Home | कारपोरेट मीडिया | खबर न दिखाने की आम-सहमति

खबर न दिखाने की आम-सहमति

Font size: Decrease font Enlarge font 9872
image नोएडा फिल्म सिटी में लगभग सारे समाचार चैनलों के दफ्तर हैं

किसी समाचार चैनल को देखते हुए मन में एक सवाल आता है कि आम लोगों से सरोकार के बगैर भी क्या चैनल चलाए जा सकते हैं?

जो खबरों से हटकर दिखाया जा रहा है उसका अर्थशास्त्र तो चैनलों ने साफ बता दिया है कि दर्शक जो देखना चाहते हैं वही दिखाया जा रहा है. क्योंकि विज्ञापन उसी आधार पर मिलते हैं. लेकिन मामला न्यूज यानी खबरों का है. इसलिए दिमाग में पत्रकार का चेहरा, उसकी सोच, उसका नजरिया और इन सबके साथ आम आदमी के साथ उसके सरोकार बार-बार इस बात को लेकर सवाल खड़ा करते हैं कि कैसे संभव है किसी पत्रकार का विज्ञापन की पूंजी तले सब कुछ भुला देना.

नब्बे के दशक में जिस वक्त विज्ञापन की पूंजी ने पत्रकारों को लुभाना शुरू किया था, दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग में पत्रकारों का जमघट कमोबेश हर चाय की दुकान पर इस बहस में उलझा रहता था. इस सवाल पर खूब बहस होती थी कि मीडिया का भविष्य क्या होगा? अखबार चल पायेंगे या नहीं? पत्रकारों को कहीं विज्ञापन जुगाड़ने के लिए तो नहीं कहा जाएगा? अखबारों से जुड़े पत्रकारों में यह बहस आज भी जारी है. कह सकते हैं अखबारों में खबरों को लेकर अभी संवेदनशीलता बरकरार है.

लेकिन समाचार चैनलों की जरूरत खबरों के आधार पर आंकी नहीं गयी. सूचना तकनीकि की जरूरत या फिर बाजार के प्रचार-प्रसार का नायाब माध्यम और अखबार की तुलना में कई गुना ज्यादा पूंजी लगाकर कई गुना ज्यादा मुनाफा कमाने की सोच को लेकर हमेशा बहस होती रही. यानी समाचार चैनल में काम करनेवाले खबरों की जगह मुनाफे को लेकर ज्यादा संवेदनशील रहते हैं.

यह सोच कैसे और किस रूप में मौजूद है इसका अहसास नोएडा के फिल्म सिटी में पहुंचकर होता है. बहादुरशाह जफर मार्ग की अखबारी सोच फिल्म सिटी में पहुंचकर कैसे रेंगने लगती है वह यहां घुसते ही अहसास हो जाता है. फिल्म सिटी ही वह जगह है जहां कमोबेश हर न्यूज चैनल का दफ्तर है. जो दिल्ली में हैं उन्हें भी आज-कल में यहीं आना है.

आप जैसे ही फिल्म सिटी में घुसेंगे आपको गाड़ियों की कतार-दर-कतार नजर आयेगी. यहां हर माडल की गाड़ी मिल जाएगी. चैनलों के सुनहले सपनों की इमारतों के सामने गाड़ियां, उनके आगे-पीछे गाड़ियां. किसी पेड़ के नीचे से लेकर अंदर की सड़क को चौराहे में बदलने का काम भी गाड़ियां ही करती हैं. किसी नये समाचार चैनल के खुलते ही पहली बहस अब यही होती है कि इसमें काम करनेवाले अपनी गाड़ी कहां खड़ी करेंगे.

हर चैनल का दफ्तर वातानुकुलित है. टीवी की मशीन ज्यादा संवेदनशील होती हैं इसलिए इनके लिए वातानुकूलन बहुत जरूरी है. तो टीवी के दफ्तर में घुसते ही मौसम की पहचान सबसे पहले खत्म हो जाती है. इसलिए दिल्ली में बेमौसम बारिश की फुहारों से लेकर लू के थपेड़े और सर्दियों में बढ़ती कंपकंपी भी सबसे बड़ी खबर हो सकती है. यह बात दीगर है कि उस मौसम का उसे कतई अहसास भी नहीं होता जिसके बारे में वह बड़ी खबर बनाकर दिखा रहा है. सभी चैनलों में घूम लीजिए. आउटपुट डेस्क पर सभी जगह आपको एक खास तरह की सहमति दिखाई देगी. यह सहमति खबरों को खारिज करने से लेकर खबरों को अपनी सोच के अनुसार दिखाने की प्रवृत्ति तक बनी रहती है.

