्षत पड़ी वह लाश दरिंदगी की सारी कहानी खुद बयान कर रही थी। तब तक जो खबरें आई थीं वह यह कि उसी दिन उस इलाके में इस गांव से दस किलोमीटर दूर अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन आनेवाले थे। जाहिर है, पुलिस ने तब तक इस मामले को रफा दफा करने की ही कोशिश की होगी, जब तक कि क्लिंटन वापस न चले जाते। लेकिन मोहनलालगंज का मौका-ए-वारदात पर मौजूद लोगों की दरिंदगी उनसे कम नहीं थी जिन्होंंने उस नौजवान महिला के साथ इतना वीभत्स व्यवहार किया था।

मौका-ए-वारदात पर पुलिस पुरी तरह से नग्न अवस्था में लहुलुहान पड़ी थी। उत्तर प्रदेश पुलिस को सूचना स्थानीय ग्राम प्रधान ने दी। तब तक निश्चित रूप से गांव के

Jul

18

2014

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बचपन पर बुरी नजर

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खैर, इसी स्कूल की एक ब्रांच कुंदानाहल्ली में भी है. हर दिन की तरह सभी बच्चे स्कूल गये और स्कूल से घर लौट आये. लेकिन उन्हीं सब हज़ारों बच्चों में से एक बच्ची थी जो 3:30 बजे (स्कूल छूटने का समय) की बजाय, 1:00 बजे ही घर पर छोड़ दी गयी. बच्ची ने घर आकर जब अपने निजी अंगों में दर्द की शिकायत की तो अभिभावक डाक्टर के पास लेकर भागे. डाक्टर बच्ची को चैक करने के बाद बताता है कि बच्ची को शारीरिक तौर पर एब्यूज़ किया गया है और रिपोर्ट आती है कि बलात्कार एक नहीं दो लोगों ने किया है.

जिस स्कूल में सैकड़ों-हज़ारों बच्चे पढ़ते हैं उसके टीचर्स प्रिंसिपल क्या दिन में पंखा झेलते हैं, जो उनके स्कूल में थर्ड फ्लोर पर बंद कमरे में हो रही घटना का उन्हें पता नहीं चलता. ऊपर से अभिभावक के साथ खड़े होने की बजाय वो उन स्पोर्ट्स टीचर्स का बचाव करते हैं, जिन्होंने छ: साल की बच्ची का मुंह बंद कर नोच-नोच कर गटक गये उसका बचपन. जब महिलाएं सुरक्षित नहीं तो ये फूल-सी बच्चियां भला कैसे सुरक्षित रह सकती हैं. महिलाएं और बच्चे दुनियां के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं. यदि कोई जगह सुरक्षित है तो

Jul

18

2014

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वैदिक प्रकरण से सीखें पत्रकार

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डॉ. वैदिक ने खुद पर उठ रहे सवालों के जवाब भी ऐसे दिए मानो वे अभी पत्रकारिता में पढ़ाई के दौर से गुजर रहे हों| मान भी लिया जाए कि डॉ. वैदिक ने बतौर पत्रकार आतंकी हाफिज सईद से मुलाक़ात की तो उस मुलाक़ात की खबर या इंटरव्यू कहां है? फिर यदि उन्होंने मुंबई हमलों में वांछित और अमेरिका द्वारा विश्व के दुर्दांत आतंकियों में शुमार हाफिज सईद से मुलाक़ात की तो उनकी यह भेंट किसने करवाई? सभी जानते हैं कि हाफिज सईद को पाकिस्तान में उच्चस्तरीय सुरक्षा प्राप्त है| कहा जाता है कि उसकी सुरक्षा पाकिस्तान के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी कड़ी है और बिना आईएसआई के उच्चाधिकारियों की अनुमति के उससे कोई नहीं मिल सकता| फिर पाकिस्तान के उच्चायोग को भी इस मुलाक़ात की भनक न होगा डॉ. वैदिक के प्रति संदेह उत्पन्न करता है| डॉ. वैदिक से एक गलती यह भी हुई कि उन्होंने अपनी इस मुलाक़ात को अपने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के साथियों द्वारा पहले तो महिमामंडित करवाया और जब इसपर उनकी छीछालेदर होने लगी तो उन्होंने अपने उसी रूप को प्रस्तुत करना शुरू किया जिसके लिए वे कई दशकों से कुख्यात रहे हैं|

अपनी आत्मप्रशंसा सुनने के आदी डॉ. वैदिक ने पत्रकारिता तो यूं भी

Jul

15

2014

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वैदिक वैदिक वेद प्रतापा

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क्योंकि, वैदिक जी के किसी लेख में कोई बहुत विश्लेषण या ऐसा कुछ तथ्य भी नहीं होता जिससे कम से कम मेरे जैसा अल्पबुद्धि वाला पत्रकार थोड़ा बहुत अपनी बुद्धि में वृद्धि की संभावना तलाश पाता। इसलिए मैंने उसे स्पैम किया और धीरे-धीरे उस विश्वव्यापी वैदिक गंध से मुझे मुक्ति मिल गई। वैदिक जी की अपार क्षमता का मैं अंदाजा भी नहीं लगा पाता अगर वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल की फेसबुक वॉल पर ये लाइनें उनके बारे में न पढ़ीं होतीं।

