यह चिट्ठा ही है, चिट्ठी नहीं

जब मैं इस दुनिया में आया तो कई सारे ब्लागरों ने “चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है” वाली उक्ति से मेरा स्वागत किया था. मैं सोचता था कि यह चिट्ठा जगत क्यों है. इसके साथ चिट्ठी-पत्री वाली शब्दावली भी तो प्रयोग की जा सकती है. यह कुलबुलाहट बनी हुई थी जिसने हाल फिलहाल में दम तोड़ दिया है. पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से कुछ अफलातून टाईप लोगों ने खम ठोककर, ललकारते हुए शब्दों की नूरा-कुश्ती की उससे यह साबित हो गया कि यह चिट्ठी नहीं चिट्ठाजगत ही है.
चिट्ठी और चिट्ठा में बुनियादी फर्क है. वैसा ही जैसे पट्ठा और पट्ठी में हो सकता है. चिट्ठी के साथ संवेदनाएं अपने आप जुड़ जाती हैं. चिट्ठे के साथ ऐसी कोई बाध्यता नहीं होती. चिट्ठा है इसका मतलब है कि आप पट्ठों की तरह व्यवहार कर सकते हैं. फुरसतिया ने लिखा भी है कि आप अपनी गर्मी सनसनाते हुए निकाल सकते हैं. लोग वही करते भी हैं. यहां आया था तब और यहां रूक गया तब दोनों के बीच बड़ा बदलाव आ चुका है. ब्लाग बनाया तो जिस तरह लोगों ने स्वागत-सत्कार किया उससे मैं भी उसी तरह शर्माया जैसे कोई नई-नवेली दुल्हन मुंह दिखाई पर शर्माती है. यह लाज-हया दुल्हन की आबरू समझी जाती है. जिसके पीछे स्वाभिमान और प्रोत्साहन का ऐसा पुट छिपा रहता है कि यह लाज-हया और घूंघट कमजोरी नहीं उसकी ताकत बन जाती है.
लेकिन यह सब थोड़े दिनों की बात होती है. इसके बाद अधिकतर घटनाएं वारदात में बदल जाती हैं और सब अपनी-अपनी वास्तविकता पर उतर आते हैं. सास, ससुर, ननद, भैया, भाभी, देवर सभी अपनी व्यावहारिक भूमिका अख्तियार कर लेते हैं और वह सब होने लगता है जिसे हम वास्तविक जीवन कहते हैं. दुल्हन भी लाज-हया को पहले हरसंभव तरीके से बचाने की कोशिश करती है क्योंकि इसके पीछे की ताकत और प्रोत्साहन का अंदाज उसे है. आखिरकार वह भी मैदान में आ जाती है, खुलकर. इसके बाद क्या होता है यह किसी भी आम भारतीय परिवार को देखकर समझा जा सकता है.
फिर भी चिट्ठाकारिता की दुनिया में आपका स्वागत है, क्योंकि यह नियति है. अच्छे-बुरे दौर आयेंगे, जाएंगे लेकिन समय का यह पहिया लगातार चलता रहेगा. टिकेगा वही जो कृष्ण की इस बात को मानता है – सुखे दुखे समेकृत्वा, लाभालाभौ जयाजयौ…….. … .. .

3 thoughts on “यह चिट्ठा ही है, चिट्ठी नहीं

  1. आपका अनुभव जीवन का सार है – कुछ खट्टा कुछ मीठा. और बहुत सारा कड़वा.

    इसी के साथ जीना सीखना होगा मित्र 🙂

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  2. संजयजी, ये बातें कहाँ से निकलीं? चिट्ठाजगत में अबकी आपको किसी ने घेर लिया है क्या?

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