ऐसा नहीं है कि सभी एक सा जीवन जीते हैं इसलिए यह आम सहमति काम करती है. पत्रकारिता में डिग्री-डिप्लोमा लेकर किसी चैनल में काम पा जाने वाला लड़का अपने साथियों के बीच हीरो होता है. उसके कालेज के साथी नौकरी की तलाश में जब उससे मिलने पहुंचते हैं तो चाय के ठेले पर साथियों से बात करते हुए वह अपने उज्वल भविष्य को लेकर आश्वस्त दिखता है. सीनियर लोगों की बातचीत तीन स्तरों पर होती है. पहला टीआरपी का जुगाड़ में वह खुद कितना माहिर है. दूसरा, वह आनेवाले दिनों में कौन  से नये माडल की गाड़ी लेनेवाला है और तीसरा, क्या वह आनेवाले दिनों में अपना खुद का चैनल प्लान कर सकता है? और संपुट में यह कि अपना चैनल जुगाड़ने के लिए वह क्या-क्या जुगाड़ लगा रहा है.

खबर छोड़ दीजिए. समाज के वर्तमान पर ही चर्चा शुरू हो जाए तो आप झटके में समझ सकते हैं कि टायरों पर दौड़ते चैनलों की जिंदगी और शीशे के पार से समाज की धड़कन महसूस करनेवाले कैसे और क्यों सरोकार रखनेवाली खबरों से दूर हो चुके हैं? यह फिल्म सिटी बंद गली के आखिरी मकान जैसा है जिसमें जहां से आप घुसेंगे वहीं से निकलना भी होगा. यानी आखिर में रास्ता बंद है. (जनसत्ता)  

Subscribe to comments feed Comments (4 posted):

Suresh Chandra Gupta on 28 May, 2008 12:14;18
avatar
आम लोगों से सरोकार इतना तो हमेशा रहेगा कि आम लोग समाचार चैनल देखेंगे और समाचार चैनल इस आधार पर विज्ञापन बटोरेगा. समाचार तो कभी आम लोगों तक पहुँचता ही नहीं. घटना स्थल से ही समाचार एक कहानी बनना शुरू हो जाता है और समाचार चैनल उसे एकता कपूर के सीरिअल जैसा रोचक और अवास्तविक बना कर आम आदमी के सामने परोस देता है. एकता कपूर भी बही पेश करती है जो उसके अनुसार आम आदमी चाहता है, और समाचार चैनल भी यही करता है. आम आदमी बास्तव में चाहता क्या है, यह न तो एकता कपूर जानती है, न ही समाचार चैनल जानता है और न ही आम आदमी. दुकानें अच्छी चल रही हैं सबकी. यही सब चाहते हैं. तकलीफ किस बात की है?
Thumbs Up Thumbs Down
0
munna kumar jha on 29 May, 2008 14:25;02
avatar
srokaar ki baat mat he kijiye pet bhara rahta hai tho baazar baazar chilate sanse nahin thakti aur ajj jab bhukhe hai tho sarokar aur aamaadmi yaad aarahi hai.darsal sarokar aur aam aadmi ke baton ko uthana aur ush par lekh likhna app jaise logo ke liye parshidi aur behti ganga main hath dhone ke saman hai.acha hoga pehle hum aur app tai kare kee saroka aur aam aadmi kaun hai aur hum kiske saath jaana chate hai.dhanyavaad
Thumbs Up Thumbs Down
0
Shashi Singh on 29 May, 2008 14:32;29
avatar
प्रसूनजी, समस्या को कुछ बेहतर शब्दों में बयान भर किया है आपने. कमोबेस सभी जानते हैं रोग क्या है? समाधान के बारे में चर्चा करें में कुछ बात हो, वरना सब बकवास है.
Thumbs Up Thumbs Down
0
somen on 07 September, 2008 19:58;46
avatar
Shashi Singh ka kahna sahi hai.patrakarita ka aaj jo haal hai usse kaun wakif nahi,lekin shuruaat bhi to patrakaaron ko hi karni hogi.shuruaat dalalon ko journalism se bahar karke kijiye.....
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 4 | displaying: 1 - 4

