Home | बियाबान में शोर | पहाड़ के एक गांव में मुट्ठीभर लोग

पहाड़ के एक गांव में मुट्ठीभर लोग

Font size: Decrease font Enlarge font 5804
image

पहाड़ों से पलायन के 60 वर्षो का लेखा जोखा देखें तो समझ में आता है कि इन 60 वर्षो में अकेले उत्तराखण्ड की एक करोड़ से अधिक आबादी पहाड़ छोड़कर बाहर जा चुकी है, जो बच गये वे 85 लाख हैं.

गांव के ईर्द गिर्द सिरहाने और पांवों की ओर दो तीन कीमी दूर तक छितरे उन सीढ़ीनुमा खेतों के बारे में इस बार अचानक मेरी दिलचस्पी बढ गई। खेतों को दूर दूर तक निहारते हुए यह प्रश्न मेरे जेहन में बार-बार कौंधा कि आखिर इस महाविस्तार में इतने सीढीनुमा खेत किसने बनाये होंगे? अब ये खेत बंजर पडे़ हैं। हमारे शैशव में जिन खेतों पर फसलें लहलहाती थी वहां अब जंगली झाडियॉं और कंटीले पेड़ उग आये है। ऐसा देखना उस आमधारणा के उलट है जो मानती है कि पहले जनसंख्या बहुत कम थी और अब एकाएक विस्फोट की स्थिति में पहुंच गई हैं। फिर ये खेत ऑंखिर बंजर क्यों हो गये? जनसंख्या बढ़ने के साथ उन पर दबाव बढ़ना चाहिए था। पर ये दवाब शून्य ही नही बंजर कर दिये गये हैं। कभी कभी ठहरकर यदि आप नजर डालेंगे तो इस वितान में दूर खडे़ छोटे- छोटे मकानों को देखकर एहसास होगा ये किसी महासभ्यता के ध्वंशावशेष हैं। जो या तो अपनी किसी गलती से यहां छूट गये या इन्हें यकीन है कि इस विशाल उपत्यका में जल्दी ही कोई नई सभ्यता पनाह लेगी और वे वंदनवार सजाकर इस बंजर जमीन के पुर्ननवा होने का जश्न मनायेंगे.

रोजगार के लिए पहाड़ों से शहरों की ओर पलायन के 60 वर्षो का लेखा जोखा देखें तो इतना समझ में आता है कि इन वर्षो में अकेले उत्तराखण्ड की एक करोड़ से अधिक आबादी अन्यत्र चली गई और 85 लाख वहॉं रह गई। लेकिन इन आंकड़ों का स्याह पक्ष उत्तराखण्ड शासन की एक सूचना निदर्शिनी सामने रखती है। इस डायरी में संकलित एक डेटा बताता है उत्तराखण्ड में कुल 16826 गांव हैं। इनमें से आबाद ग्राम 15761 और 1065 गैर आबाद ग्राम हैं। यानि 1065 गांवों में आबादी नहीं है. सरकार भी मानती है कि वे खंडहर और बंजर हो गये हैं।

जो लोग महानगरों की आपाधापी रेलमपेल और कतार कल्चर से उकता गये हैं वे यकीनन यह मान सकते हैं कि शहरों में स्पेश का महाअभाव इन विरानों में नई सभ्यता का अभ्युदय कर सकता है। सुविधाओं की दौड़भाग में सुदंर न सही पहाड़ी कस्बों की ओर लोग दौड़ तो रहें हैं। रुद्रपुर, रामनगर, हल्द्वानी, पंतनगर जैसे सुविधासंपन्न कस्बों में पांच सात सालों में ही कई हजार खाते पीते महानगरों में बसे एन आर आईज अप्रवासी पहाडियों ने घर खरीदे हैं । अभी यह दौड थमी नही है । हाउसिंग कंपनियां आये दिन इन कस्बों में दूर दराज तक पैर पसार रही हैं । जिन खाते पीते अघाये लोगों को यह अहसास हो गया है कि दिल्ली जैसे महानगरों में निकट भविष्य में जीवन यापन और दुष्कर होने वाला है वे इन सुविधा संपन्न गिरि कंदराओं कि जडों में अपने आशियाने सुरक्षित कर रहे हैं ।

