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संकट में सहकार

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अंदाज लगाना मुश्किल होता है कि अमेरिका के गे मूवमेन्ट ने दुनिया के सहकारिता आंदोलन से प्रेरणा ली है कि सहकारिता आंदोलन को अमेरीकी गे मूवमेन्ट का सतरंगी झंडा बहुत प्रिय लगा लेकिन दोनों की निशानी उनका झंडा दिखने में बिल्कुल एक जैसा है। वैसे ही सतरंगी। सात रंग एक दूसरे को छूते हुए। हम इसे अगर इत्तेफाक मान भी लें तो इन दिनों इधर सहकारिता वालों के लिए जो संकट पैदा हुआ है उसके मूल में वही अमेरिका है जो आमतौर पर भारत की हर समस्या के मूल में आमतौर पर बैठा ही रहता है। कुछ समय से सहकारिता की बिल्कुल प्राथमिक ईकाई को नष्ट करने की सरकारी कवायद चल रही है। तृस्तरीय सहकारी प्रणाली में इसका सबसे आधारभूत स्तर इसकी ग्रामीण इकाईयां होती हैं जो कमोबेश देश में 94 हजार के करीब हैं। अब केन्द्र सरकार की एक संस्था की ओर से इन समतियों को भंग करने का सिफारिशी पत्र भेजा गया है। पत्र के बाद सहकारी समितियों में हड़कंप मचा हुआ है और अफवाह भी कि यह सब अमेरिकी कंपनियों के दबाव में किया जा रहा है।

इस अफवाह के पीछे की सच्चाई तो पता नहीं लेकिन अगर सरकार के स्तर पर ग्रामीण सहकारी समितियों को भंग किया जाता है तो इसका दूरगामी फायदा बड़े बैंकों और माइक्रो फाइनेन्सिग के अमेरिकी मॉडल को ही होगा। इसलिए अफवाह को निरा अफवाह समझकर खारिज करना मुश्किल है।

भारत सरकार के राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की ओर से भारत के सभी राज्यों में कार्य करनेवाली सहकारी बैंको और केन्द्रीय सहकारी बैंकों को 22 जुलाई को एक पत्र जारी किया गया और कहा गया कि वे ग्रामीण सहकारी समितियों (बैंकों) को जिला सहकारी बैंक में विलय कर दें। ग्रामीण सहकारी बैंकों की जो पूंजी या शेयरधारिता है वह सब जिला सहकारी बैंक में समाहित कर दिया जाए और ग्रामीण सहकारी समितियां जिला सहकारी समितियों के व्यावसायिक एजेण्ट के बतौर काम करें। कहने और सुनने में ये दो लाइन की बात लगती है। और ऊपरी तौर पर इसमें ऐसा कुछ आपत्तिजनक भी नहीं लगता है कि इस प्रस्ताव का विरोध किया जाए। लेकिन सिर्फ ऊपरी तौर पर। अगर आप सहकारी समितियों का ढांचा समझते हैं तो यह एक लाइन का सुझाव भारत में सहकारी आंदोलन की कमर तोड़ने के लिए पर्याप्त है।

करीब एक सौ दस साल पुराने हो चुके सहकारी आंदोलन की पूछ परख वैसे भी देश में बची नहीं है। समाजवाद के नेहरूवादी स्वर्णकाल के दौरान ही सहकारिता पर जो संकट बढ़ना शुरू हुआ था वह कभी न छंटनेवाले काले घने अंधेरे बादल के रूप में परिवर्तित हो गया है। इसी साल जून में सहकारिता द्वारा दिल्ली में आयोजित किये गये एक जलसे में राष्ट्रपति और कृषि मंत्री दोनों ही आये थे और दोनों ने ही सहकारिता का गुणगान किया था लेकिन खुद सहकारिता के भीतर सहकारिता अब राजनीतिक उठापटक के रूप में ही बची है, शायद। देशभर के सहकारिता आंदोलन की दशा तो पता नहीं लेकिन केन्द्रीय स्तर पर सहकारिता के साथ जितना संपर्क होता है उसमें एक भयावह भ्रम साफ साफ दिखाई देता है। अगर आप देश के एक सामान्य नागरिक हैं तो आपको सालों लग जाएंगे यह समझने में कि सामनेवाला सहकारी आपको समझाना क्या चाहता है? साफ है, जब उन्हें ही समझ नहीं आ रहा है कि समझाना क्या है तो सामनेवाला भला क्या समझ पायेगा? 

