गोत्र को गाली देनेवालों, सुनो

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

सबसे पहले मैं अपना परिचय देता हूं-
नाम – संजय
जाति- तिवारी (तिवारी में भी “मणि” तिवारी)
वर्ण- ब्राह्मण (सरयूपारीण)
धर्म- सनातन (वैष्णव)
गोत्र – शांडिल्य

इतने के बाद भी एक आखिरी सवाल लोग और पूछते हैं, तीन के ब्राह्मण हो या तेरह के? तो मैं आपको बता दूं कि मुझे यह बताया गया है कि मैं तीन का ब्राह्मण हूं. क्योंकि गर्ग, गौतम और शांडिल्य गोत्र तीन में आते हैं.

मेरे इस परिचय से मुझे जाहिर तौर पर श्रेष्ठता का बोध होता है और सुधारवादी लोगों के दृष्टिकोण से मैं ब्राह्मणवादी मानसिकता का आदमी बन जाता हूं. आज की शहरी जीवनशैली में बहुतों के लिए इन बातों का कोई मतलब नहीं है वैसे ही आज मेरे लिए भी इस परिचय का मतलब नहीं रह गया है. रोजी, रोटी, संबंध और व्यवहार में इन विश्लेषणों का कोई उपयोग नहीं है. फिर भी क्या इस वर्गीकरण को खारिज किया जा सकता है ? एक बार कुछ दिनों के लिए मैंने भी अपनी जाति छोड़ दी थी. तब एक बुजुर्ग समाजवादी ने मुझे बहुत डांटा था. उसने कहा यह सब पागलपन क्यों कर रहे हो. हालांकि तब भी उसकी बात का मेरे ऊपर कोई खास असर नहीं हुआ था लेकिन आज मुझे लगता है कि उन्होंने सही कहा था. जाति छोड़ने का नाटक पागलपन ही है. ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि इस व्यवस्था में आये विकार हमें इससे अलग करने के लिए प्रेरित करते हैं. रास्ता क्या है? क्या हम अलग हो जाएं या फिर इसके विकार दूर करें?

हरियाणा में सगोत्रीय विवाह के कारण एक जोड़े की हत्या कर दी जाती है तो कुछ लोगों ने इसे बर्बरता करार दिया. मैं भी इसे बर्बरता मानता हूं लेकिन वैसे नहीं जैसे और लोग मान रहे हैं. गोत्र को गाली देते हुए मैं इसे बर्बरता नहीं कह सकता. यह वर्तमान अंग्रेजी शिक्षा का प्रभाव है कि हमारे लिए कुल, गोत्र आदि का मतलब समाप्त हो गया है. हम भी जाति और जनपद को उसी तरह गाली देने लगे हैं जैसे अंग्रेज बहादुर देकर चले गये. सजातीय गोत्र में शादी न करने के पीछे कारण यह है कि हम एक ही ऋषि की संतान हैं. इसलिए आज उस गोत्र का कोई भी व्यक्ति कितनी भी दूर क्यों न हो रिश्ता भाई-बहन का होता है. इसको कोई पोंगापंथी नजरिये से देखना चाहे तो यह उसकी समझ है मैं इसे दूसरे नजरिये से देखता हूं. हमारे बंधुत्व को बढ़ाने में यह एक कारगर औजार है. आज जब अंग्रेजी शिक्षा पद्धति के उपयोग से हमारी समझ छिन्न-भिन्न् करने की कोशिश की जा रही है ऐसे औजारों के बारे में हमें नये सिरे से सोचने और समझने की जरूरत है.

बहुत समय नहीं गुजरा जब योग और आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा के सामने तुच्छ और हीन माना जा रहा था. पिछले 10 सालों में ऐसा क्या हो गया कि योग और आयुर्वेद इलिट क्लास की चिकित्सा पद्धति बन बैठा. त्रिदोष और पंचमहाभूत की अवधारणा को हमने अचानक ही वैज्ञानिक मान्यता क्यों दे दी? क्योंकि पश्चिम ने उसे नये सिरे से अपना लिया. पश्चिम ने कहा कि योग और आयुर्वेद अच्छा है. फिर हमें भी होश आया कि योग-आयुर्वेद तो हमारा अपना है. नहीं तो समाजवादी अर्थव्यवस्था और सोच ने गांव-गांव से वैद्य परंपरा को खत्म कर दिया था. आज गांवों में वैद्य उपनाम बचे हैं लेकिन उस घर का आदमी अपनी रोजी-रोटी चलाने के लिए मेहनत मजदूरी करता है. मैं यह नहीं कहता कि वैद्यकी में दोष नहीं आये होंगे. लेकिन दोष निवारण की जगह उस विधा को ही समाप्त कर देना कहां की बुद्धिमानी है?

