ढाई दिन का आंदोलन और कलाम की विदाई

एपीजे अब्दुल कलाम को दोबारा राष्ट्रपति के रूप में कांग्रेस ने क्यों नापसंद कर दिया जबकि एनडीए और तीसरा मोर्चा दोनों ही उनके नाम पर एकमत थे. अगर आप भूल गये थे तो याद करिए वह समय जब सोनिया गांधी की जगह अचानक मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बन गये थे. वे कलाम ही थे जिन्होंने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया था. इसी समय एक ढा़ई दिन का आंदोलन भी चला था जिसका नेतृत्व गोविन्दाचार्य ने किया था. क्या हुआ था उस समय, एक रिपोर्ट.

वह 16 मई 2004 का दिन था. केवल मौसम ही गर्म नहीं था देश का राजनीतिक माहौल भी उबल रहा था. 13 मई को लोकसभा चुनाव के परिणाम आ गये थे और पहली बार 13 के आंकड़े ने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को धोका दे दिया था. सांकेतिक बढ़त के साथ कांग्रेस भाजपा को “पराजित” कर सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की तैयारियां शुरू कर चुकी थी. राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से सोनिया गांधी की पहली औपचारिक मुलाकात हो गयी थी जिसके बाद 24 अकबर रोड (कांग्रेस कार्यालय) और सोनिया गांधी के आवास 10 जनपथ पर गहमागहमी का माहौल था. लेकिन अचानक ही एक प्रेस कांफ्रेस ने पूरे माहौल को बिगाड़कर रख दिया.

दिल्ली स्थित 35, मीना बाग फ्लैट्स के एक अहाते में सुबह से हलचल थी. दर्जनों टीवी और प्रिंट के पत्रकार वहां मौजूद थे. कैमरों की झड़ी लगी हुई थी. सामने की तरफ दो कुर्सियां और एक मेज रखी. थोड़ी ही देर में भाजपा के पूर्व महासचिव गोविन्दाचार्य एक प्रेस कांफ्रेस करनेवाले थे. प्रेस कांफ्रेस शुरू हुई और उनके साथ मंच पर गांधीवादी चिंतक और इतिहासकार धर्मपाल भी बैठे.गोविन्दाचार्य ने कहा कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री की दावेदारी करती हैं तो वे इस बात का विरोध करेंगे. देशभर में इसके खिलाफ आंदोलन चलाया जाएगा. आनन-फानन में जिस मंच की घोषणा की गयी उसका नाम था- राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन. एक सफेद कपड़े पर नीली स्याही से लिखे गये ये तीन अक्षर क्या सचमुच सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने से रोक सकते थे?

