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सूखे सर होंगे तर

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image बुन्देलखण्ड में तालाबों के पुनर्जीवन का काम शुरू हो रहा है

आदमी के माथे की गाद हट जाए तो तालाब की गाद साफ होते देर नहीं लगती. बुन्देलखण्ड में जगह-जगह तालाबों के पुनर्जीवन का अभियान जोर पकड़ रहा है.

माथे की गाद हटी तो तालाब चमककर आंचल पसारे पानी धारण करने के लिए फिर से तैयार हो रहे हैं. महोबा का चरखारी तालाबों के आंचल में सिमटा कस्बा है. लेकिन समय बीता तो तालाब के आंचल मटमैले हो गये. इसकी कीमत चरखारी को भी चुकानी पड़ी. लेकिन अब चरखारी के आस-पास के मलखान सागर, जयसागर रपट तलैया, गोलाघाट तालाब, सुरम्य कोठी तालाब, रतन सागर, टोला ताल, देहुलिया तालाब, मंडना और गुमान बिहारी जैसे तालाब चमककर निखरने लगे हैं. चरखारी में तालाबों की सफाई का यह काम समाज अपने से कर रहा है क्योंकि सूखे की मार सरकार पर नहीं समाज पर है. बात फैली तो संचित सहयोग की भावना हिलोरे मारकर जागृत हो गयी. आसपास के लोगों ने सुना कि तालाब की गाद साफ हो रही है तो जालौन, हमीरपुर, बांदा, चित्रकूट, महोबा और झांसी के लोग भी यहां श्रमदान करने आये.

पानी का पुनरोत्थान हो सकता है? शायद व्याकरण के लिहाज से यह थोड़ा अटपटा लगे लेकिन बुन्देलखण्ड में आज का व्यावहारिक व्याकरण यही है. पानी को बाजार से मुक्त कराने और समाज को पानी का हक दिलाने के लिए पुष्पेन्द्र भाई ने पानी पुनरोत्थान पहल की शुरूआत की है. वे बताते हैं-"हां यह पानी का पुनरोत्थान ही है. बाजार पानी छीनना चाहता है. उस पर अपना कब्जा जमाना चाहता है. इसे रोकने के लिए हमने नवयुवकों की एक टोली बनाई है. ये बुन्देली जल प्रहरी पानी बचाएंगे. उसका पुनरोत्थान करेंगे." अरविन्द सिंह चरखारी नगरपालिका से जुड़े हैं. इस तालाब सफाई अभियान को चलाये रखने में उनका बड़ा योगदान है. वे बताते हैं-"तालाब तो हमेशा से साझी धरोहर रही हैं. यह तो समय और सरकार ने तालाबों को निजी संपत्ति में बदल दिया. यह पुनः समाज के हाथ में वापस जाए इसके लिए समाज को जागरूक करने की जरूरत है."

पुष्पेन्द्र भाई केवल चरखारी तक ही अपना अभियान नहीं रखना चाहते. वे पूरे बुन्देलखण्ड के तालाबों का पुनरूत्थान करना चाहते हैं. इस काम में समाज जुटे और इसे अपना काम समझकर इसमें शामिल हो जाए इसके लिए उनके जैसे लोग कई स्तरों पर कोशिश कर रहे हैं.इनमें सर्वोदय सेवा आश्रम के अभिमन्यु सिंह, राजस्थान लोक सेवा आयोग की नौकरी छोड़कर आये प्रेम सिंह, लोकन्द्र भाई, डॉ भारतेन्दु प्रकाश और सरकारी नुमांईदे सरदार प्यारा सिंह जैसे लोग भी हैं जो बुन्देलखण्ड को उसका गौरव पानी उसे वापिस दिलाना चाहते हैं. 

