ताकि अमेरिका तक न पहुंचे अग्नि की लपट

भारत अमेरिका परमाणु समझौते का पहला झटका. सरकार ने परमाणु आयुध क्षमता से युक्त अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाईल (आईसीबीएम) को बनाने का इरादा छोड़ दिया है. यह खबर आज के दैनिक भाष्कर में छपी है. अखबार ने आशंका जताई है कि है ऐसा परमाणु समझौतों के खातिर किया है. रक्षा सूत्रों के हवाले से अखबार लिखता है कि रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) को यह आदेश मिला है कि अधिक रेंज वाली मिसाईल कार्यक्रम पर फिलहाल रोक लगा दिया जाए. इसी साल 12 अप्रैल को अग्नि-3 का परीक्षण किया गया था. इस मिसाईल की मारक क्षमता 3000 हजार किलोमीटर है. अग्नि तीन का विकास पूरी तरह से अपने संसाधनों से किया गया था.

यह सब तो एक दिन होना ही था. भारत और अमेरिका परमाणु समझौते पर देश में जो बहस होनी चाहिए थी वह हुई नहीं. अमेरिका की प्रतिनिधि सभा ने एकमत से परमाणु समझौते पर मोहर लगा दी थी. 84 फीसदी सदस्यों ने इस समझौते के पक्ष में मतदान किया था. यह अगस्त 2006 की बात है. लेकिन इस समझौते पर भारत में कोई खास बहस नहीं हुई. भारत ने पिछले एक साल में अमरीका के साथ तीन समझौतों पर हस्ताक्षर किया है. इसमें पहले समझौते पर तत्कालीन रक्षामंत्री प्रणव मुखर्जी और बाकी दो पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हस्ताक्षर किये हैं. एक तब, जब वे अमेरिका गये थे, और दूतरा तब जब जार्ज बुश भारत आये थे. इन समझौतों के मुख्य बिन्दू हैं-

1. भारत अमेरिका के हर विश्वप्यापी अभियान में शामिल होने का वचन देता है.
2. भारत अमेरिका द्वारा आतंकवाद की लड़ाई में अमेरिका के साथ है.
3. दुनिया में कहीं भी जल,थल, नभ में होनेवाले सैन्य अभ्यासों में भारत अमेरिका के साथ रहेगा.
4. भारत कृषि को आधुनिक बनायेगा और इसको व्यवसाय के रूप में मान्यता देगा.
5. परमाणु उर्जा को बढ़ावा देने के लिए भारत अमेरिका की मदद लेगा.

इन मुख्य बिन्दुओं से समझ में आ जाना चाहिए कि भारत अमेरिका से कैसा रिश्ता रखता है. इनमें दो बिन्दू आपत्तिजनक हैं. पहला कृषि का व्यवसायीकरण और दूसरा परमाणु उर्जा के क्षेत्र में अमेरिका से सहयोग.

अमेरिका लगातार यह कोशिस कर रहा है कि भारत में खेती के पैटर्न को बदला जाए क्योंकि जब तक ऐसा नहीं होगा अमरीकी खाद्य बहुराष्ट्रीय कंपनियों करगिल और मोंमसेंटो के लिए भारत में संभावना नहीं बनती है. भारत में खेती आज भी ज्यादातर प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है इसलिए पूंजी बाजार के उतार-चढ़ाव से देश की मूल अर्थव्यवस्था पर कोई खास फर्क नहीं पड़ता. अमेरिका लगातार इसे भेदने की कोशिश कर रहा है. भारत में कैश-क्राप को बढ़ावा देने की बात भी लंबी अवधि की रणनीति को ध्यान में रखकर किया जा रहा है. भारत के खाद्यान्न आत्मनिर्भरता को तब तक कोई खतरा नहीं है जब तक वह परंपरागत खेती पर निर्भर है. इस समझौते के बाद सरकार की ओर से लगातार ऐसे बयान आने शुरू हो गये हैं कि अब कृषि में पूंजी-निवेश की आवश्यकता है. कृषि में पूंजी निवेश के नाम भारतीय कृषि की रीढ़ तोड़ दी जाएगी. पहले ही हरित क्रांति के नाम पर देश के दो सबसे उपजाऊ प्रदेशों का सत्यानाश किया जा चुका है. अब पूरे देश में नकदी फसल को बढ़ावा देने से हम खाने के लिए अमेरिका और यूरोप पर निर्भर हो जाएंगे. यह एग्री एक्सपोर्ट ओरिएंटेड इकानामी ताबूत में आखिरी कील साबित होगी. फिलहाल इसकी प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

