खबर न दिखाने की आम-सहमति
किसी समाचार चैनल को देखते हुए मन में एक सवाल आता है कि आम लोगों से सरोकार के बगैर भी क्या चैनल चलाए जा सकते हैं?
जो खबरों से हटकर दिखाया जा रहा है उसका अर्थशास्त्र तो चैनलों ने साफ बता दिया है कि दर्शक जो देखना चाहते हैं वही दिखाया जा रहा है. क्योंकि विज्ञापन उसी आधार पर मिलते हैं. लेकिन मामला न्यूज यानी खबरों का है. इसलिए दिमाग में पत्रकार का चेहरा, उसकी सोच, उसका नजरिया और इन सबके साथ आम आदमी के साथ उसके सरोकार बार-बार इस बात को लेकर सवाल खड़ा करते हैं कि कैसे संभव है किसी पत्रकार का विज्ञापन की पूंजी तले सब कुछ भुला देना.
नब्बे के दशक में जिस वक्त विज्ञापन की पूंजी ने पत्रकारों को लुभाना शुरू किया था, दिल्ली में बहादुर शाह जफर मार्ग में पत्रकारों का जमघट कमोबेश हर चाय की दुकान पर इस बहस में उलझा रहता था. इस सवाल पर खूब बहस होती थी कि मीडिया का भविष्य क्या होगा? अखबार चल पायेंगे या नहीं? पत्रकारों को कहीं विज्ञापन जुगाड़ने के लिए तो नहीं कहा जाएगा? अखबारों से जुड़े पत्रकारों में यह बहस आज भी जारी है. कह सकते हैं अखबारों में खबरों को लेकर अभी संवेदनशीलता बरकरार है.
लेकिन समाचार चैनलों की जरूरत खबरों के आधार पर आंकी नहीं गयी. सूचना तकनीकि की जरूरत या फिर बाजार के प्रचार-प्रसार का नायाब माध्यम और अखबार की तुलना में कई गुना ज्यादा पूंजी लगाकर कई गुना ज्यादा मुनाफा कमाने की सोच को लेकर हमेशा बहस होती रही. यानी समाचार चैनल में काम करनेवाले खबरों की जगह मुनाफे को लेकर ज्यादा संवेदनशील रहते हैं.
यह सोच कैसे और किस रूप में मौजूद है इसका अहसास नोएडा के फिल्म सिटी में पहुंचकर होता है. बहादुरशाह जफर मार्ग की अखबारी सोच फिल्म सिटी में पहुंचकर कैसे रेंगने लगती है वह यहां घुसते ही अहसास हो जाता है. फिल्म सिटी ही वह जगह है जहां कमोबेश हर न्यूज चैनल का दफ्तर है. जो दिल्ली में हैं उन्हें भी आज-कल में यहीं आना है.
आप जैसे ही फिल्म सिटी में घुसेंगे आपको गाड़ियों की कतार-दर-कतार नजर आयेगी. यहां हर माडल की गाड़ी मिल जाएगी. चैनलों के सुनहले सपनों की इमारतों के सामने गाड़ियां, उनके आगे-पीछे गाड़ियां. किसी पेड़ के नीचे से लेकर अंदर की सड़क को चौराहे में बदलने का काम भी गाड़ियां ही करती हैं. किसी नये समाचार चैनल के खुलते ही पहली बहस अब यही होती है कि इसमें काम करनेवाले अपनी गाड़ी कहां खड़ी करेंगे.
हर चैनल का दफ्तर वातानुकुलित है. टीवी की मशीन ज्यादा संवेदनशील होती हैं इसलिए इनके लिए वातानुकूलन बहुत जरूरी है. तो टीवी के दफ्तर में घुसते ही मौसम की पहचान सबसे पहले खत्म हो जाती है. इसलिए दिल्ली में बेमौसम बारिश की फुहारों से लेकर लू के थपेड़े और सर्दियों में बढ़ती कंपकंपी भी सबसे बड़ी खबर हो सकती है. यह बात दीगर है कि उस मौसम का उसे कतई अहसास भी नहीं होता जिसके बारे में वह बड़ी खबर बनाकर दिखा रहा है. सभी चैनलों में घूम लीजिए. आउटपुट डेस्क पर सभी जगह आपको एक खास तरह की सहमति दिखाई देगी. यह सहमति खबरों को खारिज करने से लेकर खबरों को अपनी सोच के अनुसार दिखाने की प्रवृत्ति तक बनी रहती है.
ऐसा नहीं है कि सभी एक सा जीवन जीते हैं इसलिए यह आम सहमति काम करती है. पत्रकारिता में डिग्री-डिप्लोमा लेकर किसी चैनल में काम पा जाने वाला लड़का अपने साथियों के बीच हीरो होता है. उसके कालेज के साथी नौकरी की तलाश में जब उससे मिलने पहुंचते हैं तो चाय के ठेले पर साथियों से बात करते हुए वह अपने उज्वल भविष्य को लेकर आश्वस्त दिखता है. सीनियर लोगों की बातचीत तीन स्तरों पर होती है. पहला टीआरपी का जुगाड़ में वह खुद कितना माहिर है. दूसरा, वह आनेवाले दिनों में कौन से नये माडल की गाड़ी लेनेवाला है और तीसरा, क्या वह आनेवाले दिनों में अपना खुद का चैनल प्लान कर सकता है? और संपुट में यह कि अपना चैनल जुगाड़ने के लिए वह क्या-क्या जुगाड़ लगा रहा है.
खबर छोड़ दीजिए. समाज के वर्तमान पर ही चर्चा शुरू हो जाए तो आप झटके में समझ सकते हैं कि टायरों पर दौड़ते चैनलों की जिंदगी और शीशे के पार से समाज की धड़कन महसूस करनेवाले कैसे और क्यों सरोकार रखनेवाली खबरों से दूर हो चुके हैं? यह फिल्म सिटी बंद गली के आखिरी मकान जैसा है जिसमें जहां से आप घुसेंगे वहीं से निकलना भी होगा. यानी आखिर में रास्ता बंद है. (जनसत्ता)
Title :
Body
- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
- हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
- सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
- टाटा-बिड़ला-अंबानी, पीयेंगे मध्य प्रदेश का पानी
- प्रेस क्लब ने खाना नहीं खिलाया, नोटिस थमा दिया
- पाँचना से फोन पर पानी पहुँचा घना



del.icio.us
Digg
Post your comment