कुछ इतिहासकार गोत्र, जाति व्यवस्था की मनमानी व्याख्या करते हैं. उनके अपनी जानकारी के स्रोत क्या हैं? वे वही समझते हैं जो उन्हें समझाया जाता है. इसलिए ऐसे इतिहासकारों को बहुत अहमियत देना हमारी कुंद समझ का ही उदाहरण है और कुछ नहीं. गोमांस खाने का जो सवाल रवीश कुमार ने अपने ब्लाग पर उठाया है, इसे मैं उनकी नासमझी ही कहूंगा कि बिना समझे औरों की ही तरह चार अक्षर पढ़कर उन्होंने इतनी बड़ी बात कह दी. गो का अर्थ गाय है लेकिन हमारे शरीर में भी एक गोस्थान है. जिसतक पहुंचने के लिए खेचरी मुद्रा का सहारा लेना पड़ता है. लंबे समय के अभ्यास के बाद हम अपने शरीर के भीतर ही एक ऐसे अमृत कोष को खोज लेते हैं कि हमारी भूख-प्यास पर नियंत्रण हो जाता है. हो सकता है इसे ही गोमांस भक्षण कहा जाता हो. मैं भी एक ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ हूं लेकिन मैंने गाय को कर्मणा मां के रूप में ही देखा है.

जाति और जनपद इस देश की एकता के दो सबसे महत्वपूर्ण स्रोत हैं. वर्तमान चुनौतियों और समस्याओं का समाधान भी इसी व्यवस्था में छिपा है. जाति व्यवस्था का सबसे बड़ा योगदान यह था कि जन्म से आपको रोजगार की गारंटी होती थी. अगर आपमें क्षमता होती थी तो आप नये तरह के रोजगार को अपना सकते थे, उसके लिए कोई रोक-टोक नहीं होती थी. मैं पत्रकार न रहूं तो पूजा-पाठ कराने का परंपरागत व्यवसाय मुझे विरासत में मिला है लेकिन उसे ही करने की मेरे ऊपर कोई बाध्यता नहीं है. इसी तरह भूमंडलीकरण के इस युग में अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए हम पुनः जनपद व्यवस्था की ओऱ लौंटेंगे. मनुष्य का मानसिक विस्तार जितना अधिक है उसकी शारीरिक क्षमता उतनी ही सीमित. भूमंडलीकरण के इस युग में हम अपने लिए कोई मोहल्ला क्यों खोजते हैं? क्योंकि भूमंडलीकरण हमसे हमारी पहचान छीन लेता है और मोहल्ला, गांव और जनपद हमें हमारी पहचान देता है.

गोत्र को गालीदेनेवाले गोत्र को जैसा समझते हैं, वह वैसा है नहीं. गोत्र के निहितार्थ बिल्कुल अलग हैं. भूमंडलीकरण पर 10 साल से काम करते हुए मुझे यही समझ में आ रहा है कि हमारे बीच से ही कुछ लोगों को तैयार कर दिया गया है जो अपनी ही जड़ पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं. ऐसा करते हुए उन्हें लगता है कि वे कोई क्रांति कर रहे हैं इसलिए ये लोग किसी भी आलोचना-प्रत्यालोचना से रुकनेवाले नहीं. लेकिन वह समय आ रहा है जब हम खोज-खोज कर जाति, गोत्र, जनपद की सीमाओं को अपना आधार बना लेगें. जो ऐसा नहीं करेगा लोग समझेंगे इसकी समझ में खोट है. भूमंडलीकरण ने इसकी पृष्ठभूमि तैयार कर दी है. ठीक वैसे ही जैसे एलोपैथी ने आयुर्वेद का रास्ता साफ कर दिया था.

