अपने पड़ोस में भी बनाइये एक आर्कुट

आपने यह खबर न देखी हो तो सुन लीजिए. शिवसेना के विद्यार्थी संगठन ने कहा है कि वह आर्कुट को हैक करने का साफ्टवेयर विकसित कर रहा है. उनका कहना है कि आर्कुट का गलत इस्तेमाल हो रहा है जिसके कारण हिन्दू भावनाओं को कमजोर किया जा रहा है. जाहिर है शिवसेना के इस कदम से बहुतों का दिल टूटेगा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रतावाली एक बहस भी फौरी तौर पर चल पड़ेगी. नतीजा क्या होगा? ढाक के तीन पात. न आर्कुट को कोई रोक सकता है और न ही शिवसेना को.

शिवसेना ने सही सवाल गलत तरीके से उठाया है. यह उनके कार्यकर्ताओं की अपनी समझ और कार्यशैली का हिस्सा है. लेकिन आर्कुट भी बेदाग नहीं है. सोशल नेटवर्क का नारा आर्कुट पर जाते ही लफंगई में बदल जाता है. समविचारी लोगों को एक प्लेटफार्म मिले इसमें क्या हर्ज है? लेकिन वे समविचारी गुंडे हैं, लफंगे हैं, छद्म नामधारी हैं या फिर काम-काजी लोग हैं यह कौन तय करेगा. एक बार मुझे आर्कुट पर देखकर किसी ने मेल किया कि क्या आप अपनी असली पहचान बताएंगे? मैं दंग रह गया. क्या पहचान भी नकली होती है? बाद में मेरे कुछ आर्कुटिया मित्रों ने बताया कि लड़कियों की फोटो पर लड़के हो सकते हैं, जवान रैम्बों टाईप फोटो के पीछे कोई बुढ़ऊ हो सकते हैं या फिर किसी बुढिया की फोटो के पीछे खूबसूरत नौयुवती भी हो सकती है. मुझे नहीं मालूम इसमें कितनी सच्चाई है लेकिन अगर ऐसा है तो ऐसे सोशल नेटवर्क से तौबा.

मैं कई बार लोगों को मेल करता हूं कि भाई शिमला में हो और न्यूयार्क की खबरें कॉपी-पेस्ट करते हो. क्यों नहीं शिमला के बारे में कुछ लिखते. हमें भी तो पता चले कि शिमला, शिमला के लोग, हिमाचल की संस्कृति, वहां की समस्याएं क्या हैं. जिसको भी मैंने इस तरह का मेल किया उसने आजतक पलट कर न तो जवाब दिया और न ही उसने कभी कुछ लिखा. शायद चिढ़ाने के लिए उसने अगले दिन फैशन, ब्रांड और रोलेक्स की खबरों से अपना ब्लाग पाट दिया. लो, और दो नसीहत.

भईया, बहिनों एक आर्कुट हमारे पड़ोस में भी है. हमारे पड़ोसी, दोस्त, मित्र, दुकानदार, कामगार सभी उसमें शामिल हैं. उनको समझने की हम कितनी कोशिश करते हैं? और आर्कुटबाजी के चक्कर में हम अपने पड़ोस से दूर हो गये तो यह कम्प्यूटरवाला सोशल नेटवर्क हमारे किसी काम का नहीं रह जाएगा. केन्द्र से भटकी वस्तु का कोई ठिकाना नहीं होता. मेरे एक परिचित की माता जी का स्वर्गवास हाल में ही हो गया. मैं वहां गया तो देखकर दंग. इस दुख के वक्त दिल्ली जैसे शहर में 500-700 लोग उनके फ्लैट के नीचे जमा थे. ऐसा नहीं है कि वे कोई सामाजिक कार्यकर्ता या राजनीतिज्ञ हैं. सामान्य नौकरीपेशा इंसान हैं. लेकिन ये पांच-सात सौ लोग उनके अपने आर्कुट से आये थे. हमारे परिचित निरंकार समाज से जुड़े हुए हैं. ये सारे लोग निरंकार समाज से आये थे. मैंने देखा कि इस दुख भरे क्षण में कैसे उनके समाज के लोग उनको संभाल रहे थे. सारा क्रिया-कर्म समाज के लोगों ने अपने हाथ में ले लिया. पूरे समय तू ही निरंकार का लयबद्ध जाप उस दुखभरे क्षण में शांति का बोध करा रहा था. गांव छोड़ने के बाद पहली बार इस तरह का मेल-जोल देखा था. उस घटना से मेरी समझ तरोताजा हो गयी.