यह उन तीन अक्षरों का कमाल था या फिर नियति लेकिन परिणाम वही हुआ जिसके लिए इस आंदोलन की शुरूआत की गयी थी. गोविन्दाचार्य को शुभचिंतकों की कमी नहीं है. मीडिया में भी उनके ऐसे शुभचिंतकों की भरमार है. जिन्होंने उनके लिए यश-अपयश दोनों की व्यवस्था करते रहते हैं. यह उनके शुभचिंतकों की सुभिच्छा थी या फिर मुद्दे की अहमियत लेकिन उस प्रेस कांफ्रेस को कई टीवी चैनलों ने देशभर में सीधा प्रसारित किया. माहौल बनाने के लिए यह कदम पर्याप्त था. अभी प्रेस कांफ्रेस खत्म भी नहीं हुई थी कि देशभर से लोगों के फोन आने लगे कि वे इस मुहिम में गोविन्द जी के साथ है. किसी ने गौहाटी से फोन किया तो किसी ने बनारस से. प्रेस कांफ्रेन्स के बाद आनन-फानन में एक टीम बन गयी और उसकी वहीं पर बैठक भी हो गयी. इस बैठक में लगभग 45-50 लोग थे. तय हुआ कि 18 मई को जन्तर-मंतर पर एक धरना और मार्च आयोजित किया जाएगा. इसके बाद राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपने के लिए कुछ लोग जाएंगे. पत्रकारों में गोविन्दाचार्य के मित्र और जनसत्ता समाचार सेवा के संपादक रह चुके रामबहादुर राय पूरे अभियान की शक्ल-सूरत बनाने में लगे हुए थे. जो लोग गोविन्दाचार्य को जानते हैं वे जानते हैं कि रामबहादुर राय और गोविन्दाचार्य की जोड़ी ने बिहार में छात्र आंदोलन को सफल बनाया था जिसका नेतृत्व खुद जय प्रकाश नारायण कर रहे थे. अगले दिन यह भी पता चला कि गोविन्दाचार्य और रामबहादुर राय ने आपस में बातचीत कर तय किया था कि सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनाने के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन चलाना चाहिए. प्रेस कांफ्रेस में धर्मपाल का आना भी रामबहादुर राय का ही प्रयास था. यह बात अलग है कि धर्मपाल के इस कदम को मठी गांधीवादियों ने उनके खिलाफ हथियार की तरह इस्तेमाल किया.गांधीवादी संस्थाओं में आये छीजन का खामियाजा धर्मपाल को भुगतना पड़ा फिर भी उन्होनें कभी यह नहीं कहा कि उन्होंने जो कदम उठाया वह गलत था. गोविन्द जी की प्रेस कांफ्रेन्स का यह असर हुआ कि कई सांसद और वरिष्ठ नेता अपने से पहल करके उनके पास आये और हर तरह से मदद करने का भरोसा दिलाया. कुछ ने तो तुरंत आर्थिक मदद भी की और कहा कि आगे जरूरत पड़ने पर वे हर तरह से इस आंदोलन के साथ रहेंगे. एक-दो पूर्व प्रधानमंत्री भी अपने-अपने स्तर पर संदेश दे रहे थे कि जैसे भी सोनिया गांधी को देश का प्रधानमंत्री बनने से रोका जाना चाहिए. अफवाहें यह भी थीं कि कांग्रेस के अंदर भी एक बड़ा धड़ा ऐसा था जो सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनते हुए नहीं देखना चाहता. मीडिया द्वारा इस मुद्दे को जिस तरह से उठाया गया उससे यह साफ हो गया था कि मीडिया में भी बड़ा तबका है जो विदेशी मूल के मुद्दे को महत्व देता है. 18 मई की सुबह जंतर-मंतर कुछ 100-150 लोग थे. लेकिन 12 बजते-बजते यह संख्या 1500 से ऊपर पहुंच गयी. यहां जो लोग आये थे वे अपनी पहल पर आये थे. कोई नहीं चाहता था कि एक विदेशी मूल की महिला प्रधानमंत्री बने. जंतर-मंतर से एक दल ज्ञापन लेकर राष्ट्रपति निवास गया. आमतौर पर जैसा होता है कि अगर आप राष्ट्रपति को ज्ञापन देते हैं तो वहां एक अधिकारी होता है जो मोहर लगाकर आपको ज्ञापन की एक प्रति सौंप देता है. ज्ञापन लेकर जो लोग गये थे उन्होंने भी यही किया. अधिकारी को ज्ञापन सौंप दिया. साथ ही यह भी निवेदन किया कि वे राष्ट्रपित से मिलना चाहते हैं. राष्ट्रपति ने फौरन उन्हें दोपहर बाद मिलने का समय दे दिया.