11 thoughts on “गोत्र को गाली देनेवालों, सुनो

  1. आप जिस खेचरी मुद्रा द्वारा गोमांस भक्षण की बात कर रहे हैं वह हठ योग प्रदीपिका में आप को मिलेगा.. जो आठवीं नौवीं शताब्दी में गोरखनाथ और मत्स्येन्द्रनाथ के होने के बाद ग्यारवीं बारहवीं शतब्दी में लिखी गई.. पा जिस गोमांस भक्षण की बात रवीश ने की या अम्बेदकर अपनी पुस्तक अछूत में बताते हैं.. वह वैदिक काल में किया गया गोमांस भक्षण है..

    आहत न हो.. इतिहासकारों को गाली न दें.. संयत स्वर से सुनें, सवाल करें.. अपने धर्मग्रंथ पढ़ें.. किसी को गाली देने की ज़रूरत न होगी.. और न ये कहने की कि वो इतिहासकार किसी के सिखाने पर बोल रहा है.. और उसके स्रोत क्या है..

    अछूत सीरिज के दौरान मैंने अम्बेदकर द्वारा दिये गये हर उद्धरण को ऋग्वेद और मनुस्मृति से मिलाया है.. हर उद्धरण सौ प्रतिशत सही है.. हिन्दू, ब्राह्मण, यानी हमारे आपके पूर्वज.. गोमांसाहारी थे..विश्वास न हो तो मेरे ब्लॉग पर ऋगवेद की उन ऋचाओं की जो क्रमसंख्या दी है.. उस से मिला कर खुद देख लें..

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  2. यह अभय का शोध कार्य ब्लॉग पोस्ट से हट कर टिप्पणियों में फैल गया है 🙂

    संजयजी आपने अच्छा लिखा है. ग्लोबलाइजेशन भले हो जाये, तलाशते हम अपनी जड़ें ही हैं.

    3/13 का आगे भी कोई स्प्लिटिंग है – अर्थात 3 में भी 3+ या 3- के ब्राह्मण!
    मेरे बाबा जिदा होते तो आपको निहायत पसन्द करते. वे बेचारे जिन्दगी भर ‘कौन बाभन?’ के प्रश्न ही लोगों से करते रहे!
    थे बड़े संतपुरुष.

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  3. भाइ तब भी तो तुम्हारे जैसे लेखक रहे होगे,उन्होने जोड तोड कर गौ मांस खाने का कार्य्क्रम अपनी सुविधानुसार जोड लिया होगा.अब आप उसी का उदाहरण पढा रेह हो…?

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  4. संजय जी ब्राह्मणों की सहज परशुराम प्रवृत्ति के कारण ही राम से साक्षातकार हो पाया है इसलिए आपकी आक्रामकता जायज है । अभय भाई की बातों को भी सुनें । नाम के पीछे तिवारी, पाण्‍डेय लिखना कितना दुखदायी हो जाता है इसका अनुभव मुझे है पर हमे अपना काम करना है वर्तमान में कैसे विचार पल व पनप रहे है इसका आभास यहां हो ही रहा है ।

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  5. भई, अब तो अन्तर्राष्ट्रीय अदालत भी ‘गोत्र’ को मान्यता देने लगी हैं। गोत्र = गुणसूत्र = D.N.A. डीएनए टेस्ट के द्वारा ही पता लगाया जाता है कि ‘अमुक’ बालक उक्त व्यक्ति का बेटा है या नहीं। समग्र विज्ञान अब मानने लगा है कि वंशबीज (वीर्य) के आधार पर ही व्यक्ति का शरीर(रक्त), मन, चरित्र, ज्ञान, शक्ति सब कुछ के विकास होता है, जिसका प्रभाव सैंकड़ों पीढ़ियों तक अमिट रहता है।

    एक ओर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लुप्त होती जा रहे पशुओं की प्रजातियों (शेर, डानयासोर, सफेद हाथी, पक्षियों, साँपों, मेंढकों और कीट पतंग तक)के वंश बचाने/बढ़ाने के लिए अनेक कानून बन रहे हैं, करोड़ों/अरबों खर्च किए जा रहे हैं। देशी गाय की आनुवंशिकी को बचाने के लिए उतने प्रयास नहीं हो रहे। अधिकांश गायों का प्रजनन ‘इंजेक्शन’ माध्यम से करके जर्सी बनाया जा रहा है।

    दूसरी ओर अन्तर्जातीय विवाहों, तलाकों, द्वितीय, तृतीय, बहु-विवाहों के कारण अनेक पिता और अनेक माँ होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं और सन्तानें “वर्णसंकर” मानव बनती जा रही है।

    अतः ‘गोत्र’ को गाली देनेवाले क्या ‘अगोत्री’ या ‘वर्णसंकर’ कहलाने के हकदार नहीं हैं?