जहां तक परमाणु उर्जा से जुड़े समझौते का सवाल उस बारे में देश के पूर्व प्रधानमंत्री वी पी सिंह का एक बयान मैं यहां दे रहा हं जो उनके ऊपर लिखी गयी किताब से लिया गया है. यह किताब पिछले साल उसी समय आयी थी जिन दिनों यह समझौता हो रहा था. वीपी सिंह कहते हैं-

“शुरू में कुछ आशंकाएं थी कि फास्ट ब्रीडर रियेक्टर को भी जांच के दायरे में रखेंगे. फास्ट ब्रीडर रियेक्टर हमारा बहुत महत्वपूर्ण मार्ग है. भारत में थोरियम का भंडार बहुत है लेकिन यूरेनियम का भंडार हमारे पास नहीं है. साधारणतः एटामिक रियेक्टर यूरेनियम पर ही चलते हैं. भारत ने रास्ता निकाला कि यहां जो भी रियेक्टर बनाए जाएंगे वे प्लूटोनियम पर आधारित होंगे. प्लूटोनियम से थोरियम और थोरियम से आत्मनिर्भरता यही देश की परमाणु उर्जा नीति रही है.

हमने यूरेनियम रियेक्टर इसलिए नहीं लगाए क्योंकि इसके बाद हमें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता. जैसे तारापुर संयत्र इसलिए बंद करना पड़ा क्योंकि उसके लिए बाहर से मिलनेवाली यूरेनियम की आपूर्ति बंद हो गयी. आज अगर इस समझौते को हम स्वीकार कर लेते हैं तो हमारी आणविक नीति पूरी तरह से दूसरों के हाथ में गिरवी हो जाएगी. हमें कहा जा रहा है कि ईंधन मिलेगा, यानि यूरेनियम मिलेगा. यानि वे जब चाहें हमारे परमाणु कार्यक्रमों को बंद करा सकते हैं और हमारी ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह अपने हाथ में गिरवी रखेंगे ही. आप सोचिए भविष्य में परमाणु ऊर्जा का प्रयोग बढ़ेगा तो उसका नियंत्रण हम अभी से अमेरिका के हाथ में क्यों दे रहे हैं? एक बात और समझने की है कि इस समझौते के बाद भारत के पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान तो परमाणु परीक्षण कर सकते हैं लेकिन भारत परमाणु परीक्षण नहीं कर सकेगा. जबतक भारत सरकार इस पर स्पष्टीकरण नहीं देता मैं इस समझौते का विरोधी हूं क्योंकि यह देशहित में नहीं है.”
यह तो रही परमाणु समझौते की बात. जहां तक अग्नि मिसाईल कार्यक्रम प्रभावित होने की बात है उस बारे में भी कुछ तथ्यों को जान लेना जरूरी है. भारत सरकार के इस रोक के बाद अग्नि-4 मिसाईल कार्यक्रम ठप पड़ जाएगा जिसकी मारक क्षमता 15 हजार किलोमीटर है. पहले भारत सरकार ने इस मिसाईल पर काम करने का आदेश दे दिया था जो नयी परिस्थितियों में अपने आप रोक दिया जाएगा. 22 मई 1989 को पहली बार अग्नि रेंज की पहली मिसाईल अग्नि-1 का परीक्षण किया गया था. इसके बाद का अग्नि का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है. अग्नि-1 की रेंज 850 किलोमीटर थी और जहां अग्नि मिसाईल कार्यक्रम पहुंचा है वहां भारत 5500 किलोमीटर की मारक क्षमता हासिल कर चुका है. इस पूरी प्रक्रिया पर अब ग्रहण लगता दिखाई दे रहा है. एक उभरती महाशक्ति की इस लाचारी को उसकी रणनीति कहीं से नहीं कही जा सकती.

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