शिवालिक फुट हिल्स यानि मध्य हिमालय के गांव वीरान हो रहे हैं। इन्हें इस तरह से मानवीय पलायन ने विरान नही किया है। तपते हिमालय, सूखते वनों उजडते चारागाहों और जलश्रोतों के चलते यह स्थिती हुई है। कुछ लोग इसे उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन में आये बडे परिवर्तन के रूप में परिभषित कर रहे हैं, लेकिन जो लोग अब तक पहाड के गांवों में बचे हैं वे हरीमिर्च और धनिया बाजार से लाने का दर्द जानते हैं । इस दर्द को महानगरों में रह रहे वे लोग भी बखुबी समझ सकते हैं जो महासंघर्ष के बाद सर छुपाने की जगह तो पा जाते हैं लेकिन घर में फूल के गमले की जगह का सपना देखते ही नही । पहाड में लोगों के पास छोटे- छोटे ही सही ढेर सारे खेत खलिहान हैं. गरम होते मौसम भूख से जंग में करो या मरो पर उतारु वाइल्ड लाइफ ने इंसान को यहां सब होते हुए भी बंचितों की जमात में खडा कर दिया है। यह तो ठीक से नही कहा जा सकता कि वास्तव में यह पहाडी जीवन में आया कोई परिवर्तन है जिसे स्वीकार करना ही होगा या मौसमी उठापटक है जो जल्द ही ठीक हो जायेगा, लेकिन बंजर होते पहाडी गांवों में बसे लोगों के चेहरे, गांवों की ओर पैर पसारी रही सडकों, मोबाइल और माल क्रांति की तेज बयार में गमगीन नही लगते।

संचार और सड़क जल्दी ही दुर्गम को सुगम भी बना देंगे। इसलिए पहाड़ के एक गांव में मुटठी भर रह गये लोग अभी बंजरों के बीच अकेले भले ही रह गये हों जल्दी ही उन्हें शहरों से खदेड़ दी गयी सभ्यताओं का अभिनंदन करना है। बाबजूद इसके कि वे श्रम और जमीन के होते हुए भी अपने लिए वह कुछ नही उगा सकते सिवाय उसके जो अपने आप उग जाता है। क्योंकि राम के साथी रहे जंगली जीव धार्मिक अभयदान के साथ-साथ भारतीय वन्य जीव कानूनों की छतरी में अबघ्य हैं । वाइल्ड लाइफ,पर्यावरण और धरती की ठेकेदारी कर रही बिरादरी को आबारा कुत्तों को सूखी रोटी खिलाना छोडकर कभी इस तरह की समस्याओं पर भी नजर डालनी चाहिए। ज्वाइंट फारेस्ट मैनेजमैंट जैसे जुमलों से बाहर निकलकर आदमी और जानवर के बीच बढ़ती खाई को कम करने की कोई व्यावहारिक तरकीब निकालनी चाहिए। यह पहाड़ या भारत के किसी एक गांव की समस्या नही वल्कि डैन्सफारेस्ट वाले हर राज्य के ग्रामीण की समस्या है। यह कैसी बिडंबना है कि पहाड़ के जिन गॉंवों में लोग एक दशक पूर्व लंगूर बंदर जैसे जंगली जानवरों के दर्शन करने 4-5 कि.मी. दूर घने जंगलों में जाते थे उनके घर बाग बगीचे खेत खालिहान बंदरों और अन्य जंगली जानवरों से गुलजार हैं। पहाड़ के पलायन ने उसके आधें खेत खलिहान बंजर किये थे और अब आधा काम जानवरों ने कर दिया है। गनीमत है कि इसके बावजूद भी कुछ लोग किसी तरह पहाड़ के गॉंवों में अटके हुए हैं। वे चाहे सरकारी योजनाओं के बूते कुछ दिन सुगम जीवन जीलें लेकिन पहाड़ी गॉवों को बंजर होने से बचाने का उनके पास कोई उपाय नही।

