ब्राह्मण हूं, ब्राह्मणवादी नहीं

कुल-गोत्र के सवाल पर मैंने जो कुछ लिखा उसपर जिन्होंने प्रशंसा की उनका धन्यवाद. जिन्होंने आलोचना से सचेत किया उनका भी धन्यवाद और जो तटस्थ रहे, उनके बारे में समय लिखेगा उनका भी इतिहास की तर्ज पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूंगा. इस मसले पर मैं इष्टदेव और देवाशीष की उन टिप्पड़ियों से सहमत हूं जो उन्होंने रवीश कुमार के लेख पर की हैं. अभय तिवारी अपनी टिप्पणी में खेचरी मुद्रा को ग्यारहवीं सदी में गुरू गोरखनाथ द्वारा दिया गया बता रहे हैं. अभय भैया कहते हैं – आहत न हो.. इतिहासकारों को गाली न दें.. संयत स्वर से सुनें, सवाल करें.. अपने धर्मग्रंथ पढ़ें.. किसी को गाली देने की ज़रूरत न होगी.. और न ये कहने की कि वो इतिहासकार किसी के सिखाने पर बोल रहा है.. और उसके स्रोत क्या है..

पहली बात, सनातन धर्म में कुछ भी नया पैदा नहीं होता. यहां सबकुछ पुनश्च है. पुनरपि जननम्, पुनरपि मरणम्, पुनरपि जननी जठरे शयनम् … इसे समझने के लिए जीवन की उस शास्वत अवधारणा को समझना होगा जो लंबवत नहीं, वर्तुल है. विकास की इस वर्तुल अवधारणा में व्यष्टि और समष्टि दोनों का केन्द्र एक है. और दोनों एक दूसरे पर अवलंबित है. व्यष्टि का केन्द्र समष्टि में हैं और समष्टि का केन्द्र व्यष्टि में है और दोनों का केन्द्र परमात्मा में है. जीव, प्रकृति और परमात्मा का यह त्रिकोणीय संबंध एक वर्तुल में चलता है जहां जीव, प्रकृति और परमात्मा तीनों शास्वत हैं लेकिन तीनों का पुनर्जन्म होता है. वेद और मनुस्मृति जिसका सहारा लेकर लोग तर्क-कुतर्क करते हैं वे भी पहले नहीं, आखिरी हैं. यानी इसके पहले वेद भी थे और मनुस्मृति भी. गोरखनाथ ने कहीं यह नहीं कहा है कि यह विद्या मैंने गढ़ी है. जिस खेचरी मुद्रा को आप गोरखनाथ की विधि बता रहे हैं वह तांत्रिक साधना का एक हिस्सा है और स्मृतियां यह कहती हैं कि तंत्र वेद से भी पहले अस्तित्व में आ गये थे. यह देश स्मृतियों की संस्कृति पर चलता है जिसका आशय है विद्या की विस्मृति होती है और युग-काल-परिवेश के अनुकूल होने पर स्मृति जागृत हो जाती है. यह रहस्यवाद है. क्योंकि इतिहास की गपोड़पाजी में यह कहीं अनुकूल नहीं बैठता, और जिस इतिहासकार को यह रहस्य समझ में आ जाये तो फिर उसे यह भी समझ में आ जाता है – ज्ञान बंधः, अगर ज्ञान बंधन है तो फिर कहने और बहस करने के लिए बचा क्या? ज्यादा पीछे क्यों जाएं? महात्मा गांधी ने कहा था – मैं जो कुछ कह रहा हूं इसमें नया कुछ भी नहीं है. और ये वही महात्मा गांधी हैं जो भारतीय वर्ण व्यवस्था को सांगोपांग मानते थे लेकिन इसमें व्याप्त छूआछूत को कलंक मानकर जीवनभर इसके खिलाफ लड़ते रहे. दूसरी ओर अंबेडकर थे जिनके अकाट्य तर्कों का सहारा लेकर लोग-बाग वर्ण व्यवस्था को गाली देते हैं. सही हो या गलत, मैंने अंबेडकर का नहीं, गांधी का रास्ता चुना है.

