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Oct

31

2014

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अजय नाथ झा के साथ वो आखिरी शाम

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अजय नाथ झा के साथ वो आखिरी शाम

‘मीडिया का हाल मुझसे ज्यादा और पहले से आप जानते हैं, अब आपके जमाने का मीडिया (उसूलों वाला) कहां रह गया है! हर उस्ताद अपने चमचे/ चेले/ चंपू को संपादक बनाने में जुटा है। भले ही चमचे को अपने मुंह पर चिपकी झूठन (जूठन) साफ करना न आता हो। कथित उस्ताद मगर उस चमचे को भी सीधे संपादक बनाने के सपने दिखाने से बाज नहीं आते हैं। मौजूदा मीडिया का हाल वही है, अंधा बांटै रेवड़ी, बार-बार अपने को दे, ऐसे टॉपिक पर आप सवाल करके मेरे मुंह से आग क्यों उगलवाना चाह रहे हैं?’ मेरा जबाब सुनते ही खुलकर हंसे और मेरी पीठ पर जोर से थपकी मारी। टहलने के क्रम में तेज-तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे।

करीब एक घंटे टहलने के दौरान और भी तमाम बतातें हुई। मैं पसीने से तर-ब-तर होकर जब अपनी स्पीड कम करने लगा, तो बोले - ‘बस बाबा...हांफने लगे। अभी तुम्हारी उम्र ही क्या है। तुमने दुनिया में देखा ही कहां है। संजीव तेरा वजन बहुत बढ़ने लगा है। इंसान की खुशहाल जिंदगी में मोटापा तमाम बीमारियों का रास्ता बनाता है। तुरंत अपना वजन कम कर..वरना यह ठीक नहीं होगा  तेरे लिए और बहू और मेरी बच्चियों के लिए भी

Oct

31

2014

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इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद

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इस्लाम ज़िन्दा होता है हर कर्बला के बाद

कर्बला के इतिहास मुताबिक़ सन 60 हिजरी को यज़ीद इस्लाम धर्म का ख़लीफ़ा बन बैठा. सन् 61 हिजरी से उसके जनता पर उसके ज़ुल्म बढ़ने लगे. उसने हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के नवासे हज़रत इमाम हुसैन से अपने कुशासन के लिए समर्थन मांगा और जब हज़रत इमाम हुसैन ने इससे इनकार कर दिया, तो उसने इमाम हुसैन को क़त्ल करने का फ़रमान जारी कर दिया. इमाम हुसैन मदीना से सपरिवार कुफ़ा के लिए निकल पडे़, जिनमें उनके ख़ानदान के 123 सदस्य यानी 72 मर्द-औरतें और 51 बच्चे शामिल थे. यज़ीद सेना (40,000 ) ने उन्हें कर्बला के मैदान में ही रोक लिया. सेनापति ने उन्हें यज़ीद की बात मानने के लिए उन पर दबाव बनाया, लेकिन उन्होंने अत्याचारी यज़ीद का समर्थन करने से साफ़ इनकार कर दिया.

हज़रत इमाम हुसैन सत्य और अहिंसा के पक्षधर थे. हज़रत इमाम हुसैन ने इस्लाम धर्म के उसूल, न्याय, धर्म, सत्य, अहिंसा, सदाचार और ईश्वर के प्रति अटूट आस्था को अपने जीवन का आदर्श माना था और वे उन्हीं आदर्शों के मुताबिक़ अपनी ज़िन्दगी गुज़ार थे. यज़ीद ने हज़रत इमाम हुसैन और उनके ख़ानदान के लोगों को तीन दिनों तक भूखा- प्यास रखने के बाद अपनी फ़ौज से शहीद करा दिया. इमाम हुसैन और कर्बला

Oct

31

2014

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खुमैनी होने की शाही खुमारी

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नवाज शरीफ के साथ जामा मस्जिद में सैयद अहमद बुखारी नवाज शरीफ के साथ जामा मस्जिद में सैयद अहमद बुखारी