दोपहर बाद राष्ट्रपति से जो लोग मिलने गये उनमें गोविन्दाचार्य के साथ एक वकील मीनाक्षी लेखी भी थीं. इसके अलावा एक-दो लोग और थे. मीनाक्षी लेखी ने उस समय जो तर्क दिया वह कानूनी रूप से बहुत मजबूत था. उन्होंने कहा कि आमतौर पर हम दूसरे देश के नागरिकों को वही सुविधा देते हैं जो संबंधित देश हमारे नागरिकों को अपने देश में देता है. इटली में किसी भारतीय मूल के व्यक्ति को चुनाव लड़ने पर रोक है ऐसे में भला हम उसके मूल नागरिक को अपने देश का प्रधानमंत्री कैसे बना सकते हैं? ये लोग अपनी बात राष्ट्रपति के सामने रखकर वापस आ गये. राष्ट्रपति ने गोविन्दाचार्य से कहा था कि मैं वहीं करूंगा जो उचित होगा. राष्ट्रपति ने उस समय क्या कवायद की और सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में न्यौता न देने के लिए किन बातों को अपना आधार बनाया, यह तो तभी पता चलेगा जब वे खुद इस मुद्दे पर कुछ बोलेंगे या लिखेंगे. लेकिन इतना तय है कि उन ढाई दिनों में राष्ट्रपति कलाम ने हर तरह के लोगों से बात की थी. उसी दिन यानि 18 मई को 24 अकबर रोड पर भी दिनभर नौटंकी चलती रही. कांग्रेस की चाटुकारी राजनीति का चरम उस दिन वहां देखने को मिल रहा था. पूरी सड़क पर कांग्रेस कार्यकर्ताओं का हुजूम टहल रहा था. एक गंगाचरण राजपूत नामक व्यक्ति ने तो अपने कनपटी पर रिवाल्वर तान ली थी कि अगर सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बनती तो वह अपनेआप को खत्म कर लेगा. बाद में उसने इसलिए कांग्रेस छोड़ दी क्योंकि उसके भाई को कांग्रेस से टिकट नहीं दिया गया. बहरहाल पूरे दिन गहमा-गहमी का माहौल बना रहा. इसी बीच सोनिया गांधी की एक और मुलाकात राष्ट्रपति से होती है. इस बार उनके साथ मनमोहन सिंह भी गये थे. संभवतः तब तक राष्ट्रपति ने यह साफ कर दिया था कि वे प्रधानमंत्री के रूप में सोनिया गांधी को शपथ लेने के लिए नहीं बुला सकते. इसलिए इस बार मिलने जाते समय सोनिया गांधी मनमोहन सिंह को अपने साथ ले गयी थीं. शाम को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक हुई जिसमें सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद से अपनी दावेदारी वापस ले ली थी. इसके बाद यहां भी मान-मनौवल का एक नाटक चला जिसमें अजीत जोगी जैसे चारण-भाटों ने चापलूसी की नयी मिसाल पेश की. यह साबित करने की कोशिश की गयी कि सोनिया गांधी ने बहुत बड़ा त्याग किया है.

सोनिया गांधी के इस इंकार को देशभर में प्रचारित किया गया कि सोनिया गांधी ने कोई महान त्याग किया है. यह बात छिपा ली गयी कि कई तरह की कानूनी अड़चनो के कारण सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया गया था. उनकी नागरिकता पर भी सवाल खड़े किये गये और कहते हैं राष्ट्रपित से अपनी मुलाकात में सुब्रमण्यम स्वामी ने ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत किये थे जिससे सोनिया गांधी की नागरिकता और संसद में उनके हलफनामें पर सवाल खड़ा होता था क्योंकि उनमें जानकारियां झूठी थी. उस दिन देर रात यही सब नाटक चलता रहा. सोनिया गांधी ने अपने भाषण में साफ कह दिया था कि उन्होंने अपने बच्चों से राय-मशविरा कर लिया है और अपने प्रधानमंत्री न बनने पर कोई पुनर्विचार नहीं करेंगी. अगले दिन यानि 19 मई की रात गोविन्दाचार्य के ऊपर कुछ लोगों ने हमला भी किया जब वे वीपी हाऊस से कहीं बाहर जा रहे थे. ये लोग भूपिन्दर सिंह हुड्डा के समर्थक थे. उनका कहना था कि यही वह आदमी है जिसने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोक दिया. संभव है हुड्डा को हरियाणा का मुख्यमंत्री बनाते समय इस बात का भी ध्यान रखा गया हो. हालांकि गोविन्दाचार्य को कोई चोट नहीं आई और उन्होंने इस बात को ज्यादा तूल भी नहीं दिया. 19 मई को दोपहर बाद 10 जनपथ पर एक बैठक हुई जहां प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह का नाम तय हुआ. और मनमोहन सिंह के नाम की घोषणा के साथ ही तात्कालिक तौर पर राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन भी समाप्त हो गया. जो लोग भी सक्रिय हुए थे किसी को आंदोलन खत्म होने का दुख नहीं था. उल्टे इस बात की खुशी थी कि ढाई दिन के इस आंदोलन के हाथ बड़ी सफलता प्राप्त हुई है. इस पूरे घटनाक्रम का उल्लेख यहां करने का कारण है. पहला आपको अब तक पता चल गया होगा कि सोनिया गांधी या कांग्रेस के लिए राष्ट्रपति उम्मीदवार के रूप में कलाम क्यों पसंद नहीं आये. दूसरा, सोनिया गांधी कोई त्याग की देवी नहीं हैं. वे ताकत की राजनीति करती हैं. अगर उन्हें सत्तामोह नहीं होता तो वे यूपीए अध्यक्ष पद को प्रधानमंत्री के समानांतर न बना देंती. मनमोहन सिंह ऐसे कठपुतली प्रधानमंत्री हैं जिसकी डोर सोनिया गांधी के हाथ में हैं. अब यह सबकुछ साबित हो गया है. कलाम का वह सत्य उनके दोबारा राष्ट्रपति पद के चुनाव में सबसे बड़ी बाधा बन गया जिसके पालन से भारत के स्वाभिमान की रक्षा हो सकी. हो सकता है कलाम ने उस समय वैसा ही व्यवहार किया होता जैसा सोनिया गांधी अपेक्षा करती थीं तो आज कलाम शायद दोबारा राष्ट्रपति पद के दावेदार होते क्योंकि यह कांग्रेस भी जानती है कि कलाम की लोकप्रियता और सच्चरित्रता का कोई जोड़ नहीं है.

