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अंधो की रतनजोत

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केन्द्रीय मंत्रियों की एक टोली कृषिमंत्री शरद पवार की सदारत में एक योजना बना रही है. इस योजना के तहत देश की एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर भूमि पर

जैव ईंधन वाली फसलें उगायी जाएंगी. सन 2017 तक जैव ईंधन परिवहन की 10 प्रतिशत मांग पूरी कर सकेगा. दावा है कि जैव ईंधन से पर्यावरण और परिवेश दोनों की रक्षा होगी. देवेन्द्र शर्मा से पूछा कि जैव ईंधन उगायेंगे यानी क्या तो उन्होंने बताया कि जट्रोफा उगाएंगे. अब साफ समझ में आया कि साल भर पहले राजस्थान के किसानों ने जो शिकायत की थी कि उन्हें रतनजोत उगाने के लिए धमकाया जा रहा है तो उसका अर्थ क्या है. रतनजोत से जितना फायदा हो सकता है वह अनाज की पैदावार से कहां हो सकता है? रतनजोत उगाओ खूब पैसा कमाओ. पैसे से अनाज खरीदो और पेटभर खाओ.

हमारे कृषिमंत्री की अगुवाई में हमारे मंत्रियों ने एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर भूमि पर जैव ईंधन उगाने की योजना ऐसे वक्त में बनाई है जब देश में गेंहू, चावल, दलहन और तिलहन की पैदावार घटी है. आर्थिक सर्वेक्षण कह रहा है कि 90-91 में अनाज की प्रति व्यक्ति खपत 468 ग्राम थी जो 2005-06 में घटकर 412 ग्राम हो गयी है. सन 56-57 में दालों की प्रति व्यक्ति खपत 72 ग्राम हुआ करती थी जो अब 33 ग्राम रह गयी है. इसका मतलब लोगों को खाने का उतना अनाज नहीं मिल पा रहा है जितना 50-55 साल पहले मिलता था. पिछले सत्रह साल में अनाज की पैदावार तो 1.2 प्रतिशत बढ़ी है लेकिन आबादी 1.9 प्रतिशत की दर से बढ़ी है. अनाज की कमी तो होगी ही और मंहगाई भी बढ़ेगी.

दुनिया की ओर देखो तो पता चलता है कि पेट्रोल की बढ़ती कीमतों से पार पाने के लिए यूरोप और अमेरिका में जैव ईंधन की खेती पर जोर दिया गया. किसानों ने अपने लिए अनाज उगाना छोड़ गाड़ियों के लिए पैदावार शुरू कर दी. इसका नतीजा यह हुआ कि गेंहू उगानेवाले अमेरिका में गेहूं की कमी हो गयी. यूरोप में भी अनाज की कमी हुई तो मंहगाई बढ़ गयी. सन 2006-2008 में गेंहूं के दाम 180 प्रतिशत ऊंचे उठ गये. विश्वबैंक और आईएमएफ ने भी अपनी चिंता जाहिर कर दी है. कई विशेषज्ञों का मानना है कि मंहगाई का यह दौर अगले साल भी जारी रहेगा. लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के कई देशों में अनाज के लिए दंगे हुए हैं. बांग्लादेश में तो हुए ही हैं. पाकिस्तान में अनाज के गोदामों की रक्षा सेना के हाथ है. तेल मंहगा होने के नाते अनाज की जहाजों से ढुलाई इतनी मंहगी हो गयी है कि अनुदान देनेवाली एजंसियों के बजट गड़बड़ा गये हैं.

जैव ईंधन की खेती की सबसे बड़ी सफलता ब्राजील के नाम है. ईंधन में ऐथेनाल की मिलावट ने पेट्रोल की खपत को काफी हद तक कम किया है. लेकिन ऐसा करने में ब्राजील के अमेजान के बरसाती जंगल काट डाले गये हैं. ये जंगल वातावरण में छोड़े गये कार्बन डाई आक्साईड को जब्त करते थे. इन जंगलों को काटकर जैव ईंधन पैदा करने का मतलब है एक हाथ पाया तो दूसरे हाथ से गंवाया. यानी हिसाब बराबर हो गया. इसलिए विश्वबैंक और दूसरी अंतरराष्ट्रीय एजंसियां कह रही हैं कि जब तक खेती का ध्यान वापस अनाज पैदा करने पर नहीं लगाया जाता तब तक संसार को इस संकट से नहीं बचाया जा सकता. ऐसी स्थिति में अपने कृषि मंत्री और उनकी टोली की दाद देनी चाहिए कि वे पूरे एक करोड़ बीस लाख हेक्टेयर जमीन पर जैव ईंधन की खेती की योजना बना रहे हैं. यह सब ऐसे देश में हो रहा है जहां रकबा और पैदावार दोनों घट रही है. इन्हें वाहनों को सस्ता ईंधन दिलवाना है लेकिन लेकिन गरीबों के पेट को सस्ते अनाज से भरपूर भरने की अनिवार्यता इन्हें नहीं दिखती.

भारत में जो अनाज और मंहगाई का संकट है उसका दुनिया के कारण नहीं है. यह ग्लोबल फेनामिना नहीं बल्कि पिछले सत्रह साल में अपनाई गयी आर्थिक नीतियों का भयावह नतीजा है. विश्वबैंक तो अब मान रहा है कि विकास की जरूरत के नाते खेती से ध्यान हटाना ठीक नहीं था और सही संतुलन कायम किये बिना स्थिति नहीं सुधरेगी. देश के ग्रोथ उग्रवादियों को खेती की सुस्त चाल पसंद नहीं थी क्योंकि उन्हें 9-10 प्रतिशत का ग्रोथ चाहिए था. आज भी ग्रोथ उग्रवादी इतनी मंहगाई और संकट के बावजूद ग्रोथ को गिरने नहीं देना चाहते भले ही गरीबों का जीना मुहाल हो जाए. ऐसे में हमारे बेचारे मंत्री रतनजोत की खेती की योजना बना रहे हैं. अमेरिका से मिले चाहे यूरोप से. अंधों की यही रजनजोत है. भविष्य में भूखे पेटों को सस्ता अनाज नहीं बल्कि कारों को सस्ता पेट्रोल मिलना ही चाहिए.

जनसत्ता, 19 अप्रैल 2008

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image प्रभाष जोशी वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी अंग्रेजी पत्रकारिता से हिन्दी में आये. जनसत्ता को शिखर पर ले जाने वाले संपादक के रूप में प्रभाष जी का काम हिन्दी पत्रकारिता में मीलपत्थर है. पत्रकारिता के जाने-माने हस्ताक्षर जो अब हमारे बीच नहीं है.
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