शायद ही किसी ने यह कल्पना की हो कि उत्तराखण्ड के किसी गॉंव की शत-प्रतिशत आबादी पलायन कर गई हो लेकिन पलायन का लेखा जोखा बताता है प्राकृतिक आपदाओं और विस्थापन के परे भी कई गॉव पलायन के चलते उजड़ गये हैं। पहाडों में पर्यावरणीय परिवर्तनों से नये खतरे खडे हुए हैं। जंगल के बेइंतहा दोहन से प्राकृतिक संसाधन समाप्ति की ओर अग्रसर हैं। परिणामस्वरूप जल संकट के साथ साथ भूखी और कुपित वन बिरादरी का रोष भी लोगों पर बढ़ रहा है। पहाडों से पलायन कर महानगरीय जीवन के घात-प्रतिघात सह रहे लोग शायद महानगरीय त्रासदियों के बीच यह अच्छी तरह समझ गये होंगे कि यहॉ जीवन अब कितनी सुगम है. निश्चय ही कालक्रम की प्रगति पर्यावरणीय नुकसानों के साथ-साथ नई तकनीक के सहारे अब दुर्गम पर्वतीय जनजीवन को काफी सुगम बना चुकी हैं। सड़कें और संचार के महाजंजाल से संवरता दुगर्म पहाड़ अब कई अर्थों में सुगम हो गया है। यह बात दीगर है कि इन सुविधाओं के बीच विरानों में नई सभ्यताओं का क्रंदन भी गूंजने लगी है. यदि समय रहते वे इस क्रंदन को सुन लें तो नई पीढ़ियॉं उनकी शुक्रगुजार हो सकती है। पलायन और संस्कृति के पतन के इस अध्याय में बचने-बचाने के सरकारी प्रयास नगण्य हैं। उत्तराखण्ड की सरकार पर्यावरणीय कानूनी छत्री के तले जानवरों की चिंता में मग्न है लेकिन दुर्गम क्षेत्रों में आम आदमी के जीवन को सुगम बनाने के प्रयास नगण्य हैं।

Subscribe to comments feed Comments (23 posted):

विजय गौड on 30 May, 2008 23:37;56
avatar
अच्छी रिपोर्ट है.
Thumbs Up Thumbs Down
0
ghughutibasuti on 31 May, 2008 00:22;05
avatar
यह सब पढ़कर दुख हो रहा है। मुझे जो पहाड़ याद है वह तो हरा भरा था। युवा नौकरी के लिए निकले तो थे पर अधिकतर जहाज के पंछी की तरह लौटकर वहीं आते थे। वैसे बाहर बसे लोगों के लिए तो पहाड़ और वहाँ की संस्कृति केवल यदाकदा दिए एँपण, व ओढ़े रंगवाली पिछौड़ तक ही सीमित रह गई है।
घुघूती बासूती
Thumbs Up Thumbs Down
0
Nikhil singh on 31 May, 2008 01:45;24
avatar
Really Its real story. congratulation for writing the artile.
Thumbs Up Thumbs Down
0
meena pant on 03 June, 2008 23:06;13
avatar
neeraj ji aapki report sochne ke liye majboor karti hai ki anchal main khamoshi kyo ho rahi hai???per aapne visthapan ki majburiyo ko nzarandaj kyo kiya hai???
Thumbs Up Thumbs Down
0
B.P. NAITHANI on 04 June, 2008 13:10;25
avatar
I am very happy to read this article and really we all have shifted from this beutiful place to hell but unemployment and other circumstances have compelled us and we have left our native place and it is our bad luck.
I am very thankful to our Shri Neeraj Joshi who has written this article for our garhwalies so that they can think once again and can do better for. Great efforts.
Thumbs Up Thumbs Down
0
CM Negi on 04 June, 2008 13:17;13
avatar
Dear

Neeraj ji

This is really heart touching story .but as u know u didnt mention cos of these things...
Thumbs Up Thumbs Down
0
Dinesh Dhaundiyal on 04 June, 2008 13:50;13
avatar
Neerajji,

This is very unfortunate to all of us but we are helpless due to not availability of employment sources and hospitals. Our Govt. should have to think about this. As we all know Utrakhand has best talent but this talent is used in Citys.

Thanx & regards,

Dinesh Dhaundiyal
Thumbs Up Thumbs Down
0
Dinesh Dhyani on 04 June, 2008 15:52;07
avatar
Hello! Joshi. How are you. This article is nice this the fact picture of uttarakhand. We all are responsible for this.
thanks
dinesh dhyani
Thumbs Up Thumbs Down
0
Vivek Patwal on 04 June, 2008 16:19;14
avatar
नीरज जी जो वर्णन आपने हमारे पहाड़ के बारे में किया वो वास्तव में एक ह्रदय विदारक सत्य है, अब जरुरत है तो इसे रोकने की, में सोचता हूँ की जो लोग पलायन करके जा चुके और अच्छे मुकाम पर आज हैं, उन्हें कुछ पहल करनी चाहिए ताकि ये पलायन आगे जरी न रह सके,
Thumbs Up Thumbs Down
0
Subhash Devrani on 04 June, 2008 18:36;22
avatar
Neeraj ji, aapne Garhwal ke es byatha to sahi roop me warnit kiya hai. Aap isake liye dhanyabad ke patra hai.