योजना बनी. मीडिया को इसके बारे में बताया गया और यह मुद्दा बन गया. कई मीडिया वालों को मौका मिल गया यह दिखाने का कि यह प्रधानमंत्री की बेइज्जती है. जबकि बात बहुत ही छोटी सी है. बुखारी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को दावत दें या टिमबक्टू के. देश की सरकार की इच्छा के बिना कोई विदेशी भारत में घुस नहीं सकता है. इतने बड़े मस्जिद के इतने बड़े ईमाम के छोटे से दिमाग में इतनी बात नहीं गई कि सरकार को नाराज करके पाकिस्तान के किसी नेता को वो भारत कैसे आमंत्रित कर सकते हैं. इन्हें भी समझ में नहीं आया कि नवाज शरीफ की दिमागी हालत ईमाम बुखारी की तरह नहीं है. वो वैसे भी नहीं आएंगे और अगर वो भारत आएं तो बिना मोदी से मिले वापस नहीं लौट सकते हैं. ये मामला प्रोटोकॉल का भी है.

वैसे इस “शाही ईमाम” के बारे में मजेदार बात बताता हूं. पूरी दुनिया में जामा मस्जिद अकेली मस्जिद है जहां ईमामत वंश आधारित है. यानि एक ही परिवार के पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है. जामा मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह शाहजहां ने 1656 मे किया. उसने इस बेहतरीन मस्जिद के लायक ईमाम को ढूंढना शुरु किया. इस शानदार

Oct

30

2014

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महाज्ञानी अरनब गोस्वामी

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महाज्ञानी अरनब गोस्वामी

पता नहीं सबेरे सवेरे इनलोगों ने क्या पी रखी थी कि ये मामूली सी बात नहीं समझ सके. कोर्ट ने बस इतना किया कि लिस्ट का सीलबंद लिफाफा एसआईटी को दे दिया. अब पता नहीं कोर्ट ने ऐसा क्यों किया, लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि एसआईटी के पास तीन महीने पहले से ही वो लिस्ट है. जो दलील सरकार दे रही थी वही दलील कोर्ट ने भी दी. सरकार भी लिस्ट में शामिल नामों को उजागर नहीं किया तो सुप्रीम कोर्ट ने भी नाम उजागर करने से मना कर दिया. केजरीवाल को भी सदमा लगा और अरनब भी मुरझा गया. अच्छा होता दोनों मिल कर सुप्रीम कोर्ट के सामने धरने पर बैठ जाते कि नामो की लिस्ट दो.

मुद्दा हाथ से निकल गया. सुप्रीम कोर्ट से आज मशाला नहीं मिल पाया तो अरनब ने फिर से एक घिसे पिटे टापिक को उठाकर अपनी मूर्खता का परिचय दिया. बात का बतंगर बनाने में अरनब गोस्वामी कई हिंदी चैनलों के छुटभैये संपादकों से कही आगे निकल गया है. अरनब ने कल भी इस मुद्दे पर बहस की और आज भी हंगामा खड़ा किया. बात बस इतनी सी है कि हरियाणा के किसी व्यक्ति ने इतना कहा कि स्कूल

Oct

29

2014

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काले धन पर सरकारी कोहरा

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काले धन पर सरकारी कोहरा

चुनाव में काले धन को मुद्दा बनानेवाली बीजेपी के सरकार बना लेने के बाद काले धन को लेकर आशायें जगने लगी थी। इन आशाओं के मध्य यह भी उत्सुकता बनती रही कि आखिर वो कौन लोग है जिनके नाम से काले धन को विदेशों में जमा कराया गया है? जनता के मध्य नाम और रकम को लेकर अबतक तो कुहरे वाली ही स्थिति है। कुछ समय पहले सरकार ने कहा था कि वह 136 लोगों के नाम बतायेगी लेकिन समूचे देशवासियों को उस समय गहरी निराशा हुई जब एनडीए ने मात्र तीन नामों को उजागर किया जिनमें प्रदीप बर्मन, राधा टिम्बलू और पंकज चमनलाल लोढि़या के नाम शामिल हैं। किस्तों में नामों को उजागर करने के पीछे सरकार के चाहे जो तर्क हो लेकिन नाम न उजागर करना कहीं से भी देशहित में नहीं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की कड़ी फटकार के बाद केंद्र सरकार ने कहा है कि वह बुधवार को कोर्ट को ब्लैक मनी खाताधारकों की पूरी लिस्ट सौंप देगी। साथ ही कोर्ट का यह कहना कि ”हम काले धन को वापस लाने का मुद्दा सरकार के भरोसे नहीं छोड़ सकते।“ एक तरह से सरकारी कमजोरी पर सुप्रीम कोर्ट की नकेल ही है।