दूसरी बात, रवीश कुमार अपने तर्क को मजबूत करने के लिए इतिहासकार डी एन झा के सहारे लिखते हैं “गाय पालन आर्यों के सामाजिक जीवन का अहम हिस्सा होता जा रहा था। धीरे धीरे गायों के आस पास सामाजिक ढांचा बनने लगा। गोत्र का संबंध उस बाड़े से हो गया जहां एक समूह विशेष की गायें बांधी जाती थीं। वह समूह वंश में बदलता गया। चूंकि एक गोत्र और दूसरे गोत्र के बीच गायों को लेकर युद्ध होता था इसलिए अलायंस यानी सैन्य गठबंधन बनने की प्रक्रिया शुरू हुई।” आप जानते हैं इतनी कहानी गढ़ने का आधार क्या है? एक शब्द- गोचर. आप गोचर के सहारे यह तर्क गढ़ सकते हैं जो इतिहासकार डी एन झा बता रहे हैं लेकिन तंत्र की शब्दावली में गोचर का मतलब है सांसारिक, जो हमारी परिधि में हो. अगोचर का अर्थ होता है आध्यात्मिक. जो हमारी ज्ञान परिधि के बाहर है. लेकिन उसका अस्तित्व है. अब आप बताईये मैं दूसरे अर्थ के साथ जाता हूं तो क्या मुझे इसका अधिकार नहीं है. मैं अवैज्ञानिक हो गया. जो लोग दूसरे अर्थ से सहमत हैं उनकी समझ पर सवाल खड़ा कर देना कहां तक न्यायसंगत है?

इस देश के लोग स्मृति पर चलते हैं और मैं भी उनमें से एक हूं. बुद्ध के उस उपदेश को मानता हूं जिसमें वे सम्मा सत्ती (सम्यक स्मृति) का उपदेश देते हैं. स्मृति ज्ञान बंधन से परे चेतना की शुद्ध अवस्था है जहां तर्क और युक्ति से परे आप अनुभूति के धरातल पर अपनेआप को और अपने काल-परिवेश को देखते हैं. यहां तर्कों का कोई काम नहीं. क्योंकि एक अवस्था में आपको समझ में आ जाता है तर्क आपको निष्कर्ष पर नहीं पहुंचने देते. मनुष्य जीवन का लक्ष्य तर्कों में उलझना नहीं है. क्योंकि यह खंडन-मंडन की प्रक्रिया अंतहीन होती है.

मुझे तो तुलसीदास की यह वंदना प्रिय है-

भवानी शंकरौ वन्दे, श्रद्धा-विश्वास रुपिणौ
याभ्या बिना न पश्यन्ति, सिद्धास्वांतस्थमीश्वरम् ।।

आप मुझे ज्ञानी समझें तो मुझे क्या मिल जाएगा और मूर्ख समझें तो क्या चला जाएगा? दोनों ही स्थितियों में मैं न कुछ पाता हूं और न कुछ खोता हूं. मैं अपना ब्राह्मण होना नहीं बदल सकता. इस वर्ण के साथ मिली जिम्मेदारियों से मैं भाग नहीं सकता. और इस अनिवार्य शर्त से मैं कभी पीछे नहीं हट सकता कि क्षणभर के लिए भी मुझमें जाति का अहंकार न आने पाये. अगर क्षणभर के लिए यह अहंकार मेरे मन में आता है तो मैं घोर पाप का भागी बनता हूं. ब्राह्मण का अर्थ है जो ब्रह्म में रमण करता है. क्षुद्र बुद्धिवाला क्या ब्रह्म में रमण कर सकता है? फिर मैं जातीय अस्मिता जैसी साधारण बात के लिए परम आनंद से मुख कैसे मोड़ लूं. ब्राह्मण वे नहीं हैं जो ब्राह्मण जाति में पैदा हुए. मेरी समझ यह कहती है ब्राह्मण हैं वे जो ब्रह्म में रमण करने की पात्रता रखते हैं. इस समझ पर पहुंचने के बाद जातियों का अस्तित्व समाप्त हो जाता है. मेरी समझ यह कहती है कि ब्राह्मण किसी भी कुल में पैदा हो सकता है. किसी भी घर में पैदा हो सकता है. किसी भी काल-परिवेश में पैदा हो सकता है और होता भी है. सामाजिक बुराई यहां है कि हम किसी बाभन के घर में ही ब्राह्मण खोजते हैं.