Regards,
Thumbs Up Thumbs Down
0
1 2 3 next total: 23 | displaying: 1 - 10

Post your comment comment

Please enter the code you see in the image:

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image नीरज जोशी नैनीताल समाचार से पत्राकारिता की शुरूआत नब्बे की शुरूआत तब से दिल्ली में कुछ अखबारों की चाकरी के साथ साथ लगातार अखबारों के लिए कलम घिसी अभी भी पहाड़ों के दर्द से सारोबार होकर उसमें डूबने की चाह हिमालय, नदी और समाज के लिए अनथक काम करने के अवसरों की तलास में हाल दिल्ली में रहकर लेखन एवे पत्राकारिता।
Rate this article
4.00
More from बियाबान में शोर
Previous
image
हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
हरिप्रसाद को एक हफ्ते तक पुलिस हिरासत में रखने के बाद जमानत मिल गयी है. जेल से छूटने के बाद हैदराबाद पहुंचे हरिप्रसाद ने कहा है कि वे इस गिरफ्तारी से न झुकेंगे न टूटेंगे बल्कि ईवीएम मशीनों की धोखाधड़ी के खिलाफ अपना अभियान जारी रखेंगे. हरिप्रसाद की यह दिलेरी और लोकतंत्र के प्रति हठ निश्चित रूप से काबिले तारीफ है. ...
image
छलावा है नक्सलियों से बातचीत का दावा
कुछ अजीब सी बात है। नक्सलियों और सरकार के बीच वार्ता के लिए वातावरण बनाने में लगे हुए स्वामी अग्निवेश ने 12 अगस्त को मीडिया के सामने स्पष्ट कर दिया कि माओवादी वार्ता के लिए राजी हैं। लेकिन उनकी एक महत्वपूर्ण शर्त है नक्सली नेता चेरूकुरी राजकुमार उर्फ आजाद की पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की घटना की न्यायिक जांच कराई जाए। अभी कुछ दिन पूर्व 16 अगस्त को नई दिल्ली में एक नितांत व्यक्तिगत बातचीत में उन्होंने खुलासा किया कि वार्ता से संबंधित माओवादियों का एजेंडा केन्द्र सरकार को सौंप दिया गया है। अब निर्णय सरकार को लेना है किंतु वह ढिलाई बरत रही है।...
image
बेशर्म वामपंथ में नंगी होती औरतें
अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के साथ देश भर में हो अमानवीय उत्पीडन के क्रम में पश्चिम बंगाल में महिलाओं को नंगा घुमाए जाने की सिलसिलेवार घटनाएँ सामने आई है ,अभी पश्चिम बंगाल महिला आयोग ने वीरभूम जिले में हजारों पुरुषों के बीच में एक महिला को नंगा करके घुमाने और फिर उसकी वीडियो फिल्म बनाने की घटना की जांच शुरू ही की थी कि इसी जिले में दो और महिलाओं को नंगा करके घुमाये जाने का खौफनाक मामला सामने आया है। ...
image
राजीव गांधी के जन्मदिन पर महाविनाश की सौगात
आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का 66वां जन्मदिन है. इस साल उनका नाम भोपाल गैस त्रासदी को लेकर उठे विवाद में जबरदस्त तरीके से घसीटा गया. उन पर यूनियन कारबाइड के सीईओ वारेन एंडरसन को संरक्षण देने और सेफ पैसेज देने का गंभीर आरोप लगा. एक अमेरिकी एजेंसी ने तो यहां तक कह डाला कि वारेन एंडरसन के बदले इंदिरा गांधी के चहेते ड्राइवर के बेटे को छोड़ने की डील हुई थी और इसमें राजीव गांधी की बड़ी भूमिका थी. संयोगवश हमारी केंद्र सरकार ने आज का ही दिन न्यूक्लियर लायेबिलिटी बिल पर संसद में बहस कराने के लिये चुना है....
image
राममंदिर बनवाएं, भाईचारा बढ़ाएं
रामजन्मभूमि बनाम बाबरी मस्जिद पर फैसला आने ही वाला है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने बहुप्रतीक्षित रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित कर लिया है। उच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति एस.यू. खान, न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा एवं न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल हैं। चूंकि न्यायमूर्ति डी.वी. शर्मा सितंबर के अंत में सेवानिवृत्त होने वाले हैं। इसलिए माना जा रहा है कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद के बारे में फैसला सितंबर महीने के पूर्व कभी भी आ सकता है।...