कुछ सालों पहले काले धन मामले

Oct

27

2014

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बेइज्जत हो गये बिलावल

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लंदन की रैली में बिलावल भुट्टो लंदन की रैली में बिलावल भुट्टो

पाकिस्तान को कश्मीर में विलय के समर्थकों ने यह आयोजन किया था। किंतु उन्हें क्या पता था कि उनके साथ ऐसा व्यवहार होगा जिसे वे शायद ही भूल पाएंगे। वहां फूलों की जगह अंडे, खाली बोतलें, टमाटर...... तथा जिन्दाबाद की जगह गो बिलावल गो का नारा....। जाहिर है, उनके लिए यह समझना मुश्किल था कि हो क्या रहा है। लेकिन वहां से उल्टे हाथ भागने के अलावा कोई विकल्प ही नहीं था। इसलिए उन्होंने वहां से खिसकने में ही अपनी भलाई समझी।

गनीमत तो यह भी थी कि अपेक्षा के अनुरुप लोग भी नहीं आए। कुछ सौ की संख्या में लोग थे। पहले हजारों लोग एकत्रित हो जाते थे। इस प्रकार यह आयोजन विफल हो गया। बेचारे गुलाम कश्मीर के पूर्व प्रधानमंत्री बैरिस्टर सुल्तान महमूद चौधरी मुंह ताकते रहे और सब कुछ हो गया। वे ही आयोजन के मुखिया थे और उन्हीं की कोई सुनने वाला नही।

तो इसका अर्थ क्या है? स्वयं पाक अधीनस्थ कश्मीर के अंदर का माहौल बदल रहा है, कश्मीर पर पाकिस्तान के प्रति आस्था रखने वालों की सोच में भी अंतर आ रहा है। गुलाम कश्मीर में जब पाकिस्तान से आजादी की आवाज गूंज रही हो तो फिर कश्मीर पर पाकिस्तानी नेताओं की

Oct

26

2014

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पीएम की पीठ पर अंबानी का हाथ

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पीएम की पीठ पर अंबानी का हाथ

वैसे तो यह बहुत सामान्य सी घटना है लेकिन यह सामान्य सी घटना तब बहुत असामान्य संकेत देने लगती है जब मिलनेवाला व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि देश का प्रधानमंत्री हो। उस देश का प्रधानमंत्री जिसके सवा सौ करोड़ लोगों के एक कदम चलने से देश सवा सौ साल आगे चले जाने का विश्वास जताता हो। लेकिन शनिवार को जो नजारा दिखा उससे एकबारगी लगा कि सवा सौ करोड़ लोगोंं का सर्वोच्च प्रशासनिक व्यक्ति अगर देश का प्रधानमंत्री है उस प्रशासनिक व्यक्ति की पीठ पर एक सर्वोच्च उद्योगपति का हाथ पहुंच सकता है। न सिर्फ व्यावहारिक तौर पर बल्कि प्रोटोकॉल के लिहाज से भी यह मुकेश अंबानी द्वारा प्रधानमंत्री पद की गरिमा का अपमान है।

मुकेश अंबानी प्रधानमंत्री मोदी से जहां मिले वह सार्वजनिक स्थल था, उनकी निजी बैठक नहीं जहां कि वे प्रधानमंत्री मोदी से अपने निजी रिश्तों को इस तरह सार्वजनिक करने लगते मानों वे प्रधानमंत्री से ज्यादा बड़ी हैसियत रखते हों। याद करिए मनमोहन सिंह का अमेरिका दौरा और उस दौरे के दौरान राष्ट्रपति बराक ओबामा से मुलाकात। उस मुलाकात के दौरान भी बराक ओबामा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पीठ पर हाथ रख दिया था। बराक ओबामा की इस हरकत का कूटनीतिक दुनिया में कई अर्थ

Oct

26

2014

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ब्राह्मणवाद बनाम दलित चिंतन का ब्राह्मणवाद

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ब्राह्मणवाद बनाम दलित चिंतन का ब्राह्मणवाद