पड़ताल के लिए यह लंबा इतिहास हो जाएगा कि देश में सहकारिता आंदोलन की रीढ़ कहां कहां और कब तोड़ी गई। लेकिन सहकारिता आंदोलन की अति राजनीतिकरण भी इसका एक कारण है। शब्दावली और कार्यप्रणाली भी ऐसी हो चली है कि अपनी ही प्रासंगिकता परखने के लिए लंबे चौड़े आयोजन करने पड़ते हैं जिसके बाद भी यह शिकायत बची रह जाती है कि दुनिया ध्यान ही नहीं देती है। समाजवादी नेहरूवाद के दौर में विकसित हुआ जन और धन संसाधन सहकारिता को राजनीति का अखाड़ा बना देता है। और इस अखाड़े में न जाने कब से न जाने किसकी न जाने किससे नूरा कुश्ती चल रही है, और धीरे धीरे सहकारिता आंदोलन सिर्फ समितियों की संख्या गिनने तक सिमटकर रह गया है। अमूल को छोड़ दें तो देश में सहकारिता का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है जिसे उदाहरण बनाकर औद्योगिक पूंजीवाद के सामने विकल्प बनाकर प्रस्तुत किया जा सके। तिस पर, अब उन्हीं सहकारी समितियों को ही खत्म कर देने की सिफारिश पूरे सहकारिता आंदोलन की आत्मा को ही मार देने जैसा प्रयास है।

पता नहीं सहकारी आंदोलन में नैफ्सकोब क्या बला है लेकिन सुब्रमण्यम साहब उसी के चेयरमैन या फिर डायरेक्टर जैसे कुछ थे। उन्हें बहुत जानकारी थी। तेज आदमी लगे। शुक्रवार को देशभर के ग्रामीण सहकारी समितियों के प्रतनिधनियों की दिल्ली में जो बैठक बुलाई गई थी, उसमें वे भी मौजूद थे। जाहिर है उन्होंने नाबार्ड की इस कोशिश को सहकारी समितियों को कमजोर करने की साजिश बताया लेकिन इस साजिश का असली मकसद क्या है? वे कहते हैं कि अगर पैक्स को खत्म कर दिया गया तो सहकारी आंदोलन की तृस्तरीय ढांचा बिखर जाएगा। पैक्स सहकारी आंदोलन का पिलर है। उसे हटा लिया गया तो सहकारी ढांचा चरमराकर गिर जाएगा। अपने सवाल का जवाब तो तब भी नहीं मिला था कि सहकारी समितियों की स्थानीय इकाई को खत्म करने का असली मकसद क्या था लेकिन एक और संकट खड़ा हो गया। अब यह पैक्स क्या बला है? और इसके हटने से सहकारी समतियों को भला क्या नुकसान होनेवाला है। नेशनल कोआपरेटिव यूनियन आफ इंडिया के अध्यक्ष चंद्रपाल सिंह यादव ने बात तो जरूर साफ कर दी लेकिन वे बी पैक्स पैक्स ही लिखते बोलते रहें। पैक्स का मतलब हुआ वही ग्रामीण सहकारी समितियां जिसे अंग्रेजी में विस्तार देकर प्राइमरी एग्रीकल्चर सोसायटी बना दिया गया और इसी प्राइमरी एग्रीकल्चर सोसायटी का संक्षिप्त नाम पैक्स बनाकर पैक कर दिया गया है।

लेकिन पैक्स का नामकरण ही अकेला संकट नहीं है जिस पर आये संकट को समझने के लिए उसके नाम में उलझना पड़ता है। सीसीबी, बीसी, केसीसी, एसटीसीसीएस, ओह ऐसे ऐसे सार संक्षेप की घण्टों दिमाग लगाने के बाद भी समझ पाना मुश्किल की सहकारी साथी अपने किस संकट की बात कर रहा है। ऊपर से पूरा मामला आर्थिक लेन देन से जुड़ा होता है तो वित्तीय विवरणों का बोझ अलग। ऐसा लगता है कि सहकारिता का अपने ही बोझ तले दबकर दम घुट रहा है और ऐसे में कुछ सरकारी और बाहरी प्रयास इसकी ताबूत में आखिरी कील गाड़ने की कोशिशों में भी लगे हुए हैं। सहकारी समितियों के प्रतिनिधि संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष चंद्रसेन यादव वैसे तो बहुत सरल सहज तरीके से अपनी बात कह देते हैं लेकिन अक्सर अपनी बातचीत में वे सहकारी समितियां बनाने को जनता का मौलिक अधिकार बताना नहीं भूलते। संविधान का 97 वां संशोधन उन्हें जुबानी याद है और अपने भाषणों में वे उसका हवाला जरूर देते हैं। लेकिन कोई पलटकर उनसे पूछ ले कि अगर जनता इस मौलिक अधिकार का इस्तेमाल ही न करना चाहे तो?

