शिखरपुरूष ब्लागर का इंटरव्यू

यह अखबार-मैगजीन की नौकरी भी जो न करवाये वाली भिन्नाहट के साथ मैं दफ्तर से निकला. कैमरा, रिकार्डर आदि मेरे झोले में था ही. कल तो काल को समर्पित है वाले दिव्यज्ञान से ओत-प्रोत और इस ज्ञान की तह में छिपी खुन्नस के वशीभूत सोचा ब्लागर से बातचीत आज ही निपटा दें. और थोड़ी देर में मैं ब्लागर गयादीन के साथ था. उनका परिचय देने में कल आ सकता है जो कि पहले ही काल को समर्पित है, इसलिए पेशे-खिदमत है एक ब्लागर से सीधी बातचीत…..(बातचीत को एडिट नहीं किया है, वो हमारे पत्रिकावालों और आपकी सिरदर्दी है.)

सवाल- आप कब से ब्लाग लिख रहे हैं?
जवाब- महोदय, आप अपनी वाणी शुद्ध कर लें, मैं ब्लाग नहीं लिखता, चिट्ठे लिखता हूं.

सवाल – वही, हुए तो ब्लागर ही न.
जवाब- महोदय, आप इस दुनिया को नहीं जानते. इसलिए दूसरी बार मैं आपको अभयदान देता हूं. आगे से ध्यान रखिये मैं चिट्ठा लिखता हूं और चिट्ठाजगत में सम्मानित चिट्ठाकार की हैसियत रखता हूं.

सवाल- लेकिन आपने बताया नहीं, आप लिख कब से रहे हैं?
जवाब- कुछ लोग भले ही पहले चिट्ठाकार होने का दावा करें, लेकिन यथार्थ यह है कि मैं चिट्ठाजगत का आदिपुरूष हूं. मैं 1999 से चिट्ठे लिख रहा हूं, जब से ब्लागर का आविष्कार हुआ है.

सवाल- तब तो इंटरनेट पर हिन्दी दूर की कौड़ी होती थी. आप कैसे लिख लेते थे?
जवाब- आपका चिट्ठाज्ञान उत्तम है. अपने अगले चिट्ठे में मैं आपके चिट्ठाज्ञान का उल्लेख करूंगा. जहां तक मेरे लिखने का सवाल है तब मैं रोमन में लिखा करता था.

सवाल- ऐसे में तो लोगों को पढ़ने-समझने में बहुत दिक्कत आती होगी?
जवाब – (उनके चेहरे के हाव-भाव से साफ था कि वे मन ही मन पुनः मेरे चिट्ठाज्ञान की तारीफ कर रहे हैं) देखिए जैसा मैंने आपको बताया मैं पहला चिट्ठाकार था इसलिए लिखने से लेकर पढ़ने तक सारी जिम्मेदारी मैं अकेले ही उठाता था. पांच सालों तक यही क्रम चलता रहा. जहां तक समझने का सवाल है, तो कोई क्या समझता है इसकी चिंता न तब थी न अब है.

सवाल- फिर पांच साल बाद क्या हुआ?
जवाब – फिर यहां लोग आने लगे. इंटरनेट पर हिन्दी लिखने की छुटपुट तकनीकि भी आ गयी थी. अतः मैंने भी रोमन शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया.

सवाल- उस ब्लाग को तो सहेजकर रखा होगा. क्या एक बार उसे देख सकते हैं?
जवाब- बीत गयी सो बात गयी. आज में जीना सीखो मित्र. कल मैंने हिन्दी के लिए क्या किया था आज उसका परिणाम दिख रहा है. अब कहां रोमन के पीछे पड़ते हो.
(मैं समझ गया उनका चिट्ठा इतिहास संदिग्ध है. बहलहाल यह जाहिर न करते हुए कि मैं उन्हें समझने लगा हूं, मैंने बातचीत जारी रखी.)

सवाल- इस पूरे दौर में उतार-चढ़ाव भी खूब आये होंगे?
जवाब – (थोड़ी देर के लिए वे मौन हो गये. मानों उनके ऊपर विंध्याचल पर्वत गिर पड़ा हो और उन्हें समझ में न आ रहा हो कि इस भार से मुक्ति कैसे मिले. फिर भी वे बोले) चढ़ाव कम, उतार ज्यादा देखे हैं मैंने. तब भी एक-एक टिप्पड़ी की बाट जोहते दिन कटते थे आज भी परिस्थितियां कमोबेश वैसी ही हैं. फिर भी मैंने हिम्मत नहीं हारी है. जननी होने का दुख तो उठाना ही पड़ता है.

(तभी दरवाजे पर कोई आहट सुन उनकी बांछे खिल गयीं. उनके सखा घुरहू थे. बताने की जरूरत नहीं कि उनका पाठक वाला टानिक घुरहू लेकर चलते हैं. कोई पढ़े न पढ़े घुरहू को पढ़ाने में वे कामयाब रहते हैं. मानों चिट्ठाजगत में गयादीन के बचे रहने का श्रेय घूरहू को निर्विवाद रूप से हासिल है.)