अगर हम ऐसा होता हुआ मान लें तो अब यहां से एक दूसरी दिक्कत सामने आ रही हैं। सामाजिक न्याय के पैरोकार, लगातार ब्राह्णवाद को गरियाने के साथ "विरासत के ज्ञान" को भी गरिया रहे हैं लेकिन बदले में ज्ञान की कोई बड़ी रेखा खींच पाने में सक्षम नहीं है। यदि उन्हें बड़ी रेखा खींचनी है तो उन्हें सात सुरों के बाद "आठवां सुर" तलाशना होगा, भाषा विज्ञान में उन्हें 36 ध्वनियों के बाद 37वीं ध्वनि" स्थापित करनी होगी। उन्हें "शून्य" से आगे बढ़कर गणित या गणना में कोई अद्भुत चमत्कार कर दिखाना होगा। या फिर सौरमंडल की स्थापित प्रतिस्थापनाओं से आगे जाकर "ब्राह्मांड की नवस्थापना" करना होगा।

विरासत को खारिज करने के अपने खतरे भी बहुत ही विकट हैं। यदि हम स्थापित ज्ञान को खारिज कर देते हैं, अस्वीकार कर देते हैं तो हमारे सामने वो "आधार" नहीं रह जाते जिनके सहारे हम ज्ञान के नए मानक तलाश कर दे पाएं। यह कैसे संभव है कि "शून्य" को अस्वीकार कर कोई गणितज्ञ नई स्थापना या गणना कर दिखाए? यह कैसे संभव है कि संगीत का कोई "नया कंपोजिशन" सात स्वरों के बिना ही हो जाए? यह कैसे मुमकिन होगा कि स्वर विज्ञान में बिना 36 ध्वनियों को मानें 37वीं

Oct

22

2014

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दीये का दर्द बाती की बेबसी

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दीये का दर्द बाती की बेबसी

पर आज तो चारों ओर घोर निराशा का साम्राज्य है। अन्धकार स्थापित हो चुका है। ऐसे समय में अन्धेरों से जूझने की आस्था कहां से आये? प्रकाश की किरणों को किस सूरज में ढूंढ़ा जाए? सर्वत्र निराशा का माहौल है। निराशा के इस दौर में आस्था को कैसे पाए? आज दिये सिसक रहें हैं और बाती अपनी बेबसी पर रो रही है। गोदामों में अन्नपूर्णा सड़ रही है लेकिन भूख से मौतें जारी हैं। व्ससनों की आग मे॑ देश के भविष्य को उजाला दिखाया जा रहा है। इन अंधेरों के सौदागरों को पता ही नहीं है कि उनकी मुनाफाखोरी, कालाबाजारी, मिलावटखोरी ने कितने ही घरों के चिरागों को बुझा दिया है। इस मानसिकता का दमन ही दिवाली का उत्सव है। चारो तरफ फैले दिये की रौशनी तले कितना अंधेरा है यह समझने के लिए हमें बस अपने आस-पास निहारने भर की जरूरत है। लाखों-लाखों दीपशिखाएं चुपचाप आवाजें दे रहीं हैं। खुशहाली में सराबोर यह त्योहार लाखों आंसुओं में डूबा हुआ है। इस देश में दर्जनों की संख्या में बहू को, पहली ही दीपावली में, दहेज के नाम पटाखों के हवाले कर दिया जाता है। विडंबना है कि किसी घर से मीठे के डब्बे बासी होने पर फेंके जायेंगे तो कोई