यादव जी के पास क्या जवाब होगा, यह वे जानें लेकिन देश में सहकारिता आंदोलन जिस तरह से सुप्त अवस्था में चला गया उसके पीछे निश्चित रूप से बाहरी प्रयास कम इसके भीतरी दुर्गुण ज्यादा दोषी रहे होंगे। सहकारिता का जो विकल्प देश की बाजारवादी अर्थव्यवस्था का विकल्प हो सकता था आज उसकी प्राथमिक ईकाई ग्रामीण समितियों को जिला समितियों में विलय करके उनके एजेंट बनने की बात की जा रही है और देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो इस बारे में विरोध तो छोड़िए जानना भी चाहे। वह शायद इसलिए कि देश की जनता सीधे कैश सब्सिडी लेने में ज्यादा यकीन करने लगी है। ग्रामीण सहकारी समितियों का मृतप्राय मॉडल जो अतीत में ही भ्रष्टाचार का दूसरा पर्याय नजर आने लगा था अब उसकी पूंजी पाकर जिला समितियां उनका पुनरुद्धार करना चाहती हैं। इसके पीछे असल में किसका पुनरुद्धार छिपा है इसे समझने के लिए फिर नये सिरे से आर्थिक विशेषज्ञ बनना पड़ेगा लेकिन इतना तय है कि इन "पैक्स" के पैकअप करने से बड़े बैंकों का ग्रामीण इलाकों में बैकअप बहुत मजबूत हो जाएगा और जो वित्तीय कारोबार ये छोटी ग्रामीण सहकारी समितियां अपने बूते कर सकती थीं उसमें बड़े बैंकों, वित्तीय घरानों और माइक्रोफाइनेन्स का कारोबार करनेवाले पूंजीपतियों को पूंजी का नया बाजार मिल जाएगा।

छत्तीसगढ़ सरकार के अधिकारी उमेश मिश्रा
 

वह नौजवान जिसने दिया "सबके साथ सबका विकास'' का नारा

सिर्फ देश में ही नहीं बल्कि विदेश तक में अब इस नारे की धूम हो गयी है। भारत के दौरे पर आये अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन कैरी तक ने कहा है कि वे नरेन्द्र मोदी के उस नारे से बहुत प्रभावित हैं जिन्होंने सबका साथ सबका विकास वाला नारा दिया है। नारा तो प्रभावित करनेवाला है ही लेकिन क्या ये सच है कि यह नारा नरेन्द्र मोदी का ही है? नरेन्द्र मोदी के दिये दो जुमले ऐसे हैं जो सबसे अधिक चर्चा में आये। पहला, अच्छे दिन आनेवाले हैं और दूसरा सबका साथ सबका विकास। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान नरेन्द्र मोदी ने बार बार इन नारों को सार्वजनिक मंच से इस्तेमाल किया तो समझा यही गया कि यह नारा नरेन्द्र मोदी दे रहे हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। कम से कम सबके साथ साथ सबका विकास का नारा नरेन्द्र मोदी ने नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ के एक नौजवान अधिकारी ने दुनिया दिया है। ... Full story

हिन्दी के आंदोलनकारियों को टाइम्स आफ इंडिया ने बताया 'दंगाई'
 

हिन्दी के आंदोलनकारियों को टाइम्स आफ इंडिया ने बताया 'दंगाई'

सिविल सेवा की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता के खिलाफ दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में चल रहे आंदोलन को अंग्रेजी के अखबार टाइम्स आफ इंडिया ने दंगा करार दे दिया है। टाइम्स आफ इंडिया के आनलाइन संस्करण में मुखर्जी नगर के आंदोलन को दंगा करार देते हुए टाइम्स आफ इंडिया लिखता है "सिविल सर्विसेज की तैयारी करनेवाले छात्र दंगाई बन गये हैं।'' स्टोरी में टाइम्स आफ इंडिया आगे लिखता है कि "बुधवार की रात मुखर्जी नगर और तिमारपुर के इलाके में जमकर हंगामा हुआ।" ... Full story