7 thoughts on “ढाई दिन का आंदोलन और कलाम की विदाई

  1. लेकिन फायदा क्या हुआ। वो सुपर प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रही हैं। वो ये तय कर रही हैं कि कौन बनेगा देश का राष्ट्रपति। वैसे आपने पर्दे के पीछे की अच्छी जानकारी दी है।

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  2. आपसे ऐसी उम्मीद न थी,

    शायद आपको पता हो कि राष्ट्रपति भवन ने एक स्पष्टीकरण दिया था जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति कलाम की सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री बनने की बात को लेकर सोनियाजी से किसी कानूनन अडचन को लेकर कोई भी बात नहीं हुयी थी । उस स्पष्टीकरण में ये भी कहा गया था कि कलाम साहब ने कभी भी ये नहीं कहा कि वे सोनिया गाँधी को सरकार बनाने के लिये आमंत्रित नहीं करेगें । आप अपने इस दावे के लिये कोई ठोस प्रमाण दे सकते हैं?

    शर्म की बात है लोग मात्र किसी की निन्दा करने के लिये ऐसे झूठे तर्क ईजाद कर लेते हैं ।

    आप कहीं से सुनी हुयी अफ़वाह जो ज्यादा वरीयता देंगे या राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक स्पष्टीकरण को?

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  3. बहुत ही शानदार लेख, पूरे मामले की सच्चाई से रुबरु करवाने के लिए धन्यवाद!

    यह बात सौ फीसदी सच है कि प्रधानमंत्री बनने में आने वाली अड़चनों के चलते ही सोनिया गांधी ने त्याग का नाटक रचा।

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  4. मैंने जो कुछ लिखा है उसका आधार कोई अफवाह नहीं है. दूर से ही सही मैं खुद उस पूरी प्रक्रिया से जुड़ा हुआ था. संकट यह है कि राजनीति में जो बताया जाता है वह होता नहीं है और जो होता है वह बताया नहीं जाता.
    सोनिया गांधी के बारे में मैं क्या दुराग्रह करूंगा. मेरी क्या बिसात. लेकिन इतिहास केवल वह नहीं होता जो राजा लोगों के इशारे पर लिखा जाता है. इतिहास वह भी होता है जो राजपन्नों पर दर्ज नहीं होता.

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  5. sanjay ji ,
    rajniti me bhi aur kut niti me bhi jo bahar aata hai wah sach nahi hota yaki pura sach nahi hota.kahi padha tha ki soniyaji k pita double agent the.politicsparty.com pr to soniyaji k jijaji ko do deso ke prime ministers ke assesintion ke liye jimmewar thahrane ki kosis ki gyee hai . aap ke pas koi khulasa ho to krupya ek article blog per dale.parde ke pichhe k khulase des hit me bahut jaruri bhi hote hain.

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  6. Apka lekh suni sunai bat per hi likha gaya hai esa koi prman apni nai diya jisse apki bat mai vajan lage jin mahanubhav ko apene apne lekh ka kendrbindu banaya hai unki khud ki visvnjyta kasi hai pura Bharat janta hai

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  7. Jo log yeh kah rahe ki suni sunai baat reporter ne likhi hai we log dilli ke buddha garden ke hero hai.Mai khud us pure dhai din ke Andolan me tha. us samay ke tv channels ki clipping se ise confirm kar sakte hai.Dhanyawad.

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