Oct

17

2014

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काले धन पर काला मन

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काले धन पर काला मन

2011 से सुप्रीम कोर्ट वरिष्ठ अधिकवक्ता राम जेठमलानी की शिकायत पर एक विशेष जांच दल (एसआईटी) बनाकर काले धन का पता लगाने की कोशिश कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में जब जब केन्द्र सरकार से जवाब मांगा गया तत्कालीन यूपीए सरकार के प्रतिनिधि (एटार्नी जनरल) ने यही कहा कि नाम सार्वजनिक कर पाना संभव नहीं है। तत्कालीन केन्द्र सरकार का तर्क था कि इसमें मुख्य रूप से दो दिक्कत है। पहली दिक्कत यह है कि जिन देशोंं में भारत के लोगों का बेनामी या अवैध धन जमा है उनसे हम किस आधार पर सूचना मांगे। सूचना सिर्फ उसी व्यक्ति के बारे में मांगी जा सकती है जिसके बारे में भारत सरकार की एजंसियां कोई आर्थिक धोखाधड़ी की जांच कर रही होंं। जब अवैध या बेनामी धन रखनेवाले का नाम ही पता नहीं है तो फिर उसके खिलाफ कार्रवाई किस आधार पर करें। अब अगर केन्द्र सरकार टैक्स हैवेन देशोंं में भारत का काला धन जमा करनेवालोंं का नाम पता पूछने जाए तो वहले से ऐसी संधियां हुई पड़ी हैं कि वे अपने यहां भारतीय मूल के लोगोंं के धन का बखान ही नहीं कर सकते। जाहिर है, केन्द्र सरकार के सामने यह दोहरी मुश्किल थी। यही मुश्किल आज भी है

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Seetaram Yechuri

Seetaram Yechuri

हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
Rajiv Yadav

Rajiv Yadav

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक राजीव दिल्ली स्थित आईआईएमसी से मीडिया में मास्टर डिग्री ले चुके हैं. फिलहाल इलाहाबाद में रहकर मुक्त पत्रकारिता और जनाधिकार के मुद्दों पर सक्रिय कार्य कर रहे हैं. विस्फोट पर लेखन.
Ashok Wankhade

Ashok Wankhade

यवतमाल में पैदा हुए अशोक वानखेडे पढ़ने के लिए इंदौर आये तो पत्रकारिता का कैरियर साथ में लेकर इंदौर से बाहर निकले. फ्री प्रेस जर्नल से पत्रकारिता शुरू करनेवाले अशोक वानखेडे चौथा संसार में काम करने दिल्ली आये तो यहीं के होकर रह गये. करीब पचीस साल के अपने पत्रकारीय कैरियर में अंग्रेजी, हिन्दी और मराठी तीनों भाषाओं के लिए काम किया है. इलेक्ट्रानिक का जमाना आया तो विडियो जर्नलिज्म में भी हाथ आजमाया. अब एक अखबार के राजनीतिक संपादक होने के साथ साथ नये मीडिया को नारा-ए-मस्ताना बनाना चाहते हैं.
Dr. Ashish Vashisth

Dr. Ashish Vashisth

डॉ. आशीष वशिष्ठ लखनऊ में रहनेवाले स्वतंत्र पत्रकार हैं. विभिन्न विषयों पर समसामयिक टिप्पणी और लेखन.
Harsh Vardhan

Harsh Vardhan

हर्षवर्धन टीवी पत्रकार हैं. अमर उजाला में लंबे समय तक काम करने के बाद सीएनबीसी आवाज में काम किया. इस वक्त पी7न्यूज में कार्यरत। बतंगड़ नाम से नियमित ब्लाग भी लिखनेवाले हर्षवर्धन राजनीतिक विश्लेषक के तौर पर स्थापित हैं.
Vinod Upadhyay

Vinod Upadhyay

मूलत: बक्सर बिहार के रहनेवाले विनोद उपाध्याय भोपाल में रहकर पत्रकारिता करते हैं. दैनिक राष्ट्रीय हिन्दी मेल से पत्रकारिता में प्रवेश. वर्तमान में भोपाल से ही प्रकाशित होनेवाले दैनिक अग्निबाण से जुड़े हुए हैं.
Arvind Tripathi

Arvind Tripathi

अरविन्द त्रिपाठी देश के कई बड़े समाचार पत्रों व पत्रिकाओं में काम करने के बाद वर्तमान में दिल्ली से प्रकाशित हो रही "सामना" हिंदी पत्रिका में उत्तर प्रदेश से विशेष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं. साथ ही पानी और पर्यावरण के मुद्दे पर राजेन्द्र सिंह के साथ काम कर रहे हैं.
Sanjeet Tripathi

Sanjeet Tripathi

रायपुर के रहनेवाले संजीत त्रिपाठी वैसे तो प्रिंट मीडिया के लिए ही काम करते हैं लेकिन प्रिंट से ज्यादा आनलाइन मीडिया में सक्रियता. ब्लाग लिखने से लेकर फेसबुक सक्रियता तक संजीत सब जगह नजर आते हैं. आवारा बंजारा नाम से ब्लाग लेखन करनेवाले संजीत फिलहाल रायपुर में एक अखबार के साथ काम कर रहे हैं.
Anushikha Tripathi

