सन 2052 का एक दिन-II

आप लोगों को एक बात मैं बता दूं मेरी जवानी के दिनों (21 सदी की शुरूआत में) तकनीकि को जीवन में शामिल करने के बारे में बहस होती थी. तब इस बारे में विपक्ष कम ही था. लगभग आम राय थी कि तकनीकि का जीवन में दखल होने दीजिए. उन दिनों हमनें न जाने कैसे-कैसे औजार बनाए, साफ्टवेयर विकसित किये. फौरी तौर पर हमें उसका फायदा भी हुआ. लेकिन कहते हैं बड़े से बड़े बांध में आप एक सुराख कर दें बांध अपने आप बह जाएगा. आज तकनीकि की इस उन्नत अवस्था में पहुंचने के बाद मुझे यह बात ठीक लगती है. अब हम तकनीकि का उपयोग नहीं करते, तकनीकि हमारा उपयोग करती है. हमारे जीवन का विस्तार उतना ही है जितना तकनीकि हमको अवसर देती है. अब नैतिक और अनैतिक की बहस का कोई मतलब नहीं है. आज हम लोग जो बहस करते हैं वह है जरूरी और गैर-जरूरी. अगर कोई वस्तु या फिर विचार हमारे लिए जरूरी है तो हम उसका उपयोग करते हैं, नहीं जरूरी है तो उसके बारे में सोचते तक नहीं है.
आज तकनीकि को सीमित करने के लिए बहस चलती है. लेकिन हमें नहीं पता कि हम इसे कैसे सीमित कर सकते हैं. हमने तकनीकि को आधार बनाकर दुनिया की सूरत इतनी बदल दी है कि वापस जाने के सारे रास्ते बंद हो गये हैं. आज मैं सोचता हूं कि उन दिनों में जब तकनीकि को जीवन में प्रवेश देने की होड़ मची हुई थी तब हम सोच-समझ कर कदम उठाते तो आज दुनिया की शक्ल कुछ और होती. आप सोच रहे होंगे मैं कोई फंतासी लिख रहा हूं. ऐसा नहीं है. मैंने दुनिया के दो रूप देखे हैं. मैं इस बात में सक्षम हूं कि अपने विवेक के आधार पर दुनिया के दोनों रूपों का विश्लेषण कर सकूं. वही मैं कर रहा हूं. मेरे जीवन में गैजेट्स की कमी नहीं है. सुबह उठने से लेकर रात सोने तक मैं दिनभर अपने गैजेट्स के भरोसे सारा काम करता हूं. लेकिन न जाने क्यों जीवन में सदैव एक अभाव खटकता रहता है. क्या ऐसा है जो मेरे पास नहीं है?
जैसा मैंने पहले आपको बताया था कि अब सक्रियता के मायने बदल गये हैं. दूरियों के पैमाने बदल गये हैं और बहुत सी परिभाषाएं वह नहीं है जो आज से पचास साल पहले हुआ करती थी. अब हम ज्यादा स्वस्थ हैं. हो सकता है मेरे जीते-जी यह तकनीकि न आ सके लेकिन अगले पचास सालों में हम तकनीकि रूप से इतने विकसित होंगे कि हम नया शरीर धारण कर सकते हैं. संभवतः यह तकनीकि का चरम होगा. आज इतना तो संभव है कि हम अपने उतकों को ज्यादा लंबे समय तक सक्रिय रख सकते हैं और इसका परिणाम यह है कि हमारी औसत उम्र 100 साल हो चुकी है. मुझे अपने जीवन के बारे में खास संदेह नहीं रहता. मैंने देखा है मेरी दादी कैसे 65 साल की उम्र में अकाल मौत मरी थी. उस समय तो मेरा बचपना था और हम एक देहात में रहते थे. एक स्थानीय डाक्टर जिसे शरीर विज्ञान का ठीक से कखग भी नहीं आता था, उसके भरोसे ही बैठे रहे. दो दिन में उसने तड़पकर दम तोड़ दिया और सबने मान लिया कि यह उसकी स्वाभाविक मौत थी. आज भी मैं उस घटना को नहीं भूला हूं हालांकि उस बात को 60 साल गुजर गये हैं. कभी-कभी लगता है कि काश चिकित्सा-विज्ञान उस समय थोड़ा विकसित होता तो मैं दस-बीस साल और अपनी दादी की ममता पा सकता था. मेरे पोतों को मेरे बारे में कोई खास चिंता नहीं है. वे जानते हैं अभी दादा बीस-पच्चीस साल से पहले नहीं जाने वाले.