image
बेजा नहीं है ब्लैकबेरी पर बवाल
ब्लैकबेरी ईमेल मैसेजिंग के सवाल पर एक बार फिर सरकार और कंपनी आमने सामने हैं. कंपनी ने सीमित मात्रा में सरकार को सूचना उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है लेकिन अब सरकार ने कहा है कि वह कारपोरेट इमेलिंग पर भी सरकार को नजर रखने की सुविधा मुहैया कराए. पूरे विवाद में क्या सरकार सही है या फिर ब्लैकबेरी? सतीश सिंह मानते हैं कि रिम कंपनी को सरकार की बात मान लेनी चाहिए क्योंकि यूरोप और अमेरिका में वह ऐसा कर रही है. ...
image
राख के ढेर में आग भड़काने की कोशिश
बहुत दिनों की खामोशी के बाद संघ परिवार राख हो चुके राममंदिर मुद्दे में आग लगाने की कोशिश करेगा। अब आरएसएस ने मंदिर निर्माण की जिम्मेदारी ली है। इसी 16 अगस्त से संघ परिवार पूरे देश में बड़े पैमाने पर कार्यक्रम शुरु करने का ऐलान किया है। सवाल यह है कि आखिर संघ ने अभी क्यों मंदिर निर्माण का राग अलापना शुरु किया है? ...
image
नेहरू गांधी परिवार के निशाने पर गुजरात
इतिहास अक्सर स्वयं को दोहराता है. गुजरात के नेताओं और नेहरू परिवार के संबंधों में यह दोहराव तो साफ़-साफ़ जाहिर हो रहा है. अभी बीते सप्ताह ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र से विनम्रतापूर्वक पूछा कि उनसे केंद्र(इसे सोनिया गांधी समझें) किस बात के लिए दुश्मनी निभा रहा है? नरेन्द्र मोदी को भी यह पता होना चाहिए कि नेहरू गांधी परिवार ने हमेशा गुजरात के साथ दुश्मनी रखी है. नेहरू के समय में सरदार पटेल निशाने पर थे तो आज नरेन्द्र मोदी उस खानदान के िनशाने पर हैं. ...
image
सच्चाई से मुंह छिपाने का शर्मनाक खेल
भारत जैसे तथाकथित विकासशील देश में जहाँ आंकड़ों की बाजीगरी के द्वारा विकास किया जाता है वहां राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन की बात सोचना ही एक क्रूर मजाक करने के समान है, क्योंकि आज भी भारत के 60 फीसदी लोग प्रतिदिन दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए संघर्ष करने पर भी आधे पेट पानी पीकर सोकर मजबूर हैं। शुतुरमुर्ग की तरह रेत के ढेर में मुँह छिपाने से क्या सच को हम बदल सकते हैं? भारत के क्या हालत हैं, क्या यह दुनिया से छुपा है?...
image
मीडिया प्रायोजित 'हिन्दू' आतंकवाद
आजकल मीडिया में आतंकवाद, खासकर ‘हिन्दू आतंक’ चर्चा में है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि ‘हिन्दू आतंक’ मीडिया के कारण ही चर्चा में है। कई बार किसी खास मुद्दे और विषय पर चर्चा करते समय उस मुद्दे पर और उसके माध्यम पर भी चर्चा होने लगती है। कुछ ऐसा ही हुआ जब पिछले हफ्ते आजतक के सहयोगी चैनल ‘हेडलाइन्स टुडे’ ने स्टिंग आॅपरेशन दिखाने का दावा किया।...
image
नादान हैं पाकिस्तानी हुक्मरान
अगर भारत और पाकिस्तान के बीच तैयार किये गये तल्ख रिश्तों को नरम कर दिया जाता है तो सबसे अधिक फायदे में पाकिस्तान की आवाम रहेगी. भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते सुधरें तो उसका सीधा आर्थिक फायदा पाकिस्तानी जनता को पहुंचेगी. पाकिस्तानी आवाम भी इसे स्वीकार करती है और दोनों देशों के रिश्तों को मधुर करने के लिए बातचीत के अलावा और कोई राश्ता नहीं है. अगर पाकिस्तानी हुक्मरान बातचीत के रास्ते में रोड़ा बनते हैं तो यह उनकी नादानी ही कही जाएगी. संजीव पाण्डेय का विश्लेषण-...