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  6. संजय जी, आपके इस लेख के शीर्षक से ऐसी भ्रान्ति होती है कि आपने केवल गोत्र को “गाली देने वालों” को कुछ सुनाने के लिये इस लेख को लिखा है. ऐसे शीर्षक से आपके लेख और उसमें प्रस्तुत तर्कों का वजन हल्का हो जाता है. मैं गोत्र को गाली नहीं देता, फिर भी आपकी बात सुनी और महसूस किया कि लेख विचारपूर्ण है और इस पर गहराई से चिंतन की आवश्यकता भी है.

    मुझे इस सम्बन्ध में ज्ञान की कमी है, अत: कुछ जिज्ञासाएं हैं, यदि समाधान हो सका तो बहुत प्रसन्नता होगी:

    १. आपने अपनी जड़े खोदने का आह्वान किया, पर जड़ें खोदते-खोदते कितना पीछे जायें? उस दृष्टिकोण से सभी मनुष्य भाई-बहन नहीं हुये क्या?

    २. यदि अपने गोत्र के बाहर का विवाह ही स्वीकार्य है तो उन्हीं कारणों के आधार पर अपनी जाति व धर्म के बाहर किया गया विवाह और भी स्वीकार्य होना चाहिये. परन्तु जैसा कि हम अपने समाज में देखते हैं, ऐसा कदापि नहीं हैं. क्या आप प्रकाश डाल सकते हैं इस विरोधाभास पर.

    ३. हरिराम जी की टिप्पणी से एक और जिज्ञासा उतपन्न हुई. वर्णसंकर होने का अर्थ क्या है, और वर्णसंकर होने में क्या बुराई है. प्रसिद्ध वैज्ञानिक मेण्डलीफ़ ने जाने कितने प्रयोग किये इस बारे में. हम आप जो गेंहूं-चावल खाते हैं, उनमें अधिकांश वर्णसंकर तकनीकि से ही विकसित बीजों से आते हैं. इसी प्रकार गाय-भैंस व अन्य पशुओं की अनेक प्रजातियां वर्णसंकर हैं. क्या सगोत्र विवाह को हतोत्साहित करने के साथ-साथ वर्णसंकर संतानों का विरोध करना क्या स्वयं एक विरोधाभास नहीं है?

    आपने गोत्र व्यवस्था की तुलना आयुर्वेद से करने की चेष्टा की है, वह मेरी दॄष्टि में सर्वथा अनुचित है. आयुर्वेद में अलग-अलग गोत्र के लोगों में होने वाले एक ही रोग का उपचार अलग-अलग तरीके से करने की व्यवस्था है क्या? मेरे विचार से नहीं. तो फिर आयुर्वेद और गोत्र व्यवस्था का कोई सम्बन्ध नहीं है. अत: सदियों से चली आ रही किन्हीं दो परम्पराओं में से एक को स्वीकार करना और दूसरी को अस्वीकार करना कोई विरोधाभास नहीं है, बल्कि सीधी-साधी तार्किक सोच का परिणाम है. और ऐसी सोच में अंग्रेजों का कोई योगदान नहीं, बल्कि ऐसी सोच हमारे अपने उपनिषदों से मिली प्रेरणा का फल है, जिनमें कहा गया है, नेति नेति!

    नेति-नेति…

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  7. नाम – संजय
    जाति- तिवारी (तिवारी में भी “मणि” तिवारी)
    वर्ण- ब्राह्मण (सरयूपारीण)
    धर्म- सनातन (वैष्णव)
    गोत्र – शांडिल्य
    :
    :
    वैसे ही आज मेरे लिए भी इस परिचय का मतलब नहीं रह गया है. रोजी, रोटी, संबंध और व्यवहार में इन विश्लेषणों का कोई उपयोग नहीं है

    वैसे आपकी इस मोहक सी अबोधता पर मिट मिट जाने का मन है। यदि सब कुछ इतना आदर्श हो गया है तब तो सारा दलित विमर्श ही मूर्खता हो गया- एक उच्‍च कोटि के ब्राह्मण का दावा है कि आजकल व्‍यवहार से इन सब वर्गीकरणों का लोप हो गया। गोत्र तो उसकी ‘वैज्ञानिकता’ के कारण स्‍वीकार्य होने चाहिए- सदके जाएं।