आपको एक बात बताऊं आज वह चिकित्सा विज्ञान नहीं है जिसके भरोसे हमने अपने डेढ़ सौ साल बर्बाद किये. पिछले 50 साल में आयुर्वेद और जीन थेरेपी के क्षेत्र में हुए उल्लेखनीय प्रयोगों के कारण हम स्वास्थ्य की बिल्कुल नयी अवधारणा के साथ जी रहे हैं. आयुर्वेद को नये अर्थों में समझा गया है. पश्चिम के वैज्ञानिकों ने त्रिदोष पद्धति को आधार बनाकर जो खोज की है उसने आदमी को सौ साल की पक्की उम्र दे दी है. लेकिन यह सारे प्रयोग बहुत वैज्ञानिक और आधुनिक तरीके से होते हैं. पंचतत्व की जिस अवधारणा को हम लंबे समय तक पोंगापंथी कहते रहे आज चिकित्सा और स्वास्थ्य विज्ञान का आधार बना हुआ है. हां अब इसके लिए हमें किसी वैद्य की जरूरत नहीं होती. मेरा सुपर कम्प्यूटर इसका सारा नियंत्रण अपने पास रखता है.
तकनीकि की जटिलता का ही परिणाम है कि हमारी उम्र भले बढ़ गयी हो लेकिन जीने का मकसद खत्म हो गया है. मुझे कोई पूछे कि मैं क्यों इतना जीना चाहता हूं, तो मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं है. बहुतों के पास नहीं है. सत्य की खोज में निकले थे और आत्मा को हार आये. अब सत्य मिल गया है तो उसका करें क्या? सोचने-समझने और निर्णय करने तक का काम हमनें अपने सुपर कम्पूटर्स को दे दिया है. फिर हमारे होने का मतलब क्या है. आज जब जीने की उन्नत विधियां विकसित हो चुकी हैं तो जीने की इच्छा ही मर रही है. यह तकनीकि का ही असर है. तकनीकि विकास की अंधी दौड़ में हम वह पुल नहीं बना सके जो नदी के इन दो पाटों विधि और इच्छा के बीच सामंजस्य बैठाकर रखता. मुझे याद है लंबे समय तक क्लोन को विकसित करने के प्रयोगों को रोककर रखा गया था. इधर कई सरकारों ने उसपर काम शुरू कर दिया है. अभी रोबोट से हम उबरने की सोच रहे थे अब हमारे सामने एक और नयी चुनौती खड़ी हो गयी है.
बहरहाल, आपसे कहने के लिए मेरे पास बहुत कुछ है. बूढ़े आदमी को तब भी बहुत काम नहीं होता था, आजकल तो बिल्कुल भी नहीं होता. अभी तो मैं जा रहा हूं अबूझमाड़ जो कि बस्तर का एक आदिवासी इलाका है. सरकार ने उसे प्रोटेक्टेड एरिया घोषित कर रखा है ठीक वैसे ही जैसे वन्यजीवन बचाने के लिए पहले बड़े-बड़े नेशनल पार्क बनाये जाते थे. अबूझमाड़ ह्यूमन नेशनल पार्क है. यहां आज भी आदिवासी संरक्षित हैं और उसी तरह जीते हैं जैसे सौ साल पहले जीते थे. यहां विकास और तकनीकि की मार न पहुंचे इसलिए सरकार ने संरक्षित क्षेत्र घोषित कर रखा है. देश-दुनिया से लोग यहां सफारी करने और छुट्टियां मनाने आते हैं. मैं भी एक-दो दिन में वहां जाने वाला हूं. थोड़े दिन प्रकृति के संरक्षण में रहने और अपने अतीत को देखने की इच्छा मैं नहीं रोक पा रहा हूं. इसलिए अब मैं तैयारी करने जा रहा हूं.

2 thoughts on “सन 2052 का एक दिन-II

  1. सत्य की खोज में निकले थे और आत्मा को हार आये. अब सत्य मिल गया है तो उसका करें क्या?

    -वाह, बहुत सुन्दर और गहरी बात कह कर जा रहे हैं.

    बस्तर घूम आईये फिर वहाँ के संस्मरण सुनाईयेगा.वहाँ से तस्वीरें जरुर लायें.हमें तो वहाँ गये एक अरसा बीता. शुभकामनायें मंगलमयी यात्रा के लिये.

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  2. अबूझमाड़ ह्यूमन नेशनल पार्क घूमकर आइये और फिर वहां बिताये हुए दिन पर पोस्ट लिखिए। पोस्ट का इंतज़ार रहेगा।

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