छतरपुर (मध्य प्रदेश) जिले में तालाबों की सफाई का अभियान जोरों पर है. छतरपुर नगरपालिका के अध्यक्ष सरदार प्यारा सिंह ने तालाबों की सफाई का जिम्मा अपने हिस्से ले लिया है. वे बताते हैं "छतरपुर में ग्वाल मगरा, प्रताप सागर, रानी तलैया, किशोर सागर जैसे कई तालाब हैं. मैंने संकल्प लिया है कि अपना कार्यकाल खत्म होने के पहले इन सारे तालाबों की सफाई पूरी कराऊंगा."  कुछ इसी तरह का संकल्प लोकेन्द्र भाई का भी है. वे झांसी से हैं और बिनोबा भावे के सर्वोदय सत्याग्रह से जुड़े रहे हैं. उन्होंने अपने घर बिजना को केन्द्र बनाकर 25 किलोमीटर के दायरे में जो कुएं और तालाब बनवाएं हैं वे इस भयंकर सूखे के दौर में भी लोगों को तर कर रहे हैं. लोकेन्द्र भाई पानी तलाशने की उस परंपरागत तकनीकि के बारे में भी बताते हैं जिसके सहारे यह समाज हमेशा पानीदार बना रहा है. वे कहते हैं कि मेंहन्दी की लकड़ी, अरहड़ की झाड़ या बेंत के माध्यम से पानी तलाशना सरल है. बस आपको थोड़ी तपस्या करनी होगी कि इन प्राकृतिक औजारों के भरोसे आप पानी तक कैसे पहुंच सकते हैं. जिन्हें यह पता है वे जानते हैं कि धरती मां के गर्भ में कहां पानी है और कितने गहरे पर है.

सर्वोदय सेवा आश्रम के अभिमन्यु सिंह ने तो पाठा के बड़गड़ क्षेत्र को गोद ही ले लिया है. वे और उनके कार्यकर्ता घूम-घूम कर पानी को बचाने की कोशिशों में लगे रहते हैं. उन्होंने जगह किचेन गार्डेन को भी बढ़ावा दिया है. जिसके पौधों की सिंचाई उस पानी से होती है जो बेकार समझकर बहा दिया जाता है. प्रेम सिंह तो सरकारी नौकरी  छोड़कर आये हैं. अब रूखे-सूखे बुन्देलखण्ड में वे पानी और खेती दोनों को नयी ताकत देने की कोशिश कर रहे हैं. देर से ही सही बुन्देलखण्ड अपने हिस्से का पानी संजोने में जुट गया है. हो सकता है जल्द ही उसे इसका प्रसाद भी मिलने लगे.

(आशीष कुमार सोपानस्टेप के संवाददाता हैं. ashishkumaranshu@gmail.com)      

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abhishek on 25 May, 2008 17:07;01
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इस प्रकार की जानकारी देने के लिए साधुवाद।
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mahendra mishra on 25 May, 2008 17:57;20
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बहुत बढ़िया जानकारी सामूहिक श्रमदान कर बड़ी से बड़ी सफलता प्राप्त की जा सकती है , धन्यवाद
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sanjay on 26 May, 2008 15:25;43
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यह पूरी तस्‍वीर नहीं है. बुंदेलखंड केवल उत्तर प्रदेश का हिससा नहीं है. मप्र वाले बुंदेलखंड के हालात बदतर हैं. केंद्र सरकार ने राहत के नाम पर एक कौड़ी नहीं दी.लाखों लोग पलायन कर चुके हैं लेकिन राज्‍य सरकार इसे मानने को तैयार नहीं. तालाबों के जीर्णोद्धार की बात करते हैं तो जान लें कि सागर की लाखा बंजारा झील भारत की दूसरी सबसे प्रदूषित झील है. इसके जीर्णोद्धार के लिए केंद्र सरकार ने 22 करोड़ रुपए दिए लेकिन राज्‍य सरकार इस काम को राजनीति का जरिया बना रही है. झील को संवारने का काम अब तक शुरू नहीं हो सका. आशीष कुमार की रिपोर्ट सतही और एकपक्षीय है. सच इससे कहीं ज्‍यादा विद्रूप है. सागर जिले के 400 से ज्‍यादा गांवों में पीने के पानी का संकट है. पंचायतों ने पानी के परिवहन की अनुमति मांगी थी. प्रशासन ने दी... लेकिन सिर्फ 19 पंचायतों को.... अच्‍छा होता यदि रिपोर्ट में कुछ ऐसी सच्‍चाई का समावेश भी किया जाता.
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raja hindustani on 28 May, 2008 14:28;18
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kya sahi likha hai.
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यह रिपोर्ट का संपदित अंश है.
इसलिए आपको मुश्किल हुई.
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image आशीष कुमार बेतिया से पढ़ना शुरू किया और दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ ली. दसवीं कक्षा पहुंचने तक आधा दर्जन स्कूलों को नाप चुके आशीष कुमार 'अंशु' आजकल एक घुमंतू पत्रकार के तौर पर देश को नाप रहे हैं. लिखते-पढ़ते स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं और सोपानस्टेप के लिए घूमते-फिरते कार्यरत भी हैं.
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