Post your comment comment

Please enter the code you see in the image:

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
visfot news network विस्फोट.कॉम इंटरनेट पर नये दौर की पत्रकारिता में परंपरागत मूल्यों को स्थापित करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है, जो कि पूरी तरह से जनकेन्द्रित, वास्तविक और निहित स्वार्थी तत्वों के प्रभाव से मुक्त है. हमारा संपर्क है visfot@visfot.com
Rate this article
5.00
More from कारपोरेट मीडिया
Previous
image
विकीलीक्स-विकीलीक्स खेल रहे हैं मीडिया दिग्गज
दुनिया भर को सच्चाई, ईमानदार और दायित्वबोध का पाठ पढ़ाने वाले मीडिया हाउसों की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि अपनी बारी आने पर वे नैतिकता को बैकफुट पर रख देते हैं. नेता या अफसर ने उनके हितों को नुकसान पहुंचा दिया तो पीछे पड़ जाते हैं. वह दौर अब काफी पीछे छूट गया है जब प्रतिद्वंद्विता बैकफुट पर और नैतिकता फ्रंट फुट पर हुआ करती थी. अब तो मीडिया दिग्गज प्रतिद्वंद्वी हाउसों में चोरी करवा रहे हैं और डाके डलवा रहे हैं. जी हां, रांची में चल रहे मीडिया वार में एक दूसरे कर्मचारियों पर डाका डालना और प्रतिद्वंद्वी का अखबार न बिकने देने के लिये हॉकरों को अपने कब्जे में लेना तो आम बात है....
image
रांची में पूंजी बनाम पत्रकारिता की जंग
रांची में 22 अगस्त से मीडिया वार शुरू हो चुका है. खोजी खबरें, जनसरोकार और मुद्दे की बात पर आधारित पत्रकारिता करने के लिये मशहूर अखबार समूह प्रभात खबर के इस गढ़ में हाई-लाइफ(पेज-3 पत्रकारिता), बाजारवाद और सनसनी परोसने वाला मीडिया समूह दैनिक भास्कर ने दस्तक दे दिया है....
image
पुरुष फ्रंटपेज है, महिलाएं भीतर छपी हुई ख़बरें
"अगर आपको अपना चेहरा दिखाकर या फिर बातों से प्रभावित करने या मक्खन लगाने की कला नहीं आती तो मीडिया आपके लिए नहीं है. अगर आपका कोई गाडफादर नहीं है तो भी मीडिया आपके लिए नहीं है. आप मेरी तरह फांकाकशी करेंगे और फिर थकहार कर किस्मत को कोसते हुए बैठ जायेंगे जैसे मै बैठी हूँ, ठूंठ! नौकरी छूट चुकी है जहाँ भी इंटरव्यू देने जाती हूँ हर जगह एक जैसा माहौल। किसी को आपके काम से मतलब नहीं। लेकिन आश्चर्य तब होता है जब बड़े बैनर वाली जगहों पर भी यही होता है. मीडिया के भीतर और बाहर दोनों जगह एक जैसा माहौल। ऐसे में सोचना पड़ता है कि मै पत्रकार क्यों हूँ?"...
image
चैनल के खिलाफ खबर चलाई तो मिलने लगी जान से मारने की धमकी
भारत में वेब के मीडिया बनने की अभी ठीक से शुरूआत भी नहीं हुई है. लेकिन वेब मीडिया के स्वतंत्र अस्तित्व को बाधित करने के लिए न केवल सरकार सक्रिय है बल्कि अपने आप को व्यवस्था का चौथा खंभा कहनेवाले मीडिया घराने भी इसकी औकात बताने पर उतारू हैं. आये दिन वेब मीडिया से जुड़े लोगों को धमकियां, नोटिस तो मिलती ही रहती हैं, अब जान से मारने की धमकी भी मिलने लगी है. ...
image
झूठ का पुलिन्दा है फिर भी चौथी दुनिया जिन्दा है