इस सामाजिक सोच का दुष्परिणाम हुआ है कि बाभनों के घर में शूद्रों की पैदाईश में लगातार बढ़ोत्तरी हुई है. ब्राह्मणत्व पाना एक तपस्या है. किसी बाभन के घर पैदा होने से कोई ब्राह्मण हो जाता है यह सोचना ही गलत है. मैं ऐसे समाजिक परिवेश से आता हूं जहां जन्म से निर्धारण होता है कि आप क्या हैं, मुझे कल भी इसपर आपत्ति थी आज भी है और आगे भी रहेगी. लेकिन इसका आशय यह नहीं कि मैं वर्ण व्यवस्था को गाली दे दूं. अपनी इसी समझ से, पूरी जिम्मेदारी के साथ मैं कहता हूं कि मैं ब्राह्मण हूं, ब्राह्मणवादी नहीं.

6 thoughts on “ब्राह्मण हूं, ब्राह्मणवादी नहीं

  1. अच्छा मंथन चल रहा है। आप से लेकर अभय और रवीश अच्छे तथ्य और तर्क पेश कर रहे हैं। उम्मीद है ज्ञानियों के इस मंथन से दिमाग साफ होंगे, भ्रांतियां दूर होंगी। वैसे, एक लेमैन के रूप में गोत्र के बारे में मेरे दिमाग में सवाल ये उठा कि क्या हमारे ऋषि ब्लॉक के सांडों की तरह होते थे कि हर जाति में संतानें पैदा करने चले जाते थे, नहीं तो क्या तुक है कि कश्यप गोत्र के ब्राह्मण भी होते हैं, वैश्य भी और क्षत्रिय भी?

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  2. बहुत अच्छा लगा देखकर कि वर्तमान विमर्श यहां पर भी चल रहे हैं । बढिया है । इस प्रकार का चिन्तन चालू रखा जाए ।ब्राह्मणत्व तो ऐसी प्रव्रित्ति है जो ब्राह्म्ण मे भी मिल जाएगी और उस अन्त्यज मे‍ भी जिसने सत्ता का एक भी सोपान तय कर लिया है । सत्ता तो भ्रष्ट करती ही है । ब्राह्मण के पास हो या शूद्र के पास ।

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  3. जन्मना जायते शूद्र:, संस्कारात् भवेत् द्विज:।
    वेदभ्यासी च भवेत विप्र:, ब्रम्हजानाति ब्राम्हण:।।

    (जन्म से (हर कोई) शूद्र पैदा होता है; संस्कार के द्वारा द्विज बन जाता है; जो वेद का अभ्यास करता है वह विप्र: है; जो ब्रम्ह को जानता है वह ब्राम्हण है।)

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  4. आप कह रहे हैं कि तंत्र वेद से भी पहले अस्तित्व में आ गए थे.. हम मान लेते हैं.. वैदिक संस्कृति और तांत्रिक धारा में कोई ज़्यादा अंतर नहीं.. वेदों में हिंसा भरी पड़ी है.. बौद्धो के कारण हमें उसे त्यागना पड़ा कुछ काल के लिए.. उनकी पराजय के बाद तंत्र के पंच मकार के साथ वापसी
    हुई..फिर सारी धाराए चली.. चल रही हैं..

    गहन विषय है बाते बहुत हो सकती हैं मगर आप ऐसी ज़मीन पर पहुँच गए हैं जहाँ सवाल जवाब बेमानी हो जाते हैं.. सब कुछ गोलाकार तर्क के हवाले कर दिया जाता है.. और फिर आस्था.. खैर.. आप के ही इस गोलाकार तर्क से दो प्रश्न उठ खड़े हुए.. पूछने की धृष्टता कर रहा हूँ..

    क्या अछूत भी पैदा नहीं होते.. हमेशा से थे.. हमेशा रहेंगे.. ?

    अम्बेदकर जैसे व्यक्ति को आप क्या कहेंगे.. जो सारे वेद, ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद, स्मृतियां, पुराण घोट के बैठा है.. मगर उन निष्कर्षों से अलग निष्कर्ष पर पहुँचता है जिन पर हम और आप जैसे लोग बिना पढ़े खड़े रहते हैं.. ? क्या वो ब्राह्मण है या शूद्र.. या अछूत..? यदि वे आप को मिल जाते क्या आप उनके पैर छूते..?

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  5. Sanjay Bhai, Ham aapako padh rahe hai aur aapaka kahana bhi samajh rahe hai ki समय लिखेगा उनका भी aparadh, par jab shastrarth chal raha ho to ham jaiso ko gyan to milabai kar rahaa hai, vaise aap hamare man ki bat kah rahe hai par ham chuki shastrarth ke liye samay nahi nikaal pa rahe hai isaliye chup hai, Thanks

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