image
जिंदा बम के ढेर पर मुंबई
मुंबई भोपाल होते होते रह गया. अगर छब्बीस साल पहले यूनियन कार्बाइड में रिसी गैस ने हजारों लोगों को लील लिया था तो बुधवार को मुंबई पोर्ट ट्रस्ट पर क्लोरीन गैस के रिसाव के कारण भी वैसा ही खतरा पैदा हो गया था. 1989 में तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार की पर्यावरण मंत्री ने मुंबई का दौरा किया था और कहा था कि एक दिन मुंबई भी भोपाल बन जाएगी. उनकी बात सच होते होते रह गयी. ...
image
ऐसे ही न याद करें उदयन को
आज 11 जुलाई को सुप्रसिद्ध पत्रकार उदयन शर्मा का जन्म दिन है। आज के दिन पत्रकारिता के बड़े-बड़े नाम समकालीन पत्रकारिता पर चर्चा करने के लिए दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब के स्पीकर हॉल में जुटेंगे। सब पत्रकारिता के गिरते स्तर पर चिंता जताएंगे। साथ में यह भी कहा जाएगा कि आज के दौर में बाजार को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता है। पिछले सात साल से इस प्रोग्राम में मैं लगातार यही बातें सुनता आ रहा हूं। लेकिन हालात बद से बदतर होते जा रहे है।...
image
अचानक एक नासूर उभरा और डॉक्टर ने कहा कि कैंसर है
आलोक तोमर को कैंसर हो गया है. गले का कैंसर. अच्छा भला तीसरे स्टेज में पकड़ में आया. अरे.....अरे......क्या बात बोल रहे हो. कैंसर हुआ है और ऐसे बता रहे हो मानों आलोक तोमर को पद्मश्री मिल गया है. मौत सामने दस्तक देती जान पड़ रही है और बोलते हो कि कैंसर हो गया है बस! शर्म नहीं आती. ...
image
फिर जिन्दा हुआ इशरतजहां का जिन्न
एनडीए शासनकाल में 15 जून 2004 को अहमदाबाद पुलिस ने इशरतजहां और अन्य तीन लोगों को आतंकवादी बताकर मुठभेड़ में मार गिराया था। उस मुठभेड़ की मजिस्ट्रेट जांच में मुठभेड़ को फर्जी और सरकार से तमगे हासिल करने के लिए की गयीं हत्याएं बताया गया था। अब फिर इशरतजहां के बारे कहा जा रहा है कि अमेरिकी आतंकवादी डेविड हेडली ने भारतीय अधिकारियों को शिकागो में बताया था कि इशरतजहां का ताल्लुक लश्कर से था और वह मानव बम थी। तो क्या यह माना जाए कि मजिस्ट्रेट तमांग जांच रिपोर्ट गलत थी?...
image
स्वागत करिए, रानी का राजदण्ड आया है
शनिवार को भारत में अखबारों ने यह खबर छापी कि "क्वीन्स बैटन" भारत आ गयी है और उसे भारत में प्रवेश करवाने के लिए दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित खुद बाघा बार्डर पर पहुंची तथा कामनवेल्थ गेम्स फेडरेशन के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष माइक फेनेल के हाथ से "बैटन" का भारत में स्वागत किया. क्वीन्स बैटन का मतलब रानी का राजदण्ड. रानी का मतलब ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय. ...
image
भोपाल पीड़ितों को 1500 करोड़ की रिश्वत
मैं शायद एक अजीब सी बात आप लोगों के बीच रख रहा हूं, क्योंकि जीओएम ने जिस मुस्तैदी से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा दिये गये दस दिनों के डेटलाइन के भीतर सारी जांच कर ली और एक-एक कर कई लुभावनी सिफारिशें कर दीं उससे हमें खुशी ही होनी चाहिये थी. क्योंकि वे हम लोग ही हैं जो हमेशा से मानते रहे हैं कि भोपाल के पीड़ितों के साथ अन्याय हुआ है. उनके साथ न्याय होना चाहिये. उन्हें वाजिब मुआवजा मिलना चाहिये. नहीं! सवाल यह नहीं है!...
Next
Tags
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम कॉपीराइट के सभी प्रकार के दावों और दायरों से मुक्त है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2