चौथी दुनिया और झूठ का लगता है चोली दामन का साथ है. दूसरी बार जबसे चौथी दुनिया प्रकाशित होना शुरू हुआ है झूठी और मनगढंत रिपोर्टिंग की एक से एक मिसाल पेश कर रहा है. पहले अखबार ने दावा किया कि वह देश का पहला साप्ताहिक अखबार है, झूठ. वह लिम्का बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज भी हो गया है, झूठ. हर अंक की कवर स्टोरी ऐसी कि पढ़कर आपके मन में पहला ख्याल यही आयेगा- झूठ बोल रहा है. फिर भी संतोष भारतीय देशभर में होर्डिंग लगाकर दावा कर रहे हैं कि वे देश के सबसे विश्वसनीय पत्रकार हैं. ...
image
दूरदर्शन को सोखकर रसूखदार हुए रजत
एक टीवी चैनल स्थापित करने में करोडों रुपए लगते हैं और उसे चलाने में और करोड़ों रुपए हर साल। दिल्ली में एक ऐसा टीवी चैनल है जिनके मालिक कश्मीरी गेट के एक अपेक्षाकृत गरीब परिवार में पैदा हुए थे. वे जिस घर में पैदा हुए थे उसमें एक कमरे में दर्जनों लोग सोते थे। लेकिन आज वही आदमी एक न्यूज चैनल का मालिक है. बात इंडिया टीवी के मालिक रजत शर्मा की हो रही है।...
image
ईद के दिन ईद मुबारक आयी और कहा कि तुम चांद हो
"ईद का दिन ईद मुबारक का एस.एम.एस. आया शाम को काल आयी कि तुम तो चांद हो प्यार में उम्र मायने नहीं रखती जब से तुम्हें देखा, मुझे चैन नहीं है। काश तुम मुझे 10 साल पहले मिली होती मैं तुमसे शादी कर लेता। अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है मैं तुम से शादी करना चाहता हूं। मैं तुम्हें हर सुख दूंगा जो तुमने सोचा भी न होगा। मैं जो भी चीज हासिल करना चाहता हूं उसे हासिल कर लेता हूं।"...
image
संपादक महोदय रिपोर्टर से दूसरी शादी करना चाहते थे
मैं एक अखबार का मालिक और प्रबंध संपादक हूं. मुझे यह सुनाने और बताने की जरूरत नहीं है कि अखबार मालिकों पर अक्सर यह आरोप लगता है कि अखबार मालिक संपादकों को काम करने का मौका नहीं देते. उनके ऊपर दबाव बनाकर रखते हैं कि वे अखबार मालिक के लिहाज से व्यवहार करें. जब मैंने अखबार निकालना शुरू किया तो मैं हमेशा इस बात को लेकर सतर्क था कि डीएनए अखबार के संपादक को ऐसी किसी परिस्थिति का सामना न करना पड़े. ...
image
सोशल मीडिया के आगोश में सिमटती दुनिया
ट्विटर पर ट्वीट करिए, ब्लागर पर ब्लाग लिखिए और फेशबुक पर अपनी जनता जमात को फेश करिए. क्या जमाना आ गया है. हर खासो आम नये उभरते आनलाइन माध्यमों का उपयोग अपने प्रचार प्रसार के लिए कर रहा है फिर चाहें दुनिया के सबसे ताकतवर देश के राष्ट्रपति बराक ओबामा हों या फिर हाल में ही त्रिनिदाद टुबैगो की प्रधानमंत्री चुनी गयी कमला बिसेसर. आम आदमी से लेकर राष्ट्राध्यक्ष तक इन नये माध्यमों का उपयोग कर रहे हैं. ...
image
हारे हुए बहादुरशाह की प्रेस कांफ्रेस
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चेहरे पर न तो उत्साह था, न ही ताजगी। वे थके हारे लग रहे थे। सोमवार की प्रेस कांफ्रेंस भी रूटीन की प्रेस कांफ्रेंस थी। कारपोरेट मीडिया को कारपोरेट प्रधानमंत्री जवाब दे रहे थे। प्रधानमंत्री को देश में सबकुछ ठीक नजर आ रहा है। उनसे सवाल पूछने वाले मीडिया को भी देश में सबकुछ ठीक नजर आ रहा है।...
image
टीआरपी के खेल का सच
हाल में ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की पहल पर एक कमेटी का गठन किया गया है जो कि तीन महीने के अंदर टीआरपी के नाम पर की जा रही धांधली पर एक रिपोर्ट सौंपेगा. सरकार का इरादा है कि टीआरपी के नाम पर जिस तरह से खबरों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है उस पर रोक लगाई जा सके. क्या है टीआरपी और विवाद के विषय क्या हैं, इसके बारे में बता रहे हैं सतीश सिंह...