    जो वर्णसंकर हैं- उनका क्‍या करेंगे पंडितजी–जीने का अधिकार छीन लेंगे। अमरीका सारा वर्णसंकर है- भारत के सारे मुसलमान भी- क्‍या आदेश है आपका- मिटा दें धरा से- आज्ञा दें परशुराम।

    ऐसा नहीं कि हैवानगी के पक्ष में तर्क नहीं हो सकते, हो सकते हैं पर वि‍वेक हैवानगी के पक्ष में कभी नहीं हो सकता।

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  8. लेकिन हत्या को जायज कैसे ठहराया जा सकता है। बर्बरता तो बर्बरता है, वह न तो छोटी होती है न ही बड़ी।

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  9. जहाँ तक गोमांस भक्षण की प्रथा का ज़िक्र है, उसका उल्लेख तो स्पष्टतः ऋग्वेदादि संहिताओं में है। वैदिक युग में “मधुपर्क” नामक प्रथा प्रचलित थी, जिसमें अतिथि के सामने खाने के लिए शहद के साथ गाय, बैल आदि का मांस प्रस्तुत किया जाता था। हालाँकि आपने जो अर्थ बताया है, योगशास्त्र में वही अर्थ सही है।

    योग और आयुर्वेद, दोनों ही काफ़ी वैज्ञानिक हैं। कम-से-कम इनका प्रयोग करने पर स्वास्थ्य अच्छा होता है, यह बात सिद्ध है। इनका प्रयोग कर खुद इसका अनुभव किया जा सकता है। सगोत्र विवाह से ऐसा क्या विशेष लाभ होता है? इतर गोत्र में विवाह से क्या हानि होती है? कुछ भी नहीं। परम्परा से प्राप्त ज्ञान (जैसे योगायुर्वेदादि) को सहेजना और तथ्यहीन बातों (जैसे गोत्रादि) को छोड़ना ही उचित जान पड़ता है।

    हालाँकि आपने जातिव्यवस्था के योगदान का तो उल्लेख किया है, लेकिन इसके दुष्परिणामों का ज़िक्र नहीं किया। क्या आपको लगता है कि दुष्परिणामों की अपेक्षा इसके लाभ अधिक हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता है। हाँ, इतना अवश्य है कि अपने मूल वैदिक रूप में जाति व्यवस्था एक हितकारी व्यवस्था ज़रूर है। वर्तमान रूप दोषों से परिपूर्ण है।

    इसी तरह आपने वर्णसंकरता की बात उठाई है। वैज्ञानिक तथ्य है कि वर्णसंकर जाति (मनुष्य, फल या जानवर; सभी की) उन दोनों जातियों से उत्तम होती है, जिनके संकरण से नई जाति की उत्पत्ति हुई है। वैसे भी वेदों (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद) में कहीं भी सगोत्र विवाह को अनिवार्य नहीं कहा गया है। यह बाद के कुछ स्मृतिकारों का मत है। और स्मृतियों में ही यह भी स्पष्ट लिखा है कि स्मृति केवल समयोपयोगी नियमों का संकलन भर हैं और यदि उनमें कुछ भी वेदविरुद्ध है तो वह सर्वथा त्याज्य है।

    हिन्दू धर्म को वैदिक धर्म कहा जाता है, क्योंकि यह वेदों पर प्रतिष्ठापित है। यदि स्मृतियों पर होता, तो वैदिक की बजाय स्मार्त्य धर्म कहलाता। स्मृतियों में कई देशाचारों का उल्लेख है, जो वेदविरुद्ध होने से त्याज्य हैं; जैसे कि छूआ-छूत आदि।

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  10. क्षमा चाहता हूं. ऊपर की गई टिप्पणी में मेण्डल की जगह मेण्डलीफ़ लिख गया हूं.

    प्रतीक भाई, आपने बहुत अच्छे रूप से पूरी चर्चा का सार कम से कम शब्दों में रखा, आपको बधाई.

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  11. बहुत अच्छा लिखा संजीव जी, आपसे सहमत हूँ (कुछेक बातें छोड़कर)

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