नटवर का मार, सोनिया हुई शिकार
 

नटवर का मार, सोनिया हुई शिकार

खांटी कांग्रेसी नटवर सिंह ने कांग्रेस का मतलब ही गांधी परिवार के उस मर्म पर हमला किया है, जहां से खड़ा होने के लिये गांधी परिवार को ही व्यूहरचना करनी होगी। छाती पर शहीदी तमगा और विचार के तौर पर त्याग का मुकुट लगाकर ही सोनिया गांधी ने कांग्रेस को खडा किया। सत्ता तक पहुंचाया लेकिन नटवर सिंह ने जिस तरह राजीव गांधी की हत्या के साथ श्रीलंका को लेकर राजीव गांधी की फेल डिप्लोमेसी और सोनिया गांधी के त्याग के पीछे बेटे राहुल गांधी को मां की मौत का खौफ के होने की बात कही है, उसने गांधी परिवार के उस प्रभाव को भी खत्म किया है। अब तक इसी प्रभाव के आसरे कांग्रेस खड़ी रही है। नटवर ने कांग्रेस की उस राजीनिति में भी सेंध लगा दी है जो बीते दस बरस से तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं की तुलना में सोनिया गांधी को अलग खड़ा करती रही। ... Full story

जग हंसे, 'हंस' रोय
 

जग हंसे, 'हंस' रोय

गुरुवार शाम जब रचना यादव ने कहा कि राजेंद्र यादव के अवदान पर प्रेमचंद जयंती का सालाना जलसा इस बार रखने का पहले पहल आया विचार उन्‍होंने त्‍याग दिया, तो मुझे यह बात ठीक ही जान पड़ी। व्‍यक्ति के बजाय बात मुद्दे पर हो तो बेहतर, जैसा राजेंद्रजी करते आए थे। लेकिन इस विचार में यह कहां लिखा है कि मर चुके व्‍यक्ति को प्रेत की तरह मंच पर अगोरन बनाकर छोड़ दिया जाए? गुरुवार की शाम ऐवान-ए-ग़ालिब सभागार के मंच की दाहिनी तरफ़ जब-जब नज़र गई, ब्‍लैक एंड वाइट फ्रेम में से राजेंद्रजी घूरते नज़र आए। हमारी आंखों को मृत तस्‍वीरों पर मालाओं और अगरबत्तियों की आदत रही है। इनके बिना वह सूना-सादा फ्रेम 31 जुलाई की शाम लगातार सब से कुछ कह रहा था। यादवजी चुपचाप सब कुछ घटता देख रहे थे। ... Full story

सत्ता के बाद संगठन पर दांव
 

सत्ता के बाद संगठन पर दांव

देश के राजनीतिक इतिहास में पहली बार पूर्ण बहुमत से सत्ता में पहुंची भारतीय जनता पार्टी के हौसले बुलंद हैं। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने वह हासिल कर लिया है जो संस्थापक अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में भी हासिल न हो सका था। जाहिर है, देश में भले ही नरेन्द्र मोदी की हैसियत अब प्रधानमंत्री की हो लेकिन बीजेपी के भीतर नरेन्द्र मोदी की हैसियत इससे भी बड़ी हो गयी है। अब वे पार्टी के ऐसे तारणहार है जिनके बिना न तो ऐसी जीत की कल्पना मुश्किल थी, और न ही सत्ता का ऐसा अहर्निष अभियान संभव था। लेकिन क्या मोदी के इस पार्टी प्रेम के इतने ही संकेत हैं कि वे अपनी "मां" को नहीं भूले हैं या फिर बात कुछ और है? अगर मोदी और बीजेपी के बीच मां बेटे का ही प्यार और अपनापन है तो पार्टी के शीर्ष पर कुछ नेता बेचैनी क्यों महसूस कर रहे हैं? ... Full story