image
विजय दीक्षित ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा
पूरा मीडिया जानता है कि आजकल एस वन चैनल के क्‍या हाल हैं। चैनल के मालिक विजय दीक्षित ने चैनल को अय्याशी का सामान बना रखा है। अपने सारे काले धंधों को एस वन की आड़ में छिपाते चले आ रहे हैं। अभी तक तो विजय दीक्षित कहते आ रहे थे कि चैनल को रेवेन्यू नहीं मिल रहा है, इसलिए सैलरी समय पर देने में दिक्कत हो रही है। जबकि सच्‍चाई ये है कि चैनल लंगड़ी चाल चलता रहे और काले धंधे छिपते रहें, इसलिए इन्‍होंने आजतक एडवरटाइमेंट और चैनल के डिस्ट्रीब्यूशन के लिए कोई अप्वाइंटमेन्ट नहीं किया। सारा काम राकेश निगम से ही लेने का बहाना बनाते चले आ रहे हैं।...
image
मीडिया पर नकेल डालना चाहती है नौकरशाही
आजादी के बाद आपातकाल के दौरान पहली बार मीडिया पर किसी प्रकार की पाबंदी लगायी गयी थी. सरकार द्वारा आरोपित उन पाबंदियों का सबसे अधिक दुरुपायोग नौकरशाही ने किया और प्रशासनिक आदेश से भी दो कदम आगे जाकर मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश की. आपातकाल के बाद एक बार फिर नौकरशाही मीडिया को निशाने पर ले रही है. ...
image
ट्विटर की ट्वीट पर धराशायी हुआ आईपीएल
आईपीएल काण्ड का सबसे सुखद पहलू क्या है? अव्वल तो आप यह मानेंगे नहीं कि आईपीएल में कुछ सुखद भी हो रहा है लेकिन आप ध्यान से देखेंगे तो पायेंगे कि इस काण्ड में एक सुखद अध्याय जुड़ा है जो मीडिया के नये स्वरूप को हमारे सामने ला रहा है. यही इस काण्ड का सबसे सुखद पहलू है. ...
image
सम्मान नहीं शहादत का
रविवार को दिल्ली के प्रेस क्लब में एक प्रेस कांफ्रेस हुई. प्रेस कांफ्रेस किसी आंदोलन समूह, राजनीतिक दल या कारपोरेट घराने द्वारा नहीं बल्कि एक मीडिया हाउस द्वारा आयोजित की गयी थी. उस मीडिया घराने प्लानमैन मीडिया ने अपनी पत्रिका सण्डे इण्डियन के सभी संस्करणों में एक स्टोरी प्रकाशित की है जिसमें उड़ीसा के उन जवानों की कहानी प्रकाशित की है जिनके आश्रित मुआवजे के लिए दर दर भटक रहे हैं. ...
image
ब्लाग बिरादरी पर कारपोरेट मीडिया का डाका
हमारे सहयोगी अरुण जोशी पूछ रहे हैं- सर, वो साइट कौन है जो लैपटाप दे रही है? उनको भी बताया, आपको भी बता रहा हूं. उस साइट का नाम है- जागरण जंक्शन. हिन्दी के सबसे बड़े अखबार दैनिक जागरण ने अपने विशाल संपादकीय नेटवर्क का इस्तेमाल करने के लिए अपना यह नया उद्यम शुरू किया है. लेकिन अब उन्होंने आम जन को भी लालच की चोपड़ी फेंकी है कि आप उनके ब्लाग जंक्शन पर लिखिए, हो सकता है आप वह लकी विनर हों जिसे लैपटाप मिल जाए. ...
image
मीडिया की सानिया, सानिया की शादी
मीडिया अपनी टीआरपी की हवस में किसी भी हद तक जा सकता है। खासतौर से इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने तो जैसे सारी नैतिकता ही खत्म कर दी है। सानिया ने एक पाकिस्तानी क्रिकेटर शोएब मलिक से शादी करने का फैसला क्या लिया पूरा मीडिया सानिया और शोएब मलिक की निजी जिन्दगी में दखलअंदाजी कर बैठा। ...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम कॉपीराइट के सभी प्रकार के दावों और दायरों से मुक्त है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2