हर पत्रकार को अपना अनुभव जरूर लिखना चाहिए। लेकिन यह काम वे करें तो ज्यादा बेहतर हैं जिनके अनुभव का पिटारा भर चुका है। और इसके लिए सबसे उपयुक्त व्यक्ति हैं श्रीमान वेदप्रताप वैदिक जी। भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सरकार किसी की रहे वे सबकी आँखों के तारे बने ही रहते हैं। उनकी प्रतिभा के बारे में भाई शेष नारायण सिंह
ी चुके
हैं।

मैं जब पत्रकारिता का कखग सीख रहा था तब भी वैदिक जी आसमान के सितारे थे और आज भी हैं। वे एक ही सांस में मुलायम सिंह यादव, लालकृष्ण आडवाणी और स्वर्गीय ज्योति वसु को श्रीकृष्ण का अवतार बता चुके हैं। वे हर किसी से मिल सकते हैं और हर कोई

Jul

14

2014

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हाफिज से मिलकर बुरे फंसे वैदिक जी

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हाल की अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान वैदिक जी लाहौर के मुदिरके पहुंच गये। वही मुदिरके जो हाफिज सईद का घर और दफ्तर है। वही हाफिज सईद जो भारत में आतंकवादी गतिविधियों का अक्सर मास्टरमाइंड होता है और जिसके सिर पर मुंबई में हमला करवाने का संगीन आरोप है। लेकिन वैदिक जी सख्त सुरक्षा व्यवस्था में मुदिरके हो आये। हाफिज सईद से मिले। बातचीत की। और लौटकर भारत आये तो खुद ही पत्रकारों को संपर्क करके यह सूचना और फोटो सार्वजनिक करनी शुरू कर दी कि देखो, वे हाफिज सईद से मिलकर आ रहे हैं। जिन पत्रकारों को उन्होंने यह बात बताई उनमें से एक, आदित्यराज कौल ने वह फोटो ट्विटर पर शेयर कर दी यह कहते हुए कि हाफिज सईद से मिलकर उन्होंने अच्छा महसूस किया। (ही सेज दैट ही फेल्ट गुड)।

सोशल मीडिया के बाहर बात फैली तो मुख्यधारा की मीडिया ने खबर बना दिया। समाचार चैनलों ने हाफिज से मेल मुलाकात का विवरण लेना शुरू कर दिया। हालांकि अब वैदिक जी उतना खुलकर नहीं बोल रहे थे जितना पत्रकारों से निजी बातचीत में कहकहा लगा रहे थे लेकिन फिर भी उन्होंने टीवी चैनलों पर भी विवरण देने में कोई कोताही नहीं की। थोड़ी कतर व्यौंत के साथ

Jul

12

2014

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साईं पर शंकर संग्राम

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तेरहवीं शताब्दी में माधवाचार्य ने इस क्षेत्र के जिन षड-दर्शनों की चर्चा की है उन में से तीन आस्तिक दर्शन शैव, अर्थात शिव के उपासक, शाक्त अर्थात शक्ति [देवी] के उपासक और वैष्णव अर्थात विष्णु के अवतारों को मानने वाले आते थे। उसी समय के तीन नास्तिक दर्शनों में जैन, बौद्ध, और चार्वाक के दर्शन को मानने वाले भी बड़ी संख्या में थे। बाद के काल में शैव, शाक्त, और वैष्णव हिन्दू के नाम से पहचाने गये। मुगल काल में औरंगजेब जैसे कुछ कट्टर शासकों के समय इन तीन भिन्न दर्शनों के मध्य समीपता बढी, जिसका दुरुपयोग कर अंग्रेजों ने भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान ‘डिवाइड एंड रूल’ नीति के अनुरूप हिन्दू मुस्लिम टकराव को बढा कर किया।

लोकतंत्र आने के बाद यही समूह वोट बैंक की राजनीति के काम आने लगे और कुछ राजनीतिक दलों ने अपने स्वार्थ के कारण इस टकराव को बढाया तो दूसरे राजनीतिक दलों ने इससे पैदा हुयी स्थिति का स्वाभाविक लाभ उठाया। इसके परिणाम स्वरूप राजनीति में साम्प्रदायिकता को दूर रखने की सोच वाले दल और संगठन हाशिये पर जाते रहे। इन दिनों साम्प्रदायिक आधार पर राजनीतिक संगठन विकसित करने वाला दल इस विभाजन का चुनावी लाभ लेकर देश में सत्तारूढ है, और जहाँ

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
S Rajen Todariya

S Rajen Todariya

लंबे समय से पत्रकारिता में सक्रिय एस राजेन टोडरिया दैनिक भास्कर में बतौर स्थानीय संपादक काम कर चुके हैं। इस वक्त देहरादून से प्रकाशित पाक्षिक पत्रिका जनपक्ष टुडे के प्रधान संपादक हैं।
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

Rajesh Singh

मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

Abhishek Singh

अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।