महानवासियों ने शुरु किया वन सत्याग्रह
 

महानवासियों ने शुरु किया वन सत्याग्रह

सिंगरौली, मध्यप्रेदश में महान क्षेत्र के 12-14 गांवों के सैकड़ों ग्रामीणों ने महान जंगल में प्रस्तावित खदान के विरोध में अमिलिया में आयोजित महान जंगल बचाओ जनसम्मेलन में हिस्सा लिया। जनसम्मेलन में ग्रामीणों ने वन सत्याग्रह का एलान किया है। पर्यावरण मंत्री वीरप्पा मोईली द्वारा महान कोल लिमिटेड को दिए गए दूसरे चरण के क्लियरेंस के बाद आयोजित इस जनसम्मेलन में ग्रामीणों ने इस क्लियरेंस को अमान्य करार दिया। उन्होंने उस विशेष ग्राम सभा में वनाधिकार कानून पर पारित प्रस्ताव के फर्जी होने के सबूत दिए जिसके आधार पर दूसरे चरण का क्लियरेंस दिया गया है। ... Full story

न्यूज एक्सप्रेस के प्रसून शुक्ला
 

कमाल करेंगे कापड़ी जी!

तीन साल पहले जब न्यूज एक्सप्रेस की शुरूआत की गई थी उस वक्त कहा गया था कि देखते हैं कि अब ये क्या कमाल करते हैं। आमतौर पर मीडिया उद्योग में, खासकर हिन्दी मीडिया जगत में जब कोई नया चैनल लांच होता है तो इसी तरह की टिप्पणी दी जाती है। नौकरीपेशा पत्रकारों की थोड़ी बहुत आवाजाही और फिर कुछ दिनों बाद सबकुछ रूटीन का काम बनकर रह जाता है। न्यूज एक्सप्रेस के साथ भी कमोबेश ऐसा हुआ। मुकेश कुमार के दावों के मुताबिक चैनल ने संवेदनशील शुरूआत की थी लेकिन जल्द ही उनके असंवेदनशील आर्थिक व्यवहार ने उनके लिए और चैनल के लिए, दोनों के लिए संकट पैदा कर दिया। वे विदा हुए। निशांत चतुर्वेदी आये। चैनल चलता रहा इसी बीच खबर आई कि विनोद कापड़ी ने इंडिया टीवी से इस्तीफा दे दिया है और वे न्यूज एक्स्प्रेस ज्वाइन करने जा रहे हैं। मीडिया जगत के लिहाज से यह बड़ी खबर थी। बड़ी खबर है। इंडिया टीवी जैसे स्थापित ब्रांड से परे मीडिया मार्केट में मजबूती की तलाश करते न्यूज एक्सप्रेस को गति देने के लिए साईं प्रसाद मीडिया समूह को कापड़ी जैसे नाम की ही शायद जरूरत भी थी। लेकिन क्या कापड़ी जी वही कमाल यहां भी कर पायेंगे जो उन्होंने इंडिया टीवी में किया? ऐसे और भी बहुत सारे सवालों के साथ हमने मुलाकात की प्रसून शुक्ला से, जो साईं प्रसाद मीडिया समूह के न्यूज निदेशक होने के साथ साथ मीडिया समूह के लिए आधिकारिक प्रवक्ता भी हैं। ... Full story

चुनाव प्रचार के दौरान लखनऊ रैली में बोलते हुए नरेन्द्र मोदी
 

सुनामी बना मोदी का नाम

बनारस में नामांकन करने जब नरेन्द्र मोदी पहुंचे थे तब अमित शाह ने कहा था कि देश में मोदी लहर नहीं, मोदी नाम की सुनामी है। उत्तर प्रदेश के प्रभारी और नरेन्द्र मोदी के नंबर दो अमित शाह ने जब यह बयान दिया था, उसे उनकी स्वाभाविक स्वामिभक्ति समझा गया था। लेकिन शायद ऐसा नहीं था। अब जब दोपहर 1.00 बजे तक लोकसभा के 543 सीटों में 535 लोकसभा सीटों के रुझान आधिकारिक रूप से सामने आ चुके हैं तब कहा जा सकता है, कि अमित शाह ने सही कहा था। देश में नरेन्द्र मोदी नाम की एक सुनामी चली जिसमें न सिर्फ कांग्रेस बल्कि वे सारे दल तिनके की तरह उड़ गये जो मोदी विरोध में खड़े थे। ... Full story

 
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अर्थ अनर्थ

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Sanjay Tiwari

Sanjay Tiwari आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वहां तक काम करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. visfot@visfot.com
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