Anushikha Tripathi

भोपाल में ही पढ़ाई लिखाई और अब भोपाल में ही रहकर पत्रकारिता. माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से 2011 में पत्रकारिता की डिग्री.
Awesh Tiwari

Awesh Tiwari

मेरे लिए खबरें सिर्फ सूचनाओं को कलमबंद करने का जरिया नहीं है ,ये जरुरी है कि जिनके लिए भी हम खबरें लिख रहे हैं उनको उन ख़बरों से कुछ मिले |पिछले एक दशक से उत्तर भारत के सोन-बिहार -झारखण्ड क्षेत्र में आदिवासी किसानों की बुनियादी समस्याओं ,नक्सलवाद ,विस्थापन ,प्रदूषण और असंतुलित औद्योगीकरण को लेकर की गयी अब तक की रिपोर्टिंग में हमने अपने इस सिद्धांत को जीने की कोशिश की है।
Anshuman Tiwari

Anshuman Tiwari

मूलत: उत्तर प्रदेश के रहनेवाले अंशुमान तिवारी ने आर्थिक पत्रकारिता को हिन्दी में बहुत शुरूआती दौर से देखा समझा है. अमर उजाला कारोबार के लिए काम किया और बाद में दैनिक जागरण समूह से जुड़े. वर्तमान में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ हैं. इसके साथ ही अर्थार्थ नाम से ब्लाग भी लिखते हैं.
Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari

आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
Sanjay Swadesh

Sanjay Swadesh

किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं।
Naresh Sirohi

Naresh Sirohi

महैन्द्र सिंह टिकैत की टीम में शामिल होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन से अपना सार्वजनिक जीवन शुरू करनेवाले नरेश सिरोही अभी भी मूल रूप से किसान आंदोलन से ही जुड़े हुए हैं। स्वदेशी आंदोलन में सक्रियता। संप्रति भाजपा किसान मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष।
Rakesh Sinha

Rakesh Sinha

अकादमिक पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखनेवाले प्रो. राकेश सिन्हा संघ विचारधारा के बीच सक्रिय समानतावादी विचारक हैं. राकेश सिन्हा हिन्दुत्व की प्रखर धारा के पैरोकार हैं. लेकिन ऐसा करने के लिए वे हिंसक विवाद की बजाय अहिसक "संवाद" को अपना जरिया बनाते हैं. इंडिया पॉलिसी फाउण्डेशन के मानद निदेशक के रूप में शोध, अध्ययन और संवाद को आगे बढ़ा रहे हैं.
Virender Singh Chauhan

Virender Singh Chauhan

वीरेंद्र सिंह चौहान एक दशक से अधिक समय तक हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा से जुड़े रहे. दैनिक दिव्य हिमाचल में बतौर उप संपादक और बाद में अमर उजाला और दैनिक ट्रिब्यून में स्टाफ रिपोर्टर के नाते कार्य किया. इस दौरान हरियाणा यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स के प्रदेश अध्यक्ष. सितम्बर 2007 से पत्रकारिता के शिक्षण में. सम्प्रति चौधरी देवी लाल विश्वविद्यालय, सिरसा के पत्रकारिता व जनसंचार विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष.
S N Singh

S N Singh

शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
Rajesh Singh

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मुंबई में रहनेवाले राजेश सिंह मानवाधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार हैं. वर्तमान समय में नागरिक विकल्प नामक पत्रिका का संपादन और मानवाधिकार संस्था का संचालन.
SATISH SINGH

SATISH SINGH

सतीश सिंह वर्तमान में भारतीय स्टेट बैंक में एक अधिकारी के रूप में पटना में कार्यरत हैं और विगत तीन वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान से सत्र 1994-95 में (हिन्दी पत्रकारिता में) स्नात्कोतर डिप्लोमा करने के बाद 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में इनकी सक्रिय भागीदारी रही है।
Abhishek Singh