मेरे लिए मेरा वास्तविक आर्कुट ज्यादा जरूरी है. जो काल्पनिक आर्कुट में भटकना चाहते हैं उन्हें उनकी दुनिया मुबारक. क्यों जी आप क्या सोचते हैं………..

6 thoughts on “अपने पड़ोस में भी बनाइये एक आर्कुट

  1. भाई मेरे लिये दोनों जरूरी हैं। आरकुट हो या ब्लॉग आपकों अपने मोहल्ले अपने शहर से बाहर निकल कर अन्य लोगों से जुड़ने की जरूरत महसूस होती है. वर्ना हम और आप जैसे ये ब्लॉग नहीं लिख रहे होते। हाँ, नेट की दुनिया और वास्तविक दुनिया में तारतम्य बैठाए रखना जरूरी है.

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  2. आपकी बात सही है। लेकिन मनीष की बात ज्यादा सही है। आखिर इस आभासी दुनिया के सहयोग से ही तो हम आपकी यह बात पढ़ पा रहे हैं।

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  3. देखिए इस आभासी दुनिया में अच्छी और बुरी दोनों चीजें हैं। अब यह आप पर है कि आप किसे चुनते हैं।

    अगर यह आभासी दुनिया न होती तो आज हम सब हिन्दी प्रेमी यहाँ पर इकट्ठे न होते। रही बात ऑर्कुट जैसी चीजों की तो मेरी तरह केवल उन्हीं लोगों से संपर्क रखिए जिन्हें या तो आप व्यक्तिगत रुप से जानते हैं या फिर वे इंटरनैट पर ब्लॉग आदि माध्यमों से परिचित हैं और आप उनकी पहचान के प्रति आश्वस्त हैं।

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  4. हरिमोहन भाई मेरा तो आकार है, मैं निरंकार कैसे हो सकता हूं. ब्लाग पितामह अनूप शुक्ल, मनीष और शिरीष जी की बात ठीक है. इस रिपोर्ट के पीछे मेरा मकसद तकनीकि को गाली देना नहीं है. मैं सिर्फ इस सावधानी का हिमायती हूं कि तकनीकि का प्रयोग हम करें, तकनीकि हमारा प्रयोग न करे.
    आप सबका धन्यवाद.

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  5. भाई संजय जी
    अपने आर्कुट पर अभिव्यक्ति या विमर्श स्वातंत्र्य की जो बात उठाई है वह बिल्कुल सही है. गलत पहचान बताने वालों की इन्टरनेट पर भरमार है. इसका सबसे ज्यादा इस्तेमाल चैटिंग करने वाले करते हैं. पर दुनिया यहीं तक सीमित नहीं है, इसका सही इस्तेमाल करने वाले भी ख़ूब हैं. वैसे गलत इस्तेमाल तो हर चीज का होता है. इस नाते हम सही इस्तेमाल करना या चीजों – तकनीकों का अस्तित्त्व में आना बंद तो नहीं ही कर सकते हैं न.
    रही बात पड़ोस के आर्कुट की, तो वह एक अलग मसला है. इस पर अलग से बहस हो सकती है. मेरा ख़्याल है कि जरूरत किसी भी चीज को नकारने की नहीं, बल्कि उपयोग में संतुलन लाने की है. हम आर्कुट या ब्लोग का प्रयोग तो करें, लेकिन संतुलित ढंग से. उसमें ऐसे न खोएं कि अपने पड़ोस को भूल जाएँ. रही बात शिवसेना के विरोध की, तो उन्हें उनके विरोध के जरिये फिल्मों-विल्मों के प्रचार का काम ही करने दीजिए. ऐसे लोगों की बातों को बहुत महत्त्व नहीं देना चाहिए.
    इष्ट देव सांकृत्यायन

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