सवाल – आप चिट्ठाजगत को आज कहां पाते हैं?
जवाब- यह चिट्ठाकारिता का शैशवकाल है. अभी तो इसके दूध के दांत भी नहीं गिरे. (उनका जननीवाला भाव बरकरार था, जैसे कह रहे हैं अभी इस बच्चे को मेरी बहुत जरूरत है.) आजकल थोड़ी अभद्रता और असहिष्णुता बढ़ गयी है लेकिन मुझे विश्वास है कि यह दौर ज्यादा दिन नहीं रहेगा. थोड़े ही दिनों में लोगों को यह समझ में आ जाएगा कि गाली-गलौज और थुक्का-फजीती से कुछ हासिल नहीं होगा. तब लोग स्वयं से अपने ऊपर अनुशासन रखना शुरू कर देंगे.

(इसके बाद उन्होंने मेरा टेप बंद करवा दिया और बोले)
इन हिन्दीवालों का कुछ नहीं हो सकता. ये जहां पहुंच जाएंगे वहां यही सब करते हैं. इतना बढ़िया माध्यम है. अरे तुम मेरी तारीफ करो, मैं तुम्हारी करता हूं. दोनों खुश. लेकिन अक्ल तो घुटनों में होती है इनके. यहां हर कोई तो विद्वान है. दूसरे को सेटता कहां है. आखिरकार मैं किस बात का शिकार हुआ.. मैं चिट्ठाजगत का शिखरपुरूष था. मेरा कुछ सम्मान वगैरह करते. मुझे स्थापित करते…. उसकी जगह मुझे एक टिप्पड़ी के लिए तरसा कर रख दिया. आखिर मंदिर में कोई मूर्ति रखनी होती है या नहीं. बिना मूर्ति के ही मंदिर बनाये जा रहे हो. अशांति तो होगी ही. (अपने इस तर्क की पुष्टि के लिए उन्होंने घुरहू की ओर देखा जो कि वहां होकर वहां नहीं थे. फिर मेरी ओर देखकर इशारा किया कि मैं टेप फिर से चालू कर सकता हूं.)

सवाल- क्या आप मानते हैं कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का यहां दुरूपयोग हो रहा है?
जवाब- नहीं ऐसा कुछ नहीं है. सदियों की गुलामी से हमारा मन तल्ख हो गया है इसलिए कई बार कुछ लिखते-बोलते समय हम असंयत हो जाते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हमारी प्रज्ञा क्षीण हो गयी है.

सवाल- इस विधा का भविष्य क्या है?
जवाब – अभी तो वर्तमान गड़बड़ाया हुआ है, क्या भविष्य की बात करें. वैसे उत्तम है, यही छापना.

सवाल- अपनी ओर से आप नये ब्लागरों को कोई संदेश देना चाहेंगे?
जवाब- जी जरूर. मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है. जैसे संजय दत्त मुन्नाभाई के रूप में लगा हुआ है वैसे ही नये-पुराने सभी तरह के चिट्ठाकारों को मेरा संदेश है आप लगे रहें. पोस्ट-दर-पोस्ट आपके काम में निखार आना चाहिए. इस बात की चिंता न करें कोई आपको नोटिस करता है या नहीं. एक दिन ऐसा आयेगा जब आपका काम बोलेगा.

(अब इस संक्षिप्त वार्ता को समेटकर मैं चलने की तैयारी करने लगा. यह पक्का हो जाने पर कि मेरा टेप बंद हो चुका है तो मेरे उठते-उठते उन्होंने जो आखिरी वाक्य कहा वह ज्यादा सारगर्भित था. उन्होंने कहा – भैया तिवारी, इंटरव्यू की बात और है लेकिन सच्चाई तो यह है कि यहां आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास….)

7 thoughts on “शिखरपुरूष ब्लागर का इंटरव्यू

  1. बिल्कुल ठीक. हिंदी चिट्ठाकारी में आए दिन पुरोधा, पितामह और शिखर पुरुष ऐसे उग रहे हैं जैसे गेहूं के खेत में मामागेहूँ. उनका असली इंटरव्यू करके उसकी असली प्रस्तुति की जाए तो मुझे भी लगता है कि कुछ ऐसा ही होगा. बधाई आपको.

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  2. असली वाला इण्टरव्यू सांकृत्यायन जी से ही प्रारम्भ करो. और उसमें – मुझे विश्वास है ऑफ द रिकार्ड कुछ नहीं होगा. कम से कम मुझे तो नहीं लगता कि वे छद्म व्यक्तित्व रखते होंगे.
    वैसे सुकुल जी इनके बारे में लिख चुके हैं.
    🙂

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  3. संजय भाई इंटरव्यू की अच्छी प्रस्तुती की है…पढकर मजा आ गया।

    सुनीता(शानू)

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