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अभिषेक रंजन सिंह ने 2007-08 में नई दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की। करियर की शुरूआत सकाल मीडिया गुप्र से किया। इन दिनों दक्षिण एशिया की प्रमुख ब्रॉडकास्ट एजेंसी सीवीबी न्यूज सर्विस में कार्यरत हैं। इसके अलावा विस्फोट सहित देश के प्रमुख हिंदी समाचार पत्र और पत्रिकाओं में समसामयिक मुद्दों पर नियमित लेखन कर रहे हैं।
SANDEEP SINGH

SANDEEP SINGH

सजग युवा पत्रकार व गांधीनगर में रहकर गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय में शोधरत, सिनेमा व रंगमंच को लेकर विशेष हस्तक्षेप, सामाजिक व राजनीतिक मुद्दों पर खास नजर, विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं व वेब पोर्टलों के लिये स्वतंत्र लेखन.
Pranay vikram  Singh

Pranay vikram Singh

श्रमजीवी पत्रकार प्रणव विक्रम सिंह सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर पिछले कई सालों से लेखन कर रहे हैं.
Dhananjay Singh

Dhananjay Singh

सिमटते सिमटते कुल परिचय इतना ही शेष रह गया है कि फिलहाल घुमक्कड़ी, सधुक्कड़ी और हाथ में कलम की लकड़ी। गाजीपुर से काशी हिन्दू विश्वविद्यालय होते हुए देहरादून तक पहुंचे हैं। काम काज बहुत किया अब लिखकर अकाज करते हैं।
A N Sibli

A N Sibli

1993 से हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी के विभिन्न राष्ट्रीय अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन कर रहे अब्दुल नूर सिबली इस वक्त दिल्ली से प्रकाशित हिन्दुस्तान एक्सप्रेस में बतौर ब्यूरो चीफ कार्यरत हैं. विभिन्न वेबसाइटों पर नियमित लेखन.
Prem Shukla

Prem Shukla

मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक.
Puja Shukla

Puja Shukla

पेश से टीवी पत्रकार पूजा शुक्ला धाकड़ लिक्खाड़ हैं. घर परिवार की जिम्मेदारी और टीवी पत्रकारिता के साथ साथ कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल करती हैं. दिल्ली युनिवर्सिटी से पढ़ी लिखी पूजा दिल्ली में ही रहती है.
Rajesh Shukla

Rajesh Shukla

राजेश शुक्ला तो बस राजेश शुक्ला है. कला की समीक्षा के अलावा समाज और राजनीति की भी कलात्मक समीक्षा करने में महारत. मीडिया की मजूरी और कलम की गुलामी के अलावा दुनिया में फक्कड़ी ही पसंद आती है.
Abhishek Shrivastav

Abhishek Shrivastav

अभिषेक श्रीवास्तव के परिचय वाला पन्ना आमतौर पर खाली ही रहता है। खुद अपना कुछ पता नहीं। कोई परिचय नहीं। लेकिन हाथ में कलम और एक अदद कैमरा पकड़ लें तो बहुत सारी छुपी अक्सों को परिचय दे देते हैं। संघर्ष जिन्दगी का संघर्ष नहीं, बल्कि जीने का फलसफा है। स्वतंत्र पत्रकार तो हैं ही।
Arvind Shesh

Arvind Shesh

नास्तिकता और नौकरी दोनों साथ साथ। घोषित तौर पर। बिना किसी हिचक के। परिचय के नाम पर सिर्फ इतना कि जनसत्ता में नौकरी। लेकिन काम के नाम पर बहुत कुछ। खासकर लेखन के क्षेत्र में। मुद्दों को कविता और कहानी की शक्ल तो दे ही देते हैं, कभी कभी कविता और कहानी को भी मुद्दा बना देते हैं। दिल्ली में डेरा, बाकी सब तरफ कलम का घेरा।
Balendu Sharma

Balendu Sharma

माईक्रोसाफ्ट के मोस्ट वैलुएबल प्रोफेशनल पुरस्कार से सम्मानित बालेन्दु दाधीच वेब पोर्टल प्रभासाक्षी के समूह संपादक है. तकनीकि के घोड़े पर हिन्दी की काठी बांधनेवाले बालेन्दु दाधीच केवल तकनीकि के जानकार ही नहीं बेहतरीन पत्रकार भी हैं.